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प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

२४ प्राचीनलिपिमला.
ऊपर कर दिया है अथवा [खड़े] अक्षरों को आड़ा कर दिया है और [कितने एक] के कोणों को
खोल दिया है १.
फिनिशिअन और ब्राह्मी की लेखन प्रणाली एक दूसरे से विपरीत होने के कारण बहुत से
अक्षरों की परस्पर समानता बतलाने में बाधा पड़ती थी जिसके लिये बूलर ने यह मान लिया कि
'ब्राह्मी लिपि का रुख पलटने से (अर्थात् जो लिपि पहिले दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी २ जाती थी
उसे पीछे से बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखने से) कितने एक [सेमिटिक] अक्षरों का रुख ग्रीक
अक्षरों की नांई दाहिनी ओर से बाईं ओर को बदल गया'३.
जब इन फेरफारों से भी काम न चला तब बूलर ने २२ अक्षरों में से प्रत्येक की उत्पत्ति बतला
ने के समय बहुत से और फेरफार भी मान लिये जिनमें से मुख्य ये हैं:-
कहीं लकीर को कुछ [इधर उधर] हटा दिया ४, जहां लकीर न थी वहां नई खींच दी५, कहीं
मिटा दी६, कहीं बढ़ा दी७, कहीं घटा दी८, कहीं नीचे लटकती हुई लकीर ऊपर की तरफ़ फिरा दी९, तिरछी
लकीर सीधी करदी१, आड़ी लकीर खड़ी करदी", दो लकीरों के बीच के अंतर को नई लकीर से जोड़
दिया१२, एक दूसरी को काटने वाली दो लकीरों के स्थान में बिंदु बना दिया१३, बाईं तरफ मुड़ी हुई
लकीर के अंत को ऊपर बढ़ा कर गांठ बनादी१४, त्रिकोण को धनुषाकार बना दिया१५, कोण या
कोणों को मिटा कर उनके स्थान में अर्धवृत्त सा बना दिया१६ आदि. इतना करने पर भी सात १७
अक्षरों की उत्पत्ति तो ऐसे अक्षरों से माननी पड़ी कि जिनका उच्चारण बिलकुल बेमेल है.
ऊपर बतलाये हुए फेरफार करने पर फिनिशिअन अक्षरों से ब्राह्मी अक्षरों की उत्पत्ति बूलर
ने किस तरह सिद्ध की जिसके केवल चार उदाहरण नीचे दिये जाते हैं:-
१-अलेफ से 'अ' - K > > d
२-हेथ १८ से 'घ' - 日 日 四 ⊓ し
३-योध् से 'य' - Z 7 F ५ 山 山
४-मेम् से 'म' - y y ୪
इन चारों अक्षरों की उत्पत्ति में पहिला अक्षर प्राचीन फिनिशिअन लिपि का है और
अंतिम अक्षर अशोक के लेखों से है. बाकी के सब अक्षर परिवर्तन की बीच की दशा के सूचक अनु-
मान किये गये हैं कहीं लिखे हुए नहीं मिले. इन रूपान्तरों का विवरण यह है कि:-
१. बू; इं. पे; पृ. ११.
२. ब्राह्मी लिपि पहिले दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी वा नहीं यह विचार आगे किया जायगा.
३. बू; इं. पे; पृ. ११. ४. अलेफ़ से 'अ' की उत्पत्ति में; बू; इं.पे; पृ. १२.
५. ज़ाइन् से 'ज' की उत्पत्ति में 'ज' के बीच की आड़ी लकीर.
६. ज़ाइन् से 'ज' की उत्पत्ति में; हेथ से 'घ' की उत्पत्ति में. ७. हेथ से 'घ' की उत्पत्ति में.
८. ज़ाइन् से 'ज' की उत्पत्ति में ज़ाइन् के ऊपर और नीचे की दोनों आड़ी लकीरों के बाईं तरफ़ बाहर निकले
हुए अंशों का कम करना.
९. योध् से 'य' की उत्पत्ति में. १०. नून् से 'न' की उत्पत्ति में; योध् से 'य' की उत्पत्ति में.
११. दालेथ से 'ध' की उत्पत्ति में. १२. वाव से 'व' की उत्पत्ति में. १३. तैथ से 'थ' की उत्पत्ति में.
१४. मेम् से 'म' की उत्पत्ति में. १५. दालेथ से 'ध' की उत्पत्ति में. १६. मेम् से 'म' की उत्पत्ति में.
१७. दालेथ (द) से 'ध' की; हेथ् (ह) से 'घ' की; तैथ् (त) से 'थ' की; सामेख (स) से 'ष' की; फे
(फ) से 'प' की; त्साधे (स) से 'च' की; और क़ोफ् (क़) से 'ख' की.
१८. ए.सा.ब्रि; जि. १, पृ. ६०० में तथा डॉ. ई. रॉडिजर संपादित और परिवर्धित जेसेनियस के हिब्रू ग्रामर (व्याक-
रण) में इस अक्षर का नाम चेथ (च) लिखा है (पृ. १३) परंतु बंबई की छपी हुई 'हिब्रू प्राइमरी रीडर' नामक छोटी
पुस्तक में, जिसमें हिब्रू अक्षरों के नाम तथा उच्चारख अंग्रेजी और मराठी (नागरी लिपि) दोनों में दिये हैं, इसका नाम 'हेथ्'
(पृ. १) और इसका ध्वनिसूचक चिह्न 'ह' (पृ. ३) दिया है. इसीसे ग्रीक (यूनानी) अक्षर 'एटा' बना जिससे अंग्रेज़ी
का 1 (ऐच) अक्षर, जो 'ह' की ध्वनि का सूचक है, तथा इसीसे अरबी का ८ (हे), जो 'ह' का सूचक है, निकला है.
अत एव हमने इस अक्षर का नाम 'हिब्रू प्राइमरी रीडर' के अनुसार 'हेथ्' लिखा है.

ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति. २४
१-अलेफ् के पहिले रूप का रुख बदलने से दूसरा रूप बना. दूसरे की खड़ी लकीर को दा-
हिनी तरफ़ हटाने से तीसरा बना. उसपर से चौथा रूप बन गया.
२-हेथ् के पहिले रूप की खड़ी लकीरों को समान लंबाई की बनाने और तीनों आड़ी लकीरों
को सीधी करने से दूसरा रूप बना. इस प्रकार सीधे बने हुए खड़े अक्षर को आड़ा करने से
तीसरा रूप बना, जिसके ऊपर के भाग की आड़ी लकीरों को मिटा देने से चौथा रूप बना. फिर
बाईं ओर की पहिली खड़ी लकीर को लंबी कर देने से पांचवां रूप बन गया.
३-योध् की सब तिरछी लकीरों को सीधी करने से दूसरा रूप बना, जिसका रुख बद-
लने से तीसरा रूप बना. इस खड़े अक्षर को आड़ा करने से चौथा रूप बना. उसकी नीचे लट-
कती हुई लकीर को ऊपर की तरफ़ फिरा देने से पांचवां रूप बना, जिसकी मध्य की खड़ी लकीर
को लंबी करने से छठा रूप बना और उसपर से सातवां.
४-मेम् के नीचे वाली बाईं ओर मुड़ी हुई लकीर को ऊपर की तरफ़ बढ़ा कर ग्रंथि बना देने से
दूसरा रूप बना. फिर ऊपर के बाईं तरफ़ के कोण वाले हिस्सों को मिटा कर उनकी जगह अर्धवृत्त
सी रेखा बना देने से तीसरा रूप बना. उसके ग्रंथि वाले भाग को बढ़ा कर ऊपर निकालने से
चौथा रूप बन गया.
बूलर के माने हुए अक्षरों के ये फेरफार ऐसे हैं कि उनके अनुसार अक्षरों का तोड़ मरोड़
करने से केवल फिनिशियन् से ब्राह्मी की उत्पत्ति बतलाई जा सकती है ऐसा ही नहीं, किंतु दुनिया भर
की चाहे जिस लिपि से किसी भी लिपि की उत्पत्ति आसानी से सिद्ध हो सकती है. उदाहरण
के लिये तक्षशिला के अरमइक लिपि के लेख के अक्षरों से तथा वर्तमान अंग्रेज़ी टाइप (छापे के अक्षरों)
से ब्राह्मी लिपि के अक्षर कितनी आसानी से बनाये जा सकते हैं यह नीचे बतलाया जाता है-
तक्षशिला के लेख से—
१-अलेफ् से 'अ'- 𐡀 X 𑀅
२-बेथ् से 'ब'- د ⊃ 𑀩
३-गिमेल् से 'ग'- 人 𑀕
४-दालेथ् से 'द'- ד ל 𑀤
५-हे से 'ह'- ת v 𑀳 ᒐ
६-वाव् से 'व'- ˥ ⌋ 𑀯
इन ६ अक्षरों के रूपांतरों में प्रत्येक का पहिला रूप तक्षशिला के लेख से लिया गया है
और अंतिम रूप अशोक के लेखों के अनुसार है. बीच के परिवर्तन बूलर के माने हुए नियमों के अनु-
सार अनुमान किये गये हैं, जिनका ब्यौरा इस तरह है—
१-अलेफ् के पहिले रूप के ऊपर के तथा नीचे के कोनों को कुछ चौड़े करने से दूसरा रूप बना.
उसकी दाहिनी तरफ की दोनों तिरछी लकीरों को सीधी करने से तीसरा रूप बन गया.
२-बेथ् के पहिले रूप के ऊपर की छोटी सी खड़ी लकीर को मिटाने से दूसरा रूप बना. उस-
की बाईं तरफ एक खड़ी लकीर खींचने से तीसरा रूप बन गया.
३-गिमेल् 'ग' से मिलता ही है.
४-दालेथ् के पहिले रूप के नीचे की खड़ी लकीर के साथ बाईं तरफ एक आड़ी लकीर जोड़ने
से दूसरा रूप बना और उस नई जुड़ी हुई लकीर के बाएं किनारे पर ज़रासी छोटी खड़ी लकीर जोड़ने
से तीसरा रूप बन गया.
५-हे के पहिले रूप को उलट देने से दूसरा रूप बना; उसका रुख पलटने से तीसरा रूप बन गया
जो अशोक के सारनाथ के लेख के 'ह' से मिलता हुआ है और चौथा रूप गिरनार के लेख से है.

२६ प्राचीनलिपिमाला.
६-वावू के पहिले रूप को उलटने से दूसरा रूप बना, जिसका रुख पलटने से तीसरा बना,
फिर उसकी दाहिनी तरफ़ की झुकी हुई लकीर के स्थान में ग्रंथि बना देने से चौथा रूप बना.
वर्तमान अंग्रेज़ी छापे के अक्षरों से—
१-'ए' से 'अ' A A H 𑀅
२-'बी' से 'ब' B B ☐
३-'सी' से 'च' C D d
४-'डी' से 'द' D כ כ
५-'ई' से 'ए' E [ ▷ 𑀏
६-'ऐफ़' से 'फ' F E b 𑀨
इनमें से प्रत्येक अक्षर के रूपांतरों में पहिला रूप वर्तमान अंग्रेज़ी छापे का अक्षर और अं-
तिम रूप अशोक के लेखों से है. बीच के कुल रूप बूलर के सूत्रों के अनुसार अनुमान किये हैं जिनका
विवरण इस तरह है—
१-'ए' के पहिले रूप के ऊपर के कोण को खोल देने से दूसरा रूप बना, जिसकी दोनों
तिरछी खड़ी लकीरों को सीधी करने से तीसरा रूप हुआ और उससे चौथा.
२-'बी' की बीच की लकीर को मिटाने से दूसरा रूप और उसकी दाहिनी तरफ़ की वक्र रेखा
को सीधी करने से तीसरा बना.
३-'सी' की दाहिनी तरफ़ एक खड़ी लकीर जोड़ने से दूसरा रूप बन गया और उससे तीसरा.
४-'डी' की बाईं ओर की खड़ी लकीर को मिटाने से दूसरा रूप बना, जिसके बाईं तरफ़
के किनारों के साथ एक एक छोटी खड़ी लकीर जोड़ने से तीसरा रूप बन गया.
५ 'ई' की बीच की लकीर मिटा देने से दूसरा रूप; उसकी दाहिनी तरफ़ की दोनों लकीरों
को तिरछी करने से तीसरा रूप और उससे चौथा बन गया.
६ ऐफ़ को उलटने से दूसरा रूप बना, जिसके नीचे की दाहिनी तरफ़ की दो आड़ी लकीरों
को एक खड़ी लकीर से जोड़ देने से तीसरा रूप और उससे चौथा बन गया.
तक्षशिला के अरमइक लेख से तथा अंग्रेज़ी के छापे के अक्षरों से ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति
बताने में फिनिशियन की अपेक्षा अधिक सरलता होने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि उनसे
ब्राह्मी अक्षर बने हैं. ऐसी दशा में बूलर का मत किसी तरह स्वीकार नहीं हो सकता क्योंकि फिनि-
शियन् के गिमेल (ग) और ब्राह्मी के 'ग' को छोड़ कर अन्य किसी समान उच्चारण वाले अक्षर में
समानता नहीं है. बूलर का सारा यत्न खींचतान ही है. इसीसे बूलर की 'भारतवर्ष की ब्राह्मी लिपि
की उत्पत्ति' के छपने के बाद 'बुद्धिस्ट इंडिया' नामक पुस्तक के कर्ता डॉ. राइस डेविड्ज़ को यह
मानना पड़ा कि 'ब्राह्मी लिपि के अक्षर न तो उत्तरी और न दक्षिणी सेमिटिक अक्षरों से बने हैं'१, ऐसे
ही 'एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटॅनिका' नामक महान अंग्रेज़ी विश्वकोश में इस विषय में यह लिखा गया कि
'बूलर का कथन यद्यपि पाण्डित्य और चतुराई से भरा हुआ है तो भी यह मानना पड़ता है कि
वह अधिक निश्चय नहीं दिलाता. इस लिपि का उद्भव कहां से हुआ इसका निर्णय निश्चित रूप से कर-
ने के पहिले इसके प्राचीन इतिहास के और भी प्रमाणों का ढूंढ़ना आवश्यक है, और ऐसे प्रमाण मिल
सकेंगे इसमें कोई संदेह नहीं'२.
यदि ब्राह्मी और खरोष्ठी दोनों लिपियां फिनिशियन् से, जिसकी उत्पत्ति ई. स. पूर्व की १० वीं
शताब्दी के आस पास मानी जाती है, निकली होतीं तो ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी में, अर्थात्
अशोक के समय, उनमें परस्पर बहुत कुछ समानता होनी चाहिये थी जैसी कि अशोक के समय की


१ देखो ऊपर, पृ. २०.
२ ए., ब्रि; जि ३३, पृ. ६०३.

ब्राह्मी से निकली हुई ई. स. की पांचवीं और छठी शताब्दी की गुप्त और तेलुगु-कनड़ी लिपियों के बीच
पाई जाती है, परंतु उन दोनों (ब्राह्मी और खरोष्ठी) में एक भी अक्षर की समानता का न होना भी
यही सिद्ध करता है कि ये दोनों लिपियां एक ही मूल लिपि से सर्वथा नहीं निकलीं १, अर्थात् खरोष्ठी
सेमिटिक से निकली हुई है और ब्राह्मी सेमिटिक से नहीं.
फिनिशियन लिपि से ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति मानने का सिद्धान्त कहां तक प्रामाणिक और
स्वीकार करने योग्य है इसका विचार यहां तक किया गया. अब वूलर के इस दूसरे कथन की समीक्षा
आवश्यक है कि 'ब्राह्मी लिपि पहिले दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी.'
वूलर को फिनिशियन लिपि से ब्राह्मी की उत्पत्ति सिद्ध करने के यत्न में कितने एक अक्षरों
का रुख बदलने की आवश्यकता थी. ई. स. १८६१ में जनरल कनिंगहाम ने 'कॉइन्स ऑफ एन्श्यंट्
इंडिया' नामक भारतवर्ष के प्राचीन सिक्कों के विषय का एक पुस्तक प्रकट किया जिसमें एरण २ से
मिले हुए कई एक तांबे के सिक्के भी छापे. उनमें से एक पर का ब्राह्मी लिपि का लेख 'धमपालस' ३
दाहिनी ओर से बाईं ओर को पढ़ा जाता है. इस उलटे लेख के तिनके के सहारे को वूलर ने बड़े
महत्व का माना और इसीके आधार पर अपनी 'ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति' विषयक पुस्तक में लिखा
कि 'सेमिटिक से ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति सिद्ध करने के प्रमाणों की श्रृंखला को पूर्ण करने के लिये
जिस कड़ी की त्रुटि थी वह वास्तव में यही है' ४; तथा उस सिक्के को ई. स. पूर्व ३५० के आस पास
का मान कर यह सिद्धांत कर लिया कि 'उस समय ब्राह्मी लिपि दाहिनी ओर से बाईं ओर तथा
बाईं ओर से दाहिनी ओर (दोनों तरह) लिखी जाती थी' ५.
इस कल्पना का मुख्य आधार एरण का सिक्का ही है, क्योंकि अब तक कोई शिलालेख इस
देश में ऐसा नहीं मिला कि जिसमें ब्राह्मी लिपि फारसी की नांई उलटी लिखी हुई मिली हो ६. किसी
सिक्के पर लेख का उलटा आ जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि सिक्के पर उभरे हुए अक्षर
सीधे आने के लिये सिक्के के ठप्पे में अक्षर उलटे खोदने पड़ते हैं अर्थात् जो लिपियां बाईं ओर से दाहिनी
ओर (जैसे कि ब्राह्मी और उससे निकली हुई सब लिपियां और अंगरेज़ी भी) लिखी जाती हैं उनके
ठप्पों में सिक्के की इबारत की पंक्ति का आरंभ दाहिनी ओर से करके प्रत्येक अक्षर उलटा खोदना
पड़ता है, परंतु यदि खोदनेवाला इसमें चूक जाय और ठप्पे पर बाईं ओर से खोदने लग जाय तो
सिक्के पर सारा लेख उलटा आ जाता है, जैसा कि एरण के सिक्के पर पाया जाता है. यदि वह एक
१. ई. स. १८६४ में मैंने 'प्राचीनलिपिमाला' का प्रथम संस्करण छापा, जिसकी एक प्रति डॉ. वूलर को भेंट की.
उसकी पहुंच स्वीकार करने के साथ डॉ. वूलर ने लिखा 'कि तुम ब्राह्मी लिपि को भारतवासियों की निर्माण की हुई स्वतंत्र लिपि
मानते हो यह ठीक नहीं. ब्राह्मी लिपि सेमिटिक लिपि से निकली हुई है.' इसके उत्तर में मैंने लिखा कि 'यदि ब्राह्मी
और खरोष्ठी दोनों लिपियां एक ही मूल लिपि की शाखें हैं तो ७०० वर्ष के भीतर ही उनमें परस्पर एक भी अक्षर की
समानता न रही इसका क्या कारण है सो आप कृपा कर सूचित कीजिये.' परंतु इसका कुछ भी उत्तर वे न दे सके और न
अब भी कोई दे सकता है.
२. मध्य प्रदेश के सागर ज़िले का एक प्राचीन नगर. ३. क; कॉ. ए. इं; पृ. १०१; प्लेट ११, संख्या १८.
४. वू; इं. स्ट; संख्या ३, पृ. ३ (ई. स. १८६५). ५. वू; इं. स्ट; संख्या ३, पृ. ४३.
६. वूलर ने लिखा है कि 'अशोक के लेखों में दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखने के चिह्न बहुत कम मिलते हैं.
जौगड़ और धौली के लेखों में 'ओ' उलटा है; और जौगड़ तथा देहली के सिवालिक स्तंभ के लेख में 'ध' कचित् उलटा
मिलता है' (वू; इं. पे; पृ. ६), परंतु ये तो मामूली लेखकों के हस्तदोष या देशभेद के तुच्छ अंतर हैं. क्योंकि 'ओ'
की आकृति, एक खड़ी लकीर के ऊपर के छोर से बाईं ओर को और नीचे के छोर से दाहिनी ओर को एक एक आड़ी लकी-
र खींचने से, बनती है. यह संभव है कि असावधान लेखक पहिले खड़ी लकीर खींच कर आड़ी लकीरें खींचने में ग़लती
कर जावे. 'ध' की आकृति धनुष के सदृश होने के कारण उसकी प्रत्यंचा चाहे दाहिनी तरफ रहे या बाईं तरफ इसमें मा-
मूली अनपढ़ लेखक शायद ही फ़र्क माने. देशभेद से भी कभी कभी किसी अक्षर की आकृति उलटी लिखी मिलती है जैसे
कि ई. स. की छठी शताब्दी के यशोधर्मन् के लेख में 'उ' नागरी के 'उ' का सा है (देखो लिपिपत्र १८ वां) परंतु उसी
शताब्दी के गार्लुलक सिंहादित्य के दानपत्र में उससे उलटा है (लिपिपत्र ३८ वां). वर्तमान बंगला लिपि का 'ख' उलट,

२८ प्राचीनलिपिमाला.
दो अक्षरों को ही उलटा खोदना भूल कर सीधा खोद दे तो केवल वे ही अक्षर सिक्के पर उलटे आ
जावेंगे.
ऐसी गलतियां कभी कभी हो जाने के उदाहरण मिल आते हैं. सातवाहन (आंध्र) वंश के
राजा शातकर्णी के भिन्न प्रकार के दो सिक्कों पर 'शतकणिस' (शातकर्णे:) सारा लेख एरण के सिक्के
की नांई उलटा आ गया है १. पार्थियन् अचद्गमिस्र् के एक सिक्के पर के खरोष्ठी लेख का एक अंश उलटा
आ गया है अर्थात् नागरी की नांई बाईं ओर से दाहिनी ओर है (रै; इं. कॉ; पृ. १५). विक्रम संवत्
१९४३ के बने हुए इंदौर राज्य के पैसे पर 'एक पाव आना इंदोर' यह लेख उलटा आगया है २.
महाक्षत्रप रंजुवुल (राजुल) के एक सिक्के पर खरोष्ठी लेख की तरफ के ग्रीक अक्षर Y और E से
बने हुए मोनोग्राम ३ में E अक्षर उलटा आगया है ४ परंतु दूसरे सिक्कों पर सीधा है ५. एक प्राचीन
मुद्रा पर 'श्रीमसपकुल' लेख है, जिसमें 'श्री' और 'प' ये दो अक्षर उलटे आ गये हैं ६. ऐसे ही पटना
से मिली हुई एक मुद्रा पर के 'अगपलश' (अंगपालस्य) लेख में 'अ' उलटा आगया है ७.
ऐसी दशा में एरण के सिक्के पर के उलटे लेख के आधार पर यह मान लेना कि, 'ब्राह्मी लिपि
पहिले दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी' किसी तरह आदरणीय नहीं हो सकता ८.
प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. हुल्श (Hultzsch) ने लिखा है ९ कि 'बूलर एरण के सिक्के को, जिस
पर के अक्षर दाहिनी ओर से बाईं ओर हैं, ब्राह्मी के सेमिटिक लिपि से निकलने का प्रमाण मानता है,
इसमें मैं उससे सहमत नहीं हो सकता. यह जानी हुई बात है कि सिक्के पर अक्षर ठीक आने के
लिये ठप्पे पर उनको उलटा खोदना चाहिये; इस बात को हिन्दुस्तानी ठप्पा खोदने वाले अक्सर भूल
जाते हैं.' डॉ. फ्लीट १० ने भी ऐसा ही मत प्रकट किया है.
ब्राह्मी लिपि के न तो अक्षर फिनिशियन् या किसी अन्य लिपि से निकले हैं और न उसकी
बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखने की प्रणाली किसी और लिपि से बदल कर बनाई गई है. यह
भारतवर्ष के आर्यों का अपनी खोज से उत्पन्न किया हुआ मौलिक आविष्कार है. इसकी प्राची-
नता और सर्वांगसुंदरता से चाहे इसका कर्त्ता ब्रह्मा देवता माना जा कर इसका नाम ब्राह्मी पड़ा,

लिखा जाता है (लिपि पत्र ७८) परंतु पहिले ऐसा न था (लिपिपत्र ३२-३५).
१. रा; कँ. कॉ. आं. क्ष; पृ. ४, प्लेट १, संख्या ६ और ११. २. इं. पँ; जि. २६, पृ. ३३६.
३. पूरे नाम के प्रत्येक अंश के प्रारंभ के सांकेतिक दो या तीन वर्णों को मिला कर जो एक विलक्षण चिह्न बनाया
जाता है उसे अंग्रेज़ी में 'मोनोग्राम' (एकाक्षर) कहते हैं.
४. गा; कॉ. ग्री. सी; पृ. ६७, संख्या ५. ५. गा; कॉ. ग्री. सी; पृ. ६७, संख्या ६.
६. ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९०१, पृ. १०४, संख्या ६. ७. क; आ. स. रि; जि. १५, प्लेट ३, संख्या २.
८. ई. स. १८९५ में डॉन मार्टिनो डी. ज़िल्वा विक्रमसिंगे ने रॉयल एशिआटिक सोसाइटी के जर्नल (त्रैमासिक पत्रिका)
में एक पत्र प्रकाशित कर यह बतलाना चाहा था कि 'सीलोन में कई शिलालेख प्राचीन ब्राह्मी लिपि के मिले हैं, जिनमें से
दो में अक्षर उलटे हैं, परंतु उनकी छापों के अभाव में उनका विवेचन नहीं किया जा सकता' (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८९५,
पृ. ८६५-६८) और ई. स. १९०१ में एक लेख उसी जर्नल में फिर छपवाया जिसमें उलटा खुदा हुआ कोई शिलालेख तो प्रका-
शित न किया किंतु उनकी छापें शीघ्र प्राप्त करने का यत्न करने की इच्छा प्रकट की, और अशोक के गिरनार के लेख में 'प्र'
के स्थान में 'पै' 'त्र' के स्थान में 'तं' आदि जो अशुद्धियां मिलती हैं उनपर से यह सिद्धांत निकाला कि 'ब्राह्मी लिपि का
रुख बदलने से ये अक्षर इस तरह लिखे गये' (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९०१, पृ. ३०१-५); परंतु गिरनार के सारे लेख को ध्यान-
पूर्वक पढ़नेवाले को यह अवश्य मालूम हो जायगा कि उसके लिखनेवाले को संयुक्ताक्षरों का ठीक ठीक ज्ञान न था और
संयुक्ताक्षर में प्रथम आने वाले 'र्' (रेफ) तथा द्वितीय आने वाले 'र' का अन्तर तो वह समझता ही न था जिससे उसने
संयुक्ताक्षरों में ऐसी ऐसी अनेक अशुद्धियां की हैं. यदि इन अशुद्धियों पर से ही यह सिद्धांत स्थिर किया जा सकता हो
कि ये ब्राह्मी लिपि के उलटे लिखे जाने के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं तो बात दूसरी है.
ई. स. १९०३ में डॉ. राइस डेविड्स ने विक्रमसिंगे के ऊपर लिखे हुए पत्र और लेख के हवाले से मान लिया कि
ब्राह्मी लिपि उलटी भी लिखी जाती थी (डे; बु. इं; पृ. ११५), परंतु साथ में यह भी लिख दिया कि 'अब तक उलटी
लिपि का कोई शिलालेख प्रसिद्ध नहीं हुआ.'
९. इं. पँ; जि. २६, पृ. ३३६.
१०. बू; ई. पे. के अंग्रेज़ी अनुवाद की भूमिका; पृ. ३-४.

ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति. २३
चाहे साक्षरसमाज ब्राह्मणों की लिपि होने से यह ब्राह्मी कहलाई हो १, पर इसमें संदेह नहीं कि
इसका फ़िनिशियन् से कुछ भी संबंध नहीं.
आदर्श लिपि में यह गुण होना चाहिये कि प्रत्येक उच्चारण के लिये असंदिग्ध संकेत हों
जिससे जो बोला जाय वह ठीक वैसा ही लिखा जाय और जो लिखा जाय वह ठीक वैसा ही
पढ़ा जाय. उच्चारित अक्षर और लिखित वर्ण के इस संबंध को निभाने के उद्देश्य का विचार करें
तो ब्राह्मी लिपि सर्वोत्तम है और इसमें और सेमिटिक लिपियों में रात दिन का सा अंतर है. इसमें
स्वर और व्यंजन पूरे हैं और स्वरों में ह्रस्व, दीर्घ के लिये तथा अनुस्वार और विसर्ग के लिये
उपयुक्त संकेत न्यारे न्यारे हैं; व्यंजन भी उच्चारण के स्थानों के अनुसार वैज्ञानिक क्रम से जमाये गए
हैं. इसमें किसी प्रकार की त्रुटि नहीं है और आर्य भाषाओं की ध्वनियों को व्यक्त करने के लिये
इसमें किसी प्रकार के संशोधन या परिवर्तन की अपेक्षा नहीं है. व्यंजनों के साथ स्वरों के संयोग
को मात्रा के चिह्नों से प्रकट करने की इसमें ऐसी विशेषता है जो किसी और लिपि में नहीं है.
साहित्य और सभ्यता की अति उच्च अवस्था में ही ऐसी लिपि का विकास हो सकता है. वैदिक
और प्राचीन संस्कृत वाङ्मय

३० प्राचीनलिपिमला.
अवशेषों तक अभी वह नहीं पहुंच सका है. अभी तक प्राचीन शिलालेख जो मिले हैं वे
ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी से पहिले के नहीं हैं, परंतु साहित्य में प्रत्यक्ष या गौण रीति
से लेखनकला के जो हवाले मिलते हैं वे बहुत प्राचीन समय तक जाते हैं. उन सब से सिद्ध
होता है कि लेखनकला सर्वसाधारण में प्रचलित, एक पुरानी बात थी जिसमें कोई अनोखापन
न था. जितने प्रमाण मिले हैं, चाहे प्राचीन शिलालेखों के अक्षरों की शैली, और चाहे साहित्य
के उल्लेख, सभी यह दिखाते हैं कि लेखनकला अपनी प्रौढ़ावस्था में थी. उसके आरम्भिक विकास के
समय का पता नहीं चलता. ऐसी दशा में यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि ब्राह्मी लिपि का
आविष्कार कैसे हुआ और इस परिपक्व रूप में, कि जिसमें ही हम उसे पाते हैं, वह किन किन परिव-
र्तनों के बाद पहुंची. मिसर आदि में जैसे भावों के संकेतरूप चित्र हुए और वे शब्दों के संकेत हो
कर उनसे अक्षरों के संकेत बने, इस तरह यहां भी किसी चित्रलिपि से ब्राह्मी लिपि बनी, या प्रारम्भ
से ध्वनि के ही सूचक चिन्ह बना लिये गये, यह कुछ निश्चय के साथ नहीं कहा जा सकता. निश्चय
के साथ इतना ही कहा जा सकता है कि इस विषय के प्रमाण जहां तक मिलते हैं वहां तक ब्राह्मी
लिपि अपनी प्रौढ़ अवस्था में और पूर्ण व्यवहार में आती हुई मिलती है और उसका किसी बाहरी
स्रोत और प्रभाव से निकलना सिद्ध नहीं होता.
आर. शाम शास्त्री ने 'देवनागरी लिपि की उत्पत्ति के विषय का सिद्धांत' नामक एक विस्तृत
लेख १ में यह सिद्ध करने का यत्न किया है कि देवताओं की मूर्तियां बनने के पूर्व उनकी उपासना सां-
केतिक चित्रों द्वारा होती थी जो कई त्रिकोण तथा चक्रों आदि से बने हुए यंत्र के, जो 'देवनगर' कह-
लाता था, मध्य में लिखे जाते थे. देवनगर के मध्य लिखे जाने वाले अनेक प्रकार के सांकेतिक चिन्ह
कालांतर में उन उन नामों के पहिले अक्षर माने जाने लगे और देवनगर के मध्य उनका स्थान होने से
उनका नाम 'देवनागरी' हुआ. वह लेख बड़ी गवेषणा के साथ लिखा गया है और युक्तियुक्त अवश्य
है, परंतु जब तक यह सिद्ध न हो कि जिन तांत्रिक पुस्तकों से अवतरण उद्धृत किये गये हैं वे
वैदिक साहित्य के समय के पहिले के, या कम से कम मौर्यकाल से पहिले के, हैं, तब तक हम उनका
मत स्वीकार नहीं कर सकते.
बाबू जगन्मोहनवर्मा ने एक लंबा चौड़ा लेख २ लिख कर यह बतलाने का यत्न किया है कि
'वैदिक चित्रलिपि या उससे निकली हुई सांकेतिक लिपि से ब्राह्मी लिपि का विकास हुआ', परन्तु उस
लेख में कल्पित वैदिक चित्रलिपि के अनेक मनमाने चित्र अनुमान कर उनसे भिन्न अक्षरों के विकास
की जो कल्पना की गई है उसमें एक भी अक्षर की उत्पत्ति के लिये कोई भी प्राचीन लिखित प्रमाण
नहीं दिया जा सका. ऐसी दशा में उनकी यह कल्पना रोचक होने पर भी प्रमाणरहित होने से
स्वीकार नहीं की जा सकती. बाबू जगन्मोहनवर्मा ने दूसरी बात यह ३ भी निकाली है कि 'ट,'
'ठ,' 'ड,' 'ढ' और 'ण' ये पांच मूर्धन्य वर्ण आर्यों के नहीं थे. वैदिक काल के आरंभ में अनार्यों
की भाषा में मूर्धन्य वर्णों का प्रयोग जब आर्यों ने देखा तब वे उनके कानों को बड़े मनोहर लगे,
अतएव उन्होंने उन्हें अपनी भाषा में ले लिया.'
इसके प्रमाण में लिखा है कि 'पारसी आर्यों की वर्णमाला में मूर्धन्य वर्णों का सर्वथा
अभाव है और धातुपाठ में थोड़े से धातुओं को छोड़ कर शेष कोई धातु ऐसा नहीं जिसके आदि में
मूर्धन्यवर्ण हो', परंतु पारसी आर्यों के यहां केवल मूर्धन्यवर्णों का ही अभाव है यही नहीं किंतु उन
की वर्णमाला में 'छ,' 'झ' और 'ल' वर्ण भी नहीं हैं और वैदिक या संस्कृत साहित्य में 'ञ' से
प्रारंभ होने वाला कोई धातु या शब्द भी नहीं है, तो क्या 'छ,' 'झ', 'ल' और 'ञ' वर्ण

१. इं. ऐं; जि. ३५, पृ. २५३-६७; २७०-६०; ३११-२४. २. सरस्वती; ई. स. १९१३ से १९१५ तक कई जगह.
३. सरस्वती; ई. स. १९१५, पृ. ३७०-७१.

खरोष्ठी लिपि की उत्पत्ति. ३१
भी अनार्यों से ही लिये गये? 'ट' १, 'ड' २, 'ढ' ३ और 'ण' ४ से प्रारंभ होने वाले बहुत से धातु हैं,
और जिनमें मूर्धन्य वर्णों का प्रयोग हुआ हो ऐसे हज़ारहां शब्द वैदिक साहित्य में पाये जाते
हैं. ग्रीक आर्यों की भाषा में 'ट' और 'ड' ही हैं, 'त' और 'द' का सर्वथा अभाव है और
सेमिटिक् अनार्यों की लिपियों में मूर्धन्य वर्णों का सर्वथा अभाव पाया जाता है (देखो पृ. २३ में
छुपा हुआ नक्शा); इसी से ग्रीकों ने फ़िनिशियन् अक्षर 'ताव' ('त' का सूचक) से टाओ
('ट'), और दालेथ ('द') से डेल्टा ('ड') बनाया. ऐसी दशा में बाबू जगन्मोहनवर्मा का यह
दूसरा कथन भी आदरणीय नहीं हो सकता.

३—खरोष्ठी ५ लिपि की उत्पत्ति.

मौर्यवंशी राजा अशोक के अनेक लेखों ६ में से केवल शहबाज़गढ़ी और मान्सेरा के चटा-
नों पर खुदे हुए लेख खरोष्ठी लिपि में हैं; जिनसे पाया जाता है कि यह लिपि ई. स. पूर्व की
तीसरी शताब्दी में केवल भारतवर्ष के उत्तरी-पश्चिमी सीमांत प्रदेश के आस पास, अर्थात्
पंजाब के गांधार ७ प्रदेश में, प्रचलित थी. अशोक से पूर्व का इस लिपि का कोई शिलालेख
अब तक नहीं मिला, परंतु ईरानियों के कितने एक चांदी के मोटे सिक्कों ८ पर ब्राह्मी या खरोष्ठी
लिपि के एक एक अक्षर का ठप्पा ९ लगा हुआ मिलता है, जिससे अनुमान होता है कि पंजाब
की तरफ़ चलने वाले ये ईरानी सिक्के संभवतः सिकंदर से पूर्व के अर्थात् ई. स. पूर्व की चौथी
शताब्दी के हों; क्योंकि सिकंदर के विजय से ईरानियों का अधिकार पंजाब पर से उठ गया था.

१. 'ट' से प्रारंभ होने वाले धातु टंक्, टल्, टिक्, टिप्, टीक और ट्वल् हैं.
२. 'ड' से प्रारंभ होने वाले धातु डप्, डम्, डंबू, डंभ्, डिप्, डिम् और डीं हैं.
३. 'ढ' से प्रारंभ होने वाला धातु ढौक् है.
४. पाणिनि ने धातुपाठ में बहुत से धातु 'ण' से आरंभ होने वाले माने हैं (णो नः; पा. .६ । १ । ६५; उपसर्गा-
दसमासेऽपि णोपदेशस्य; पा. ८ । ४ । १४ ).
५. युरोपियन् विद्वानों ने 'खरोष्ठी' लिपि का बाकट्रिअन, बाकट्रिअन पाली, आरिअनोपाली, नॉर्थ (उत्तरी) अशोक,
काबुलिअन और गांधार आदि नामों से भी परिचय दिया है, परंतु हम इस लेख में 'खरोष्ठी' नाम का ही प्रयोग करेंगे.
खरोष्ठी नाम के लिये देखो ऊपर पृ. १८.
६. राजा अशोक के लेख जिन जिन स्थानों में मिले हैं उनके लिये देखो ऊपर पृ. २, टिप्पण ५. उक्त टिप्पण में दिये
हुए स्थानों के नामों में अलाहाबाद (प्रयाग) का नाम भी जोड़ना चाहिये, जो वहां छपने से रह गया है.
७. प्राचीन काले में 'गांधार देश' में पंजाब का पश्चिमी हिस्सा तथा अफ़गानिस्तान का पूर्वी हिस्सा अर्थात् उत्तर-
पश्चिमी सीमान्त प्रदेश के ज़िले पेशावर और रावलपिंडी तथा अफ़गानिस्तान का ज़िला काबुल गिना जाता था.
८. ईरान के प्राचीन चांदी के सिक्के गोली की आकृति के होते थे जिनपर ठप्पा लगाने से वे कुछ चपटे पड़ जाते थे
परंतु बहुत मोटे और भद्दे होते थे. उनपर कोई लेख नहीं होता था किंतु मनुष्य आदि की भद्दी शकलों के ठप्पे लगते थे;
ईरान के ही नहीं किंतु लीडिआ, ग्रीस, आदि के प्राचीन चांदी के सिक्के भी ईरानी सिक्कों की नाईं गोल, भद्दे, गोली की शकल
के चांदी के टुकड़े ही होते थे. केवल हिंदुस्तान में ही प्राचीन काल में चौकूंटे या गोल चांदी के सुंदर चपटे सिक्के, जिन्हें
कार्षापण कहते थे, बनते थे, कॉरिंथिया वालों ने भी पीछे से चपटे सिक्के बनाये जिसकी देखा देखी दूसरे देशवालों ने भी
चपटे सिक्के बनाये (क; कॉ. ए. इं; पृ. ३).
९. प्रॉफेसर रैप्सन् ने कितने एक ईरानी चांदी के सिक्कों के चित्र विवरण सहित छापे हैं (ज रॉ. ए. सो; ई. स.
१८६५, पृ. ८६५-७७, तथा पृ. ८६४ के सामने का सेट, संख्या १-२५) जिनपर ब्राह्मी लिपि के 'यो' 'व', 'प', 'ज' और
'गो' अक्षर और खरोष्ठी लिपि के 'म', 'मे', 'मं,' 'ति' 'द' और 'ह' अक्षरों के ठप्पे लगे हुए हैं.

वासुदेव के सिक्कों की दोनों ओर ग्रीक लेख ही हैं; गा; कँ. कॉ. ग्री. सी. किं. बा. इं; सेट २५-२६. हा; कँ. कॉ. पं. म्यू; जि. १,
Wait, look at line 4:
कुजुलकर कडफसिस और वेम कडफसिस इन तीन के सिक्कों पर खरोष्ठी लेख मिलते हैं और कनिष्क, हुविष्क और वासु-
देव के सिक्कों की दोनों ओर ग्रीक लेख ही हैं; गा; कँ. कॉ. ग्री. सी. कि. बा. इं; सेट २५-२६. हा; कँ. कॉ. पं. म्यू; जि. १,
Wait, किं. or कि.?
In line 4 of note 5: ग्री. सी. कि. बा. इं; - look at कि., it does not have anusvara (or very faint). Let's check: in note 1 it was किं., in note 4 किं., here कि.. Let's keep it accurate: किं. or कि..
Next line:
सेट १७-२०. स्मि; कँ. कॉ. ई. म्यू; सेट ११-१४.

  • Footnote 6:
    `६. औदुंबर और कुनिंदवंशी राजाओं के पंजाब से मिलने

खरोष्ठी लिपि की उत्पत्ति. ३३
कुशनवंशी १ राजाओं के समय के हैं इनमें से कितने एक में राजाओं के नाम मिलते हैं,
और दूसरों में साधारण पुरुषों २ के ही नाम हैं, राजाओं के नहीं. ये बौद्ध स्तूपों में रक्खे हुए
पत्थर आदि के पात्रों और सोने, चांदी या तांबे के पत्रों पर; अथवा चटानों और शिलाओं
या मूर्त्तियों के आसनों पर खुदे हुए मिले हैं. इनमें से अधिकतर गांधारदेश से ही मिले हैं,
और वहां भी विशेषकर तक्षशिला (शाहढेरी, पंजाब के ज़िले रावलपिंडी में) और चारसड्डा
(पुष्कलावती) से. पंजाब के बाहर अफ़गानिस्तान में वर्डक (ज़िले वर्डक में) तथा हिड्डा (जलालाबाद
से ५ मील दक्षिण) आदि में, और मथुरा में, मिले हैं, अन्यत्र ३ नहीं.
१. कुशनवंशी राजाओं के समय के खरोष्ठी लिपि के लेख अधिक संख्या में मिले हैं. राजा कनिष्क के समय का
एक शिलालेख (सं. ११ का) ज़ेड़ा (ज़िले यूसफ़ज़ई में) से (ज. ए; ई. स. १८६०, भाग १, पृ. १३६); एक ताम्रलेख
(सं. ११ का) सुएविहार (पंजाब के बहावलपुर राज्य में) से (इं. ऐं; जि. १०, पृ. ३२६; और जि. ११, पृ. १२८); एक लेख
माणिक्यिाल से (क; आ. स. रि; जि ५, पृ. १६० के सामने का सेट); और पेशावर के कनिष्कविहार के स्तूप से मिले
हुए डिब्बे पर खुदे हुए तीन छोटे छोटे लेख (आ. स; ई. स. १९०६-१०, पृ. १३६-३८) मिले हैं. आरा नामक
नाले (बागनीलाब से २ मील पर-पंजाब में) के अंदर के एक पुराने कुए में से वाक्षेष्प के पुत्र कनिष्क के समय का एक
शिलालेख (सं. ४१ का) मिला है (इं. ऐं; जि. ३७, पृ. ५८). हुविष्क के समय का एक लेख (सं. ५१ का) वर्डक (अफ़ग़ा-
निस्तान में) के स्तूप में से मिले हुए एक पीतल के पात्र पर खुदा है (ए. इं; जि. ११, पृ २१०-११). पंजतार (ज़िले यूसफ़ज़ई
में) से एक शिलालेख (सं. १२२ का) किसी गुशन (कुशन) वंशी राजा के समय का (क; आ. स. रि; जि. ५, पृ. १६१,
और सेट १६, संख्या ४), तथा महाराज राजातिराज देवपुत्र खुशन (कुशन. उक्त नाम के राजा या कुशन वंशी किसी राजा)
का एक लेख (सं १३६ का) रौप्यपत्र पर खुदा हुआ तक्षशिला से मिला है (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९१४, पृ. ९७२-७६.
और ई. स. १९१५, पृ. १६२ के सामने का सेट).
२. हिड्डा के स्तूप से मिले हुए मिट्टी के पात्र पर (सं. २८ का) लेख (ज. रॉ. ए. सो; ई स. १९१५, पृ. ६२, और उस
के सामने का सेट); शकदरी (पंजाब के ज़िले अटक में) से मिला हुआ (सं. ४० का) शिलालेख (इं. ऐं; जि. ३७, पृ. ६६);
ओहिंद (यूसफ़ज़ई ज़िले में) का (सं. ६१ का) लेख (क; आ. स. रि; जि. ५ पृ. ५८; सेट १६, संख्या २.); फतहजंग
(ज़िले अटक में) का (सं. ६८ का) शिलालेख (ज. ए; ई. स १८६०, भाग १, पृ. १३०); सुचइ (ज़िले यूसफ़ज़ई में) से
मिला हुआ (सं. ८१) का शिलालेख (इं. ऐं; जि. ३७, पृ. ६४); बोज़ पहाड़ का (सं. १०२ का) लेख (ज. ए; ई. स. १८६४,
भाग २, पृ. ५१४); पाजा (ज़िले यूसफ़ज़ई में) का (सं. १११ का) शिला लेख (इं. ऐं; जि. ३७, पृ. ६५); कलदरां नदी
(पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश में दर्गाई के पास) में से मिला हुआ (सं. ११३) का शिलालेख (इं. ऐं; जि. ३७, पृ. ६६);
स्कारहढेरी (चारसड्डा अर्थात् हश्तनगर से ८ मील उत्तर में) से मिली हुई हारिती की मूर्त्ति के आसनपर खुदा हुआ (सं.
१७६ का) लेख (आ. स; ई. स. १९०३-४; पृ. २५५; सेट ७०, संख्या ६); देवाई (ज़िले यूसफ़ज़ई में) का (सं २०० का) शि-
लालेख (ज. ए; ई. स. १८६४. भाग २, पृ. ५१०); लोरियन तंगाइ (ज़िले स्वात में) से मिली हुई बुद्ध की मूर्त्ति के आसन
पर खुदा हुआ (सं. ३१८ का) लेख (आ. स; ई. स. १९०३-४; पृ. २५१; सेट ७०, संख्या ४); हश्तनगर (पेशावर ज़िले की
चारसड्डा तहसील में) से मिली हुई बुद्ध की (अपने शिष्यों सहित) मूर्त्ति के आसन पर खुदा हुआ (सं. ३८४ का) लेख
(ए. इं; जि. १२, पृ. २०२). ये सब साधारण पुरुषों के संवत् वाले लेख हैं. इन लेखों में जो संवत् लिखा है वह कौन सा
है यह अभी तक पूर्णतया निश्चित नहीं हुआ, परंतु हमारी संमति में उनमें से अधिकतर लेखों का संवत् शक संवत् ही होना
चाहिये. बिना संवत् वाले लेख ये हैं—
तक्षशिला के गंगू नामक स्तूप से मिला हुआ सुवर्णपत्र पर खुदा हुआ लेख (क; आ. स. रि; जि. २, पृ. १३०,
और सेट ५६); माणिक्यिाल के

३४ | प्राचीनलिपिमाला.
खरोष्ठी लिपि की लेखन शैली फ़ारसी की नांई दाहिनी ओर से बाईं ओर होने से निश्चित है
कि यह लिपि सेमिटिक् वर्ग की है, और इसके ११ अक्षर—'क'१, 'ज'२, 'द'३, 'न'४, 'ब'५, 'य'६,
'र'७, 'व'८, 'ष'९, 'स'१० और 'ह'११ समान उच्चारण वाले अरमइक् अक्षरों से बहुत कुछ मिलते
हुए हैं.
सेमिटिक् लिपि संबंधी आधुनिक शोध से अनुमान होता है कि असीरिया और बाबीलन में
क्यूनिफ़ॉर्म लिपि का प्रचार होने पर भी राजकीय और व्यापार के कामों में अरमइक् लिपि१२ काम
में आती थी. हखामनी १३ (अकॅमीनिअन्) वंश के बादशाहों के समय ईरान के राज्य का प्रताप
बहुत बढ़ा और दूर दूर के देश १४ उक्त राज्य के अधीन हो गये. उस समय के अरमइक् लिपि के अनेक
शिलालेख मिसर १५, अरब १६ और एशिया माइनर १७ में मिले हैं और एक ईरान १८ में तथा एक हिंदुस्तान


है कि उक्त लेख का लेखक 'पड' (पंड) पंजाब की तरफ़ का होना चाहिये, जिसको खरोष्ठी लिपि का भी ज्ञान होगा जिसे
जतलाने के लिये ही उसने ये अंतिम पांच अक्षर उस लिपि में लिखे हों. इसी तरह भरहुत के प्रसिद्ध स्तूप के द्वार पर
कहीं एक एक अक्षर खरोष्ठी का खुदा हुआ मिला है (कः भ. स्तृ; सेट ८) : ये पंजाब की तरफ से आये हुए शिल्पियों के
खोदे हुए होने चाहिये.
१. खरोष्ठी का 'क' तक्षशिला के लेख तथा पॅपायरसों के 'कॉफ' से मिलता हुआ है (देखो पृ. २३ पर छपा हुआ
नक्शा).
२. 'ज' सक्कारा, टीमा आदि के लेखों के 'ज़ाइन' से मिलता हुआ है.
३. 'द' तक्षशिला के लेख, पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'दालेथ' से मिलता है.
४. 'न' तक्षशिला के लेख, पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'नून' से मिलता है.
५. 'ब' तक्षशिला के लेख, पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'बेथ' से मिलता है.
६. 'य' तक्षशिला के लेख, पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'योध्' से मिलता है.
७. 'र' तक्षशिला के लेख तथा पॅपायरसों के 'रेश' से मिलता है.
८. 'व' तक्षशिला तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'वाव' से मिलता है.
९. 'ष' को उलटा करने पर वह पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'शिन' से मिलता है.
१०. 'स' तक्षशिला और सक्कारा के लेखों के 'त्साधे' से मिलता है.
११. 'ह' तक्षशिला के लेख के 'हे' से मिलता हुआ है.
१२. ज. रॉय. ए. सो; ई. स. १९१५, पृ. ३४६-४७.
१३. आर्य जाति के हखामन (ऍकॅमीनि) नामक ईरानी राजवंशी (जो ई. स. पूर्व की ८ वीं शताब्दी में हुआ हो)
के नाम पर से उसके वंशज, ईरान के बादशाह, हखामनी वंशी कहलाते हैं. पहिले ईरान का राज्य मीडिया के अधीन था
और हखामन के वंशज साइरस (कुरु, कुरुष-कैखुसरो) ने, जो प्रारंभ में अनशान (ईरान में) का स्वामी या शासक था,
मीडिया के राजा अस्त्यगिस (इष्टुविगु) को छलवल से परास्त कर समस्त ईरान और मीडिया पर अपना साम्राज्य ई. स.
पूर्व ५४८ के आस पास जमाया, जिसकी समाप्ति ई. स. पूर्व ३३१ में यूनान के बादशाह सिकंदर ने बादशाह दारा (तीसरे)
को परास्त कर की.
१४. हखामनी वंश के साम्राज्य के संस्थापक साइरस ने ईरान, मीडिया, लीडिआ (एशिआ माइनर का पूर्वी आधा
हिस्सा), एशिया माइनर का पश्चिमी हिस्सा जिसमें यूनानियों के कई उपनिवेश थे, आयोनिया (मीडिया से पश्चिम का
एशिया माइनर का समुद्रतट का प्रदेश), खीवा, समरकंद, बुखारा, अफ़गानिस्तान तथा गांधार आदि देश अपने अधीन किये.
उसके पुत्र कंबैसिस (कंबुजीय) ने मिसर देश विजय किया. कंबैसिस के पुत्र दारा (प्रथम) ने ग्रीस के थ्रेस तथा मसी-
डन आदि हिस्सों पर अपना अधिकार जमाया और पूर्व में हिंदुस्तान में आगे बढ़कर सिंधुत्तट का प्रदेश अपने अधीन किया.
१५. मिसर में सक्कारा, सेरापिअम तथा एंबिडॉस आदि स्थानों में अरमइक् लिपि के लेख मिले हैं, जिनमें से सक्का-
रा का लेख ई. स. पूर्व ४८२ का है (पेलिओग्राफिक सोसाइटीज़ ओरिएंटल सीरीज़, प्लेट ६३).
१६. अरब में हजाज से उत्तर के टीमा नामक स्थान में कुछ अरमइक् लिपि के लेख मिले हैं, जिनमें से एक ई. स.
पूर्व ५०० के आसपास का माना जाता है. टीमा में अरमइक् भाषा का व्यवहार करने वाले व्यापारियों की आबादी थी
(प. ब्रि; जि. २१, पृ. ६४७).
१७. एशिया माइनर—टर्की के एशियाई राज्य का पश्चिमी हिस्सा जो टर्की के यूरोपी राज्य से मिला हुआ है.
१८. ईरान के सँक कलिह (तेहरान और तेब्रीज़ के बीच) नामक स्थान में एक लेख मिला है (ई. पॅ; जि. २४, पृ. २८७).

खरोष्ठी लिपि की उत्पत्ति. ३५
में तक्षशिला नगर १ से भी मिल चुका है. मिसर से हखामनियों के राजत्वकाल के उसी लिपि के बहुतेरे
पँपायरस् २ मिले हैं और एशिया माइनर से मिले हुए ईरानी क्षत्रपों (सत्रपों) के कई सिक्कों ३ पर
उसी लिपि के लेख मिलते हैं, जिनसे पाया जाता है कि हखामनी वंश के ईरानी बादशाहों की राज-
कीय लिपि और भाषा अरमइक् ही होनी चाहिये. व्यापार के लिये भी उसका उपयोग दूर दूर
तक होना पाया जाता है ४.
हिंदुस्तान का ईरान के साथ प्राचीन काल से संबंध रहा और हखामनी वंश के बादशाह सा-
इरस (ई. स. पूर्व ५५८-५३०) ने पूर्व में बढ़ कर गांधारदेश विजय किया और ई. स. पूर्व ३१६ के
कुछ ही बाद दारा (प्रथम) ने सिंधु तक का हिंदुस्तान का प्रदेश अपने अधीन किया जो ई. स. पूर्व
३३१ तक, जब कि यूनान के बादशाह सिकंदर ने गॉगमेला ५ की लड़ाई में ईरान के बादशाह दारा
(तीसरे) को परास्त कर ईरानी राज्य पर नाम मात्र के लिये अपना अधिकार जमाया, किसी न
किसी प्रकार बना रहा. अत एव संभव है कि ईरानियों के राजत्वकाल में उनके अधीन के हिंदुस्तान
के इलाकों में उनकी राजकीय लिपि अरमइक् का प्रवेश हुआ हो और उसीसे खरोष्ठी लिपि का उद्भव
हुआ हो, जैसे कि मुसलमानों के राज्य समय फ़ारसी लिपि का, जो उनकी राजकीय लिपि थी,
इस देश में प्रवेश हुआ और उसमें कुछ वर्ण बढ़ाने से उर्दू लिपि बनी.
अरमइक् लिपि में केवल २२ अक्षर होने तथा स्वरों की अपूर्णता और उनमें ह्रस्व दीर्घ का भेद न
होने एवं स्वरों की मात्राओं का सर्वथा अभाव होने से वह यहां की भाषा के लिये सर्वथा उपयुक्त न थी तो
भी राजकीय लिपि होने के कारण यहां वालों में से किसी ने ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी के आसपास
उसके अक्षरों की संख्या बढ़ा कर, कितने एक को आवश्यकता के अनुसार बदल तथा स्वरों की मात्राओं
की योजना कर उसपर से मामूली पढ़े लिखे लोगों, व्यापारियों तथा अहल्कारों के लिये काम चलाऊ
खरोष्ठी लिपि बना दी हो. संभव है कि इसका निर्माता चीन वालों के लेखानुसार खरोष्ठ नामक आचार्य ६
(ब्राह्मण) हो, जिसके नाम पर से इस लिपि का नाम खरोष्ठी हुआ, और यह भी संभव है कि तक्ष-
शिला जैसे गांधार के किसी प्राचीन विद्यापीठ में इसका प्रादुर्भाव हुआ हो.
जितने लेख अब तक इस लिपि के मिले ७ हैं उनसे पाया जाता है कि इसमें स्वरों तथा उनकी
मात्राओं में ह्रस्व दीर्घ का भेद न था. संयुक्ताक्षर केवल थोड़े ही मिलते हैं इतना ही नहीं, किंतु उनमें
से कितने एक में संयुक्त व्यंजनों के अलग अलग रूप स्पष्ट नहीं पाये जाते परंतु एक विलक्षण
ही रूप मिलता है जिससे कितने एक संयुक्ताक्षरों का पढ़ना अभी तक संशययुक्त ही है. बौद्धों
के प्राकृत पुस्तक ८, जिनमें स्वरों के ह्रस्व दीर्घ का विशेष भेद नहीं रहता था और जिनमें संयु-

१. ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६१५, पृ. ३४० के सामने का प्लेट.
२. मिसर से ई. स. पूर्व ५०० से लगा कर ई. स. पूर्व २०० तक के अरमइक् लिपि के पँपायरस् मिले हैं.
३. ई. ऐं; जि. २४, पृ. २८७. ४. ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६१५; पृ. ३४६-४७.
५. गॉगमेला (अरबैला) तुर्की के एशियाई राज्य का एक नगर, जो मोसल और बगदाद के बीच में है.
६. खरोष्ठ के लिये देखो ऊपर, पृ. १८.
७. खरोष्ठी लिपि के शिलालेखादि के लिये देखो ऊपर पृ. ३२, टि. ७-६; और पृ. ३३, टि. १, २.
८. हिड्डा के स्तूप (संख्या १३) से मिले हुए खरोष्ठी लेखवाले मिट्टी के पात्र के भीतर खरोष्ठी लिपि में लिखे हुए
कितने एक भोजपत्र एक पत्थर पर लिपटे हुए मिले थे परंतु बहुत प्राचीन होने के कारण वे बच न सके (ऐरिआना ॲंटिका, पृ.
५६-६०, ८४, ६४, १११, ११६). ये सब से पुराने हस्तलिखित भोजपत्र थे. ई. स. की तीसरी शताब्दी के आस पास की 'धम्मपद'
की एक प्रति खोतान से मिली है जिसमें स्वरों की मात्राओं में कुछ सुधार किया हुआ पाया जाता है (भू. इं. पे; पृ. १८-१६).

३६ प्राचीनलिपिमाला.
काक्षरों का प्रयोग विरलही होता था, इसमें लिखे हुए मिले हैं, परंतु यह लिपि संस्कृत ग्रंथों १ के लिखने
के योग्य नहीं थी. शुद्धता और संपूर्णता के विचार से देखा जावे तो इसमें और ब्राह्मी में उतना
१. कलकत्ता हाई कोर्ट के भूतपूर्व जज एफ. ई. पार्जिटर नामक विद्वान् ने 'दी पुराण टेक्स्ट ऑफ़ दी डाइनेस्टीज़
ऑफ़ दी कलि एज' (कलियुग के राजवंशों के संबंध के पुराणों के मूल पाठ) नामक पुस्तक में यह बतलाने का यत्न किया
है कि पुराणों के ये पाठ मूल में खरोष्ठी लिपि में और पीछे से उसपर से ब्राह्मी में लिखे गये होंगे. इसके प्रमाण में लिखा
है कि 'विष्णुपुराण में बहुधा अशोकवर्धन नाम मिलता है परंतु उसकी एक हस्तलिखित प्रति (k Vs) में अयोशोक-
वर्धन पाठ है. यहां पर लेखक ने 'शो' को गलती से 'यो' पढ़ कर वैसा ही लिखा. बाद उसने (या किसी दूसरे ने) यह
गलती देखी और उस प्रति में 'शो' लिखा या बढ़ा दिया, परंतु 'यो' को काटा नहीं और अशुद्ध नाम अयोशोक बना
रहा और जब वह प्रति (k Vs) लिखी गई तब तक वैसी ही नकल होती रही. हिंदुस्तान की केवल खरोष्ठी लिपि में ही
'यो' और 'शो' अक्सर एक से लिखे जाते हैं अत एव यह प्रायः निश्चित ही है कि विष्णुपुराण में यह अंश अवश्य मूल
खरोष्ठी हस्तलिखित प्रति से लिया गया होगा' (पृ. ८४). इसी तरह विष्णुपुराण की एक प्रति (cy Vs) में 'कोशल'
के स्थान पर 'कोयल' और वायुपुराण की एक प्रति (e Va) में 'शालिशूक' के स्थान पर 'शालियूक' पाठ मिला. इन
तीनों स्थानों में 'श' के स्थान पर 'य' लिखा है. इसी तरह मत्स्यपुराण की एक हस्तलिखित प्रति (dj Mt) में 'काशेयाः'
के स्थान पर 'कालेयाः' और वायुपुराण में कहीं कहीं 'शृंगभृत्य' के स्थान पर 'शृंगकृत्य' पाठ मिला (पृ. ८५). इन थोड़े से
लेखक दोषों पर से मि. पार्जिटर ने यह अनुमान कर लिया कि लेखक ने 'श' को 'य' वा 'ल' और 'भ' को 'क' पढ़ लिया
और यह अशुद्धता खरोष्ठी से ब्राह्मी में नकल करने से ही हुई होगी. परंतु खरोष्ठी लिपि के जितने लेख अब तक मिले हैं
उन सब में, सिवाय बर्डक के पात्र पर के लेख के, 'श' और 'य' में स्पष्ट भेद पाया जाता है (देखो लिपिपत्र ६५-७०).
'श' और 'ल' में, और 'भ' तथा 'क' में भ्रम होने की संभावना बहुत ही कम है क्योंकि उनमें स्पष्ट अंतर है. खरोष्ठी लिपि
में वास्तव में भ्रम उत्पन्न कराने वाले अक्षरों में से 'ण' और 'न' में विशेष भेद बहुधा नहीं मिलता, तथा 'त,' 'न' और 'र'
इन तीन अक्षरों में परस्पर भेद मालूम करना मामूली लेखक के लिये कठिन है. इसी तरह स्वरों तथा उनकी मात्राओं में
ह्रस्व दीर्घ का भेद न होने तथा विसर्ग और हलंत व्यंजनों का अभाव होने से दीर्घ स्वरों तथा उनकी मात्राओं एवं विसर्ग, हलंत
व्यंजन तथा संयुक्त व्यंजनों की शुद्ध नकल होना सर्वथा असंभव है. इस लिये यदि पुराणों के ये अंश खरोष्ठी से ब्राह्मी में
नकल किये गये होते तो उनमें 'ऋ', 'ॠ', 'ऌ', 'ॡ' और 'औ' अक्षर तथा उनकी मात्राओं का तथा विसर्ग और हलंत
व्यंजनों का सर्वथा अभाव होता और 'न' तथा 'ण', एवं 'त', 'न' और 'र' अक्षरों वाले शब्दों में हज़ारहां गलतियां मिलतीं
क्योंकि पुस्तकों की नकल करने वाले संस्कृत के विद्वान् नहीं किंतु मामूली पढ़े हुए लोग होते हैं और जैसा वे मूल प्रति में
देखते हैं वैसा ही लिख डालते हैं (मक्षिकास्थाने मक्षिका). अत एव पुराणों के हस्तलिखित राजवंशवर्णन के अंश जिस
स्थिति में हमें इस समय मिलते हैं उस स्थिति में सर्वथा न मिलते किंतु कातंत्र व्याकरण के प्रारंभ के संधियों तक के पांच
पादों के सूत्रों की जो दशा हम राजपूताने की 'सीधो' * की पांच पाटियों में देखते हैं उससे भी बुरी दशा में
मिलते, परंतु ऐसा न होना यही बतलाता है कि वे प्रारंभ से ही ब्राह्मी लिपि में लिखे गये थे और उनकी नक़्लें
ब्राह्मी तथा उससे निकली हुई भिन्न भिन्न लिपियों में समयानुसार होती रहीं. मि. पार्जिटर ने खरोष्ठी से ब्राह्मी में नक़्ल
करने में जहां हज़ारहां अशुद्धियां होने का संभव था उन अक्षरों का तो तनिक भी विचार न किया, ऐसी दशा में हम उक्त
कथन को किसी तरह आदरणीय नहीं मान सकते. प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. स्टेन कॉनो ने भी उक्त पुस्तक की समालो-

  • राजपूताने में विद्यार्थियों को पहिले कातंत्र व्याकरण पढ़ाया जाता था और उस प्राचीन परिपाटी के अनुसार अब
    तक भी पुराने ढंग की पाठशालाओं में उसके प्रारंभ के संधि विषयक पांच पाद रटाये जाते हैं. कातंत्र व्याकरण के प्रथम
    सूत्र का पहिला शब्द 'सिद्धो' (सिद्धो वर्णसमाम्नायः) होने से उनको 'सीधो' कहते हैं और उक्त पांच पादों को 'सीधो
    की पांच पाटी' कहते हैं. संस्कृत न जानने वालों के द्वारा उनकी नक़लें तथा पढ़ाई होते होते इस समय उनकी कैसी
    दुर्दशा होगई है और मूल में तथा उनमें कितना अंतर पड़ गया है, यह बतलाने के लिये उनके प्रारंभ के थोड़े से सूत्र नीचे
    उद्धृत किये जाते हैं—
    कातंत्र—सिद्धो वर्णसमाम्नायः । तत्र चतुर्दशादौ स्वराः । दश समानाः । तेषां द्वौ द्वावन्योन्यस्य सवर्णौ ।
    सीधो—सीधो बरना समामुनाया । चउचुत्रउदासा दउसंँवारा । दसे समाना । तेसुदुव्वावरणो नसीसवरणो ।
    कातंत्र—पूर्वो ह्रस्वः । परो दीर्घः । स्वरोऽवर्णवज्र्जो नामी । एकारादीनि सन्ध्यक्षराणि । कादीनि व्यञ्जनानि ।
    सीधो—पूरबो हंसवा । पारो दीरघा । सारो बरणा विगान्जो नामी । ईकरादिणी संधकराणी । कादीनावू विणज्यौनामी ।
    कातंत्र—ते वर्गाः पञ्च पञ्च ।
    सीधो—ते विरघा पंचा पंचा ।

खरोष्ठी लिपि एवं उत्तरी शैलियों का विकास (मौर्य, शुंग, कुषाण व गुप्त लिपि)

प्राचीन लिपियों का पढ़ा जाना. ३७
ही अंतर पाया जाता है जितना कि इस समय छपी हुई नागरी की पुस्तकों तथा राजपूताने के अधिकतर
रजवाड़ों के मामूली पढ़े हुए अहल्कारों की लिखावटों में.
ई. स. की तीसरी शताब्दी के आस पास तक इस लिपि का कुछ प्रचार पंजाब में बना
रहा, जिसके बाद यह इस देश में से सदा के लिये अस्त हो गई और इसका स्थान ब्राह्मी ने ले लिया,
तो भी हिंदुकुश पर्वत से उत्तर के देशों तथा चीनी तुर्किस्तान आदि में, जहां बौद्ध धर्म और भारतीय
सभ्यता दृढ़ हो रही थी, कई शताब्दी पीछे तक भी इस लिपि का प्रचार बना रहा. प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता
डॉ. सर ऑरल स्टाइन ने चीनी तुर्किस्तान आदि प्रदेशों से असाधारण श्रम कर जो प्राचीन वस्तुएं एक-
त्रित की हैं उनमें इस लिपि में लिखे हुए पुस्तक और लकड़ी की लिखित तख्तियां आदि बहुमूल्य
सामग्री भी है.
४-प्राचीन लिपियों का पढ़ा जाना.
भारतवर्ष के विद्वान् ई. स. की १४ वीं शताब्दी के पहिले ही अपने देश की प्राचीन लिपि
ब्राह्मी तथा उससे निकली हुई ई. स. की छठी शताब्दी तक की लिपियों का पढ़ना भूल गये थे, परंतु
पिछली अर्थात् ७ वीं शताब्दी से इधर की लिपियां, संस्कृत और प्राकृत के विद्वान्, जिनको प्राचीन
हस्तलिखित पुस्तकों के पढ़ने का अभ्यास था, यत्न करने से पढ़ सकते थे. ई. स. १३५६ में देहली
के सुल्तान फ़ीरोज़शाह तुग़लक़ ने बड़े उत्साह के साथ टोपरा¹ तथा मेरठ से अशोक के लेखों वाले
दो विशाल स्तंभ उठवा कर असाधारण श्रम² से देहली में लाकर एक (सवाल्क स्तंभ) को फ़ीरोज़-
शाह के कोटले में और दूसरे को 'कुश्क शिकार' (शिकार का महल) के पास³ खड़ा करवाया. उस
ने उन स्तंभों पर के लेखों का आशय जानने के लिये बहुत से विद्वानों को एकत्र किया परंतु किसी से
वे पढ़े न गये⁴. यह भी प्रसिद्धि है कि बादशाह अकबर को भी उक्त लेखों का आशय जानने की बहुत
कुछ जिज्ञासा रही परंतु उस समय एक भी विद्वान ऐसा न था कि उनको पढ़ कर बादशाह की जि-
ज्ञासा पूर्ण कर सकता.
हिंदुस्तान में अंगरेज़ों का राज्य होने पर फिर विद्या के सूर्य का उदय हुआ और प्राचीन
वस्तुओं का मान होने लगा. तारीख़ १५ जनवरी सन् १७८४ ई. को सर विलियम जोन्स की प्रेरणा
से एशिया खंड के प्राचीन शिलालेख, ताम्रपत्र, सिक्के, इतिहास, भूगोल, भिन्न भिन्न शास्त्र, रीत रवाज़,
शिल्प आदि विद्या से संबंध रखने वाले सभी विषयों का शोध करने के निमित्त 'एशियाटिक सोसा-
चना करते समय उक्त कथन का विरोध किया है (इ. पँ; जि. ४२, पृ. १६६). यह निश्चित है कि ब्राह्मणों ने खरोष्ठी लिपि को
अपने धर्मग्रंथों में कभी स्थान नहीं दिया क्योंकि वह उनके लिखे जाने के योग्य ही न थी और जितने लेख अब तक उस
लिपि के मिले हैं उनमें एक भी ऐसा नहीं है जो ब्राह्मणों के धर्म से संबंध रखता हो.
१. पंजाब के ज़िले अंबाला में (सवाल्क में).
२. टोपरा का (सवाल्क) स्तंभ किस प्रकार महान् परिश्रम तथा उत्साह के साथ देहली में लाया गया इसका वृत्तान्त
समकालीन लेखक शम्स-इ-शीराज ने तारीख़-इ-फ़ीरोज़शाही में किया है (इ; हि. इं; जि. ३, पृ. ३५०-५३).
३. यह स्तंभ देहली में 'रिज' नामक पहाड़ी पर ग़दर की यादगार के स्थान के पास है.
४. क; आ. स. रि; जि. १, पृ. १६३.

३८ प्राचीनलिपिमाला.
इटी' नामक एक समाज भारतवर्ष की उस समय की राजधानी कलकत्ता नगर में स्थापन हुआ,
और बहुत से यूरोपियन तथा देशी विद्वान् अपनी अपनी रुचि के अनुसार भिन्न भिन्न विषयों में
उक्त समाज का उद्देश्य सफल करने को प्रवृत्त हुए. कितने एक विद्वानों ने ऐतिहासिक विषयों के
शोध में लग कर प्राचीन शिलालेख, दानपत्र, सिक्के तथा ऐतिहासिक पुस्तकों का टटोलना प्रारंभ
किया. इस प्रकार भारतवर्ष की प्राचीन लिपियों पर प्रथम ही प्रथम विद्वानों की दृष्टि पड़ी.
ई. स. १७८५ में चार्ल्स विल्किन्स ने दीनाजपुर जिले के बदाल नामक स्थान के पास मिला
हुआ एक स्तंभ पर का लेख' पढ़ा, जो बंगाल के राजा नारायणपाल के समय का था२. उसी वर्ष में
पंडित राधाकांतशर्मा ने टोपरावाले देहली के अशोक के लेखवाले स्तंभ पर खुदे हुए अजमेर के
चौहान राजा आन्नल्लदेव (आना) के पुत्र वीसलदेव (विग्रहराज-चौथे) के तीन ३ लेख पढ़े जिनमें से
एक [विक्रम] 'सं. १२२० वैशाख शुदि १५' का है. इन सब की लिपि बहुत पुरानी न होने से ये
आसानी के साथ पढ़े गये, परंतु उसी वर्ष में जे. एच. हैरिंग्टन् ने बुद्धगया के पास वाली 'नागार्जुनी'
और 'बराबर' की गुफ़ाओं में उपर्युक्त लेखों से अधिक पुराने, मौखरी वंश के राजा अनंतवर्मन्
के तीन लेख पाये, जिनकी लिपि गुप्तों के समय के लेखों की लिपि से मिलती हुई होने के कारण उनका
पढ़ना कठिन प्रतीत हुआ, परंतु चार्ल्स विल्किन्स ने ई. स. १७८५ से ८६ तक श्रम कर के उन तीनों
लेखों४ को पढ़ लिया जिससे गुप्तलिपि ५ की अनुमान आधी वर्णमाला का ज्ञान हो गया.
ई. स. १८१८ से १८२३ तक कर्नल जेम्स टॉड ने राजपूताना के इतिहास की खोज में लग कर
राजपूताना तथा काठियावाड़ में कई प्राचीन लेखों का पता लगाया जिनमें से ई. स. की ७ वीं शताब्दी
से लगा कर १५ वीं शताब्दी तक के कई लेख उक्त विद्वान् इतिहासलेखक के गुरु यति ज्ञानचंद्र ने पढ़े
और जिनका अनुवाद या सारांश कर्नल टॉड के 'राजस्थान' नामक पुस्तक में कई जगह छपा है.
बी. जी. बॅबिंग्टन् ने मामल्लपुर के कितने एक संस्कृत और तमिळ भाषा के प्राचीन लेखों को
पढ़ कर ई. स. १८२८ में उनकी वर्णमालाएं तय्यार कीं. इसी तरह वॉल्टर इलियट ने प्राचीन कनड़ी
अक्षरों को पहिचाना और ई. स. १८३३ में उनकी वर्णमालाओं को विस्तृत रूप से प्रकट किया ७.
ई. स. १८३४ में कप्तान ट्रायर ने इसी उद्योग में लग कर अलाहाबाद (प्रयाग) के अशोक
के लेख वाले स्तंभ पर खुदे हुए गुप्तवंशी राजा समुद्रगुप्त के लेख का कुछ अंश पढ़ा और उसी वर्ष
में डॉ. मिल् ने उसे पूरा पढ़ कर ई. स. १८३७ में भिटारी के स्तंभ पर का स्कंदगुप्त का लेख १० भी
पढ़ लिया.
१. ए. रि; जि. १, पृ. १३१. यह लेख फिर भी छप चुका है (ए. इं; जि. २, पृ. १६१-६४).
२. ई. सं. १७८६ में चार्ल्स विल्किन्स ने मुंगेर से मिला हुआ बंगाल के राजा देवपाल का एक दानपत्र पढ़ा था,
परंतु वह भी ई. स. १७८८ में छपा (ए. रि; जि. १, पृ. १२३). यह ताम्रपत्र दूसरी बार शुद्धता के साथ छप चुका है
(इं. पें; जि. २१, पृ. २५४-५७).
३. ए. रि; जि. १, पृ. ३७६-८२. को; भि. ए; जि. २, पृ. २३२-३७. इं. पें; जि. १६, पृ. २१५.
४. बराबर का लेख-ए. रि; जि. २, पृ. १६७. ज. ए. सो. बंगा; जि. ६, पृ. ६७४; प्लेट ३६, सं १४, १६, १७. इं. पें;
जि. १३, पृ ४२८. फ्ली; गु. इं; पृ. २२२-२३. नागार्जुनी गुफ़ा के २ लेख-ए. रि; जि. २, पृ. १६८. ज. ए. सो. बंगा; जि. १६,
पृ. ४०१; प्लेट १०. फ्ली; गु. इं; पृ. २२४-२७.
५. गुप्तवंशी राजाओं के समय की प्राचीन लिपि को गुप्तलिपि कहते हैं.
६. ट्रांजेक्शनस् ऑफ़ रॉयल एशियाटिक सोसाइटी (जि. २, पृ. २६४-६६; प्लेट १३, १४, १७ और १८).
७. ब. आ. स. वे. इं; जि. ३, पृ. ७३.
८. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ११८.
९. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ३३६. फ्ली; गु. इं; पृ. ६-१०
१०. ज. ए. सो. बंगा; जि. ६, पृ. १. फ्ली; गु. इं; पृ. ५३-५४.

प्राचीन लिपियों का पढ़ा जाना. ३६
ई. स. १८३५ में डब्ल्यू एच. वॉथन ने वल्लभी के कितने एक दानपत्र पढ़े¹.
ई. स. १८३७-३८ में जेम्स प्रिन्सेप ने देहली, कहाउं और एरण के स्तंभों तथा सांची और
अमरावती के स्तूपों और गिरनार के चटान पर के गुप्तलिपि के लेख पढ़े². कप्तान् ट्रायर, डा. मिल्
तथा जेम्स प्रिन्सेप के श्रम से चार्ल्स विल्किन्सन् की गुप्तलिपि की अधूरी वर्णमाला पूर्ण हो गई और
गुप्तवंशी राजाओं के समय के शिलालेख, ताम्रपत्र और सिक्कों के पढ़ने में सुगमता हो गई.
ब्राह्मी लिपि गुप्तलिपि से पुरानी होने के कारण उसका पढ़ना बड़ा दुस्तर था. ई. स. १७९५
[ब्राह्मीलिपि.] में सर चार्ल्स मेलेट ने इलोरा की गुफाओं के कितने एक छोटे छोटे लेखों की छापें तय्यार
कर सर विलियम् जोन्स के पास भेजीं. फिर ये छापें विल्फर्ड के पास पढ़ने को भेजी गईं
परंतु जब वे पढ़ी न गईं तो एक पंडित ने कितनी एक प्राचीन लिपियों की वर्णमालाओं का पुस्तक
विल्फर्ड को बतला कर उन लेखों को अपनी इच्छा के अनुसार कुछ का कुछ पढ़ा दिया. विल्फर्ड ने
इस तरह पढ़े हुए वे लेख अंग्रेज़ी अनुवाद सहित सर विलियम् जोन्स के पास भेज दिये. बहुत
बरसों तक उन लेखों के शुद्ध पढ़े जाने में किसी को शंका न हुई परंतु पीछे से उनका पढ़ना और अनु-
वाद कपोल कल्पित सिद्ध हुए.
बंगाल एशियाटिक सोसाइटी के संग्रह में देहली और अलाहाबाद के स्तंभों तथा खंडगिरि के
चटान पर खुदे हुए लेखों की छापें आ गई थीं परंतु विल्फर्ड का यत्न निष्फल होने से कितने एक वर्षों
तक उन लेखों के पढ़ने का उद्योग न हुआ. उन लेखों का आशय जानने की जिज्ञासा रहने के कारण
जेम्स प्रिन्सेप ने ई. स. १८३४-३५ में अलाहाबाद, राधिया और मथिया के स्तंभों पर के लेखों की
छापें मंगवाईं और उनको देहली के लेख से मिला कर यह जानना चाहा कि उनमें कोई शब्द एकसा
है या नहीं. इस प्रकार उन चारों लेखों को पास पास रख कर मिलाने से तुरंत ही यह पाया
गया कि वे चारों लेख एक ही हैं. इस बात से प्रिन्सेप का उत्साह बढ़ा और उसे अपनी जिज्ञासा
पूर्ण होने की दृढ़ आशा बंधी. फिर अलाहाबाद के स्तंभ के लेख से भिन्न भिन्न आकृति के अक्षरों
को अलग अलग छांटने पर यह विदित हो गया कि गुप्ताक्षरों के समान उनमें भी कितने एक अक्षरों
के साथ स्वरों की मात्राओं के पृथक् पृथक् चिह्न लगे हुए हैं, जो एकत्रित कर प्रकट किये
गये³. इससे कितने एक विद्वानों को उक्त अक्षरों के यूनानी होने का जो भ्रम⁴ था वह दूर हो
गया. स्वरों के चिह्नों को पहिचानने के बाद मि. प्रिन्सेप ने अक्षरों के पहिचानने का उद्योग
करना शुरू किया और उक्त लेख के प्रत्येक अक्षर को गुप्तलिपि से मिलाना और जो मिलता गया
उसको वर्णमाला में क्रमवार रखना प्रारंभ किया. इस प्रकार बहुत से अक्षर पहिचान में आ गये.
१. ज. ए. सो. बंगा; जि. ४, पृ. ४७७.
२. ज. ए. सो. बंगा; जि. ६, पृ. २१८, ४५५; जि. ७, पृ. ३६, ३३७, ६२६, ६३२.
३. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ७, प्लेट ५.
४. अशोक के लेखों की लिपि मामूली देखने वाले को अंग्रेज़ी या ग्रीक लिपि का भ्रम उत्पन्न करा दे ऐसी है. टॉम
कोरिअट् नामक मुसाफ़िर ने अशोक के देहली के स्तंभ के लेख को देख कर ऐल. हिटकर को एक पत्र में लिखा कि 'मैं इस
देश (हिंदुस्तान) के देली (देहली) नामक शहर में आया जहां पर 'अलेक्ज़ेंडर दी ग्रेट' (सिकंदर) ने हिंदुस्तान के राजा पोरस
को हराया और अपनी विजय की यादगार में उसने एक बृहत् स्तंभ खड़ा करवाया जो अब तक वहां विद्यमान है' (केर्स
वॉयेजिज़ ऐंड ट्रैवल्स, जि. ६, पृ. ४२३; क; आ. स. रि; जि. १, पृ. १६३). इस तरह जब टॉम कोरिअट् ने अशोक के लेखवाले
स्तंभ को बादशाह सिकंदर का खड़ा करवाया हुआ मान लिया तो उस पर के लेख के पढ़े न जाने तक दूसरे यूरोपियन
यात्री आदि का उसकी लिपि को ग्रीक मान लेना कोई आश्चर्य की बात नहीं है. पादरी एडवर्ड टेरी ने लिखा है कि, टॉम
कोरिअट ने मुझ से कहा कि मैंने देली (देहली) में ग्रीक लेख वाला एक बहुत बड़ा पाषाण का स्तंभ देखा जो 'अलेक्ज़ेंडर
दी ग्रेट' ने उस प्रसिद्ध विजय की यादगार के निमित्त उस समय वहां पर खड़ा करवाया था' (क; आ. स. रि; जि. १,
पृ. १६३-६४). इसी तरह दूसरे लेखकों ने उस लेख को ग्रीक लेख मान लिया था.

४० प्राचीनलिपिममाला.
पादरी जेम्स स्टिवन्सन ने भी प्रिन्सेप की नांई इसी शोध में लग कर 'क,' 'ज,' 'प' और
'व' अक्षरों१ को पहिचाना और इन अक्षरों की सहायता से लेखों को पढ़ कर उनका अनुवाद
करने का उद्योग किया गया परंतु कुछ तो अक्षरों के पहिचानने में भूल हो जाने, कुछ वर्णमाला पूरी
ज्ञात न होने२ और कुछ उन लेखों की भाषा को संस्कृत मान कर उसी भाषा के नियमानुसार
पढ़ने से वह उद्योग निष्फल हुआ. इससे भी प्रिन्सेप को निराशा न हुई. ई. स. १८३६ में
प्रसिद्ध विद्वान् लैसन ने एक बाक्ट्रियन ग्रीक सिक्के पर इन्हीं अक्षरों में अगॅथॉक्लिस का नाम पढ़ा.
ई. स. १८३७ में मि. प्रिन्सेप ने सांची के स्तूपों से संबंध रखने वाले स्तंभों आदि पर खुदे हुए
कई एक छोटे छोटे लेखों की छापें एकत्र कर उन्हें देखा तो उनके अंत के दो अक्षर एकसे दिखाई
दिये और उनके पहिले प्रायः 'स' अक्षर पाया गया जिसको प्राकृत भाषा के संबंध कारक के
एक वचन का प्रत्यय (संस्कृत 'स्य' से) मान कर यह अनुमान किया कि ये सब लेख अलग
अलग पुरुषों के दान प्रकट करते होंगे और अंत के दोनों अक्षर, जो पढ़े नहीं जाते और जिनमें
से पहिले के साथ 'आ' की मात्रा और दूसरे के साथ अनुस्वार लगा है उनमें से पहिला अक्षर
'दा' और दूसरा 'नं' (दानं) ही होगा. इस अनुमान के अनुसार 'द' और 'न' के पहिचाने
जाने पर वर्णमाला संपूर्ण हो गई और देहली, अलाहाबाद, सांची, मथिया, रधिया, गिरनार,
धौली आदि के लेख सुगमता पूर्वक पढ़ लिये गये. इससे यह भी निश्चय हो गया कि उनकी
भाषा जो पहिले संस्कृत मान ली गई थी वह अनुमान ठीक न था, वरन उनकी भाषा उक्त स्थानों
की प्रचलित देशी (प्राकृत) भाषा थी. इस प्रकार प्रिन्सेप् आदि विद्वानों के उद्योग से
ब्राह्मी अक्षरों के पढ़े जाने से पिछले समय के सब लेखों का पढ़ना सुगम हो गया क्योंकि भारत-
वर्ष की समस्त प्राचीन लिपियों का मूल यही ब्राह्मी लिपि है.
कर्नल जेम्स टॉड ने एक बड़ा संग्रह बाक्ट्रियन ग्रीक, शक, पार्थियन और कुशनवंशी
खरोष्ठी लिपि. राजाओं के प्राचीन सिक्कों का किया था जिनकी एक ओर प्राचीन ग्रीक और दूसरी
ओर खरोष्ठी अक्षरों के लेख थे. जनरल वेंदुरा ने ई. स. १८३० में मानिकिआल के स्तूप
को खुदवाया तो उसमें से कई एक सिक्के और दो लेख खरोष्ठी लिपि के३ मिले. इनके अतिरिक्त
सर अलेकज़ेंडर बर्न्स आदि प्राचीन शोधकों ने भी बहुत से प्राचीन सिक्के एकत्र किये जिनके
एक ओर के प्राचीन ग्रीक अक्षर तो पढ़े जाते थे परंतु दूसरी ओर के खरोष्ठी अक्षरों के पढ़ने के
लिये कोई साधन न था. इन अक्षरों के लिये भिन्न भिन्न कल्पनाएं होने लगीं. ई. स. १८२४ में कर्नल
जेम्स टॉड ने कदफिसेस् के सिक्के पर के इन अक्षरों को 'ससेनियन' प्रकट किया४. ई. स. १८३३
में ऍपॉलोडॉटसं के सिक्के पर के इन्हीं अक्षरों को प्रिन्सेप ने पहलवी५ माना और एक दूसरे सिक्के
पर की इसी लिपि६ को तथा मानिकिआल के लेख की लिपि को भी पाली७ (ब्राह्मी) बतलाया
और उनकी आकृति टेढ़ी होने से यह अनुमान किया कि छापे और महाजनी लिपि के नागरी
अक्षरों में जैसा अंतर८ है वैसा ही देहली आदि के अशोक के लेखों की पाली (ब्राह्मी) लिपि
और इनकी लिपि में है, परंतु पीछे से स्वयं प्रिन्सेप को अपना अनुमान अयुक्त जंचने लगा.
१. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ४०४.
२. 'न' को 'र' पढ़ लिया था और 'द' को पहिचाना न था.
३. प्रिं; ऐं; जि. १, पृ. ६३-६६. ४. ए. रि; जि. १८, पृ. ५७८.
५. ज. ए. सो. बंगा; जि. २, पृ. ३१३. ६. ज. ए. सो. बंगा; जि. २, पृ. ३१३, ३१६.
७. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ३१८. ८. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ३१६.

ब्राह्मी लिपि. ४१
ई. स. १८३४ में कसान कोर्ट को एक स्तूप में से इसी लिपि का एक लेख मिला जिसको देख कर
प्रिन्सेप ने फिर इन अक्षरों को पहलवी माना १. अफ़गानिस्तान में प्राचीन शोध के कार्य में लगे हुए मि.
मेसन को जब यह मालूम हो गया कि एक ओर ग्रीक लिपि में जो नाम है ठीक वही नाम दूसरी ओर
की लिपि में है, तब उसने मिनॅन्डर, ऍपॉलॉडोटस, हर्मिअस, बसिलेअस (राजा) और सॉटेरस ( त्रातर् )
शब्दों के खरोष्ठी चिह्न पहिचान लिये और वे प्रिन्सेप को लिख भेजे. मि. प्रिन्सेप ने उन चिह्नों
के अनुसार सिक्कों को पढ़ कर देखा तो उन चिह्नों को ठीक पाया और ग्रीक लेखों की सहायता से
उन ( खरोष्ठी ) अक्षरों को पढ़ने का उद्योग करने पर १२ राजाओं के नाम तथा ६ खिताब पढ़ लिये
गये. इस तरह खरोष्ठी लिपि के बहुत से अक्षरों का बोध होकर यह भी ज्ञात हो गया कि यह लिपि
दाहिनी ओर से बाईं ओर को पढ़ी जाती है. इससे यह भी पूर्ण विश्वास हो गया कि यह लिपि
सेमिटिक् वर्ग की है परंतु इसके साथ ही उसकी भाषा को, जो वास्तव में प्राकृत थी, पहलवी मान
लिया. इस प्रकार ग्रीक लेखों के सहारे से खरोष्ठी लिपि के कितने एक अक्षर मालूम हो गये किंतु
पहलवी भाषा के नियमों पर दृष्टि रख कर पढ़ने का उद्योग करने से अक्षरों के पहिचानने में अशुद्धता
हो गई जिससे यह शोध आगे न बढ़ सका. ई. स. १८३८ में दो बाकट्रिअन ग्रीक राजाओं के सिक्कों
पर पाली ( प्राकृत ) लेख देखते ही सिक्कों पर के खरोष्ठी लिपि के लेखों की भाषा को पाली ( प्राकृत )
मान उसके नियमानुसार पढ़ने से प्रिन्सेप का शोध आगे बढ़ सका और १७ अक्षर पहिचान में आ गये.
प्रिन्सेप की नांई मि. नॉरिस ने इस शोध में लग कर इस लिपि के ६ अक्षर पहिचान लिये और
जनरल कनिंगहाम ने बाकी के अक्षरों को पहिचान कर खरोष्ठी की वर्णमाला पूर्ण कर दी और संयुक्ता-
क्षर भी पहिचान लिये.
५—ब्राह्मी लिपि.
ई. स. पूर्व ५०० के आसपास से लगा कर ई. स. ३५० के आसपास तक ( लिपिपत्र १—१५ ).
ब्राह्मी लिपि भारतवर्ष की प्राचीन लिपि है. पहिले इस लिपि के लेख अशोक के समय अर्थात्
ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी तक के ही मिले थे, परंतु कुछ बरस हुए इस लिपि के दो छोटे छोटे
लेख १, जिनमें से एक पिप्रावा के स्तूप से और दूसरा बर्ली गांव से, मिले हैं जो ई. स. पूर्व की पांचवीं
शताब्दी के हैं. इन लेखों की और अशोक के लेखों की लिपि में कोई स्पष्ट अंतर २ नहीं है, जैसा कि
ई. स. की १४ वीं शताब्दी से लगा कर अब तक की नागरी लिपि में नहीं पाया जाता; परंतु दक्षिण
से मिलने वाले भट्टिप्रोलु के स्तूप के लेखों की लिपि में, जो अशोक के समय से बहुत पीछे की नहीं है,
१. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ५४७, ५६३.
२. देखो ऊपर पृ. २.
३. पिप्रावा के लेख में दीर्घ स्वरों की मात्राओं का अभाव है और बर्ली के लेख में 'ई' की मात्रा का जो चिह्न है
वह अशोक और उसके पिछले किसी लेख में नहीं मिलता ( देखो ऊपर पृ. २-३, और पृ. ३ का टिप्पण २).

४२ प्राचीनलिपिमाला
पिप्रावा, बर्ली और अशोक के लेखों की लिपि से बहुत कुछ भिन्नता पाई जाती है जिससे
अनुमान होता है कि भट्टिप्रोलु के लेखों की लिपि अशोक के लेखों की लिपि से नहीं निकली
किंतु उस प्राचीन ब्राह्मी से निकली होगी जिससे पिप्रावा, बर्ली और अशोक के लेखों की लिपि
निकली है. यह भी संभव है कि भट्टिप्रोलु के स्तूप की लिपि ललितविस्तर की 'द्राविड़ लिपि'
हो क्योंकि वे लेख द्रविड़ देश के कृष्णा जिले में ही मिले हैं.
अशोक से पूर्व के जैन 'समवायांग सूत्र' में तथा पिछले बने हुए 'ललितविस्तर' में ब्राह्मी
के अतिरिक्त और बहुतसी लिपियों के नाम मिलते हैं, परंतु उनका कोई लेख अब तक नहीं
मिला जिसका कारण शायद यह हो कि प्राचीन काल में ही वे सब अस्त हो गई हों और उन-
का स्थान अशोक के समय की ब्राह्मी ने ले लिया हो जैसा कि इस समय संस्कृत ग्रंथों के
लिखने तथा छपने में भारतवर्ष के भिन्न भिन्न विभागों की भिन्न भिन्न लिपियों का स्थान बहुधा
नागरी ने ले लिया है. ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दि से पहिले की ब्राह्मी का कोई लेख अब-
तक नहीं मिला; अतएव इस पुस्तक की ब्राह्मी लिपि का प्रारंभ ई. स. पूर्व ५०० के आस
पास से ही होता है.
हस्तलिखित लिपियों में सर्वत्र ही समय के साथ और लेखकों की लेखन रुचि के अनुसार
परिवर्तन हुआ ही करता है. ब्राह्मी लिपि भी इस नियम से बाहर नहीं जा सकती. उसमें
भी समय के साथ बहुत कुछ परिवर्तन हुआ और उससे कई एक लिपियां निकलीं जिनके
अक्षर मूल अक्षरों से इतने बदल गये कि जिनको प्राचीन लिपियों का परिचय नहीं है वे
सहसा यह स्वीकार न करेंगे कि हमारे देश की नागरी, शारदा (कश्मीरी), गुरमुखी (पंजाबी),
बंगला, उड़िया, तेलुगु, कनडी, ग्रन्थ, तामिळ आदि समस्त वर्तमान लिपियां एक ही मूल लिपि
ब्राह्मी से निकली हैं. ब्राह्मी लिपि के परिवर्तनों के अनुसार हमने अपने सुभीते के लिये उसके
विभाग इस तरह किये हैं—
ई. स. पूर्व ५०० के आस पास से लगा कर ई. स. ३५० के आस पास तक की समस्त
भारतवर्ष की लिपियों की संज्ञा ब्राह्मी मानी है. इसके पीछे उसका लेखन प्रवाह दो
स्रोतों में विभक्त होता है जिनको उत्तरी और दक्षिणी शैली कहेंगे. उत्तरी शैली का प्रचार
विंध्य पर्वत से उत्तर के तथा दक्षिणी का दक्षिण के देशों में बहुधा रहा तो भी विंध्य से उत्तर
में दक्षिणी, और विंध्य से दक्षिण में उत्तरी शैली के लेख कहीं कहीं मिल ही आते हैं.
उत्तरी शैली की लिपियां ये हैं—
१. गुप्तलिपि—गुप्तवंशी राजाओं के समय के लेखों में सारे उत्तरी हिंदुस्तान में इस
लिपि का प्रचार होने से इसका नाम 'गुप्तलिपि' कल्पित किया गया है. इसका प्रचार ई. स.
की चौथी और पांचवीं शताब्दी में रहा.
२. कुटिललिपि—इसके अक्षरों तथा विशेष कर स्वरों की मात्राओं की कुटिल आकृतियों
के कारण इसका नाम कुटिल रक्खा गया. यह गुप्तलिपि से निकली और इसका प्रचार ई. स.
की छठी शताब्दी से नवीं तक रहा, और इसीसे नागरी और शारदा लिपियां निकलीं.
३. नागरी—उत्तर में इसका प्रचार ई. स. की ६ वीं शताब्दी के अंत के आस पास से
मिलता है परंतु दक्षिण में इसका प्रचार ई. स. की आठवीं शताब्दी से होना पाया जाता है क्योंकि
दक्षिण के राष्ट्रकूट (राठौड़) वंशी राजा दंतिदुर्ग के सामनगढ़ (कोल्हापुर राज्य में) से मिले हुए शक
संवत् ६७५ (ई. स. ७५४) के दानपत्र १ की लिपि नागरी ही है और दक्षिण के पिछले कई राजवंशों
१. इं. ऐं; जि. ११, पृ. ११० से ११२ के सामने के प्लेट.

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ब्राह्मी लिपि. ४३

के लेखों में इसका प्रचार ई. स. की १६ वीं शताब्दी के पीछे तक किसी प्रकार मिल आता है. दक्षिण
में इसको 'नंदिनागरी' कहते हैं. प्राचीन नागरी की पूर्वी शाखा से बंगला लिपि निकली, और
नागरी से ही कैथी, महाजनी, राजस्थानी (राजपूताने की) और गुजराती लिपियां निकली हैं.
४. शारदा—इस का प्रचार भारतवर्ष के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों अर्थात् कश्मीर और पंजाब में
रहा. ई. स. की ८ वीं शताब्दी के राजा मेरुवर्मा के लेखों से (देखो लिपिपत्र २२ वां) पाया जाता है
कि उस समय तक तो पंजाब में भी कुटिल लिपि का प्रचार था, जिसके पीछे उसी लिपि से शारदा
लिपि बनी. उसके जितने लेख अब तक मिले हैं उनमें सब से पुराना लेख सराहां (चंबा राज्य में) की
प्रशस्ति.है, जो ई. स. की दसवीं शताब्दी की अनुमान की जा सकती है. इसी लिपि से वर्तमान कश्मीरी
और टाकरी लिपियां निकली हैं और पंजाबी अर्थात् गुरुमुखी के अधिकतर अक्षर भी इसीसे निकले हैं.
५. बंगला—यह लिपि नागरी की पूर्वी शाखा से ई. स. की १० वीं शताब्दी के आस पास निकली
है. बदाल के स्तंभ पर खुदे हुए नारायणपाल के समय के लेख में, जो ई. स. की १० वीं शताब्दी का
है, बंगला का झुकाव दिखाई देता है. इसीसे नेपाल की ११ वीं शताब्दी के बाद की लिपि, तथा
वर्तमान बंगला, मैथिल और उड़िया लिपियां निकली हैं.
दक्षिणी शैली की लिपियां प्राचीन ब्राह्मी लिपि के उस परिवर्तित रूप से निकली हैं जो क्षत्रप
और आंध्रवंशी राजाओं के समय के लेखों में, तथा उनसे कुछ पीछे के दक्षिण की नासिक, कार्ली
आदि गुफाओं के लेखों में पाया जाता है.
दक्षिणी शैली की लिपियां नीचे लिखी हुई हैं—
१. पश्चिमी—यह लिपि काठियावाड़, गुजरात, नासिक, खानदेश और सतारा ज़िलों में, हैदरा-
बाद राज्य के कुछ अंशों में, कौंकण में तथा कुछ कुछ मासोर राज्य में, ई. स. की पांचवीं शताब्दी के
आस पास से नवीं शताब्दी के आस पास तक मिलती है. ई. स. की पांचवीं शताब्दी के आस पास
इसका कुछ कुछ प्रचार राजपूताना तथा मध्य भारत में भी पाया जाता है. इसपर उत्तरी लिपि का
बहुत कुछ प्रभाव पड़ा है. भारतवर्ष के पश्चिमी विभाग में इसका अधिकतर प्रचार होने के कारण
इसका 'पश्चिमी' यह नाम कल्पित किया गया है.
२. मध्यदेशी—यह लिपि मध्यप्रदेश, हैदराबाद राज्य के उत्तरी विभाग, तथा बुंदेलखंड के
कुछ हिस्सों में ई. स. की पांचवीं शताब्दी से लगा कर आठवीं शताब्दी के पीछे तक मिलती है.
इस लिपि के अक्षरों के सिर चौकूंटे या संदूक की सी आकृति के होते हैं जो भीतर से बहुधा खाली,
परंतु कभी कभी भरे हुए भी, होते हैं. अक्षरों की आकृति बहुधा समकोणवाली होती है, अर्थात्
उनके बनाने में आड़ी और खड़ी रेखाएं काम में लाई गई हैं, न कि गोलाईदार. इस लिपि के ताम्र-
पत्र ही विशेष मिले हैं, शिलालेख बहुत कम.
३. तेलुगु-कनडी—यह लिपि बंबई इहाते के दक्षिणी विभाग अर्थात् दक्षिणी मराठा प्रदेश,
शोलापुर, बीजापुर, बेलगांव, धारवाड़ और कारवाड़ ज़िलों में, हैदराबाद राज्य के दक्षिणी हिस्सों में,
मासोर राज्य में, एवं मद्रास इहाते के उत्तर-पूर्वी विभाग अर्थात् विज़गापट्टम, गोदावरी, कृष्णा, कर्नूल,
बिलारी, अनंतपुर, कड्डुप्पा, और नेल्लोर ज़िलों में मिलती है. ई. स. की पांचवीं शताब्दी से १४ वीं
शताब्दी तक इसके कई रूपांतर होते होते इसीसे वर्तमान तेलुगु और कनडी लिपियां बनीं. इसीसे
इसका नाम तेलुगु-कनडी रक्खा गया है.
४. ग्रंथलिपि—यह लिपि मद्रास इहाते के उत्तरी व दक्षिणी आर्कट, सलेम्, ट्रिचिनापल्ली,
मदुरा और तिन्नेवेल्लि ज़िलों में मिलती है. ई. स. की सातवीं शताब्दी से १५ वीं शताब्दी तक इसके
कई रूपांतर होते होते इससे वर्त्तमान ग्रंथलिपि बनी और उससे वर्तमान मलयालम् और तुलु लिपियां