सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 90

गुप्त लिपि. ६१
लिपिपत्र १६ वां.
यह लिपिपत्र गुप्तवंशी राजा समुद्रगुप्त के अलाहाबाद के स्तंभ के लेख¹ से तय्यार किया गया
है. इसमें 'इ' का चिह्न दो बिंदियों के आगे एक खड़ी लकीर है. 'उ' की खड़ी लकीर में वक्रता
है और नीचे की आड़ी लकीर गोलाई के साथ दाहिनी तरफ़ ऊपर की ओर मुड़ी है, जैसा कि
दक्षिणी शैली की लिपियों में पाया जाता है. ड, ढ, त, द, प, भ, म और 'ष' (पहिले) के रूप
नागरी से कुछ मिलने लगे हैं. 'ष' (दूसरे) और 'स' के रूपों की आकृतियां कुछ विलक्षण हैं.
लिपिपत्र १६ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
महाराजश्रीगुप्तप्रपौत्रस्य महाराजश्रीघटोत्कचपौत्रस्य महाराजा-
धिराजश्रीचन्द्रगुप्तपुत्रस्य लिच्छविदौहित्रस्य महादेव्यं कुमारदे-
व्यामुत्प(त्प)न्नस्य महाराजाधिराजश्रीसमुद्रगुप्तस्य सर्व्वपृथिवीविजय-
जनितोदयव्याप्तनिखिलावनितलां कीर्त्तिमितस्त्रिदशपतिभवनगमनावा-
प्तललि(डि=लि)तसुखविचरणामाचक्षाण इव भुवो बाहुरयमुच्छ्रितः
स्तम्भः यस्य । प्रदानभुजविक्रमप्रशमशास्त्रवाक्योदयैरुपर्युपरिसं-
चयोच्छ्रितमनेकमागं यशः पुनाति भुवनत्रयं पशुपतेर्ज्टान्तर्गहा-
लिपिपत्र १७ वां.
यह लिपिपत्र गुप्तों के राजत्वकाल के उदयगिरि², मिहरोली³, बिलसद⁴, करंडांडा⁵ और कुड़ा⁶
के शिलालेखों तथा महाराज लक्ष्मण और जयनाथ के दानपत्रों⁷ से तय्यार किया गया है और इसमें
केवल मुख्य मुख्य अक्षर ही उद्धृत किये गये हैं. उदयगिरि के लेख में पहिले पहिल जिह्वामूलीय और
उपध्मानीय के चिह्न मिलते हैं, जो क्रमशः 'क' और 'प' के ऊपर उक्त अक्षरों से जुड़े हुए लगे हैं.
मिहरोली के लेख में कितने एक अक्षर समकोणवाले हैं. 'स्थि' और 'स्थे' में 'स' की आकृति कुछ
विलक्षण हो गई है. ऐसे ही 'स्थि' में 'थ' अक्षर का रूप 'छ' से मिलता हुआ है न कि 'थ' से.
बिलसद के लेख में स्वरों की उन मात्राओं में, जो अक्षरों के ऊपर लगती हैं, अधिक विकास पाया
जाता है और उन्हीं के परिवर्तन से कुटिल लिपि में उनके विलक्षण लंबे रूप बने हैं. करंडांडा के लेख में
'म' की आकृति विलक्षण बनाई है. महाराज लक्ष्मण के पाली गांव के दानपत्र में कहीं कहीं सिरों
तथा खड़ी, आड़ी या तिरछी लकीरों के अंतिम भाग को चीर दो हिस्से बनाकर अक्षरों में सुंदरता
लाने का यत्न किया है. 'म' के नीचे के ग्रंथिवाले हिस्से को बाईं तरफ़ बढ़ा कर लंबी लकीर का
रूप दिया है और 'त्र' में 'र' को नागरी की 'उ' की मात्रा के समान ग्रंथित बनाया है. जयनाथ के
दानपत्र में 'इ' की तीन बिंदियों में से ऊपर की बिंदी के स्थान में आड़ी लकीर बनाई है. 'इ' के इसी
रूप के परिवर्तन से पीछे से नागरी की 'इ' बनी है (देखो लिपिपत्र ८२ में 'इ' की उत्पत्ति). तोर-
माण के कुड़ा के लेख के अक्षरों में 'ग' की बाईं तरफ की खड़ी लकीर को बांईं ओर ऊपर की तरफ
मोड़ा है जिससे उक्त अक्षर का रूप वर्तमान नागरी के 'ग' से मिलता हुआ बन गया है, केवल
सिर की आड़ी लकीर का ही अभाव है.
१. फ्ली; गु. इं; प्लेट १. २. फ्ली; गु. इं; प्लेट ४ (A). ३. फ्ली; गु. इं; प्लेट २१ (A).
४. फ्ली; गु. इं; प्लेट ५. ५. ऍ. इं; जि. १०, पृ. ७१ के पास का प्लेट.
६. ऍ. इं; जि. १, पृ. २४० के पास का प्लेट.
७. लक्ष्मण का दानपत्र-ऍ. इं; जि. २, पृ. ३६४ के पास का प्लेट; और जयनाथ का दानपत्र-फ्ली; गु. इं; प्लेट १६.