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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 100

नागरीलिपि. ७१
लिपिपत्र २४ वां.
यह लिपिपत्र मोरवी से मिले हुए राजा जाईंकदेव के गुप्त संवत् ५८५ (ई. स. ९०४) के
दानपत्र १, अलवर से मिले हुए प्रतिहार राजा विजयपाल के समय के वि. स. १०१६ (ई. स. ९५६) के
शिलालेख २ और नेपाल से मिली हुई हस्तलिखित पुस्तकों ३ से तय्यार किया गया है. जाईंकदेव के
दानपत्र के अक्षरों की आकृति कुटिल ४ है परंतु लिपि नागरी से मिलती हुई ही है, केवल ख, घ, ङ,
ड, थ, ध, न, फ और म अक्षर वर्तमान नागरी से कुछ भिन्न हैं.
लिपिपत्र २४ वें की मूलपंक्तियों ५ का नागरी अक्षरांतर—
षष्टिवरिष(वर्षे)सहस्राणि स्वर्गे तिष्ठति भूमिदः ।
आछेत्ता [चा]नुमंता च तान्येव नरकं वसेत् । स्वदत्तां
परदत्तां वा यो हरेतु(त) वसुंधरां । गवां शतस-
हस्तस्य ह(हं)तुः प्राप्नोति किल्बि(ल्बि)षं ॥ विंध्याटवीष्व-
लिपिपत्र २५ वां.
यह लिपिपत्र छिंदवंशी लल्ल के वि. सं. १०४६ (ई. स. ९६२) के देवल के लेख ६ से, परमार
राजा भोजरचित ‘कूर्मशतक’ नामक दो काव्यों से, जो धार से शिलाओं ७ पर खुदे हुए मिले
हैं, और परमार राजा उदयादित्य के समय के उदयपुर ८ तथा उज्जैन ९ के लेखों से, तय्यार किया गया
है. देवल के लेख में ‘अ’ नागरी का सा बन गया है क्योंकि उसकी खड़ी लकीर के नीचे के
अंत में बाईं ओर से तिरछी रेखा जोड़ी है. यही तिरछी रेखा कुछ काल के अनंतर ‘अ’ की
बांई तरफ़ की तीन तिरछी लकीरों में से तीसरी बन गई जो वास्तव में अक्षर में सुंदरता लाने के विचार
से जोड़ी जाती थी. कूर्मशतक के अक्षरों में ‘इ’ और ‘ई’ में ऊपर की दो बिंदियों के बीच की वक्र
रेखा, उन्हींके नीचे की तीसरी बिंदी के स्थानापन्न ७ चिह्न के अंत का बाईं तरफ़ से दाहिनी तरफ़ बढ़ा
हुश्रा घुमाव, एवं ‘ऊ’ और ‘ओ’ के नीचे के भाग का वैसा ही घुमाव, केवल सुंदरता के विचार से ही हैं.
उदयादित्य के उदयपुर के लेख में ‘इ’ की जो आकृति मिलती है वह तीन बिंदीवाले ‘इ’ का रूपांतर
है और उसे सुंदर बनाने के विचार से ही इस विलक्षण रूप की उत्पत्ति हुई है. उदयादित्य के
उज्जैन के लेख के अंत में उस समय की नागरी की पूरी वर्णमाला, अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय और
उपध्मानीय के चिह्नों सहित खुदी है, जिससे ई. स. की ११वीं शताब्दी में ऋ, ॠ, ऌ और ॡ के रूप
कैसे थे यह पाया जाता है.
१. इं. पँ.; जि. २, पृ. २५८ के पास का शेट. २. उदयपुर निवासी कुंवर फतहलाल मेहता की भेजी हुई उक्त लेख की छाप से.
३. बु; इं. पे; प्लेट ६, प्राचीन अक्षरों की पंक्ति ७ से.
४. भिन्न भिन्न लेखकों की लेखन शैली भिन्न मिलती है. कोई सरल अक्षर लिखता है तो कोई टेढ़ी मेढ़ी आकृति
के अर्थात् कुटिल. ऐसी दशा में लिपिविभाग निश्चय रूप से नहीं हो सकते.
५. ये मूल पंक्तियां जाईकदेव के उपर्युक्त दानपत्र से हैं.
६. पँ. इं; जि. १, पृ. ७६ के पास का प्लेट. ७. ऍ. इं; जि. ८, पृ. २४८ और २६० के बीच के ३ प्लेट.
८. ऍ. इं; जि १, पृ. २३४ के पास का प्लेट.
९. उज्जैन में महाकाल के मंदिर के पीछे की एक छत्री में खड़ी हुई शिला पर खुदी हुई प्रशस्ति की अपने हाथ से
तय्यार की हुई छाप से.
यह शिला उदयादित्य के समय की किसी प्रशस्ति की अंतिम शिला है जिसमें ८० के पीछे के थोड़े से श्लोक हैं. इसमें
संवत् नहीं है, परंतु पत्थर का जो अंश खाली रह गया उसपर प्रशस्तिलेखक के हाथ से ही लिखी हुई पूरी वर्णमाला तथा
नाग के ग्रंथिल चित्र के भीतर धातुओं के प्रत्यय आदि खुदे हैं (जैसे कि धार से मिले हैं) और अंत के श्लोक में
“उदयादित्यदेवस्य वर्धनाक्षकृपाथिका” खुदा है जिससे उक्त प्रशस्ति का उदयादित्य के समय का होना पाया जाता है.