प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 92, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुटिल लिपि. ६३
मोखरियों के लेख और मुद्रा १, वर्मलात के समय के वसंतगढ़ के लेख २, राजा हर्ष के दानपत्रादि ३,
नेपाल के अंशुवर्मन् के लेखों ४, मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा शीलादित्य और अपराजित के लेखों ५,
मगध के गुप्तवंशी आदित्यसेन और जीवितगुप्त (दूसरे) के लेखों ६, कुदारकोट के लेख ७, झालरा-
पटण से मिले हुए राजा दुर्गगण के लेखों ८, कोटा के निकट कणस्वा (कणवाश्रम) के मंदिर में लगी हुई
राजा शिवगण की प्रशस्ति ९, बनारस से मिले हुए पंथ के लेख १०, कामां (कामवन)
से मिले हुए यादवों के लेख ११, लाखामंडल की प्रशस्ति १२, चंबा राज्य से मिले हुए राजा
मेरुवर्मन् के लेखों १३, राजपूताना और मालवे से मिले हुए प्रतिहार (पड़िहार) वंशियों के लेखादि १४
१. मौखरी (मुखर) वंशी राजा ईशानवर्मन् का हड़ाह का शिलालेख वि. सं ६११ (ई. स. ५५३) का है (सरस्वती,
ई. स. १६१६, पृ. ८१-८३). आसीरगढ़ से मिली हुई ईशानवर्मन् के पुत्र शर्ववर्मन् की मुद्रा में कोई संवत् नहीं है (फ्ली; गु.
इं; सेट ३० A). अनंतवर्मन के बराबर और नागार्जुनी पहाड़ियों की गुफाओं के लेखों (फ्ली; गु. इं; प्लेट ३० B, ३१ A
और B) में भी संवत् नहीं मिलता परंतु उसका ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आस पास होना अनुमान किया जा
सकता है. जौनपुर का लेख भी, जिसका प्रारंभ का हिस्सा बचने नहीं पाया, संभवतः उपर्युक्त ईशानवर्मन् के समय का
हो (फ्ली; गु. इं; प्लेट ३२ A). २. यह लेख वि. सं. ६८२ (ई. स. ६२५-६) का है (ऍ. इं; जि. ६, पृ. १८० के पास का प्लेट).
३. बैसवंशी राजा हर्ष का बांसखेड़ा का दानपत्र हर्ष संवत् २२ (वि. सं. ६८८-६) का (ऍ. इं; जि. ४, पृ. २१० के
पास का प्लेट) और मधुबन से मिला हुआ दानपत्र हर्ष संवत् २५ (ई. स. ६३१) का है (ऍ. इं; जि. १. पृ. ७२-७३).
सोनपत से मिली हुई उक्त राजा की मुद्रा (फ्ली; गु. इं; प्लेट ३२ B) में संवत् नहीं है.
४. अंशुवर्मन् के समय के लेखों में से एक में संवत् ३१६ (या ३१८?) है (इं. पं; जि. १४, पृ. ६८. बें; ज. ने; पृ. ७४)
जिसको गुप्त संवत् माना जावे तो उसका समय ई. स. ६३५-६ (या ६३७-८?) होगा. उसके दूसरे लेखों में संवत् ३४, ३६, ४५ (?)
और ४८ मिलते हैं (बें; ज. ने; पृ; ४. इं. पं; जि. ६, पृ. १७०-७१). यदि इन संवतों को हर्ष संवत् मानें तो इनका
समय ई. सं. ६४० से ६५४ तक स्थिर होगा.
५. मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा शीलादित्य (शील) के समय का एक शिला लेख वि. सं. ७०३ (ई. स. ६४६)
का मेवाड़ के भोमट इलाके के सामोली गांव से मिला है जो मैंने राजपूताना म्यूज़िअम (अजमेर) को भेट किया. यह
लेख अभी तक छुपा नहीं है. राजा अपराजित का लेख वि. सं. ७१८ (ई. स. ६६१) का है (ऍ. इं; जि. ४, पृ. ३०
के पास का सेट).
६. आदित्यसेन के समय के तीन लेखों में से दो में संवत् नहीं है (फ़्ली; गु. इं; सेट २८, और पृ. २१२) परंतु तीसरा
जो शाहपुर से मिली हुई सूर्य की मूर्ति के आसन पर खुदा है [हर्ष] संवत् ६६ (ई. स. ६७२) का है (फ़्ली; गु. इं; सेट
२६ A). आदित्यसेन के प्रपौत्र जीवितगुप्त (दूसरे) के समय का एक लेख देवबर्नाकं से मिला है वह भी बिना संवत्
का है (फ़्ली; गु. इं; सेट २६ B).
७. कुदारकोट के लेख में संवत् नहीं है परंतु उसकी लिपि आदि से उसका समय ई. स. की सातवीं शताब्दी
अनुमान किया जा सकता है (ऍ. इं; जि. १, पृ. १८० के पास का सेट).
८. झालरापाटण से मिले हुए राजा दुर्गगण के दो लेख एक ही शिला पर दोनों ओर खुदे हैं जिनमें से एक वि. सं.
७४६ (ई. स. ६८६) का है (इं. ऍ; जि. ५, पृ. १८१-८२ के बीच के प्लेट).
९. शिवगण की कणस्वा की प्रशस्ति वि. सं. ७९५ (ई. स. ७३८) की है (इं ऍ; जि. १६, पृ. ५८ के पास का प्लेट).
१०. इस लेख में संवत् नहीं है परंतु इसकी लिपि ई. स. की ७ वीं शताब्दी के आस पास की अनुमान की जा सकती
है (ऍ. इं; जि. ६, पृ. ६० के पास का सेट).
११. इस लेख में संवत् नहीं है परंतु इसकी लिपि ई. स. की आठवीं शताब्दी की अनुमान की जा सकती है (इं. ऍ;
जि. १०, पृ. ३४ के पास का प्लेट).
१२. महा के लखामंडल नामक मंदिर की प्रशस्ति में संवत् नहीं है परंतु उसकी लिपि ई. स. की आठवीं शताब्दी
के आसपास की प्रतीत होती है (ऍ. इं; जि. १, पृ. १२ के पास का प्लेट).
१३. मेरुवर्मन् के पांच लेखों में से एक शिला पर (वो; पँ. चं. स्टे; प्लेट ११) और चार पित्तल की मूर्तियों के आस-
नों पर खुदे हुए मिले हैं (वॊ; ऍ. चं. स्टे; प्लेट १०). उन सब में संवत् नहीं है परंतु लिपि के आधार पर उनका समय
ई. स. की आठवीं शताब्दी माना जा सकता है.
१४. प्रतिहार राजा नागभट का बुचकला का लेख वि. सं. ८७२ (ई. स. ८१५) का (ऍ. इं; जि. ६, पृ. २०० के पास
प्लेट); बाउक का जोधपुर का वि. सं. ८९४ (ई. स. ८३७) का (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६४ पृ. ४); कक्कुक का
घटिआले का वि. सं. ९१८ (ई. स. ८६१) का (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६५ पृ. ५१६); भोजदेव (प्रथम) का वि. सं.
६०० का दानपत्र (ऍ. इं; जि. ५ पृ. २११-२); और ५ शिला लेख; जिन में से देवगढ़ का वि. सं. ९१६ (ई. स. ८६२) का