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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 318 में से

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पृष्ठ 96

कुटिल लिपि. ६७
लिखा है. कुदारकोट के लेख में हलंत का चिह्न ऊपर से तथा वर्तमान चिह्न के समान नीचे से भी
बनाया है. कोटा के लेख में 'अ' (पहिला) वर्तमान नागरी 'अ' से बहुत कुछ मिलता हुआ है और
'त्' को चलती कलम से लिख कर हलंत के चिह्न को मूल अक्षर से मिला दिया है जिससे उसका
रूप कुदारकोट के लेख के 'त्' से भिन्न प्रतीत होता है.
लिपिपत्र २१ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर-
ओं नमः शिवाय ओं नमः स्स(स)कलसंसारसागरो-
त्तारहेतवे । तमोगर्त्ताभिसंपातहस्तालंबाय शम्भवे ॥
श्वेतद्वीपानुकारा X क्वचिदपरिमितैर्रिन्दुपादैः पतद्भिनिर्त्यस्थै-
लिपिपत्र २२ वां.
यह लिपिपत्र चंबा के राजा मेरुवर्मा के ५ लेखों से तय्यार किया है. उक्त लेखों में से गूंगाह
का लेख² शिला पर खुदा है और बाकी के पित्तल की मूर्त्तियों पर³. मूर्त्तियों पर के लेखों से उद्धृत
किये हुए अक्षरों में कितने एक अक्षरों के एक से अधिक रूप मिलते हैं जिसका कारण यह है कि ये
सब लेख एक ही लेखक के हाथ से लिखे नहीं गये और कुछ अक्षर कलम को उठाये बिना लिखे हों ऐसा
प्रतीत होता है. 'न' का पहिला रूप नागरी के 'म' से मिलता हुआ है. उक्त अक्षर का ऐसा रूप
अन्यत्र भी मिलता है (देखो लिपिपत्र २२ में बुचकला के लेख के अक्षरों में). 'न' के तीसरे रूप में
बीच की ग्रंथि उलटी लगाई है, 'र' का दूसरा रूप उलटा लिखा गया है, 'ब' को 'व' के समान
लिखा है और रेफ को पंक्ति के ऊपर नहीं किंतु पंक्ति की सीध में लिखा है.
लिपिपत्र २२ वें की मूल पंक्तियों⁴ का नागरी अक्षरांतर-
ओं प्रासाद⁵ मेरुसदृशं हिमवन्मूर्द्भिः⁶ कृत्वा स्वयं
प्रवरकर्म्मशुभैरनेकः तच्चन्द्रशाल⁷रचितं⁸ नयनाभनाम⁹
प्राग्ग्रीवकैर्व्विविधमण्डपनैः काचित्तैः¹⁰ ॥ तस्याग्रतो वृषभ पी¹¹-
नकपोलकायः संक्षिष्टवक्ष्ककुदोन्नतदेवयानः¹² ओमेरु-
वर्म्मचतुरुदधिकीर्त्तिरेषाः¹³ मातापित्रोः¹⁴ सततात्मफ-
लिपिपत्र २३ वां.
यह लिपिपत्र प्रतिहार राजा नागभट के समय के बुचकला के लेख¹⁵, प्रतिहार बाउक के जोध-
पुर के लेख¹⁶ तथा प्रतिहार कक्कुुक के घटियाले के लेख¹⁷ से तय्यार किया गया है. बुचकला के
लेख में 'न' नागरी के 'म' से मिलता हुआ है, 'ह' की आकृति नागरी के 'ड' के समान है
और 'स' में 'त' उलटा जोड़ा है. जोधपुर के लेख के अधिकतर अक्षर नागरी के समान हो गये हैं.
१. ये मूल पंक्तियां कोटा के लेख से हैं (इं. ऐं; जि. १६, पृ. ५८ के पास का प्लेट ).
२. फो; ऐं. चं. स्टे; प्लेट ११. ३. फो; ऐं. चं. स्टे; प्लेट १०.
४. ये मूल पंक्तियां नंदी की मूर्ति के लेख से उद्धृत की गई हैं (फो; ऐं. चं स्टे; प्लेट १०). इनमें अशुद्धियां
बहुत हैं इस लिये उन्हें मूल के साथ ( ) चिह्न के भीतर नहीं किंतु टिप्पणों में शुद्ध किया है.
५. 'सादं. ६. वन्मूर्ध्नि. ७. 'शाला. ८. 'चितो. ९. नयनाभिरामा.
१०. 'विधमण्डपैनैकै'. ११. 'षभः पी'. १२. 'वक्षःककुदुन्नतदेवयानं.
१३. चतुरुदधिकीर्त्तिरेषा. १४. मातापित्रोः. १५. ऐं. इं; जि. ६, पृ. २०० के पास का प्लेट.
१६. राजपूताना म्युजिअम् (अजमेर) में रक्खे हुए मूल लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से.
१७. प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता जोधपुर के मुन्शी देवीप्रसाद की भेजी हुई छाप से.