प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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नागरीलिपि ६६
उत्तरी भारत में नागरी का प्रयोग ई. स. की १०वीं शताब्दी के प्रारंभ के आसपास से
मिलता है और यह पहिले पहिल कन्नौज के प्रतिहारवंशी राजा महेंद्रपाल ( प्रथम ) के दिघवाद-
बौली से मिले हुए वि. सं. ६५५ के दानपत्र¹ में मिलती है. तदनंतर उसी वंश के अन्य
राजाओं²; मेवाड़, वागड़ आदि के गुहिलवंशियों³; सांभर, अजमेर, नाडौल, जालौर,
चंद्रावती ( आबू ) आदि के चाहमान (चौहान)वंशियों; कन्नौज के गाहडवालों⁴; हथुंडी,
धनोप, बदाऊं आदि के राष्ट्रकूटों⁵; काठियावाड़, लाट और गुजरात ( अणहिलवाड़ा ) के चौलुक्यों⁶
( सोलंकियों ); आबू और मालवा आदि के परमारों⁷; ग्वालियर, दूबकुंड, नरवर आदि के कच्छप-
घात⁸ ( कछवाहा ) वंशियों; जेजाकभुक्ति ( जझौती=बुंदेलखंड ) के चंद्रात्रेय(चंदेल)वंशियों⁹; त्रिपुरी
( तेवर ), रत्नपुर आदि के हैहय ( कलचुरि ) वंशियों