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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 318 में से

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पृष्ठ 94

कुटिल लिपि. ६५
जगति कान्तमदो दुरापं राजाधिराजपरमेश्वर इत्युढूढम् ॥
स्निग्धश्यामाम्बुदाभैः स्थगितदिनकृतो यज्जनामाज्यधूमैरम्भो मेध्यं
लिपिपत्र १६ वां.
यह लिपिपत्र ‘उष्णीषविजयधारणी’ नामक ताड़पत्र पर लिखी हुई पुस्तक के अंत में दी हुई
पूरी वर्णमाला १, मि. बावर के प्राप्त किये हुए प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकों २, मौखरी शर्ववर्मन् की
आसीरगढ़ से मिली हुई मुद्रा ३, मौखरी अनंतवर्मन् के २ लेखों ४ तथा महानामन् के बुद्धगया के लेख ५
से तय्यार किया गया है. ‘उष्णीषविजयधारणी’ के अंत की वर्णमाला के अक्षरों में अ, उ, ऋ, क,
ख, ग, घ, ङ, च, ज, ट, ड, ढ, ण, त, थ, द, न, प, म, य, र, ल, व, श, ष, स और ‘ह’ नागरी के उन
अक्षरों से बहुत कुछ मिलते हुए हैं और ‘ब’ तथा ‘व’ में भेद नहीं है. ‘इ’ की तीन बिंदियों में से नीचे की
बिंदी को वर्तमान नागरी के ‘उ’ की मात्रा का सा रूप दिया है. ‘इ’ का यह रूप ई. स. की १३ वीं शताब्दी
तक कहीं कहीं मिल आता है. ‘ऋ’, ‘ॠ’, ‘लृ’ और ‘ॡ’ पहिले पहिल इसी में मिलते हैं. वर्तमान
नागरी के ‘ऋ’ और ‘ॠ’ इन्हीं से बने हैं परंतु वर्तमान ‘लृ’ और ‘ॡ’ के मूल संकेत नष्ट
हो चुके हैं जिससे अब ‘लृ’ के साथ ‘ऋ’ और ‘ॠ’ की मात्राएं लगा कर काम चलाया जाता
है. ‘ओ’ की आकृति नागरी के वर्तमान ‘उ’ से मिलती हुई है परंतु उसका सिर बाईं तरफ
अधिक लंबा हो कर उसका बांया अंत नीचे को मुड़ा है. ‘ओ’ का यह रूप पिछले लेखों तथा प्राचीन
हस्तलिखित पुस्तकों में भी मिलता है और कोई कोई लेखक अब तक ‘ओं’ लिखने में
‘ऊ’ के ऊपर रेफ तथा अनुस्वार लगा कर इस प्राचीन ‘ओ’ की स्मृति को जीवित
रखते हैं. ‘ङ’, ‘ज’ और ‘ट’ के सिरों के दाहिनी तरफ़ के अंत में ⌝ चिह्न लगाया है. वह अथवा
उसका परिवर्तित रूप ⌝ पिछले लेखों में मिलता है (देखो, लिपिपत्र २१, २३, २४, २८, २६, ३०,
३१, ३२, ३३, ३४). वर्तमान नागरी के ‘ङ’ में, ‘ड’ की आकृति बना कर उसके आगे बिंदी लगाई
जाती है जो इसी चिह्न का स्थानांतर है और ‘ङ’ तथा ‘ड’ की आकृति एकसा बन जाने पर उन
अक्षरों का भेद बतलाने के लिये ही लगाई जाने लगी है. ‘ओं’ का सांकेतिक चिह्न नागरी के ७ के अंक
सा है जो वास्तविक ‘ओं’ नहीं किंतु कल्पित चिह्न है. यह कई रूपांतरों के साथ पिछले लेखों
तथा प्राचीन जैन, बौद्ध और ब्राह्मणों के हस्तलिखित पुस्तकों के प्रारंभ में मिलता हैं.
महानामन् के लेख में ‘ऊ’ को ‘उ’ के साथ ┘ चिह्न जाड़ कर बनाया है परंतु अन्यत्र बहुधा सम-
कोणवाला नहीं किंतु गोलाईदार चिह्न मिलता है जिसका अग्रभाग नीचे की ओर झुका हुआ होता
है (देखो, इसी लिपिपत्र में उष्णीषविजयधारणी के अंत की वर्णमाला का ‘ऊ’ और लिपिपत्र २४,
२५, २८, ३१, ३४, ३५ में भी). ‘त्’ का रूप उपर्युक्त यशोधर्मन् के लेख (लिपिपत्र १८ में) के ‘त्’
का सा ही है परंतु इसमें सिर की आड़ी लकीर को दाहिनी ओर झुका कर बहुत नीचे बढ़ा लिया है
संभव है कि नागरी का वर्तमान हलंत का चिह्न इसीसे निकला हो और व्यंजन के ऊपर लिखे जाने की
अपेक्षा नीचे लिखा जाने लगा हो. ‘र्थ’, ‘थ’ से मिलता हुआ है और रेफ को पंक्ति से ऊपर नहीं
किंतु सीध में लिखा है और ‘र्थ’ तथा ‘थ’ में भेद बतलाने के लिये ही ‘य’ के नीचे के दाहिनी
ओर के अंश को गोलाई के साथ ऊपर बढ़ाया है. ऐसा ही ‘र्थ’ अन्य लेखों में भी मिलता है (देखो,
लिपिपत्र १७, २०, २१, २२, २८, २६).
१. ऐं. ऑ; (आर्यन सीरीज़) जि. १, भाग ३, प्ले. १-४. ३. फ़्ली; गु. इं; प्लेट ३० A.
२. आ. स. इं; (इंपीरिअल सीरीज़) जि. २२ वीं के कई प्लेट. ५. फ़्ली; गु. इं; प्लेट ४१ A.
४. फ़्ली; गु. इं; सेट ३१ A और B.