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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 318 में से

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पृष्ठ 101

७२ प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र २५ वें की मूल पंक्तियों १ का नागरी अक्षरांतर—
आरामोद्यानवापौषु देव्वायतनेषु च । कृतानि क्रियमाणा-
नि यस्याः कर्माणि सर्व्वदा ॥ दीनानाथविपन्नेषु करुणान्वि-
तचेतसः । सत्त्वेषु भुञ्जते यस्या विप्रसंघा दिने दिने ॥
इत्थं विविक्तममयोः परिवर्द्धमानधर्म्मप्रव(ब)न्धविगलत्कलिकालवृ-
लिपिपत्र २६ वां.
यह लिपिपत्र कन्नौज के गाहडवालवंशी राजा चंद्रदेव और मदनपाल के वि. सं. ११५४ (ई. स.
१०६८) के दानपत्र², हस्तलिखित पुस्तकों³ तथा हैहय (कलचुरि) वंशी राजा जाजल्लदेव के समय के
शिलालेख४ से तय्यार किया गया है. चंद्रदेव के दानपत्र की 'इ' के परिवर्तित रूप से वर्तमान नागरी का 'इ'
बना है (देखो, लिपिपत्र ८२ में 'इ' की उत्पत्ति). 'धा' में 'आ' की मात्रा की खड़ी लकीर को 'ध' के मध्य
से एक नई आड़ी लकीर खींच कर जोड़ा है, जिसका कारण यह है कि 'ध' और 'व' के रूप बहुधा
एकसा बन गये थे जिससे उनका अंतर बतलाने के लिये 'ध' बहुधा बिना सिर के लिखा जाता था, यदि
कोई कोई सिर की लकीर लगाते थे तो बहुत ही छोटी. ऐसी दशा में 'ध' के साथ 'आ' की मात्रा सिर
की आड़ी लकीर के साथ जोड़ी नहीं जाती थी, क्योंकि ऐसा करने से 'धा' और 'वा' में अंतर नहीं रहता.
इसी लिये 'धा' के साथ की 'आ' की मात्रा मध्य से जोड़ी जाती थी. चंद्रदेव के दानपत्र के अक्षरों की पंक्ति
के अंत का 'म' उक्त दानपत्र से नहीं किंतु चंद्रदेव के वंशज गोविंदचंद्र के सोने के सिक्के पर के लेख से
लिया गया है और इसीसे उसको अंत में अलग धरा है. जाजल्लदेव के लेख में हलंत और अवग्रह के
चिह्न उनके वर्तमान चिन्हों के समान ही हैं. उक्त लेख के अक्षरों के अंत में 'इ' और 'ई' अलग दिये गये
हैं जिनमें से 'इ' बीजोल्यां (मेवाड़ में) के पास के चट्टान पर खुदे हुए चाहमान (चौहान) वंशी
राजा सोमेश्वर के समय के वि. सं. १२२६ (ई. स. ११७०) के लेख से लिया गया है और 'ई' चौहान
वंशी राजा पृथ्वीराज (तीसरे) के समय के वि. सं. १२४४ (ई. स. ११८७) के बीसलपुर (जयपुर राज्य
में) के लेख से लिया गया है. उक्त दोनों अक्षरों के ऐसे रूप अन्यत्र कहीं नहीं मिलते.
लिपिपत्र २६ वें की मूल पंक्तियों५ का नागरी अक्षरांतर—
तद्वंश्यो हैहय आसीद्यतो जायन्त हैहयाः ।......त्यसेन-
प्रिया सतौ ॥ ३ ॥ तेषां हैहयभूभुजां समभवद्वंसे(शे) स चेदीश्व-
रः श्रीकोकल्ल इति स्मरप्रतिक्षतिर्विश्व(श्व)प्रमोदो यतः । येनायं
चितसौ(श्रौ)धा......मेन मातुं यशः स्वीयं प्रेषितमुच्चकैः
कियदिदि त्र(ब्र)ह्मांडमन्तः क्षिति ॥ ४ ॥ अष्टादशस्य रिपुकुंभिवि-
लिपिपत्र २७ वां.
यह लिपिपत्र आबू के परमार राजा धारावर्ष के समय के वि. सं. १२६५ (ई. स. १२०८)
के ओरिआगांव के लेख६, जालोर के चाहमान (चौहान) राजा चाचिगदेव के समय के वि. सं. १३२१ (ई. स-
१. ये मूल पंक्तियां राजा लल्ल के समय के उपर्युक्त देवल के लेख से हैं. २. इं. ऐं; जि. १८, पृ. १९ के पास का प्लेट.
३. बृ. इं. ऐ; प्लेट ६, अक्षरों की पंक्ति १५-१६. ४. ऐ. इं; जि. १, पृ. ३४ के पास का प्लेट.
५. ये मूल पंक्तियां हैहयवंशी राजा जाजल्लदेव के रतनपुर के लेख से हैं (ऐं. इं; जि. १, पृ. ३४ के पास का प्लेट).
६. राजपूताना म्यूज़िअम (अजमेर) में रक्खे हुए उक्त लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से.