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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 318 में से

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पृष्ठ 89

ई-गुप्तलिपि.
ई. स. की चौथी और पांचवीं शताब्दी ( लिपिपत्र १५-१७ ).
गुप्तों के राज्य के समय सारे उत्तरी भारत में ब्राह्मी लिपि का जो परिवर्तित रूप प्रचलित
था उसका कल्पित¹ नाम 'गुप्तलिपि' रक्खा गया है. यह लिपि गुप्तवंशी राजाओं के, जो उत्तरी
भारत के बड़े हिस्से के स्वामी थे, लेखों में, एवं उनके समकालीन परिव्राजक और राजर्षितुल्य
वंशियों तथा उच्छ्रकल्प के महाराजाओं के दानपत्रादि में, जो अधिकतर मध्यभारत से और कुछ
मध्यप्रदेश से मिले हैं, पाई जाती है. ऐसे ही उक्त समय के अन्य राजवंशियों तथा साधारण
पुरुषों के लेखादि में भी मिलती है. राजपूताना,² मध्यभारत³ तथा मध्यप्रदेश⁴ में गुप्तकाल में भी
कहीं कहीं दक्षिणी शैली की ( पश्चिमी ) लिपि भी मिल आती है, जिसका एक कारण यह भी है
कि लेख को लिखने के लिये बहुधा सुंदर अक्षर लिखनेवाला पसंद किया जाता है और वह जिस शैली
की लिपि का ज्ञाता होता है उसीमें लिखता है. देशभेद और समय के साथ भी अक्षरों की
आकृति में कुछ अंतर पड़ ही जाता है और उसीके अनुसार लिपियों के उपविभाग भी किये जा सकते
हैं परंतु हम उनकी आवश्यकता नहीं समझते.
गुप्तों के समय में कई अक्षरों की आकृतियां नागरी से कुछ कुछ मिलती हुई होने लगीं. सिरों
के चिह्न जो पहिले बहुत छोटे थे बढ़ कर कुछ लंबे बनने लगे और स्वरों की मात्राओं के प्राचीन
चिह्न लुप्त हो कर नये रूपों में परिणत हो गये हैं.
१. गुप्तलिपि का ही नहीं परंतु पृ. ४२-४४ में ब्राह्मीलिपि के विभागों के जो नाम रक्खे गये हैं वे बहुधा सब ही
कल्पित हैं और अक्षरों की आकृति, देश या उन लिपियों से निकली हुई वर्तमान लिपियों के नामों से ही उनके नामों की
कल्पना की गई है. इसी तरह उनके लिये जो समय माना गया है वह भी अनुमानिक ही है क्योंकि कई अक्षरों के वे ही
रूप अनुमान किये हुए समय से पहिले और पीछे भी मिलते हैं.
२. राजपूताने में बहुधा लेख उत्तरी शैली के ही मिलते हैं परंतु गंगधार (झालावाड़ राज्य में) से मिला हुआ वि.
सं. ४८० (ई. स. ४२३) का लेख (फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या १७), जो विश्ववर्मन् का है, दक्षिणी शैली की लिपि का है
और बयाने (भरतपुरराज्य में) के किले (विजयगढ़) में विष्णुवर्द्धन के पुंडरीक यज्ञ के यूप (= स्तंभ) पर खुदे हुए लेख
(फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ५६) में, जो वि. सं. ४२८ (ई. स ३७२) का है, दक्षिणी शैली का कुछ मिश्रण पाया जाता है.
३. मध्यभारत में भी गुप्तकाल के लेख बहुधा उत्तरी शैली के ही मिलते हैं परंतु कहीं कहीं दक्षिणी शैली के भी मिल
आते हैं; जैसे कि चंद्रगुप्त (दूसरे) का सांची का लेख (फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ५); नरवर्मन् का मंदसोर से मिला हुआ
मालव (विक्रम) सं. ४६१ का (पै. इं; जि. १२, पृ. ३२०-२१) और कुमारगुप्त के समय का मालव (विक्रम) सं. ५२६ का
(फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या १८) लेख. उदयगिरि से मिला हुआ चंद्रगुप्त (दूसरे) के समय का एक लेख (फ्ली; गु. इं; लेख-
संख्या ६) उत्तरी शैली की लिपि का है, परंतु वहीं से मिला हुआ उसी राजा के समय का दूसरा लेख (फ्ली; गु. इं; लेख-
संख्या ३) दक्षिणी शैली का है और वहीं से मिले हुए तीसरे लेख की (फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ६१), जो गुप्त संवत १०६
(ई. स. ४२५-६) का है, लिपि उत्तरी शैली की होने पर भी उसमें दक्षिणी शैली का कुछ कुछ मिश्रण पाया जाता है. इस
प्रकार एक ही स्थान के लेखों में भिन्न शैली की लिपियों का मिलना यही बतलाता है कि उनके लेखक भिन्न लिपियों के ज्ञाता
थे न कि देशभेद ही इस अंतर का कारण था.
४. मध्यप्रदेश में भी गुप्तों के समय उत्तरी शैली की लिपि का प्रचार था परंतु कोई कोई लेख दक्षिणी शैली के भी
मिल आते हैं; जैसा कि एरण से मिला हुआ समुद्रगुप्त के समय का लेख (फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या २), परंतु वहीं से मिले
हुए बुधगुप्त और गोपराज के लेख उत्तरी शैली के हैं (फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या १६ और २०).
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziiabad. Digitzed by eGangotri