प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 111, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें८२ प्राचीनलिपिशाला.
(ई. स. ६४१) के दानपत्रों से तय्यार किया गया है. रणग्रह के दानपत्र का 'ए' लिपिपत्र ३८
में दिये हुए वलभी के राजा शीलादित्य के दानपत्र के 'ए' से मिलता हुआ है.
लिपिपत्र ३९वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
इत्युक्तञ्च भगवता वेदव्यासेन व्यासेन षष्टिवरिष(वर्ष)-
सहस्राणि स्वर्गे मोदति भूमिद (दः) आच्छेत्ता चानुमन्ता
च तान्येव नरके वसे [त्] विन्ध्याटवीष्वतोयासु शुष्ककोटरवा-
सिन [:] क्रि(कृ)ष्णाहयो हि जायन्ते भूमिदानापहारका [:]
लिपिपत्र ४० वां.
यह लिपिपत्र नवसारी से मिले हुए चालुक्य युवराज श्रयाश्रय (शीलादित्य) के कलचुरि सं.
४२१ (ई. स. ६७०) के दानपत्र² और गुजरात के राष्ट्रकूट (राठौड़) राजा कर्कराज (सुवर्णवर्ष)
के शक सं. ७३४ (ई. स. ८१२) के दानपत्र³ से तय्यार किया गया है. कर्कराज के दानपत्र के
'ड' की आकृति नागरी के 'द' की सी है जिसमें, संभव है कि, ग्रंथि से नीचे निकला हुआ अंश 'ढ'
से उक्त अक्षर को भिन्न बतलाने के लिये ही हो. 'ड' का ऐसा ही या इससे मिलता हुआ रूप
लिपिपत्र ३७ और ३८ में भी मिलता है.
लिपिपत्र ४०वें की मूल पंक्तियों⁴ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स वोव्याद्वेधसा येन(धाम) यन्नाभिकमलङ्कृतं । हरश्च
यस्य कान्तेन्दुकलया स(क)मलङ्कृतं ॥ स्वस्ति स्वकीया-
न्वयवङ्श(वंश)कर्त्ता श्रीराष्ट्रकूटामलवङ्श(वंश)जन्मा । प्रदानशूरः
समरेकवीरो गोविन्दराजः क्षितिपो बभूव ॥ यस्या-
⸱⸱⸱मात्तजयिनः प्रियसाहसस्य क्षमापालवेशफलमेव
१२—मध्यप्रदेशी लिपि.
ई. स. की पांचवीं से नवीं शताब्दी के आस पास तक (लिपिपत्र ४१-४२).
मध्यप्रदेशी लिपि का प्रचार मध्यप्रदेश, बुंदेलखंड, हैदराबाद राज्य के उत्तरी विभाग तथा
मईसोर राज्य के कुछ हिस्सों में ई. स. की पांचवीं से नवीं शताब्दी के आस पास तक रहा. यह
लिपि गुप्तों⁵, वाकाटकवंशियों⁶, शरभपुर के