प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 93, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ प्राचीनलिपिमाला.
तथा कई अन्य लेखों में; एवं जापान के होर्युजी नामक स्थान के बौद्ध मठ में रक्खी हुई
‘प्रज्ञापारमिताहृदयसूत्र’ और ‘उष्णीषविजयधारणी’१ तथा मि. बावर की प्राप्त की हुई हस्त
लिखित पुस्तकों२ में भी मिलती है.
लिपिपत्र १८ वां.
यह लिपिपत्र मंदसोर से मिले हुए राजा यशोधर्मन् (विष्णुवर्द्धन) के मालव (विक्रम) सं. ५८६
(ई. स. ५३२) के शिलालेख३ से तय्यार किया गया है. इसमें ‘अ’ वर्तमान दक्षिणी शैली के
नागरी ‘अ’ से मिलता हुआ है. ‘औ’ पहिले पहिल इसी लेख में मिलता है. ‘उ, च, ड, ढ, त,
द, न, प, म, र, ल, ष, स और ‘ह’ अक्षरों के रूप वर्तमान नागरी के उक्त अक्षरों से मिलते जुलते
ही हैं. हलंत व्यंजनों को सिरों की पंक्ति से नीचे नहीं किंतु सस्वर व्यंजनों के साथ समान पंक्ति
में ही लिखा है परंतु उनके सिर उनसे जुड़े हुए नहीं किंतु विलग ऊंचे धरे हैं और ‘त्’ के नीचे
नागरी की ‘उ’ की मात्रा का सा चिह्न और बढ़ा