सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 110

पश्चिमी लिपि. ८१
हैं (देखो 'णां' और 'दृः') और हलंत अक्षर को उसके पहिले अक्षर के नीचे लिखा है (देखो
'पत्' 'शत्' और 'सेत्').
लिपिपत्र ३७वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
स्वस्ति वलभि(भी)तः प्रसभप्रणतामित्राणां मैत्रकाणामतु-
लबलसपत्नमण्डलाभोगरुंसक्तसंप्रहारशतलब्धप्रतापः
प्रतापः² प्रतापोपनतदानमानाज्र्ज्जवोपार्जितानुरागेानुरक्तमौ-
लभृतमित्रश्रेणीबलावाप्तराज्यश्रिः (श्रीः) परमम(मा)हेश्वरः श्रि(श्री)सेना-
पतिभटाकंस्तस्य सुतस्तत्पादरजोरुणावनतपविचि(त्री)कृतशिराः
लिपिपत्र ३८ वां.
यह लिपिपत्र पालीताना से मिले हुए गारुलक सिंहादित्य के गुप्त सं. २५५ (ई. स. ५७४)
के दानपत्र³ और वलभी के राजा शीलादित्य (पांचवें) के गुप्त सं. ४०३ (ई. स. ७२२) के दान-
पत्र⁴ से तय्यार किया गया है. शीलादित्य के दानपत्र में 'इ' के चार टुकड़े किये हैं, जिनमें से
नीचे की दो रेखाएं तो दो बिंदियों के स्थानापन्न हैं और ऊपर की दो तिरछी रेखाएं, सीधी आड़ी
लकीर के खमदार रूप के ही हिस्से हैं जो जुड़े हुए होने चाहिये थे. 'ए' का रूप विलक्षण बना
है परंतु वह लिपिपत्र ३७वें में दिये हुए 'ए' का त्वरा से लिखा हुआ विकृत रूप ही है. 'ऐ'
में ऊपर की खमदार आड़ी रेखा का खम के पूर्व का हिस्सा 'ए' के अग्रभाग की बाईं ओर
जुड़नेवाली रेखा का गोलाईदार रूप ही है और बाकी का भाग 'ए' का है. 'ल्ल' में ऊपर
का आधा भाग 'ल' (दूसरे) का रूप है और नीचे का आधा भाग 'ल' (तीसरे) का कुछ
विकृत रूप है. इस तरह दो प्रकार के 'ल' मिलकर यह रूप बना है.
लिपिपत्र ३८ वें की मूल पंक्तियों⁵ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति फङ्गप्रसवणात्प्रकृष्टकर्म्माम्भोङ्गताभ्युदया-
न्निभूताशेषदिषामनेकस मरशतसं पातात्यन्त विजयिना (नां)
प्रभृतयश कौत्यों लङ्कारालङ्कतान्यवयभुवां गारुलकानां
वंश्या(वंशा)नुक्रमेणाविर्भूतो दीनानाथाश्रितार्त्तिबान्धवजनो-
पजीव्यमानविभवविस्तरः तरुरिवाक्षीणफलच्छायातयैका-
लिपिपत्र ३६ वां.
यह लिपिपत्र त्रैकूटकवंशी राज दह्रसेन⁶ के कलचुरि संवत् २०७ (ई. स. ४५६) के, गुर्जर-
वंशी रणग्रह⁷ के कलचुरि सं. ३६१ (ई. स. ६४०) के और दह्र⁸ (दूसरे) के कलचुरि सं. ३६२
१. ये मूल पंक्तियां धरसेन (दूसरे) के दानपत्र से हैं. २. 'प्रतापः' शब्द यहां पर अनावश्यक है.
३. ऍ. इं; जि. ११, पृ. १८ और १६ के बीच के प्लेटों से. ४. ज. बंब. ए. सो; जि. ११, पृ. ३६३ के पास के प्लेट १ A. B. से.
५. ये मूल पंक्तियां गारुलक सिंहादित्य के दानपत्र से हैं.
६. ऍ. इं; जि. १०, पृ. ५३ के पास के सेट से. ७. ऍ. इं; जि. २, पृ. २१ के पास के सेट से.
८. ऍ. इं; जि. ५, पृ. ४० और ४१ के बीच के सेटों से.