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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 318 में से

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पृष्ठ 112

मध्यप्रदेशी लिपि. ८३
राजाओं¹ तथा कुछ कंदबों² के दानपत्रों या शिलालेखों में मिलती है. इस लिपि के दानपत्र अधिक
और विस्तृत रूप में मिलते हैं, शिलालेख कम और बहुधा छोटे छोटे. इसके अक्षर लंबाई में
अधिक और चौड़ाई में कम होते हैं, उनके सिर चौकूंटे या संदूक की आकृति के बहुधा भीतर से
खाली, परंतु कभी कभी भरे हुए भी, मिलते हैं और अक्षरों की आकृति बहुधा समकोणवाली
होती है (देखो, ऊपर पृ. ४३). इससे इस लिपि के अक्षर साधारण पाठक को विलक्षण प्रतीत
होते हैं परंतु इन दो बातों को छोड़ कर देखा जावे तो इस लिपि में और पश्चिमी लिपि में बहुत
कुछ समता है. इस लिपि पर भी पश्चिमी लिपि की नांई उत्तरी शैली का प्रभाव पड़ा है.

लिपिपत्र ४१ वां.
यह लिपिपत्र वाकाटकवंशी राजा प्रवरसेन (दूसरे) के दूदिया³ सिवनी⁴ और चम्मक५
के दानपत्रों से तय्यार किया गया है. दूदिया तथा सिवनी के दानपत्रों के अक्षरों के सिर
चौकूंटे और भीतर से खाली हैं तथा अधिकतर अक्षर समकोणवाले हैं, परंतु चम्मक के दानपत्र
के अक्षरों के चौकूंटे सिर भीतर से भरे हुए हैं और समकोणवाले अक्षरों की संख्या कम है.
दूदिया के दानपत्र से उद्धृत किये हुए अक्षरों के अंत में जो 'इ', 'ऊ' और 'औ' अक्षर दिये हैं
वे उक्त दानपत्र से नहीं हैं. 'ऊ' अजंटा की गुफा के लेखसंख्या ३ की पंक्ति १७ से⁶ और 'औ' महासु-
देवराज के रायपुर के दानपत्र की १० वीं पंक्ति७ से लिया है. उक्त तीनों दानपत्रों में कोई प्रचलित
संवत् नहीं दिया परंतु यह निश्चित है कि प्रवरसेन (दूसरा) गुप्तवंशी राजा चंद्रगुप्त दूसरे (देवगुप्त)
की पुत्री प्रभावतीगुप्ता का पुत्र था और चंद्रगुप्त दूसरे के समय के लेख गुप्त संवत् ८२ से ९३
(ई. स. ४०१-१२) तक के मिले हैं. ऐसी दशा में प्रवरसेन (दूसरे) का ई. स. की पांचवीं शताब्दी
के प्रारंभ के आस पास विद्यमान होना निश्चित है.

लिपिपत्र ४१वें की मूल पंक्तियों८ का नागरी अक्षरांतर—
दृष्टम् प्रवरपुरात् अग्निष्टोम(मा)प्तोर्यामोक्थ्यषोडश्यतिरा(रा)त्रवाज-
पेयबृहस्पतिसवसाद्यश्क्रचतुरश्वमेधयाजिनः विष्णुवृद्धसगो-
त्रस्य सम्राटः(ज्ञो) वाकाटकानाममहाराजश्रोप्रवरसेनस्य सूनोः
सूनोः अत्यन्तस्वामिमहाभैरवभक्तस्य अंसभारसन्निवेशितशि···लि-

लिपिपत्र ४२ वां.
यह लिपिपत्र बालाघाट से मिले हुए वाकाटकवंशी राजा पृथिवीसेन (दूसरे) के९, खरिअर से
मिले हुए राजा महासुदेव१० के और राजीम से मिले हुए राजा तीवरदेव के११ दानपत्रों से तय्यार किया
गया है. तीवरदेव के दानपत्र में 'इ' की दो बिंदियों के ऊपर की आड़ी लकीर में विलक्षण मोड़ डाला है.
खरिअर और राजीम के दानपत्रों का समय अनुमान से लगाया है क्योंकि उनका निश्चित
समय स्थिर करने के लिये अब तक ठीक साधन उपलब्ध नहीं हुए.


१. ऍ. इं; जि. ७, पृ. १०४-६. जि. ६, पृ. १७२-३. फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ८१.
२. इं. ऍ; जि. २१, पृ. ६३. रा; ऍ. क; जि. ७, पृ. २०० के पास का सेट.
३. ऍ. इं; जि. ३, पृ. २६० और २६१ के बीच के सेट ४. फ्ली; गु इं; सेट ३५ वां.
५. फ्ली; गु. इं; सेट ३४.
६. आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ५७. ७. फ्ली; गु. इं; प्लेट २७.
८. ये मूल पंक्तियां प्रवरसेन (दूसरे) के दूदिया के दानपत्र से हैं.
९. ऍ. इं; जि. ६, पृ. २७० और २७१ के बीच के प्लेटों से.
१०. ऍ. इं; जि. पृ. १७२ और १७३ के बीच के प्लेटों से. ११. फ्ली; गु. इं; प्लेट ४५ से.