प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 114, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंके दानपत्रों के अक्षरों के सिर चौकूंटे नहीं किंतु छोटी सी आड़ी लकीर से बने हुए हैं. इस
लिपिपत्र की लिपियों का समय केवल अनुमान से ही लिखा है.
लिपिपत्र ४३वें की मूल पंक्तियों का१ नागरी अक्षरांतर—
जितं भगवता श्रीविजयपलक्कडस्थानात् परम्ब्रह्म-
ण्यस्य स्वबाहुबलाज्जितोर्जितक्षात्रतपोनिधेः विहि-
तसर्व्वमर्यादस्य स्थितिस्थितस्यामितात्मनो महाराज-
स्य श्रीस्कन्दवर्म्मणः प्रपौत्रस्यार्जितशक्तिसिद्धिसम्पन्न-
स्य प्रतापोनतराजमण्डलस्य महाराजस्य वसु-
धातलैकवीरस्य श्रीवीरवर्म्मणः पौत्रस्य देवद्विज-
लिपिपत्र ४४ वां.
यह लिपिपत्र देवगिरि से मिले हुए कदंबवंशी राजा मृगेशवर्मन्२ और काकुस्थवर्मन्३ के दान-
पत्रों से तय्यार किया गया है. इनके अक्षरों के सिर चौकूंटे परंतु भीतर से भरे हुए हैं और कितने
ही अक्षरों की आड़ी लकीरें विशेष कर खमदार बनती गई हैं (देखो, मृगेशवर्मन् के दानपत्रों में इ, ख,
ज, ट, ड, घ, ब, भ, म, व और ह, और काकुस्थवर्मन् के दानपत्र में इ, ख, च, ढ, द, ल आदि).
लिपिपत्र ४४वें की मूल पंक्तियों४ का नागरी अक्षरांतर—
सिद्धम् ॥ जयत्यहं [स्तलोकेशः सर्व्वभूतहिते रतः रागा-
द्यैरहरोनन्तोऽनन्त[नन्द]गौश्वरः ॥ स्वस्ति विजयवैज[य]न्त्या [:] स्वामिम-
हासेनेनमातृगणानुद्ध्या (ध्या) ताभिषिक्तानां५ मानव्यसगोत्राणां६ हारितिपू-
त्राणां (णां) तां (आं) गिरसां प्रतेहृतस्वाद्ध्या (ध्या) यचर्चकाना (नां) सद्द्धर्म्मसंदर्बाना (नां)
कदंबानां अनेकजन्मान्तरोपाज्जितविपुलपुण्यस्कन्धः वाहवाज्जित-
लिपिपत्र ४५ वां.
यह लिपिपत्र चालुक्यवंशी राजा मंगलेश्वर के समय के शक सं. ५०० (ई. स. ५७८) के
शिलालेख७, उसी वंश के राजा पुलकेशिन् (दूसरे) के हैदराबाद (निज़ाम राज्य में) से मिले हुए
शक सं. ५३४ (ई. स. ६१२) के दानपत्र८ और पूर्वी चालुक्य राजा सर्वलोकाश्रय (विजयसिद्धि,
मंगियुवराज) के राज्यवर्ष दूसरे (ई. स. ६७३) के दानपत्र९ से तय्यार किया गया है. मंगलेश्वर
१. ये मूल पंक्तियां उरुवुपल्लि के दानपत्र से हैं.
२. इं. ऐं; जि. ७, पृ. ३५ के सामने के प्लेट से. ३. इं. ऐं; जि. ६, पृ. २४ और २५ के बीच के प्लेटों से.
४. ये मूल पंक्तियां मृगेशवर्मन् के दानपत्र से हैं.
५. "भिषिक्तानां' के 'ना' के पीछे ठीक वैसा ही चिह्न है जैसा कि मृगेशवर्मन् के दानपत्र से दिये हुए अक्षरों में
'हिः' के विसर्ग के नीचे की बिंदी के स्थान में पाया जाता है. संभव है कि यह अनुस्वार का चिह्न हो (न कि 'म्' का)
जो अक्षर के ऊपर नहीं किंतु आगे धरा हो. इस प्रकार का चिह्न उक्त दानपत्र में तीन जगह मिलता है, अन्यत्र अनुस्वार
का नियत चिह्न सर्वत्र अक्षर के ऊपर ही धरा है.
६. यहां भी ठीक वही चिह्न है जिसका विवेचन टिप्पण ५ में किया गया है.
७. इं; ऐं; जि. १०, पृ. ५८ के पास के प्लेट से. ८. इं. ऐं; जि. ६, पृ. ७२ और ७३ के बीच के प्लेटों से.
९. ऐं. इं; जि. ८, पृ. २६८ और २६९ के बीच के प्लेटों से.