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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 318 में से

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पृष्ठ 57

२८ प्राचीनलिपिमाला.
दो अक्षरों को ही उलटा खोदना भूल कर सीधा खोद दे तो केवल वे ही अक्षर सिक्के पर उलटे आ
जावेंगे.
ऐसी गलतियां कभी कभी हो जाने के उदाहरण मिल आते हैं. सातवाहन (आंध्र) वंश के
राजा शातकर्णी के भिन्न प्रकार के दो सिक्कों पर 'शतकणिस' (शातकर्णे:) सारा लेख एरण के सिक्के
की नांई उलटा आ गया है १. पार्थियन् अचद्गमिस्र् के एक सिक्के पर के खरोष्ठी लेख का एक अंश उलटा
आ गया है अर्थात् नागरी की नांई बाईं ओर से दाहिनी ओर है (रै; इं. कॉ; पृ. १५). विक्रम संवत्
१९४३ के बने हुए इंदौर राज्य के पैसे पर 'एक पाव आना इंदोर' यह लेख उलटा आगया है २.
महाक्षत्रप रंजुवुल (राजुल) के एक सिक्के पर खरोष्ठी लेख की तरफ के ग्रीक अक्षर Y और E से
बने हुए मोनोग्राम ३ में E अक्षर उलटा आगया है ४ परंतु दूसरे सिक्कों पर सीधा है ५. एक प्राचीन
मुद्रा पर 'श्रीमसपकुल' लेख है, जिसमें 'श्री' और 'प' ये दो अक्षर उलटे आ गये हैं ६. ऐसे ही पटना
से मिली हुई एक मुद्रा पर के 'अगपलश' (अंगपालस्य) लेख में 'अ' उलटा आगया है ७.
ऐसी दशा में एरण के सिक्के पर के उलटे लेख के आधार पर यह मान लेना कि, 'ब्राह्मी लिपि
पहिले दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी' किसी तरह आदरणीय नहीं हो सकता ८.
प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. हुल्श (Hultzsch) ने लिखा है ९ कि 'बूलर एरण के सिक्के को, जिस
पर के अक्षर दाहिनी ओर से बाईं ओर हैं, ब्राह्मी के सेमिटिक लिपि से निकलने का प्रमाण मानता है,
इसमें मैं उससे सहमत नहीं हो सकता. यह जानी हुई बात है कि सिक्के पर अक्षर ठीक आने के
लिये ठप्पे पर उनको उलटा खोदना चाहिये; इस बात को हिन्दुस्तानी ठप्पा खोदने वाले अक्सर भूल
जाते हैं.' डॉ. फ्लीट १० ने भी ऐसा ही मत प्रकट किया है.
ब्राह्मी लिपि के न तो अक्षर फिनिशियन् या किसी अन्य लिपि से निकले हैं और न उसकी
बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखने की प्रणाली किसी और लिपि से बदल कर बनाई गई है. यह
भारतवर्ष के आर्यों का अपनी खोज से उत्पन्न किया हुआ मौलिक आविष्कार है. इसकी प्राची-
नता और सर्वांगसुंदरता से चाहे इसका कर्त्ता ब्रह्मा देवता माना जा कर इसका नाम ब्राह्मी पड़ा,

लिखा जाता है (लिपि पत्र ७८) परंतु पहिले ऐसा न था (लिपिपत्र ३२-३५).
१. रा; कँ. कॉ. आं. क्ष; पृ. ४, प्लेट १, संख्या ६ और ११. २. इं. पँ; जि. २६, पृ. ३३६.
३. पूरे नाम के प्रत्येक अंश के प्रारंभ के सांकेतिक दो या तीन वर्णों को मिला कर जो एक विलक्षण चिह्न बनाया
जाता है उसे अंग्रेज़ी में 'मोनोग्राम' (एकाक्षर) कहते हैं.
४. गा; कॉ. ग्री. सी; पृ. ६७, संख्या ५. ५. गा; कॉ. ग्री. सी; पृ. ६७, संख्या ६.
६. ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९०१, पृ. १०४, संख्या ६. ७. क; आ. स. रि; जि. १५, प्लेट ३, संख्या २.
८. ई. स. १८९५ में डॉन मार्टिनो डी. ज़िल्वा विक्रमसिंगे ने रॉयल एशिआटिक सोसाइटी के जर्नल (त्रैमासिक पत्रिका)
में एक पत्र प्रकाशित कर यह बतलाना चाहा था कि 'सीलोन में कई शिलालेख प्राचीन ब्राह्मी लिपि के मिले हैं, जिनमें से
दो में अक्षर उलटे हैं, परंतु उनकी छापों के अभाव में उनका विवेचन नहीं किया जा सकता' (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८९५,
पृ. ८६५-६८) और ई. स. १९०१ में एक लेख उसी जर्नल में फिर छपवाया जिसमें उलटा खुदा हुआ कोई शिलालेख तो प्रका-
शित न किया किंतु उनकी छापें शीघ्र प्राप्त करने का यत्न करने की इच्छा प्रकट की, और अशोक के गिरनार के लेख में 'प्र'
के स्थान में 'पै' 'त्र' के स्थान में 'तं' आदि जो अशुद्धियां मिलती हैं उनपर से यह सिद्धांत निकाला कि 'ब्राह्मी लिपि का
रुख बदलने से ये अक्षर इस तरह लिखे गये' (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९०१, पृ. ३०१-५); परंतु गिरनार के सारे लेख को ध्यान-
पूर्वक पढ़नेवाले को यह अवश्य मालूम हो जायगा कि उसके लिखनेवाले को संयुक्ताक्षरों का ठीक ठीक ज्ञान न था और
संयुक्ताक्षर में प्रथम आने वाले 'र्' (रेफ) तथा द्वितीय आने वाले 'र' का अन्तर तो वह समझता ही न था जिससे उसने
संयुक्ताक्षरों में ऐसी ऐसी अनेक अशुद्धियां की हैं. यदि इन अशुद्धियों पर से ही यह सिद्धांत स्थिर किया जा सकता हो
कि ये ब्राह्मी लिपि के उलटे लिखे जाने के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं तो बात दूसरी है.
ई. स. १९०३ में डॉ. राइस डेविड्स ने विक्रमसिंगे के ऊपर लिखे हुए पत्र और लेख के हवाले से मान लिया कि
ब्राह्मी लिपि उलटी भी लिखी जाती थी (डे; बु. इं; पृ. ११५), परंतु साथ में यह भी लिख दिया कि 'अब तक उलटी
लिपि का कोई शिलालेख प्रसिद्ध नहीं हुआ.'
९. इं. पँ; जि. २६, पृ. ३३६.
१०. बू; ई. पे. के अंग्रेज़ी अनुवाद की भूमिका; पृ. ३-४.