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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 318 में से

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पृष्ठ 55

२६ प्राचीनलिपिमाला.
६-वावू के पहिले रूप को उलटने से दूसरा रूप बना, जिसका रुख पलटने से तीसरा बना,
फिर उसकी दाहिनी तरफ़ की झुकी हुई लकीर के स्थान में ग्रंथि बना देने से चौथा रूप बना.
वर्तमान अंग्रेज़ी छापे के अक्षरों से—
१-'ए' से 'अ' A A H 𑀅
२-'बी' से 'ब' B B ☐
३-'सी' से 'च' C D d
४-'डी' से 'द' D כ כ
५-'ई' से 'ए' E [ ▷ 𑀏
६-'ऐफ़' से 'फ' F E b 𑀨
इनमें से प्रत्येक अक्षर के रूपांतरों में पहिला रूप वर्तमान अंग्रेज़ी छापे का अक्षर और अं-
तिम रूप अशोक के लेखों से है. बीच के कुल रूप बूलर के सूत्रों के अनुसार अनुमान किये हैं जिनका
विवरण इस तरह है—
१-'ए' के पहिले रूप के ऊपर के कोण को खोल देने से दूसरा रूप बना, जिसकी दोनों
तिरछी खड़ी लकीरों को सीधी करने से तीसरा रूप हुआ और उससे चौथा.
२-'बी' की बीच की लकीर को मिटाने से दूसरा रूप और उसकी दाहिनी तरफ़ की वक्र रेखा
को सीधी करने से तीसरा बना.
३-'सी' की दाहिनी तरफ़ एक खड़ी लकीर जोड़ने से दूसरा रूप बन गया और उससे तीसरा.
४-'डी' की बाईं ओर की खड़ी लकीर को मिटाने से दूसरा रूप बना, जिसके बाईं तरफ़
के किनारों के साथ एक एक छोटी खड़ी लकीर जोड़ने से तीसरा रूप बन गया.
५ 'ई' की बीच की लकीर मिटा देने से दूसरा रूप; उसकी दाहिनी तरफ़ की दोनों लकीरों
को तिरछी करने से तीसरा रूप और उससे चौथा बन गया.
६ ऐफ़ को उलटने से दूसरा रूप बना, जिसके नीचे की दाहिनी तरफ़ की दो आड़ी लकीरों
को एक खड़ी लकीर से जोड़ देने से तीसरा रूप और उससे चौथा बन गया.
तक्षशिला के अरमइक लेख से तथा अंग्रेज़ी के छापे के अक्षरों से ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति
बताने में फिनिशियन की अपेक्षा अधिक सरलता होने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि उनसे
ब्राह्मी अक्षर बने हैं. ऐसी दशा में बूलर का मत किसी तरह स्वीकार नहीं हो सकता क्योंकि फिनि-
शियन् के गिमेल (ग) और ब्राह्मी के 'ग' को छोड़ कर अन्य किसी समान उच्चारण वाले अक्षर में
समानता नहीं है. बूलर का सारा यत्न खींचतान ही है. इसीसे बूलर की 'भारतवर्ष की ब्राह्मी लिपि
की उत्पत्ति' के छपने के बाद 'बुद्धिस्ट इंडिया' नामक पुस्तक के कर्ता डॉ. राइस डेविड्ज़ को यह
मानना पड़ा कि 'ब्राह्मी लिपि के अक्षर न तो उत्तरी और न दक्षिणी सेमिटिक अक्षरों से बने हैं'१, ऐसे
ही 'एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटॅनिका' नामक महान अंग्रेज़ी विश्वकोश में इस विषय में यह लिखा गया कि
'बूलर का कथन यद्यपि पाण्डित्य और चतुराई से भरा हुआ है तो भी यह मानना पड़ता है कि
वह अधिक निश्चय नहीं दिलाता. इस लिपि का उद्भव कहां से हुआ इसका निर्णय निश्चित रूप से कर-
ने के पहिले इसके प्राचीन इतिहास के और भी प्रमाणों का ढूंढ़ना आवश्यक है, और ऐसे प्रमाण मिल
सकेंगे इसमें कोई संदेह नहीं'२.
यदि ब्राह्मी और खरोष्ठी दोनों लिपियां फिनिशियन् से, जिसकी उत्पत्ति ई. स. पूर्व की १० वीं
शताब्दी के आस पास मानी जाती है, निकली होतीं तो ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी में, अर्थात्
अशोक के समय, उनमें परस्पर बहुत कुछ समानता होनी चाहिये थी जैसी कि अशोक के समय की


१ देखो ऊपर, पृ. २०.
२ ए., ब्रि; जि ३३, पृ. ६०३.