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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 318 में से

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पृष्ठ 91

६२ | प्राचीनलिपिमला.
लिपिपत्र १७ वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति जयपुरात्परममाहेश्वरः श्रीममहाराजलक्ष्म-
णः कुशली फेलापर्व्वतिकाग्रामे ब्राह्मणादीन्प्रतिवासिकु-
टुम्बिनः समाज्ञापयति विदितं वोस्तु यथैष ग्रा-
मो मया मातापित्रोरात्मनश्च पुण्याभिवृद्धये कौत्सस-

७—कुटिल लिपि.
ई. स. की छठी से नवीं शताब्दी (लिपिपत्र १८ से २३).

ई. स. की छठी से नवीं शताब्दी तक की बहुधा सारे उत्तरी भारतवर्ष की लिपि का, जो
गुप्तलिपि का परिवर्तित रूप है, नाम 'कुटिललिपि' कल्पना किया गया है. 'कुटिलाक्षर' नाम का
प्राचीन प्रयोग² भी मिलता है परंतु वह भी उसके वर्णों और विशेष कर मात्राओं की कुटिल
आकृतियों के कारण रक्खा गया हो ऐसा अनुमान होता है³. इस लिपि के अक्षरों के सिर बहुधा
▾ ऐसे होते हैं परंतु कभी कभी छोटी सी आड़ी लकीर से भी वे बनाये जाते हैं. अ, आ, घ, प, म,
य, ष और 'स' का ऊपर का अंश दो विभागवाला होता है और बहुधा प्रत्येक विभाग पर सिर का चिह्न
जोड़ा जाता है.
यह लिपि मंदसोर से मिले हुए राजा यशोधर्मन् के लेखों⁴, महानामन् के बुद्धगया के लेखों⁵,


¹ ये मूल पंक्तियां पाली गांव से मिले हुए महाराज लक्ष्मण के दानपत्र (पं. इं; जि. २, पृ. ३६४ के पास के प्लेट)
से उद्धृत की गई हैं.
² देवल (युक्तप्रदेश में पीलीभीत से २० मील पर) गांव से मिली हुई वि. सं. १०४६ (ई. स. ९९२) की प्रशस्ति में
'कुटिलाक्षराणि' (विष्णोहरेस्तनयेन च लिखिता गौडेन करणिकेनैषा। कुटिलाक्षराणि विदुषा तच्चादित्याभिधानेन ॥ ऍ. इं; जि. १,
पृ. ८१) और विक्रमांकदेवचरित में 'कुटिललिपिभिः' (नौ कायस्थैः कुटिललिपिभिर्नो विटैश्चाटदत्तैः १८. ४२) लिखा मिलता है.
उनमें 'कुटिल' शब्द क्रमशः अक्षरों तथा लिपि का विशेषण है; परंतु उनमें उस समय की नागरी की, जो कुटिल से मिलती हुई
थी, 'कुटिल' संज्ञा मानी है. मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा अपराजित के समय की वि. सं. ७१८ (ई. सं. ६६१) की प्रशस्ति के
अक्षरों को 'विकटाक्षर' कहा है (यशोभटेन पूज्यसुतकीर्त्तणा विकटाक्षरा ॥ ऍ. इं; जि. ४, पृ. ३२), और अफसद के लेख में
(फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ४२) 'विकटाक्षराणि' लिखा मिलता है. 'विकट' और 'कुटिल' दोनों पर्याय हैं और
अक्षरों की आकृति के सूचक हैं.
³ कुटिललिपि में अक्षरों की खड़ी रेखाएं नीचे की तरफ बाईं ओर मुड़ी हुई होती हैं और स्वरों की मात्राएं अधिक
टेढ़ी मेढ़ी तथा लंबी होती हैं इसी से उसका नाम कुटिल पड़ा.
⁴ राजा यशोधर्मन् के तीन लेख मंदसोर से मिले हैं जिनमें से एक मालव (विक्रम) सं. ५८९ (ई. स. ५३२) का है
(फ्ली; गु. इं; प्लेट २१ B, C, और २२).
⁵ महानामन् नामवाले दो लेख बुद्धगया से मिले हैं (फ्ली; गु. इं; प्लेट ४१ A और B) जिनमें से एक में
संवत् २६९ है. यदि यह गुप्त संवत् माना जावे तो इसका समय ई. स. ५८८-९ होगा.