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प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

ब्राह्मी लिपि. ५६
उक्त अक्षर का कुछ परिवर्तित रूप है१. 'म' जुन्नर के लेख के 'मि' में जो 'म' अक्षर है उसका विकार
मात्र है२. 'स' की बाईं तरफ़ लगनेवाली वक्र रेखा को अक्षर के मुख्य अंश से अलग कर उसको
दाहिनी तरफ़ अधिक ऊपर बढ़ाने से यह विलक्षण 'स' बना है.
लिपिपत्र १३ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
...३चौपुरातो युवमहाराजो भारदायसगोत्तो प-
ल्लवानं सिवखंदवम्मो धंजकड़े वापतं आन-
पयति अम्हेहि दानि अंह वेजयिके धंमा-
युबलवधनिके य बम्हनानं अगिवेससगो-
लिपिपत्र १४ वां.
यह लिपिपत्र कोंडमुडि से मिले हुए राजा जयवर्मन् के दानपत्र४ से तय्यार किया गया है.
इसमें 'ई' की खड़ी लकीर को तिरछा कर दिया है. 'ड' और 'न' में स्पष्ट अंतर नहीं है. 'ज',
'न', 'म' और 'स' अक्षर लिपिपत्र १३ के उक्त अक्षरों से मिलते जुलते ही हैं इतना ही नहीं किंतु
इस दानपत्र की लिपि बहुधा वैसी ही है जैसी कि लिपिपत्र १३ वें की है.
लिपिपत्र १४ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
विजयखंधावारा नगरा कूटूरातो महेस्वरपादप-
रिगहिते बृहत्फलायनसगोतो राजा सिरिजय-
वंमो आनपयति कूटूरे वापतं अंम्हे दानि
अंम्हवेजयिके आयुवर्धनिके च बम्हनानं
गोतमसगोत्तजायाणरस सवगुतजस ट तानवस
लिपिपत्र १५ वां.
यह लिपिपत्र हीरहडगल्ली से मिले हुए पल्लववंशी राजा शिवस्कंदवर्मन् के दानपत्र५ से
तय्यार किया गया है. इसमें 'इ' और 'ध' की बिंदियों के स्थान में + चिह्न लगाये हैं. 'ए'
की आकृति नागरी के 'व' (बिना सिर के) से कुछ कुछ मिलती हुई बन गई है. 'ब' की बांई
तरफ़ की खड़ी लकीर को भीतर की ओर अधिक दबा कर बीच में गोलाई दी है. 'ब' का यह
रूप दक्षिण की शैली की पिछली लिपियों में बराबर मिलता है. 'म्' को पंक्ति से नीचे लिखा है
और उसके ऊपर के दोनों शृंगों के साथ सिर की छोटी लकीरें नहीं जोड़ी जो सस्वर 'म' के
साथ जुड़ी हुई मिलती हैं. 'गा' के साथ 'आ' की मात्रा नीचे की तरफ़ से लगाई है.
लिपिपत्र १५ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
सिद्धम् ॥ कांचिपुरा अग्गिट्टो(त्थो)मवाजपेयस्समेधयाजी
धम्ममहाराजाधिराजो भारद्वायो पल्लवाण सिव-
खंदवमो अम्ह विसये सव्वत्थ राजकुमारसे-
नापतिरट्ठिकमाडबिकदेसाधिकतादिके गामागाम-
भोजके वल्लवे गोवल्लवे अम्हे आरणधिकते
१. देखो, लिपिपत्र ११ में कार्ले के लेखों के अक्षरों में 'न'. २. देखो, लिपिपत्र ११ में जुन्नर के लेखों का 'मि'.
३. पहिला अक्षर 'कां' है परंतु मूल में स्पष्ट नहीं है. ४. एँ. इं; जि. ६, पृ. ३१५ से ३१९ के बीच के ४ प्लेटों से.
५. एँ. इं; जि. १, पृ. ६-७ के बीच के ३ प्लेटों से.
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziiabad. Digitzed by eGangotri

ई-गुप्तलिपि.
ई. स. की चौथी और पांचवीं शताब्दी ( लिपिपत्र १५-१७ ).
गुप्तों के राज्य के समय सारे उत्तरी भारत में ब्राह्मी लिपि का जो परिवर्तित रूप प्रचलित
था उसका कल्पित¹ नाम 'गुप्तलिपि' रक्खा गया है. यह लिपि गुप्तवंशी राजाओं के, जो उत्तरी
भारत के बड़े हिस्से के स्वामी थे, लेखों में, एवं उनके समकालीन परिव्राजक और राजर्षितुल्य
वंशियों तथा उच्छ्रकल्प के महाराजाओं के दानपत्रादि में, जो अधिकतर मध्यभारत से और कुछ
मध्यप्रदेश से मिले हैं, पाई जाती है. ऐसे ही उक्त समय के अन्य राजवंशियों तथा साधारण
पुरुषों के लेखादि में भी मिलती है. राजपूताना,² मध्यभारत³ तथा मध्यप्रदेश⁴ में गुप्तकाल में भी
कहीं कहीं दक्षिणी शैली की ( पश्चिमी ) लिपि भी मिल आती है, जिसका एक कारण यह भी है
कि लेख को लिखने के लिये बहुधा सुंदर अक्षर लिखनेवाला पसंद किया जाता है और वह जिस शैली
की लिपि का ज्ञाता होता है उसीमें लिखता है. देशभेद और समय के साथ भी अक्षरों की
आकृति में कुछ अंतर पड़ ही जाता है और उसीके अनुसार लिपियों के उपविभाग भी किये जा सकते
हैं परंतु हम उनकी आवश्यकता नहीं समझते.
गुप्तों के समय में कई अक्षरों की आकृतियां नागरी से कुछ कुछ मिलती हुई होने लगीं. सिरों
के चिह्न जो पहिले बहुत छोटे थे बढ़ कर कुछ लंबे बनने लगे और स्वरों की मात्राओं के प्राचीन
चिह्न लुप्त हो कर नये रूपों में परिणत हो गये हैं.
१. गुप्तलिपि का ही नहीं परंतु पृ. ४२-४४ में ब्राह्मीलिपि के विभागों के जो नाम रक्खे गये हैं वे बहुधा सब ही
कल्पित हैं और अक्षरों की आकृति, देश या उन लिपियों से निकली हुई वर्तमान लिपियों के नामों से ही उनके नामों की
कल्पना की गई है. इसी तरह उनके लिये जो समय माना गया है वह भी अनुमानिक ही है क्योंकि कई अक्षरों के वे ही
रूप अनुमान किये हुए समय से पहिले और पीछे भी मिलते हैं.
२. राजपूताने में बहुधा लेख उत्तरी शैली के ही मिलते हैं परंतु गंगधार (झालावाड़ राज्य में) से मिला हुआ वि.
सं. ४८० (ई. स. ४२३) का लेख (फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या १७), जो विश्ववर्मन् का है, दक्षिणी शैली की लिपि का है
और बयाने (भरतपुरराज्य में) के किले (विजयगढ़) में विष्णुवर्द्धन के पुंडरीक यज्ञ के यूप (= स्तंभ) पर खुदे हुए लेख
(फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ५६) में, जो वि. सं. ४२८ (ई. स ३७२) का है, दक्षिणी शैली का कुछ मिश्रण पाया जाता है.
३. मध्यभारत में भी गुप्तकाल के लेख बहुधा उत्तरी शैली के ही मिलते हैं परंतु कहीं कहीं दक्षिणी शैली के भी मिल
आते हैं; जैसे कि चंद्रगुप्त (दूसरे) का सांची का लेख (फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ५); नरवर्मन् का मंदसोर से मिला हुआ
मालव (विक्रम) सं. ४६१ का (पै. इं; जि. १२, पृ. ३२०-२१) और कुमारगुप्त के समय का मालव (विक्रम) सं. ५२६ का
(फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या १८) लेख. उदयगिरि से मिला हुआ चंद्रगुप्त (दूसरे) के समय का एक लेख (फ्ली; गु. इं; लेख-
संख्या ६) उत्तरी शैली की लिपि का है, परंतु वहीं से मिला हुआ उसी राजा के समय का दूसरा लेख (फ्ली; गु. इं; लेख-
संख्या ३) दक्षिणी शैली का है और वहीं से मिले हुए तीसरे लेख की (फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ६१), जो गुप्त संवत १०६
(ई. स. ४२५-६) का है, लिपि उत्तरी शैली की होने पर भी उसमें दक्षिणी शैली का कुछ कुछ मिश्रण पाया जाता है. इस
प्रकार एक ही स्थान के लेखों में भिन्न शैली की लिपियों का मिलना यही बतलाता है कि उनके लेखक भिन्न लिपियों के ज्ञाता
थे न कि देशभेद ही इस अंतर का कारण था.
४. मध्यप्रदेश में भी गुप्तों के समय उत्तरी शैली की लिपि का प्रचार था परंतु कोई कोई लेख दक्षिणी शैली के भी
मिल आते हैं; जैसा कि एरण से मिला हुआ समुद्रगुप्त के समय का लेख (फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या २), परंतु वहीं से मिले
हुए बुधगुप्त और गोपराज के लेख उत्तरी शैली के हैं (फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या १६ और २०).
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziiabad. Digitzed by eGangotri

गुप्त लिपि. ६१
लिपिपत्र १६ वां.
यह लिपिपत्र गुप्तवंशी राजा समुद्रगुप्त के अलाहाबाद के स्तंभ के लेख¹ से तय्यार किया गया
है. इसमें 'इ' का चिह्न दो बिंदियों के आगे एक खड़ी लकीर है. 'उ' की खड़ी लकीर में वक्रता
है और नीचे की आड़ी लकीर गोलाई के साथ दाहिनी तरफ़ ऊपर की ओर मुड़ी है, जैसा कि
दक्षिणी शैली की लिपियों में पाया जाता है. ड, ढ, त, द, प, भ, म और 'ष' (पहिले) के रूप
नागरी से कुछ मिलने लगे हैं. 'ष' (दूसरे) और 'स' के रूपों की आकृतियां कुछ विलक्षण हैं.
लिपिपत्र १६ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
महाराजश्रीगुप्तप्रपौत्रस्य महाराजश्रीघटोत्कचपौत्रस्य महाराजा-
धिराजश्रीचन्द्रगुप्तपुत्रस्य लिच्छविदौहित्रस्य महादेव्यं कुमारदे-
व्यामुत्प(त्प)न्नस्य महाराजाधिराजश्रीसमुद्रगुप्तस्य सर्व्वपृथिवीविजय-
जनितोदयव्याप्तनिखिलावनितलां कीर्त्तिमितस्त्रिदशपतिभवनगमनावा-
प्तललि(डि=लि)तसुखविचरणामाचक्षाण इव भुवो बाहुरयमुच्छ्रितः
स्तम्भः यस्य । प्रदानभुजविक्रमप्रशमशास्त्रवाक्योदयैरुपर्युपरिसं-
चयोच्छ्रितमनेकमागं यशः पुनाति भुवनत्रयं पशुपतेर्ज्टान्तर्गहा-
लिपिपत्र १७ वां.
यह लिपिपत्र गुप्तों के राजत्वकाल के उदयगिरि², मिहरोली³, बिलसद⁴, करंडांडा⁵ और कुड़ा⁶
के शिलालेखों तथा महाराज लक्ष्मण और जयनाथ के दानपत्रों⁷ से तय्यार किया गया है और इसमें
केवल मुख्य मुख्य अक्षर ही उद्धृत किये गये हैं. उदयगिरि के लेख में पहिले पहिल जिह्वामूलीय और
उपध्मानीय के चिह्न मिलते हैं, जो क्रमशः 'क' और 'प' के ऊपर उक्त अक्षरों से जुड़े हुए लगे हैं.
मिहरोली के लेख में कितने एक अक्षर समकोणवाले हैं. 'स्थि' और 'स्थे' में 'स' की आकृति कुछ
विलक्षण हो गई है. ऐसे ही 'स्थि' में 'थ' अक्षर का रूप 'छ' से मिलता हुआ है न कि 'थ' से.
बिलसद के लेख में स्वरों की उन मात्राओं में, जो अक्षरों के ऊपर लगती हैं, अधिक विकास पाया
जाता है और उन्हीं के परिवर्तन से कुटिल लिपि में उनके विलक्षण लंबे रूप बने हैं. करंडांडा के लेख में
'म' की आकृति विलक्षण बनाई है. महाराज लक्ष्मण के पाली गांव के दानपत्र में कहीं कहीं सिरों
तथा खड़ी, आड़ी या तिरछी लकीरों के अंतिम भाग को चीर दो हिस्से बनाकर अक्षरों में सुंदरता
लाने का यत्न किया है. 'म' के नीचे के ग्रंथिवाले हिस्से को बाईं तरफ़ बढ़ा कर लंबी लकीर का
रूप दिया है और 'त्र' में 'र' को नागरी की 'उ' की मात्रा के समान ग्रंथित बनाया है. जयनाथ के
दानपत्र में 'इ' की तीन बिंदियों में से ऊपर की बिंदी के स्थान में आड़ी लकीर बनाई है. 'इ' के इसी
रूप के परिवर्तन से पीछे से नागरी की 'इ' बनी है (देखो लिपिपत्र ८२ में 'इ' की उत्पत्ति). तोर-
माण के कुड़ा के लेख के अक्षरों में 'ग' की बाईं तरफ की खड़ी लकीर को बांईं ओर ऊपर की तरफ
मोड़ा है जिससे उक्त अक्षर का रूप वर्तमान नागरी के 'ग' से मिलता हुआ बन गया है, केवल
सिर की आड़ी लकीर का ही अभाव है.
१. फ्ली; गु. इं; प्लेट १. २. फ्ली; गु. इं; प्लेट ४ (A). ३. फ्ली; गु. इं; प्लेट २१ (A).
४. फ्ली; गु. इं; प्लेट ५. ५. ऍ. इं; जि. १०, पृ. ७१ के पास का प्लेट.
६. ऍ. इं; जि. १, पृ. २४० के पास का प्लेट.
७. लक्ष्मण का दानपत्र-ऍ. इं; जि. २, पृ. ३६४ के पास का प्लेट; और जयनाथ का दानपत्र-फ्ली; गु. इं; प्लेट १६.

६२ | प्राचीनलिपिमला.
लिपिपत्र १७ वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति जयपुरात्परममाहेश्वरः श्रीममहाराजलक्ष्म-
णः कुशली फेलापर्व्वतिकाग्रामे ब्राह्मणादीन्प्रतिवासिकु-
टुम्बिनः समाज्ञापयति विदितं वोस्तु यथैष ग्रा-
मो मया मातापित्रोरात्मनश्च पुण्याभिवृद्धये कौत्सस-

७—कुटिल लिपि.
ई. स. की छठी से नवीं शताब्दी (लिपिपत्र १८ से २३).

ई. स. की छठी से नवीं शताब्दी तक की बहुधा सारे उत्तरी भारतवर्ष की लिपि का, जो
गुप्तलिपि का परिवर्तित रूप है, नाम 'कुटिललिपि' कल्पना किया गया है. 'कुटिलाक्षर' नाम का
प्राचीन प्रयोग² भी मिलता है परंतु वह भी उसके वर्णों और विशेष कर मात्राओं की कुटिल
आकृतियों के कारण रक्खा गया हो ऐसा अनुमान होता है³. इस लिपि के अक्षरों के सिर बहुधा
▾ ऐसे होते हैं परंतु कभी कभी छोटी सी आड़ी लकीर से भी वे बनाये जाते हैं. अ, आ, घ, प, म,
य, ष और 'स' का ऊपर का अंश दो विभागवाला होता है और बहुधा प्रत्येक विभाग पर सिर का चिह्न
जोड़ा जाता है.
यह लिपि मंदसोर से मिले हुए राजा यशोधर्मन् के लेखों⁴, महानामन् के बुद्धगया के लेखों⁵,


¹ ये मूल पंक्तियां पाली गांव से मिले हुए महाराज लक्ष्मण के दानपत्र (पं. इं; जि. २, पृ. ३६४ के पास के प्लेट)
से उद्धृत की गई हैं.
² देवल (युक्तप्रदेश में पीलीभीत से २० मील पर) गांव से मिली हुई वि. सं. १०४६ (ई. स. ९९२) की प्रशस्ति में
'कुटिलाक्षराणि' (विष्णोहरेस्तनयेन च लिखिता गौडेन करणिकेनैषा। कुटिलाक्षराणि विदुषा तच्चादित्याभिधानेन ॥ ऍ. इं; जि. १,
पृ. ८१) और विक्रमांकदेवचरित में 'कुटिललिपिभिः' (नौ कायस्थैः कुटिललिपिभिर्नो विटैश्चाटदत्तैः १८. ४२) लिखा मिलता है.
उनमें 'कुटिल' शब्द क्रमशः अक्षरों तथा लिपि का विशेषण है; परंतु उनमें उस समय की नागरी की, जो कुटिल से मिलती हुई
थी, 'कुटिल' संज्ञा मानी है. मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा अपराजित के समय की वि. सं. ७१८ (ई. सं. ६६१) की प्रशस्ति के
अक्षरों को 'विकटाक्षर' कहा है (यशोभटेन पूज्यसुतकीर्त्तणा विकटाक्षरा ॥ ऍ. इं; जि. ४, पृ. ३२), और अफसद के लेख में
(फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ४२) 'विकटाक्षराणि' लिखा मिलता है. 'विकट' और 'कुटिल' दोनों पर्याय हैं और
अक्षरों की आकृति के सूचक हैं.
³ कुटिललिपि में अक्षरों की खड़ी रेखाएं नीचे की तरफ बाईं ओर मुड़ी हुई होती हैं और स्वरों की मात्राएं अधिक
टेढ़ी मेढ़ी तथा लंबी होती हैं इसी से उसका नाम कुटिल पड़ा.
⁴ राजा यशोधर्मन् के तीन लेख मंदसोर से मिले हैं जिनमें से एक मालव (विक्रम) सं. ५८९ (ई. स. ५३२) का है
(फ्ली; गु. इं; प्लेट २१ B, C, और २२).
⁵ महानामन् नामवाले दो लेख बुद्धगया से मिले हैं (फ्ली; गु. इं; प्लेट ४१ A और B) जिनमें से एक में
संवत् २६९ है. यदि यह गुप्त संवत् माना जावे तो इसका समय ई. स. ५८८-९ होगा.

कुटिल लिपि. ६३
मोखरियों के लेख और मुद्रा १, वर्मलात के समय के वसंतगढ़ के लेख २, राजा हर्ष के दानपत्रादि ३,
नेपाल के अंशुवर्मन् के लेखों ४, मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा शीलादित्य और अपराजित के लेखों ५,
मगध के गुप्तवंशी आदित्यसेन और जीवितगुप्त (दूसरे) के लेखों ६, कुदारकोट के लेख ७, झालरा-
पटण से मिले हुए राजा दुर्गगण के लेखों ८, कोटा के निकट कणस्वा (कणवाश्रम) के मंदिर में लगी हुई
राजा शिवगण की प्रशस्ति ९, बनारस से मिले हुए पंथ के लेख १०, कामां (कामवन)
से मिले हुए यादवों के लेख ११, लाखामंडल की प्रशस्ति १२, चंबा राज्य से मिले हुए राजा
मेरुवर्मन् के लेखों १३, राजपूताना और मालवे से मिले हुए प्रतिहार (पड़िहार) वंशियों के लेखादि १४
१. मौखरी (मुखर) वंशी राजा ईशानवर्मन् का हड़ाह का शिलालेख वि. सं ६११ (ई. स. ५५३) का है (सरस्वती,
ई. स. १६१६, पृ. ८१-८३). आसीरगढ़ से मिली हुई ईशानवर्मन् के पुत्र शर्ववर्मन् की मुद्रा में कोई संवत् नहीं है (फ्ली; गु.
इं; सेट ३० A). अनंतवर्मन के बराबर और नागार्जुनी पहाड़ियों की गुफाओं के लेखों (फ्ली; गु. इं; प्लेट ३० B, ३१ A
और B) में भी संवत् नहीं मिलता परंतु उसका ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आस पास होना अनुमान किया जा
सकता है. जौनपुर का लेख भी, जिसका प्रारंभ का हिस्सा बचने नहीं पाया, संभवतः उपर्युक्त ईशानवर्मन् के समय का
हो (फ्ली; गु. इं; प्लेट ३२ A). २. यह लेख वि. सं. ६८२ (ई. स. ६२५-६) का है (ऍ. इं; जि. ६, पृ. १८० के पास का प्लेट).
३. बैसवंशी राजा हर्ष का बांसखेड़ा का दानपत्र हर्ष संवत् २२ (वि. सं. ६८८-६) का (ऍ. इं; जि. ४, पृ. २१० के
पास का प्लेट) और मधुबन से मिला हुआ दानपत्र हर्ष संवत् २५ (ई. स. ६३१) का है (ऍ. इं; जि. १. पृ. ७२-७३).
सोनपत से मिली हुई उक्त राजा की मुद्रा (फ्ली; गु. इं; प्लेट ३२ B) में संवत् नहीं है.
४. अंशुवर्मन् के समय के लेखों में से एक में संवत् ३१६ (या ३१८?) है (इं. पं; जि. १४, पृ. ६८. बें; ज. ने; पृ. ७४)
जिसको गुप्त संवत् माना जावे तो उसका समय ई. स. ६३५-६ (या ६३७-८?) होगा. उसके दूसरे लेखों में संवत् ३४, ३६, ४५ (?)
और ४८ मिलते हैं (बें; ज. ने; पृ; ४. इं. पं; जि. ६, पृ. १७०-७१). यदि इन संवतों को हर्ष संवत् मानें तो इनका
समय ई. सं. ६४० से ६५४ तक स्थिर होगा.
५. मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा शीलादित्य (शील) के समय का एक शिला लेख वि. सं. ७०३ (ई. स. ६४६)
का मेवाड़ के भोमट इलाके के सामोली गांव से मिला है जो मैंने राजपूताना म्यूज़िअम (अजमेर) को भेट किया. यह
लेख अभी तक छुपा नहीं है. राजा अपराजित का लेख वि. सं. ७१८ (ई. स. ६६१) का है (ऍ. इं; जि. ४, पृ. ३०
के पास का सेट).
६. आदित्यसेन के समय के तीन लेखों में से दो में संवत् नहीं है (फ़्ली; गु. इं; सेट २८, और पृ. २१२) परंतु तीसरा
जो शाहपुर से मिली हुई सूर्य की मूर्ति के आसन पर खुदा है [हर्ष] संवत् ६६ (ई. स. ६७२) का है (फ़्ली; गु. इं; सेट
२६ A). आदित्यसेन के प्रपौत्र जीवितगुप्त (दूसरे) के समय का एक लेख देवबर्नाकं से मिला है वह भी बिना संवत्
का है (फ़्ली; गु. इं; सेट २६ B).
७. कुदारकोट के लेख में संवत् नहीं है परंतु उसकी लिपि आदि से उसका समय ई. स. की सातवीं शताब्दी
अनुमान किया जा सकता है (ऍ. इं; जि. १, पृ. १८० के पास का सेट).
८. झालरापाटण से मिले हुए राजा दुर्गगण के दो लेख एक ही शिला पर दोनों ओर खुदे हैं जिनमें से एक वि. सं.
७४६ (ई. स. ६८६) का है (इं. ऍ; जि. ५, पृ. १८१-८२ के बीच के प्लेट).
९. शिवगण की कणस्वा की प्रशस्ति वि. सं. ७९५ (ई. स. ७३८) की है (इं ऍ; जि. १६, पृ. ५८ के पास का प्लेट).
१०. इस लेख में संवत् नहीं है परंतु इसकी लिपि ई. स. की ७ वीं शताब्दी के आस पास की अनुमान की जा सकती
है (ऍ. इं; जि. ६, पृ. ६० के पास का सेट).
११. इस लेख में संवत् नहीं है परंतु इसकी लिपि ई. स. की आठवीं शताब्दी की अनुमान की जा सकती है (इं. ऍ;
जि. १०, पृ. ३४ के पास का प्लेट).
१२. महा के लखामंडल नामक मंदिर की प्रशस्ति में संवत् नहीं है परंतु उसकी लिपि ई. स. की आठवीं शताब्दी
के आसपास की प्रतीत होती है (ऍ. इं; जि. १, पृ. १२ के पास का प्लेट).
१३. मेरुवर्मन् के पांच लेखों में से एक शिला पर (वो; पँ. चं. स्टे; प्लेट ११) और चार पित्तल की मूर्तियों के आस-
नों पर खुदे हुए मिले हैं (वॊ; ऍ. चं. स्टे; प्लेट १०). उन सब में संवत् नहीं है परंतु लिपि के आधार पर उनका समय
ई. स. की आठवीं शताब्दी माना जा सकता है.
१४. प्रतिहार राजा नागभट का बुचकला का लेख वि. सं. ८७२ (ई. स. ८१५) का (ऍ. इं; जि. ६, पृ. २०० के पास
प्लेट); बाउक का जोधपुर का वि. सं. ८९४ (ई. स. ८३७) का (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६४ पृ. ४); कक्कुक का
घटिआले का वि. सं. ९१८ (ई. स. ८६१) का (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६५ पृ. ५१६); भोजदेव (प्रथम) का वि. सं.
६०० का दानपत्र (ऍ. इं; जि. ५ पृ. २११-२); और ५ शिला लेख; जिन में से देवगढ़ का वि. सं. ९१६ (ई. स. ८६२) का

६४ प्राचीनलिपिमाला.
तथा कई अन्य लेखों में; एवं जापान के होर्युजी नामक स्थान के बौद्ध मठ में रक्खी हुई
‘प्रज्ञापारमिताहृदयसूत्र’ और ‘उष्णीषविजयधारणी’१ तथा मि. बावर की प्राप्त की हुई हस्त
लिखित पुस्तकों२ में भी मिलती है.
लिपिपत्र १८ वां.
यह लिपिपत्र मंदसोर से मिले हुए राजा यशोधर्मन् (विष्णुवर्द्धन) के मालव (विक्रम) सं. ५८६
(ई. स. ५३२) के शिलालेख३ से तय्यार किया गया है. इसमें ‘अ’ वर्तमान दक्षिणी शैली के
नागरी ‘अ’ से मिलता हुआ है. ‘औ’ पहिले पहिल इसी लेख में मिलता है. ‘उ, च, ड, ढ, त,
द, न, प, म, र, ल, ष, स और ‘ह’ अक्षरों के रूप वर्तमान नागरी के उक्त अक्षरों से मिलते जुलते
ही हैं. हलंत व्यंजनों को सिरों की पंक्ति से नीचे नहीं किंतु सस्वर व्यंजनों के साथ समान पंक्ति
में ही लिखा है परंतु उनके सिर उनसे जुड़े हुए नहीं किंतु विलग ऊंचे धरे हैं और ‘त्’ के नीचे
नागरी की ‘उ’ की मात्रा का सा चिह्न और बढ़ा

कुटिल लिपि. ६५
जगति कान्तमदो दुरापं राजाधिराजपरमेश्वर इत्युढूढम् ॥
स्निग्धश्यामाम्बुदाभैः स्थगितदिनकृतो यज्जनामाज्यधूमैरम्भो मेध्यं
लिपिपत्र १६ वां.
यह लिपिपत्र ‘उष्णीषविजयधारणी’ नामक ताड़पत्र पर लिखी हुई पुस्तक के अंत में दी हुई
पूरी वर्णमाला १, मि. बावर के प्राप्त किये हुए प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकों २, मौखरी शर्ववर्मन् की
आसीरगढ़ से मिली हुई मुद्रा ३, मौखरी अनंतवर्मन् के २ लेखों ४ तथा महानामन् के बुद्धगया के लेख ५
से तय्यार किया गया है. ‘उष्णीषविजयधारणी’ के अंत की वर्णमाला के अक्षरों में अ, उ, ऋ, क,
ख, ग, घ, ङ, च, ज, ट, ड, ढ, ण, त, थ, द, न, प, म, य, र, ल, व, श, ष, स और ‘ह’ नागरी के उन
अक्षरों से बहुत कुछ मिलते हुए हैं और ‘ब’ तथा ‘व’ में भेद नहीं है. ‘इ’ की तीन बिंदियों में से नीचे की
बिंदी को वर्तमान नागरी के ‘उ’ की मात्रा का सा रूप दिया है. ‘इ’ का यह रूप ई. स. की १३ वीं शताब्दी
तक कहीं कहीं मिल आता है. ‘ऋ’, ‘ॠ’, ‘लृ’ और ‘ॡ’ पहिले पहिल इसी में मिलते हैं. वर्तमान
नागरी के ‘ऋ’ और ‘ॠ’ इन्हीं से बने हैं परंतु वर्तमान ‘लृ’ और ‘ॡ’ के मूल संकेत नष्ट
हो चुके हैं जिससे अब ‘लृ’ के साथ ‘ऋ’ और ‘ॠ’ की मात्राएं लगा कर काम चलाया जाता
है. ‘ओ’ की आकृति नागरी के वर्तमान ‘उ’ से मिलती हुई है परंतु उसका सिर बाईं तरफ
अधिक लंबा हो कर उसका बांया अंत नीचे को मुड़ा है. ‘ओ’ का यह रूप पिछले लेखों तथा प्राचीन
हस्तलिखित पुस्तकों में भी मिलता है और कोई कोई लेखक अब तक ‘ओं’ लिखने में
‘ऊ’ के ऊपर रेफ तथा अनुस्वार लगा कर इस प्राचीन ‘ओ’ की स्मृति को जीवित
रखते हैं. ‘ङ’, ‘ज’ और ‘ट’ के सिरों के दाहिनी तरफ़ के अंत में ⌝ चिह्न लगाया है. वह अथवा
उसका परिवर्तित रूप ⌝ पिछले लेखों में मिलता है (देखो, लिपिपत्र २१, २३, २४, २८, २६, ३०,
३१, ३२, ३३, ३४). वर्तमान नागरी के ‘ङ’ में, ‘ड’ की आकृति बना कर उसके आगे बिंदी लगाई
जाती है जो इसी चिह्न का स्थानांतर है और ‘ङ’ तथा ‘ड’ की आकृति एकसा बन जाने पर उन
अक्षरों का भेद बतलाने के लिये ही लगाई जाने लगी है. ‘ओं’ का सांकेतिक चिह्न नागरी के ७ के अंक
सा है जो वास्तविक ‘ओं’ नहीं किंतु कल्पित चिह्न है. यह कई रूपांतरों के साथ पिछले लेखों
तथा प्राचीन जैन, बौद्ध और ब्राह्मणों के हस्तलिखित पुस्तकों के प्रारंभ में मिलता हैं.
महानामन् के लेख में ‘ऊ’ को ‘उ’ के साथ ┘ चिह्न जाड़ कर बनाया है परंतु अन्यत्र बहुधा सम-
कोणवाला नहीं किंतु गोलाईदार चिह्न मिलता है जिसका अग्रभाग नीचे की ओर झुका हुआ होता
है (देखो, इसी लिपिपत्र में उष्णीषविजयधारणी के अंत की वर्णमाला का ‘ऊ’ और लिपिपत्र २४,
२५, २८, ३१, ३४, ३५ में भी). ‘त्’ का रूप उपर्युक्त यशोधर्मन् के लेख (लिपिपत्र १८ में) के ‘त्’
का सा ही है परंतु इसमें सिर की आड़ी लकीर को दाहिनी ओर झुका कर बहुत नीचे बढ़ा लिया है
संभव है कि नागरी का वर्तमान हलंत का चिह्न इसीसे निकला हो और व्यंजन के ऊपर लिखे जाने की
अपेक्षा नीचे लिखा जाने लगा हो. ‘र्थ’, ‘थ’ से मिलता हुआ है और रेफ को पंक्ति से ऊपर नहीं
किंतु सीध में लिखा है और ‘र्थ’ तथा ‘थ’ में भेद बतलाने के लिये ही ‘य’ के नीचे के दाहिनी
ओर के अंश को गोलाई के साथ ऊपर बढ़ाया है. ऐसा ही ‘र्थ’ अन्य लेखों में भी मिलता है (देखो,
लिपिपत्र १७, २०, २१, २२, २८, २६).
१. ऐं. ऑ; (आर्यन सीरीज़) जि. १, भाग ३, प्ले. १-४. ३. फ़्ली; गु. इं; प्लेट ३० A.
२. आ. स. इं; (इंपीरिअल सीरीज़) जि. २२ वीं के कई प्लेट. ५. फ़्ली; गु. इं; प्लेट ४१ A.
४. फ़्ली; गु. इं; सेट ३१ A और B.

६६ * प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र १६ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
ओं आसीत्सर्व्वमहीक्षितामनुरिव क्षत्त्रस्थितेर्द्देशिकः श्रीमान्मत्तगजे-
न्द्रखेलगमनः श्रीयज्ञवर्म्मा नृपः यस्याहूतसहस्रनेत्त्रविरहक्षामा
सदैवाध्वरैः पौलोमी चिरमश्रुपातमलिनं(नां) धत्ते कपोलश्रियं ॥
श्रीशार्दूलनृपात्मजः परहितः श्रीपौष्णः श्रूयते लोके चन्द्रम-

लिपिपत्र २० वां.
यह लिपिपत्र उदयपुर के विक्टोरिया हॉल में रक्खे हुए मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा अपराजित
के समय के वि. सं. ७१८ (ई. स. ६६१) के लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से बनाया
गया है. इसके 'थ' और 'श' नागरी के 'थ' और 'श' से मिलते जुलते ही हैं केवल ऊपर की
गांठें उलटी हैं. 'य' के प्राचीन और नवीन (नागरी के सदृश) दोनों रूप मिलते हैं. 'आ' की
मात्रा चार प्रकार से बनाई है. 'जा' और 'हा' के ऊपर 'आ' की मात्रा ( ऐसी लगी है, जिसकी
स्मृति अब तक कितने एक पुस्तकलेखकों को है क्योंकि जब वे भूल से कहीं 'आ' की मात्रा छोड़
जाते हैं और व्यंजन की दाहिनी ओर उसको लिखने का स्थान नहीं होता तब वे उस के ऊपर ऽ
चिह्न लगा देते हैं. इस लेख में अक्षरों तथा स्वरों की मात्राओं में सुंदरता लाने का यत्न कर लेखक
ने अपनी चित्रनिपुणता का परिचय दिया है (देखो, जा, टा, रा, धि, रि, हि, ही, ते, ले, नै, वै, यो, कौ,
शौ, सौ, त्य, प्र, व्य, श्री).
लिपिपत्र २० वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
राजा श्रीगुहिलान्वयामलपयोधराशौ स्फुरद्दीधितिर्ध्वस्तध्वान्तसमूहदृष्ट-
सकलव्यालावलेपान्तकृत् । श्रीमानित्यपराजितः क्षितिभृतामभ्यर्चितो
मूर्धभिः(भि)र्वृत्तस्वच्छतयैव कौस्तुभमणिश्र्जातो जगद्भूषणं ॥ शिवात्म-
जोखण्डितशक्तिसंपद्धुर्यः समाक्रान्तभुजङ्गशत्रु [:]। तेनेन्द्रवत्स्कन्द इव
प्रणेता कृतो महाराजवराहसिंहः जनगृहीतमपि क्षयवर्जितं
धवलमप्यनुरञ्जितभूतलं स्थिरमपि प्रविकासि दिशो दश भ्रमति

लिपिपत्र २१ वां.
यह लिपिपत्र बांसखेड़ा से मिले हुए राजा हर्ष (हर्षवर्द्धन) के दानपत्र१, नेपाल के राजा अंशु-
वर्मन् के लेख२, राजा दुर्गगण के झालरापाटन के लेख३, कुदारकोट के लेख४ तथा राजा शिवगण के
कोटा के लेख५ से तय्यार किया गया है. हर्ष के दानपत्र से प्राचीन अक्षरों की पहिली पंक्ति के 'ह'
से 'प्र' तक के अक्षर उद्धृत किये हैं और अंतिम पांच अक्षर ('ध' से 'श्री' तक) उक्त दानपत्र
के अंत के हर्ष के हस्ताक्षरों६ से लिये गये हैं जो चित्रलिपि का नमूना होने के साथ ही साथ उक्त राजा
की चित्रविद्या की निपुणता प्रकट करते हैं. झालरापाटन के लेख में विसर्ग की दोनों बिंदियों को ჻

१. ये मूल पंक्तियां मौखरी (मुखर) वंशी राजा अनंतवर्मन् के नागार्जुनी गुफा के लेख से उद्धृत की गई हैं (फ्ली;
गु. इं; प्लेट ३१ A.)
२. ऍ. इं; जि. ४, पृ. २१० के पास का प्लेट. ३. इं. पँ; जि. १०, पृ. १७० के पास का प्लेट.
४. झालरापाटन (छावनी) में रक्खे हुए मूल लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई दोनों ओर की छापों से.
५. ऍ. इं; जि. १, पृ. १८० के पास का प्लेट. ६. इं. पँ; जि. १६, पृ. ५८ के पास का प्लेट.

कुटिल लिपि. ६७
लिखा है. कुदारकोट के लेख में हलंत का चिह्न ऊपर से तथा वर्तमान चिह्न के समान नीचे से भी
बनाया है. कोटा के लेख में 'अ' (पहिला) वर्तमान नागरी 'अ' से बहुत कुछ मिलता हुआ है और
'त्' को चलती कलम से लिख कर हलंत के चिह्न को मूल अक्षर से मिला दिया है जिससे उसका
रूप कुदारकोट के लेख के 'त्' से भिन्न प्रतीत होता है.
लिपिपत्र २१ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर-
ओं नमः शिवाय ओं नमः स्स(स)कलसंसारसागरो-
त्तारहेतवे । तमोगर्त्ताभिसंपातहस्तालंबाय शम्भवे ॥
श्वेतद्वीपानुकारा X क्वचिदपरिमितैर्रिन्दुपादैः पतद्भिनिर्त्यस्थै-
लिपिपत्र २२ वां.
यह लिपिपत्र चंबा के राजा मेरुवर्मा के ५ लेखों से तय्यार किया है. उक्त लेखों में से गूंगाह
का लेख² शिला पर खुदा है और बाकी के पित्तल की मूर्त्तियों पर³. मूर्त्तियों पर के लेखों से उद्धृत
किये हुए अक्षरों में कितने एक अक्षरों के एक से अधिक रूप मिलते हैं जिसका कारण यह है कि ये
सब लेख एक ही लेखक के हाथ से लिखे नहीं गये और कुछ अक्षर कलम को उठाये बिना लिखे हों ऐसा
प्रतीत होता है. 'न' का पहिला रूप नागरी के 'म' से मिलता हुआ है. उक्त अक्षर का ऐसा रूप
अन्यत्र भी मिलता है (देखो लिपिपत्र २२ में बुचकला के लेख के अक्षरों में). 'न' के तीसरे रूप में
बीच की ग्रंथि उलटी लगाई है, 'र' का दूसरा रूप उलटा लिखा गया है, 'ब' को 'व' के समान
लिखा है और रेफ को पंक्ति के ऊपर नहीं किंतु पंक्ति की सीध में लिखा है.
लिपिपत्र २२ वें की मूल पंक्तियों⁴ का नागरी अक्षरांतर-
ओं प्रासाद⁵ मेरुसदृशं हिमवन्मूर्द्भिः⁶ कृत्वा स्वयं
प्रवरकर्म्मशुभैरनेकः तच्चन्द्रशाल⁷रचितं⁸ नयनाभनाम⁹
प्राग्ग्रीवकैर्व्विविधमण्डपनैः काचित्तैः¹⁰ ॥ तस्याग्रतो वृषभ पी¹¹-
नकपोलकायः संक्षिष्टवक्ष्ककुदोन्नतदेवयानः¹² ओमेरु-
वर्म्मचतुरुदधिकीर्त्तिरेषाः¹³ मातापित्रोः¹⁴ सततात्मफ-
लिपिपत्र २३ वां.
यह लिपिपत्र प्रतिहार राजा नागभट के समय के बुचकला के लेख¹⁵, प्रतिहार बाउक के जोध-
पुर के लेख¹⁶ तथा प्रतिहार कक्कुुक के घटियाले के लेख¹⁷ से तय्यार किया गया है. बुचकला के
लेख में 'न' नागरी के 'म' से मिलता हुआ है, 'ह' की आकृति नागरी के 'ड' के समान है
और 'स' में 'त' उलटा जोड़ा है. जोधपुर के लेख के अधिकतर अक्षर नागरी के समान हो गये हैं.
१. ये मूल पंक्तियां कोटा के लेख से हैं (इं. ऐं; जि. १६, पृ. ५८ के पास का प्लेट ).
२. फो; ऐं. चं. स्टे; प्लेट ११. ३. फो; ऐं. चं. स्टे; प्लेट १०.
४. ये मूल पंक्तियां नंदी की मूर्ति के लेख से उद्धृत की गई हैं (फो; ऐं. चं स्टे; प्लेट १०). इनमें अशुद्धियां
बहुत हैं इस लिये उन्हें मूल के साथ ( ) चिह्न के भीतर नहीं किंतु टिप्पणों में शुद्ध किया है.
५. 'सादं. ६. वन्मूर्ध्नि. ७. 'शाला. ८. 'चितो. ९. नयनाभिरामा.
१०. 'विधमण्डपैनैकै'. ११. 'षभः पी'. १२. 'वक्षःककुदुन्नतदेवयानं.
१३. चतुरुदधिकीर्त्तिरेषा. १४. मातापित्रोः. १५. ऐं. इं; जि. ६, पृ. २०० के पास का प्लेट.
१६. राजपूताना म्युजिअम् (अजमेर) में रक्खे हुए मूल लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से.
१७. प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता जोधपुर के मुन्शी देवीप्रसाद की भेजी हुई छाप से.

६८ प्राचीनलिपिशाला.

लिपिपत्र २३ वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
ओं नमो विष्णवे ॥ यस्मिन्विशन्ति भूतानि यत-
स्सर्गस्थितौ मते । स वः पायादृषीकेशो निर्गुण-
स्सगुणश्च यः ॥ गुणाः पूर्व्वपुरुषाणां कीर्त्यन्ते तेन
पण्डितैः । गुणकीर्त्तिर्ननश्यन्तो स्वर्गवासकरो यतः ॥
अतः श्रीबाउको धौमां(मान्) स्वप्रतीहारवड्शजां(वंशजान्) । प्रश-

८—नागरीलिपि
ई. स. की १० वीं शताब्दी से (लिपिपत्र २४-२७).

जैसे वर्तमान काल में भारतवर्ष की आर्य लिपियों में नागरी का प्रचार सब से अधिक है और सारे देश में इसका आदर है वैसे ही ई. स. की १० वीं शताब्दी के प्रारंभ से लगा कर अब तक भारत के अधिकतर हिस्सों अर्थात् राजपूताना, गुजरात, काठियावाड़, कच्छ, मध्यभारत, युक्तप्रदेश और मध्यप्रदेश में तो इसका अटल राज्य बना रहा है. बिहार और बंगाल में भी १० वीं शताब्दी तक तो यही लिपि रही जिसके पीछे इसीके कुछ कुछ परिवर्तित रूप अर्थात् बंगला लिपि का प्रचार रहा, जो इसकी पुत्री ही है. पंजाब और कश्मीर में इसकी बहिन शारदा का प्रचार १० वीं शताब्दी के आसपास से होने लगा. दक्षिण के भिन्न भिन्न विभागों में जहां तेलुगु-कनडी, ग्रंथ और तामिळ लिपियों का प्रचार रहा वहां भी उनके साथ साथ इसका आदर बना रहा. इसीसे उत्तरी और दक्षिणी कोंकण तथा कोल्हापुर के शिलारवंशी राजाओं के शिलालेखों और दानपत्रों², दक्षिण (मान्यखेट) के राष्ट्रकूटों (राठौड़ों) के कई दानपत्रों³, गुजरात के राष्ट्रकूटों के कुछ दानपत्रों४, पश्चिमी चालुक्यों५ तथा सेउणदेश और देवगिरि⁶ के यादवों के शिलालेख और दानपत्रों⁷ एवं विजयनगर के तीनों राजवंशों के कई दानपत्रों⁸ में नागरी लिपि मिल आती है. विजयनगर के राजाओं के दानपत्रों की नागरी लिपि 'नंदि नागरी' कहलाती है और अब तक दक्षिण में संस्कृत पुस्तकों के लिखने में उसका प्रचार है.


¹ ये मूल पंक्तियां प्रतिहार बाउक के उपर्युक्त जोधपुर के लेख से उद्धृत की गई हैं.
² इं. ऐं; जि. ३, पृ. २७१-६; २६७-३०२. जि. १२, पृ. २६१-५. इं. ऐं; जि. ५, पृ. २७७-८. जि. ६, पृ. ३३-५. जि. १३, पृ. १३४-६. ज. बंब. ए. सो; जि. १२, पृ. २१६; ३३३. जि. १३ पृ. २-५; आदि.
³ इं. ऐं; जि. ३, पृ. १०५-१०. जि. ४, पृ. ६०-२; २८१-६. जि. ५, पृ १५२-६. जि. ६, पृ. २४२-६. जि. ७, पृ. ३६-४१. जि. ८, पृ. १८३-८. जि. ६, पृ. २६-३७. जि. १०, पृ. ८१-६. इं. ऐं; जि. ११, पृ. १११-३; १५७-६०. जि. १२, पृ. १४६-५२; २६४-७. जि. १३, पृ. १३४-६. बुं; ई. पे. प्लेट ४. अक्षरों की पंक्ति ४ थी.
⁴ इं. ऐं; जि ६, पृ. २८७-६४. इं. ऐं; जि. १३, पृ. ६६-८. जि. १४, पृ. १६६-२००.
⁵ इं. ऐं; जि. ३, पृ ४-६; ३०५-६. इं. ऐं; जि. १४, पृ. १४१-४२. जि. १६, पृ. २१-४; आदि.
⁶ इं. ऐं; जि २, पृ. २१७-२१; २२४-८. इं. ऐं; जि. १२, पृ. १२६-७. जि. १७, पृ. १२०-२२; आदि.
⁷ इं. ऐं; जि. १, पृ. ३४१-४. जि. २, पृ. २१६-२०. इं. ऐं; जि. १४, पृ. ३१५-६. ज. बंब. ए. सो; जि. १२, पृ. ७-८; २५-३०; ४२-५. जि. १५, पृ. ३८६-६०; आदि.
⁸ इं. ऐं; जि. ३, पृ. ३७-६; १२०-२४; १५१-८; २४०-५१. जि. ४, पृ. १२-२२; २७२-८. जि. ७, पृ. ८०-८३. जि. ६, पृ. ३३१-६. जि. ११, पृ. ३२६-३६. जि. १२, पृ. १७१-८५. जि. १३, पृ. १२६-३१. इं. ऐं; जि. १३, पृ. १२८-३२; १५६-६०; आदि.

Here is the line-by-line transcription of the page:

नागरीलिपि ६६
उत्तरी भारत में नागरी का प्रयोग ई. स. की १०वीं शताब्दी के प्रारंभ के आसपास से
मिलता है और यह पहिले पहिल कन्नौज के प्रतिहारवंशी राजा महेंद्रपाल ( प्रथम ) के दिघवाद-
बौली से मिले हुए वि. सं. ६५५ के दानपत्र¹ में मिलती है. तदनंतर उसी वंश के अन्य
राजाओं²; मेवाड़, वागड़ आदि के गुहिलवंशियों³; सांभर, अजमेर, नाडौल, जालौर,
चंद्रावती ( आबू ) आदि के चाहमान (चौहान)वंशियों; कन्नौज के गाहडवालों⁴; हथुंडी,
धनोप, बदाऊं आदि के राष्ट्रकूटों⁵; काठियावाड़, लाट और गुजरात ( अणहिलवाड़ा ) के चौलुक्यों⁶
( सोलंकियों ); आबू और मालवा आदि के परमारों⁷; ग्वालियर, दूबकुंड, नरवर आदि के कच्छप-
घात⁸ ( कछवाहा ) वंशियों; जेजाकभुक्ति ( जझौती=बुंदेलखंड ) के चंद्रात्रेय(चंदेल)वंशियों⁹; त्रिपुरी
( तेवर ), रत्नपुर आदि के हैहय ( कलचुरि ) वंशियों

कि अक्षर की चौड़ाई होती है. '११वीं शताब्दी की नागरीलिपि वर्तमान नागरी से मिलती जुलती
ही है और १२ वीं शताब्दी से वर्तमान नागरी बन गई, केवल 'इ', और 'घ' में ही कहीं पुरानापन नज़र
आता है (देखो, लिपिपत्र २६ में जाजल्लदेव के लेख के अक्षर) और व्यंजनों के साथ जुड़नेवाली
ए, ऐ, ओ और औ की मात्राओं में कभी कभी यह अंतर पाया जाता है कि 'ए' की मात्रा व्यंजन
के पूर्व खड़ी लकीर के रूप में सिर की लकीर से सटी रहती है, 'ऐ' की मात्रा में एक तो वैसी ही
खड़ी लकीर और दूसरी तिरछी रेखा व्यंजन के ऊपर लगाई जाती है (देखो, लिपिपत्र २७ में धारा-
वर्ष के लेख से दिये हुए अक्षरों में 'ने' और 'लै'); 'ओ' की मात्रा दो खड़ी लकीरों से बनाई जाती
है जिनमें से एक व्यंजन के पहिले और दूसरी उसके पीछे ('आ' की मात्रा की नांई) रहती
है, और 'औ' में वैसी ही दो लकीरें तथा एक वक्र रेखा व्यंजन के ऊपर रहती हैं (देखो, लिपि-
पत्र २७ की मूल पंक्तियों की दूसरी पंक्ति में 'वंशोद्धरण' में 'शो', और पहिली पंक्ति में 'ओमे' में 'ओ' तथा
'चौलुक्य' में 'चौ'). उक्त ४ स्वरों की इस प्रकार की मात्राएं शिलालेखादि में कहीं कहीं ई. स. की
१५वीं शताब्दी तक और हस्तलिखित पुस्तकों में १६वीं शताब्दी के पीछे तक मिल आती हैं,
जिनको राजपूताना के पुस्तकलेखक 'पड़ी मात्राएं' (पृष्ठमात्रा) कहते हैं. ई. स. की १२ वीं शताब्दी से लगा
कर अब तक नागरी लिपि बहुधा एक ही रूप में चली आती है तो भी लेखनशैली और देशभेद से
कुछ अंतर रह ही जाता है, जैसे कि जैन लेखकों के इ, उ, छ, झ, ठ, ड, ल और क्ष अक्षर
(इ, उ, छ, झ, ठ, ड, ल, क्ष), और दक्खिणवालों के अ, झ, ण, भ और क्ष अक्षर (अ, झ,
ण, भ और क्ष) नागरी के उन अक्षरों से अब भी भिन्न हैं.
दक्षिण में वर्तमान नागरी से अधिक मिलती हुई लिपि उत्तरी भारतवर्ष की अपेक्षा पहिले,
अर्थात् ई. स. की आठवीं शताब्दी से, मिलती है. पहिले पहिल वह राष्ट्रकूट (राठौड़) वंश के राजा
दंतिदुर्ग के सामनगढ़ से मिले हुए शक संवत् ६७५ (ई. स. ७५४) ^१ के दानपत्र में; उसके बाद
राष्ट्रकूट राजा गोविंदराज (दूसरे) के समय के धुलिया से मिले हुए शक सं. ७०१ (ई. स. ७८०) के दानपत्र^२
में; तदनंतर पैठण^३ और वणीगांव^४ से मिले हुए राष्ट्रकूट गोविंद (तीसरे) के दानपत्रों में, जो
क्रमशः शक संवत् ७१६ और ७३० (ई. स. ७६४ और ८०८) के हैं; बड़ौदे^५ से मिले हुए गुजरात
के राष्ट्रकूट ध्रुवराज (धारावर्ष, निरुपम) के श. सं. ७५७ (ई. स. ८३५) के दानपत्र में और
राष्ट्रकूट अमोघवर्ष और उसके शिलारवंशी सामंत पुल्लशक्ति (प्रथम और द्वितीय) के समय के कन्हेरी
के लेखों^६ में, जो क्रमशः श. सं. ७६५ (?) और ७७३ (ई. स. ८४३ और ८५१) के हैं, पाई जाती है और
उक्त समय के पीछे भी दक्षिण की लिपियों के साथ साथ बराबर मिलती चली आती है. उपर्युक्त सब ताम्रपत्र
और शिलालेख भिन्न भिन्न पुरुषों के हाथ के लिखे हुए होने से उनकी लेखनशैली कुछ कुछ निराली
है परंतु उनकी लिपि को नागरी कहने में कोई संकोच नहीं है. इस प्रकार नागरी लिपि ई. स.
की ८ वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से विस्तृत रूप में लिखी हुई मिलती है परंतु उससे पहिले
भी उसका व्यवहार होना चाहिये क्योंकि गुजरात के गुर्जरवंशी राजा जयभट (तीसरे) के
कलचुरि संवत् ४५६ (ई. स. ७०६) के दक्षिणी शैली की पश्चिमी लिपि के दानपत्र^७ में उक्त
राजा के हस्ताक्षर 'स्वहस्तो मम श्रीजयभटस्य' नागरी लिपि में ही है.
१. इं. पं; जि. ११, पृ. ११० से ११३ के बीच के प्लेट. २. बॉ. गॅ; जि. ८, पृ. २८६-७ के बीच के प्लेट.
३. ऐं. इं; जि. ३, पृ. १०६ और १०७ के बीच के प्लेट.
४. इं. पं; जि. ११, पृ. १५८ और १६१ के बीच के प्लेट. ५. इं. पं; जि. १४, पृ. २०० और २०१ के बीच के प्लेट.
६. इं. पं; जि. १३, पृ. १३३ और १३४. जि. २०, पृ. ४२१-२. बू. इं. पे; प्लेट ५, अक्षरों की पंक्ति ५, और पृ. ५१,
टिप्पण ४.
७. इं. पं; जि. २, पृ. २४८ के पास का प्लेट.

नागरीलिपि. ७१
लिपिपत्र २४ वां.
यह लिपिपत्र मोरवी से मिले हुए राजा जाईंकदेव के गुप्त संवत् ५८५ (ई. स. ९०४) के
दानपत्र १, अलवर से मिले हुए प्रतिहार राजा विजयपाल के समय के वि. स. १०१६ (ई. स. ९५६) के
शिलालेख २ और नेपाल से मिली हुई हस्तलिखित पुस्तकों ३ से तय्यार किया गया है. जाईंकदेव के
दानपत्र के अक्षरों की आकृति कुटिल ४ है परंतु लिपि नागरी से मिलती हुई ही है, केवल ख, घ, ङ,
ड, थ, ध, न, फ और म अक्षर वर्तमान नागरी से कुछ भिन्न हैं.
लिपिपत्र २४ वें की मूलपंक्तियों ५ का नागरी अक्षरांतर—
षष्टिवरिष(वर्षे)सहस्राणि स्वर्गे तिष्ठति भूमिदः ।
आछेत्ता [चा]नुमंता च तान्येव नरकं वसेत् । स्वदत्तां
परदत्तां वा यो हरेतु(त) वसुंधरां । गवां शतस-
हस्तस्य ह(हं)तुः प्राप्नोति किल्बि(ल्बि)षं ॥ विंध्याटवीष्व-
लिपिपत्र २५ वां.
यह लिपिपत्र छिंदवंशी लल्ल के वि. सं. १०४६ (ई. स. ९६२) के देवल के लेख ६ से, परमार
राजा भोजरचित ‘कूर्मशतक’ नामक दो काव्यों से, जो धार से शिलाओं ७ पर खुदे हुए मिले
हैं, और परमार राजा उदयादित्य के समय के उदयपुर ८ तथा उज्जैन ९ के लेखों से, तय्यार किया गया
है. देवल के लेख में ‘अ’ नागरी का सा बन गया है क्योंकि उसकी खड़ी लकीर के नीचे के
अंत में बाईं ओर से तिरछी रेखा जोड़ी है. यही तिरछी रेखा कुछ काल के अनंतर ‘अ’ की
बांई तरफ़ की तीन तिरछी लकीरों में से तीसरी बन गई जो वास्तव में अक्षर में सुंदरता लाने के विचार
से जोड़ी जाती थी. कूर्मशतक के अक्षरों में ‘इ’ और ‘ई’ में ऊपर की दो बिंदियों के बीच की वक्र
रेखा, उन्हींके नीचे की तीसरी बिंदी के स्थानापन्न ७ चिह्न के अंत का बाईं तरफ़ से दाहिनी तरफ़ बढ़ा
हुश्रा घुमाव, एवं ‘ऊ’ और ‘ओ’ के नीचे के भाग का वैसा ही घुमाव, केवल सुंदरता के विचार से ही हैं.
उदयादित्य के उदयपुर के लेख में ‘इ’ की जो आकृति मिलती है वह तीन बिंदीवाले ‘इ’ का रूपांतर
है और उसे सुंदर बनाने के विचार से ही इस विलक्षण रूप की उत्पत्ति हुई है. उदयादित्य के
उज्जैन के लेख के अंत में उस समय की नागरी की पूरी वर्णमाला, अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय और
उपध्मानीय के चिह्नों सहित खुदी है, जिससे ई. स. की ११वीं शताब्दी में ऋ, ॠ, ऌ और ॡ के रूप
कैसे थे यह पाया जाता है.
१. इं. पँ.; जि. २, पृ. २५८ के पास का शेट. २. उदयपुर निवासी कुंवर फतहलाल मेहता की भेजी हुई उक्त लेख की छाप से.
३. बु; इं. पे; प्लेट ६, प्राचीन अक्षरों की पंक्ति ७ से.
४. भिन्न भिन्न लेखकों की लेखन शैली भिन्न मिलती है. कोई सरल अक्षर लिखता है तो कोई टेढ़ी मेढ़ी आकृति
के अर्थात् कुटिल. ऐसी दशा में लिपिविभाग निश्चय रूप से नहीं हो सकते.
५. ये मूल पंक्तियां जाईकदेव के उपर्युक्त दानपत्र से हैं.
६. पँ. इं; जि. १, पृ. ७६ के पास का प्लेट. ७. ऍ. इं; जि. ८, पृ. २४८ और २६० के बीच के ३ प्लेट.
८. ऍ. इं; जि १, पृ. २३४ के पास का प्लेट.
९. उज्जैन में महाकाल के मंदिर के पीछे की एक छत्री में खड़ी हुई शिला पर खुदी हुई प्रशस्ति की अपने हाथ से
तय्यार की हुई छाप से.
यह शिला उदयादित्य के समय की किसी प्रशस्ति की अंतिम शिला है जिसमें ८० के पीछे के थोड़े से श्लोक हैं. इसमें
संवत् नहीं है, परंतु पत्थर का जो अंश खाली रह गया उसपर प्रशस्तिलेखक के हाथ से ही लिखी हुई पूरी वर्णमाला तथा
नाग के ग्रंथिल चित्र के भीतर धातुओं के प्रत्यय आदि खुदे हैं (जैसे कि धार से मिले हैं) और अंत के श्लोक में
“उदयादित्यदेवस्य वर्धनाक्षकृपाथिका” खुदा है जिससे उक्त प्रशस्ति का उदयादित्य के समय का होना पाया जाता है.

७२ प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र २५ वें की मूल पंक्तियों १ का नागरी अक्षरांतर—
आरामोद्यानवापौषु देव्वायतनेषु च । कृतानि क्रियमाणा-
नि यस्याः कर्माणि सर्व्वदा ॥ दीनानाथविपन्नेषु करुणान्वि-
तचेतसः । सत्त्वेषु भुञ्जते यस्या विप्रसंघा दिने दिने ॥
इत्थं विविक्तममयोः परिवर्द्धमानधर्म्मप्रव(ब)न्धविगलत्कलिकालवृ-
लिपिपत्र २६ वां.
यह लिपिपत्र कन्नौज के गाहडवालवंशी राजा चंद्रदेव और मदनपाल के वि. सं. ११५४ (ई. स.
१०६८) के दानपत्र², हस्तलिखित पुस्तकों³ तथा हैहय (कलचुरि) वंशी राजा जाजल्लदेव के समय के
शिलालेख४ से तय्यार किया गया है. चंद्रदेव के दानपत्र की 'इ' के परिवर्तित रूप से वर्तमान नागरी का 'इ'
बना है (देखो, लिपिपत्र ८२ में 'इ' की उत्पत्ति). 'धा' में 'आ' की मात्रा की खड़ी लकीर को 'ध' के मध्य
से एक नई आड़ी लकीर खींच कर जोड़ा है, जिसका कारण यह है कि 'ध' और 'व' के रूप बहुधा
एकसा बन गये थे जिससे उनका अंतर बतलाने के लिये 'ध' बहुधा बिना सिर के लिखा जाता था, यदि
कोई कोई सिर की लकीर लगाते थे तो बहुत ही छोटी. ऐसी दशा में 'ध' के साथ 'आ' की मात्रा सिर
की आड़ी लकीर के साथ जोड़ी नहीं जाती थी, क्योंकि ऐसा करने से 'धा' और 'वा' में अंतर नहीं रहता.
इसी लिये 'धा' के साथ की 'आ' की मात्रा मध्य से जोड़ी जाती थी. चंद्रदेव के दानपत्र के अक्षरों की पंक्ति
के अंत का 'म' उक्त दानपत्र से नहीं किंतु चंद्रदेव के वंशज गोविंदचंद्र के सोने के सिक्के पर के लेख से
लिया गया है और इसीसे उसको अंत में अलग धरा है. जाजल्लदेव के लेख में हलंत और अवग्रह के
चिह्न उनके वर्तमान चिन्हों के समान ही हैं. उक्त लेख के अक्षरों के अंत में 'इ' और 'ई' अलग दिये गये
हैं जिनमें से 'इ' बीजोल्यां (मेवाड़ में) के पास के चट्टान पर खुदे हुए चाहमान (चौहान) वंशी
राजा सोमेश्वर के समय के वि. सं. १२२६ (ई. स. ११७०) के लेख से लिया गया है और 'ई' चौहान
वंशी राजा पृथ्वीराज (तीसरे) के समय के वि. सं. १२४४ (ई. स. ११८७) के बीसलपुर (जयपुर राज्य
में) के लेख से लिया गया है. उक्त दोनों अक्षरों के ऐसे रूप अन्यत्र कहीं नहीं मिलते.
लिपिपत्र २६ वें की मूल पंक्तियों५ का नागरी अक्षरांतर—
तद्वंश्यो हैहय आसीद्यतो जायन्त हैहयाः ।......त्यसेन-
प्रिया सतौ ॥ ३ ॥ तेषां हैहयभूभुजां समभवद्वंसे(शे) स चेदीश्व-
रः श्रीकोकल्ल इति स्मरप्रतिक्षतिर्विश्व(श्व)प्रमोदो यतः । येनायं
चितसौ(श्रौ)धा......मेन मातुं यशः स्वीयं प्रेषितमुच्चकैः
कियदिदि त्र(ब्र)ह्मांडमन्तः क्षिति ॥ ४ ॥ अष्टादशस्य रिपुकुंभिवि-
लिपिपत्र २७ वां.
यह लिपिपत्र आबू के परमार राजा धारावर्ष के समय के वि. सं. १२६५ (ई. स. १२०८)
के ओरिआगांव के लेख६, जालोर के चाहमान (चौहान) राजा चाचिगदेव के समय के वि. सं. १३२१ (ई. स-
१. ये मूल पंक्तियां राजा लल्ल के समय के उपर्युक्त देवल के लेख से हैं. २. इं. ऐं; जि. १८, पृ. १९ के पास का प्लेट.
३. बृ. इं. ऐ; प्लेट ६, अक्षरों की पंक्ति १५-१६. ४. ऐ. इं; जि. १, पृ. ३४ के पास का प्लेट.
५. ये मूल पंक्तियां हैहयवंशी राजा जाजल्लदेव के रतनपुर के लेख से हैं (ऐं. इं; जि. १, पृ. ३४ के पास का प्लेट).
६. राजपूताना म्यूज़िअम (अजमेर) में रक्खे हुए उक्त लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से.

१२६४) के सूंधा नामक पहाड़ के लेख१ और मेवाड़ के गुहिलवंशी रावल समरसिंह के समय के चीरवा
गांव से मिले हुए वि. सं. १३३० (ई. स. १२७३) के लेख२ से तय्यार किया गया है. ओरिआ गांव
के लेख में 'ध' के सिर नहीं है परंतु 'ध' को 'व' से स्पष्ट रूप से भिन्न बतलाने के लिये व के ऊपर
बाईं ओर ( ऐसी लकीर जोड़ दी है. यह रूप पिछले नागरी के लेखों तथा पुस्तकों में मिल
आता है. सूंधा के लेख की लिपि जैन है. उसके 'लृ', 'ठ' आदि अक्षरों को अब तक जैन लेखक
वैसा ही लिखते हैं. 'णण' को, 'ण' लिखके बीच में आड़ी लकीर लगा कर बनाया है. यह रूप कई लेखों में
मिलता है और अब तक कई पुस्तकलेखक उसको ऐसा ही लिखते हैं. चीरवा के लेख में 'ग्ग' को 'ग्र'
का सा लिखा है और अन्य लेखों में भी उसका ऐसा रूप मिलता है, जिसको कोई कोई विद्वान् 'ग्र'
पढ़ते भी हैं परंतु उक्त लेख का लेखक बहुत शुद्ध लिखनेवाला था अत एव उसने भूल से सर्वत्र
'ग्ग' को 'ग्र' लिख दिया हो यह संभव नहीं. उसने उस समय का 'ग्ग' का प्रचलित रूप ही लिखा
है जिसका नीचे का अंश प्राचीन 'ग' का ही कुछ विकृत रूप है, जैसे कोई कोई लेखक वर्तमान नागरी के 'क्त'
और 'क्र' को 'क्त' और 'क्र' लिखते हैं जिनमें वर्तमान 'क' नहीं किंतु उसका प्राचीन रूप ही
लिखा जाता है.
लिपिपत्र २७ वें की मूल पंक्तियों३ का नागरी अक्षरांतर-
संवत् १२६५ वर्षे ॥ वैशाखशु १५ भौमे । चौलुक्य-
वंशोद्धरणपरमभट्टारकमहाराजाधिराजश्रीमद्भीमदेवप्र-
वर्द्धमानविजयराज्ये श्रीकरणे महामुद्रामात्यमहं०-
भाभूप्रभृतिसमस्तपंचकुले परिपंथयति चंद्रावतीनायमां-
डलिकसुरत्राणश्रीधारावर्षदेवे एकातपत्रवाहकत्वेन
६-शारदा ( कश्मीरी ) लिपि.
ई. स. की १० वीं शताब्दी के आसपास से ( लिपिपत्र २८ से ३१ ).
शारदालिपि पंजाब के अधिकतर हिस्से और कश्मीर में प्राचीन शिलालेखों, दानपत्रों, सिक्कों४
तथा हस्तलिखित पुस्तकों में मिलती है. यह लिपि नागरी की नांई कुटिल लिपि से निकली है.
ई. स. की ८ वीं शताब्दी के मेरुवर्मा के लेखों५ से पाया जाता है कि उस समय तक तो उधर कुटिल
लिपि का ही प्रचार था, जिसके पीछे के स्वाइम् (सइ) गांव से मिली हुई भगवती की मूर्ति के आसन
पर खुदे हुए सोमट के पुत्र राजानक भोगट के लेख६ की लिपि भी शारदा की अपेक्षा कुटिल से अधिक
मिलती हुई है. शारदालिपि का सब से पहिला लेख सराहां की प्रशस्ति७ है जिसकी लिपि ई. स. की
१०वीं शताब्दी के आसपास की है. यही समय शारदा लिपि की उत्पत्ति का माना जा सकता है.
१. जोधपुर निवासी मेरे विद्वान् मित्र मुन्शी देवीप्रसाद की भेजी हुई छाप से.
२. चीरवा गांव के मंदिर की भीत में लगे हुए उक्त लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से.
३. ये मूल पंक्तियां उपर्युक्त ओरिआ गांव के लेख से हैं.
४. कश्मीर के उत्पलवंशी राजाओं के सिक्कों में. ५. देखो, लिपिपत्र २२ वां. ६. फो. ऐं. चं. स्टे; पृ. १५२, प्लेट १३.
७. देखो, लिपिपत्र २८ वां. कांगड़ा ज़िले के कीरग्राम के बैजनाथ (वैद्यनाथ) नामक शिवमन्दिर में जालंधर (कांगड़े)

७४ प्राचीनलिपिमला.
पहिले शारदालिपि के लेख बहुत ही कम प्रसिद्धि में आये थे और ई. स. १८०४ तक तो एक भी लेख
की प्रतिकृति प्रसिद्ध नहीं हुई थी, परंतु सुप्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता डॉ. फोजल ने ई. स. १६११ में बड़े
श्रम के साथ चंबा राज्य के शिलालेख और दानपत्रों का बड़ा संग्रह कर 'ऐंटिक्विटीज़ ऑफ़ चंबा
स्टेट' नामक अपूर्व ग्रंथ प्रकाशित किया जिसमें प्राचीन लिपियों के अभ्यासियों के लिये शारदा
लिपि की अमूल्य सामग्री है.
लिपिपत्र २८ वां.
यह लिपिपत्र सराहां की प्रशस्ति¹ से तय्यार किया गया है. इसमें 'ए' के लिखोण की सिर
के स्थान की आड़ी लकीर की बाईं ओर चिन्ह और जोड़ा है जो वास्तव में 'ए' की मात्रा का
एक प्रकार का चिह्न है और कुटिल तथा नागरी लिपि के लेखों में ए, ऐ, ओ और औ की मात्राओं
में भी कभी कभी मिलता² है. पीछे से यही चिह्न लंबा होकर खड़ी लकीर³ के रूप में परिणत
होगया (देखो, लिपिपत्र ३१ में बहादुरसिंह के दानपत्र का 'ए' ). वर्तमान शारदा 'ए' में इस
खड़ी लकीर के अतिरिक्त 'ए' के ऊपर भी नागरी की 'ए' की मात्रा सी मात्रा और लगाई जाती है
(देखो, लिपिपत्र ७७). 'द्' के मध्य में ग्रंथि लगाई है. 'श' और 'स' में इतना ही भेद है कि
पहिले का सिर पूरे अक्षर पर है और दूसरे का दो अंशो में विभक्त है. 'त्' तथा 'म्' में मूल अक्षरों
के चिह्न स्पष्ट नहीं रहे. 'ओ' की मात्रा का चिह्न कहीं ~ भी है (देखो, 'यो'), 'औ' की मात्रा
कहीं उक्त चिह्न के अतिरिक्त व्यंजन के सिर के अंत में ^ चिह्न और जोड़ कर बनाई है (देखो,
'मौ' ) और रेफ पंक्ति से ऊपर नहीं किंतु सीध में लगाया है.
लिपिपत्र २८ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर-
किष्किन्धाकाधौशकुले प्रसूता सोमप्रभा नाम बभूव तस्य ।
देवी जगद्भूषणभूतमूर्तिस्त्रिलोचनस्येव गिरौशपुत्री ॥ अपूर्व-
मिन्दुम्प्रविधाय वेधास्सदा स्फुरत्कान्तिकलकमुक्तं ... संपूर्णबिम्बं (बिम्बं)
के राजा जयचंद्र ( जयचंद्र ) के समय की दो प्रशस्तियां लगी हैं. जनरल कनिंगहाम ने बाबू ( राजा ) शिवप्रसाद के पठना-
नुसार उनका समय क्रमशः लौकिक ( सप्तर्षि ) संवत् ८० और गत शककाल ७२६ ( ई. स. ८०४ ) माना था ( क; आ. स. रि;
जि. ४, पृ. १८०-८२ ; प्लेट ४२). फिर डॉ. बूलर ने ये प्रशस्तियां छापीं (ऐं. इं ; जि. १, पृ. १०४-७ ; ११२-५) और पहिली का संवत्
[लौकिक] संवत्सर ८० ज्येष्ठ शुक्ल १ रविवार और दूसरी का गत शककाल ७[२६] होना स्थिर किया. फिर उसी आधार
पर इन प्रशस्तियों को शारदा लिपि के सब से पुराने लेख, एवं उक्त लिपि का प्रचार ई. स. ८०० के आस पास से होना, मान
लिया ( वू ; इं. पे; पृ. ५७ ) परंतु ई. स. १८८८ में डॉ. कीलहॉर्न ने गणित कर देखा तो शक संवत् ६२६ से १४२६ तक की आठ
शताब्दियों के गत २६ वें वर्षों में से केवल शक संवत् ११२६ ही एक ऐसा वर्ष पाया जिसमें ज्येष्ठ शुक्ल १ को रविवार था. इस
आधार पर उक्त विद्वान् ने इन प्रशस्तियों का ठीक समय शक संवत् ११२६ = लौकिक संवत् ८० होना स्थिर किया ( इं. ऐं ;
जि. २०, पृ. १५४ ) और डॉ. फोजल ने मूल प्रशस्तियों को देखकर डॉ. कीलहॉर्न का कथन ही ठीक बतलाया ( फो; ऐँ. चं.
स्टेट् ; पृ. ४३-४ ). ऐसी दशा में ये प्रशस्तियां न तो ई. स. ८०४ की मानी जा सकती है और न शारदा लिपि का प्रचार ई. स.
८०० के आस पास होना स्वीकार किया जा सकता है. दूसरी बात यह भी है कि जनरल कनिंगहाम ने जयचंद्र से पांचवें
राजा जयचंद्रसिंह की गद्दीनशीनी ई. स. १३९५ में और ८ वें राजा रूपचंद्र की गद्दीनशीनी ई. स. १३६० में होना और उस
(रूपचंद्र ) का फ़ीरोज़ तुगलक ( ई. स. १३६०-७० ) के अधीन होना लिखा है ( क; कॉ. मि. इं; पृ. १०४). ऐसी दशा में
भी जयचंद्र का ई. स. ८०४ में नहीं किंतु १२०४ में विद्यमान होना ही स्थिर होता है.
१ फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट १५.
२ देखो, लिपिपत्र १८वें की मूल पंक्तियों में से दूसरी पंक्ति में 'विधत्ते' का 'ते', उसी पंक्ति में 'शत्रुसैन्यं' का 'सै',
और उसी लिपिपत्र में 'श्रो' और 'श्रो'.
३ यही खड़ी लकीर नागरी में 'पर्द्धीमात्रा' (पृष्ठमात्रा) होकर ए, ऐ, ओ और औ की मात्रावाले व्यंजनों के पूर्व

शारदा लिपि. ७५
वदनं यदीयमनुत्तराङ्ककृताङ्गयष्टिः ॥ नानाविधालङ्कृतिसन्नि-
वेशविशेषरम्या गुणशालिनी या । मनोहरत्वं सुतरा मवाप स-
चेतसां सत्कविभारतीव ॥ शृङ्गारसिन्धो X किमियन्नु वेला किं वा
मनोभ्रूतसुमञ्जरी स्यात् वसन्तराजस्य नु राज्यलक्ष्मीस्त्रैलोक्यसौन्दर्य-
लिपिपत्र २६ वां.
यह लिपिपत्र राजा विदग्ध के सुंगल गांव के दानपत्र२ से तय्यार किया गया है. इसमें 'ड' वि-
लक्षण है, कहीं कहीं 'प' और 'म' में स्पष्ट अंतर नहीं है, 'व' तथा 'ब' में भेद नहीं है, 'ए' की
मात्रा तीन प्रकार से लगी है जिनमें से एक आड़ी लकीर है (देखो, 'ऐ') और 'र्थ', 'थै', 'स्थ'
और 'स्थि' में 'थ' का रूप विकृत मिलता है.
लिपिपत्र २६ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति ॥।१ श्रीचणप(म्प)कावासकात्परमभट्टारकमहाराजाधिराज-
परमेश्वरश्रीमद्युगाकरवर्मदेवपादानुध्यात[:] परमब्र(ह्म)ह्मण्यो निखि-
लसच्छासनाभिप्रवृत्तगुरुवृत्तदेवतानुवृत्तसमधिगतशास्तुकुशल-
तया समाराधितविद्वज्जनहृदयो नथानुगतपौरुषप्रयोगा-
वाप्तत्रिवर्गसिद्धिः सम्यगर्जिताभिकामिकगुणसहिततया फ-
लित इव मार्गतरु [:] । सर्वसत्वा(त्त्वा)अयनौ(णौ)यो मोषनाम्नाय३
आदित्यवङशो(वंशो)द्भव [:] परममाहेश्वरो (रः) श्रीभोगमतीदेव्या (व्यां) समुत्पन्न [:]
लिपिपत्र ३० वां.
यह लिपिपत्र सोमवर्मा के कुलैत के दानपत्र४, चंबा से मिले हुए सोमवर्मा और आसट के दान-
पत्र५, राजानक नागपाल के देवीरीकोठी (देब्रिकोटी) के शिलालेख६, आरिगांव के शिलालेख७ तथा
जालंधर के राजा जयच्चंद्र के समय की शक संवत् ११२६८=लौकिक संवत् ८० (ई. स. १२०४) की
कांगडा ज़िले के कीरग्राम के बैजनाथ (वैद्यनाथ) के मंदिर की दो प्रशस्तियों९ से तय्यार किया गया
है और इसमें मुख्य मुख्य अक्षर ही दिये गये हैं. कुलैत के दानपत्र में 'च' के बाईं तरफ के अंश के नीचे
के भाग में गांठ सी लगाई है और 'छ' की खड़ी लकीर के मध्य में ग्रंथि बनाकर उसके और 'क' के
बीच के अंतर को स्पष्ट किया है. बैजनाथ की प्रशस्तियों के 'ई' को, उक्त अक्षर के प्राचीन रूप में खड़ी
कभी कभी लगने लगी और बंगला, मैथिल तथा उड़िया लिपियों में दाहिनी तरफ नीचे गांठवाली वक्र रेखा के रूप में उसका
अब तक प्रयोग होता है (देखो, लिपिपत्र ७८ और ७६ में उक्त लिपियों की वर्णमालाओं में के, कै, को और कौ).
१. फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट १७ से.
२. इन तीन लकीरों में से पहिली की आकृति ) ऐसी है और दूसरी व तीसरी खड़ी लकीरें हैं जिनमें स एक अनावश्यक है.
३. शुद्ध पाठ 'मोषणान्वयः' होना चाहिये.
४. फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट २४ से.
५. फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट २५ से.
६. फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट ३० से.
७. ऐँ. इं; जि. ६, पृ. ३०१ के पास के प्लेट से.
८. इन प्रशस्तियों के समय के लिये देखो ऊपर पृ. ७३ टिप्पणी ७.
९. बु; इं. पे; प्लेट ४, प्राचीन अक्षरों की पंक्ति प्रथम से.

७६ प्राचीनलिपिमाला.
लकीर के दोनों पार्श्व में लगनेवाली बिंदियों को उक्त लकीर के परिवर्तित रूप के ऊपर लगा कर, बनाया
है और उसीसे वर्तमान शारदा का 'ई' बना है. 'ते' और 'थै' में 'ए' और 'ऐ' की मात्राएं
क्रमशः एक और दो आड़ी लकीरें व्यंजन के ऊपर लगा कर बनाई हैं. टाकरी लिपि में 'ए' और 'ऐ'
की मात्राएं अब तक ऐसी ही लगाई जाती है (देखो लिपिपत्र ७७).
लिपिपत्र ३० वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
ओं नमश्शिवाय ॥ जयति भुवनकारणं स्वयंभुज्जयति पुर-
न्दरनन्दनो सुरारिः [।] जयति गिरिसुतानिरुद्धदेहो...रितभयाप-
हरो हरश्च देवः ॥ श्रीचष्प(म्प)कावासकात्यसमब्रह्मग्यो लला-
तटघटितविकटभुकुटिपटककुटि(द्वि)तकट कसमटिककृतसाना-
लिपिपत्र ३१ वां.
यह लिपिपत्र कुलू के राजा बहादुरसिंह के दानपत्र², अथर्ववेद³ (पिप्पलादशाखा) और शाकु-
न्तल नाटक⁴ की हस्तलिखित पुस्तकों से तय्यार किया गया है. अथर्ववेद की पुस्तक के अक्षरों का
'इ' प्राचीन 'इ' के '७°' इस रूप को नीचे के अंश से प्रारंभ कर चलती कलम से पूरा लिखने से ही
ऐसा बना है. उसीसे वर्तमान शारदा का 'इ' बना है. शाकुंतल नाटक से उद्धृत किये हुए अक्षरों
में से अधिकतर अर्थात् अ, आँ, ई, ऊ, ऋ, ओ, औ, क, ख, ग, च, छ, झ, ञ, ड, ढ, ण, त, थ, द,
ध, न, प, फ, ब, म, य, र, श, ष, स और ह अक्षर वर्तमान कश्मीरी से मिलते जुलते ही हैं (उक्त
अक्षरों को लिपिपत्र ७० में दी हुई वर्तमान शारदालिपि से मिला कर देखो).
लिपिपत्र ३१ वें की मूल पंक्तियों⁵ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति ॥ रामरामरामपराक्रमपराक्रमण्डदक्षदक्षजा-
कांतनितांतचरणशरणकृतांतःकरणरणविशारद शारदद्वि-
मकरानुकारियशःपूरपूरितदिगंतरपरमभट्टारकमहाराजाधिरा-
जश्रीबहादुरसिंहदेवपादाः ॥ ॥ महाश्रीयुवराजप्रतापसिं-
हः महामंचिवर नारायणसिंहः ॥ श्रीचंपकपुरस्थमहापं-
१. ये मूल पंक्तियां राजा सोमवर्मा के कुलैत के दानपत्र से हैं.
२. आ. स. रि; ई. स. १९०३-४, प्लेट ७१ से. ३. हार्वर्ड ओरियंटल सिरीज में छपे हुए अथर्ववेद के अंग्रेज़ी
अनुवाद के साथ दी हुई उक्त पुस्तक के एक पत्रे की प्रतिकृति से.
४. बु; इं. पे; सेट ६, प्राचीन अक्षरों की पंक्ति ६ से.
५. ये मूल पंक्तियां कुलू के राजा बहादुरसिंह के दान पत्र से हैं.

१०—बंगला लिपि.
ई. स. की ११ वीं शताब्दी के आस पास से (लिपिपत्र ३२ से ३५).
बंगला लिपि भारतवर्ष के पूर्वी विभाग अर्थात् मगध की तरफ़ की नागरी लिपि से निकली है
और बिहार, बंगाल, मिथिला, नेपाल, आसाम तथा उड़ीसा से मिलनेवाले कितने एक शिलालेख,
दानपत्र, सिक्कों या हस्तलिखित पुस्तकों में पाई जाती है. बंगाल के राजा नारायणपाल के समय,
अर्थात् ई. स. की दसवीं शताब्दी तक तो उधर भी नागरी लिपि का ही प्रचार रहा. उक्त राजा के
लेखों में केवल 'ए'१, 'ख'२ आदि कुछ अक्षरों में बंगला की ओर झुकाव नज़र आता है. ई. स. की
ग्यारहवीं शताब्दी के पालवंशी राजा विजयपाल के देवपारा के लेख३ में ए, ख, ञ, त, म, र, ल और
स में नागरी से थोड़ी सी भिन्नता है और कामरूप के वैद्यदेव के दानपत्र४, आसाम से मिले हुए
वल्लभेंद्र के दानपत्र५ और हस्त्राकोल के लेख६ की लिपियों में से प्रत्येक को नागरी (लिपिपत्र २४-२७) से
मिलाया जावे तो अ, इ, ई, ऋ, ए, ऐ, ख, घ, झ, ञ, ट, थ, प, फ, र, श और ष में अंतर पाया जाता
है. इस प्रकार लेखनशैली में क्रमशः परिवर्तन होते होते वर्तमान बंगला लिपि बनी.
लिपिपत्र ३२ वां.
यह लिपिपत्र बंगाल के राजा नारायणपाल के समय के बदाल के स्तंभ के लेख७ और विजय-
सेन के देवपारा के लेख८ से तय्यार किया गया है. बदाल के लेख से तो मुख्य मुख्य अक्षर ही लिये
गये हैं. उनमें 'अ' और 'आ' की प्रारंभ की छोटीसी खड़ी लकीर न लगने से उनके रूप नागरी
के 'ञ' से बन गये हैं. संभव है कि यह भिन्नता दानपत्र खोदनेवाले की ग़लती से हुई हो.
देवपारा के लेख में अवग्रह की आकृति वर्तमान नागरी के 'इ' सी है, विसर्ग के ऊपर भी
सिर की आड़ी लकीर लगाई है, 'प' तथा 'य' में विशेष अंतर नहीं है और 'व' और 'ब' में
कोई भेद नहीं है.
लिपिपत्र ३२वें की मूल पंक्तियों९ का नागरी अक्षरांतर—
तस्मिन् सेनान्ववाये प्रतिसुभटशतोत्सादनव्र(ब्र)ह्मवादौ
स व्र(ब्र)ह्मक्षत्रियाणामजनि कुलशिरोदाम सामन्तसे-
नः। उन्नीयन्ते यदीयाः स्खलदुदधिजलोल्लोलश्री-
तेषु सेतोः कच्छान्तेष्वप्सरोभिर्भृशम यतनथस्पर्द्धया
युद्धगाथाः ॥ यस्मिन् सङ्गरचत्वरे पटुरटत्तूर्योप-
१. देखो लिपिपत्र ३२.
२. मेमॉयर्स ऑफ़ एशियाटिक् सोसाइटी ऑफ़ बंगाल, जिल्द ५, प्लेट २४ की अंतिम पंक्ति में 'वैशाख्यां' का 'ख'.
३. ऍ. इं; जि. १, पृ. ३०८ के पास का प्लेट. ४. ऍ. इं; जि. २, पृ. ३५२ और ३५३ के बीच के ४ प्लेट.
५. ऍ. इं; जि. २, पृ. १८४ और १८५ के बीच के २ प्लेट. ६. ज. बंगा. ए. सो; ई. स. १८०८, पृ. ४६२.
७. ऍ. इं; जि. २, पृ. १६१ के सामने का प्लेट. ८. ऍ. इं; जि. १, पृ. ३०८ के पास का प्लेट.
९. ये मूल पंक्तियां देवपारा के लेख से हैं.

७८
प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र ३३ वां.
यह लिपिपत्र बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन के तर्पणडिघी के दानपत्र १ से और कामरूप के
वैद्यदेव के दानपत्र २ से तय्यार किया गया है. उन दोनों में 'इ' और 'ई' में विशेष अंतर नहीं है.
वैद्यदेव के दानपत्र का 'ऐ', 'ए' से नहीं, किंतु 'इ' में कुछ परिवर्तन करके बनाया है, अनु-
स्वार को अक्षर के ऊपर नहीं किंतु आगे धरा है और उसके नीचे हलंत की सी तिरछी लकीर
और लगाई है, 'ऊ' और 'ऋ' की मात्राओं में स्पष्ट अंतर नहीं है, 'व' और 'ब' में भेद नहीं है
और सिर सीधी लकीर से नहीं किंतु ⊂ ऐसी लकीर से बनाये हैं, जिसका अधिक विकास उड़िया
लिपि के सिरों में पाया जाता है.
लिपिपत्र ३३ वें की मूल पंक्तियों ३ का नागरी अक्षरांतर—
ओं ओं नमो भगवते वासुदेवाय ॥ स्वस्ति ॥ अम्व(म्ब)र-
मानस्तम्भः कुम्भः संसारवी(बी)जरक्षायाः । हरिदन्तरमि-
तमूर्त्तिः क्रीडा