प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ प्राचीनलिपिमाला.
इटी' नामक एक समाज भारतवर्ष की उस समय की राजधानी कलकत्ता नगर में स्थापन हुआ,
और बहुत से यूरोपियन तथा देशी विद्वान् अपनी अपनी रुचि के अनुसार भिन्न भिन्न विषयों में
उक्त समाज का उद्देश्य सफल करने को प्रवृत्त हुए. कितने एक विद्वानों ने ऐतिहासिक विषयों के
शोध में लग कर प्राचीन शिलालेख, दानपत्र, सिक्के तथा ऐतिहासिक पुस्तकों का टटोलना प्रारंभ
किया. इस प्रकार भारतवर्ष की प्राचीन लिपियों पर प्रथम ही प्रथम विद्वानों की दृष्टि पड़ी.
ई. स. १७८५ में चार्ल्स विल्किन्स ने दीनाजपुर जिले के बदाल नामक स्थान के पास मिला
हुआ एक स्तंभ पर का लेख' पढ़ा, जो बंगाल के राजा नारायणपाल के समय का था२. उसी वर्ष में
पंडित राधाकांतशर्मा ने टोपरावाले देहली के अशोक के लेखवाले स्तंभ पर खुदे हुए अजमेर के
चौहान राजा आन्नल्लदेव (आना) के पुत्र वीसलदेव (विग्रहराज-चौथे) के तीन ३ लेख पढ़े जिनमें से
एक [विक्रम] 'सं. १२२० वैशाख शुदि १५' का है. इन सब की लिपि बहुत पुरानी न होने से ये
आसानी के साथ पढ़े गये, परंतु उसी वर्ष में जे. एच. हैरिंग्टन् ने बुद्धगया के पास वाली 'नागार्जुनी'
और 'बराबर' की गुफ़ाओं में उपर्युक्त लेखों से अधिक पुराने, मौखरी वंश के राजा अनंतवर्मन्
के तीन लेख पाये, जिनकी लिपि गुप्तों के समय के लेखों की लिपि से मिलती हुई होने के कारण उनका
पढ़ना कठिन प्रतीत हुआ, परंतु चार्ल्स विल्किन्स ने ई. स. १७८५ से ८६ तक श्रम कर के उन तीनों
लेखों४ को पढ़ लिया जिससे गुप्तलिपि ५ की अनुमान आधी वर्णमाला का ज्ञान हो गया.
ई. स. १८१८ से १८२३ तक कर्नल जेम्स टॉड ने राजपूताना के इतिहास की खोज में लग कर
राजपूताना तथा काठियावाड़ में कई प्राचीन लेखों का पता लगाया जिनमें से ई. स. की ७ वीं शताब्दी
से लगा कर १५ वीं शताब्दी तक के कई लेख उक्त विद्वान् इतिहासलेखक के गुरु यति ज्ञानचंद्र ने पढ़े
और जिनका अनुवाद या सारांश कर्नल टॉड के 'राजस्थान' नामक पुस्तक में कई जगह छपा है.
बी. जी. बॅबिंग्टन् ने मामल्लपुर के कितने एक संस्कृत और तमिळ भाषा के प्राचीन लेखों को
पढ़ कर ई. स. १८२८ में उनकी वर्णमालाएं तय्यार कीं. इसी तरह वॉल्टर इलियट ने प्राचीन कनड़ी
अक्षरों को पहिचाना और ई. स. १८३३ में उनकी वर्णमालाओं को विस्तृत रूप से प्रकट किया ७.
ई. स. १८३४ में कप्तान ट्रायर ने इसी उद्योग में लग कर अलाहाबाद (प्रयाग) के अशोक
के लेख वाले स्तंभ पर खुदे हुए गुप्तवंशी राजा समुद्रगुप्त के लेख का कुछ अंश पढ़ा और उसी वर्ष
में डॉ. मिल् ने उसे पूरा पढ़ कर ई. स. १८३७ में भिटारी के स्तंभ पर का स्कंदगुप्त का लेख १० भी
पढ़ लिया.
१. ए. रि; जि. १, पृ. १३१. यह लेख फिर भी छप चुका है (ए. इं; जि. २, पृ. १६१-६४).
२. ई. सं. १७८६ में चार्ल्स विल्किन्स ने मुंगेर से मिला हुआ बंगाल के राजा देवपाल का एक दानपत्र पढ़ा था,
परंतु वह भी ई. स. १७८८ में छपा (ए. रि; जि. १, पृ. १२३). यह ताम्रपत्र दूसरी बार शुद्धता के साथ छप चुका है
(इं. पें; जि. २१, पृ. २५४-५७).
३. ए. रि; जि. १, पृ. ३७६-८२. को; भि. ए; जि. २, पृ. २३२-३७. इं. पें; जि. १६, पृ. २१५.
४. बराबर का लेख-ए. रि; जि. २, पृ. १६७. ज. ए. सो. बंगा; जि. ६, पृ. ६७४; प्लेट ३६, सं १४, १६, १७. इं. पें;
जि. १३, पृ ४२८. फ्ली; गु. इं; पृ. २२२-२३. नागार्जुनी गुफ़ा के २ लेख-ए. रि; जि. २, पृ. १६८. ज. ए. सो. बंगा; जि. १६,
पृ. ४०१; प्लेट १०. फ्ली; गु. इं; पृ. २२४-२७.
५. गुप्तवंशी राजाओं के समय की प्राचीन लिपि को गुप्तलिपि कहते हैं.
६. ट्रांजेक्शनस् ऑफ़ रॉयल एशियाटिक सोसाइटी (जि. २, पृ. २६४-६६; प्लेट १३, १४, १७ और १८).
७. ब. आ. स. वे. इं; जि. ३, पृ. ७३.
८. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ११८.
९. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ३३६. फ्ली; गु. इं; पृ. ६-१०
१०. ज. ए. सो. बंगा; जि. ६, पृ. १. फ्ली; गु. इं; पृ. ५३-५४.