प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मी लिपि. ५६
उक्त अक्षर का कुछ परिवर्तित रूप है१. 'म' जुन्नर के लेख के 'मि' में जो 'म' अक्षर है उसका विकार
मात्र है२. 'स' की बाईं तरफ़ लगनेवाली वक्र रेखा को अक्षर के मुख्य अंश से अलग कर उसको
दाहिनी तरफ़ अधिक ऊपर बढ़ाने से यह विलक्षण 'स' बना है.
लिपिपत्र १३ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
...३चौपुरातो युवमहाराजो भारदायसगोत्तो प-
ल्लवानं सिवखंदवम्मो धंजकड़े वापतं आन-
पयति अम्हेहि दानि अंह वेजयिके धंमा-
युबलवधनिके य बम्हनानं अगिवेससगो-
लिपिपत्र १४ वां.
यह लिपिपत्र कोंडमुडि से मिले हुए राजा जयवर्मन् के दानपत्र४ से तय्यार किया गया है.
इसमें 'ई' की खड़ी लकीर को तिरछा कर दिया है. 'ड' और 'न' में स्पष्ट अंतर नहीं है. 'ज',
'न', 'म' और 'स' अक्षर लिपिपत्र १३ के उक्त अक्षरों से मिलते जुलते ही हैं इतना ही नहीं किंतु
इस दानपत्र की लिपि बहुधा वैसी ही है जैसी कि लिपिपत्र १३ वें की है.
लिपिपत्र १४ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
विजयखंधावारा नगरा कूटूरातो महेस्वरपादप-
रिगहिते बृहत्फलायनसगोतो राजा सिरिजय-
वंमो आनपयति कूटूरे वापतं अंम्हे दानि
अंम्हवेजयिके आयुवर्धनिके च बम्हनानं
गोतमसगोत्तजायाणरस सवगुतजस ट तानवस
लिपिपत्र १५ वां.
यह लिपिपत्र हीरहडगल्ली से मिले हुए पल्लववंशी राजा शिवस्कंदवर्मन् के दानपत्र५ से
तय्यार किया गया है. इसमें 'इ' और 'ध' की बिंदियों के स्थान में + चिह्न लगाये हैं. 'ए'
की आकृति नागरी के 'व' (बिना सिर के) से कुछ कुछ मिलती हुई बन गई है. 'ब' की बांई
तरफ़ की खड़ी लकीर को भीतर की ओर अधिक दबा कर बीच में गोलाई दी है. 'ब' का यह
रूप दक्षिण की शैली की पिछली लिपियों में बराबर मिलता है. 'म्' को पंक्ति से नीचे लिखा है
और उसके ऊपर के दोनों शृंगों के साथ सिर की छोटी लकीरें नहीं जोड़ी जो सस्वर 'म' के
साथ जुड़ी हुई मिलती हैं. 'गा' के साथ 'आ' की मात्रा नीचे की तरफ़ से लगाई है.
लिपिपत्र १५ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
सिद्धम् ॥ कांचिपुरा अग्गिट्टो(त्थो)मवाजपेयस्समेधयाजी
धम्ममहाराजाधिराजो भारद्वायो पल्लवाण सिव-
खंदवमो अम्ह विसये सव्वत्थ राजकुमारसे-
नापतिरट्ठिकमाडबिकदेसाधिकतादिके गामागाम-
भोजके वल्लवे गोवल्लवे अम्हे आरणधिकते
१. देखो, लिपिपत्र ११ में कार्ले के लेखों के अक्षरों में 'न'. २. देखो, लिपिपत्र ११ में जुन्नर के लेखों का 'मि'.
३. पहिला अक्षर 'कां' है परंतु मूल में स्पष्ट नहीं है. ४. एँ. इं; जि. ६, पृ. ३१५ से ३१९ के बीच के ४ प्लेटों से.
५. एँ. इं; जि. १, पृ. ६-७ के बीच के ३ प्लेटों से.
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