सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 53

२४ प्राचीनलिपिमला.
ऊपर कर दिया है अथवा [खड़े] अक्षरों को आड़ा कर दिया है और [कितने एक] के कोणों को
खोल दिया है १.
फिनिशिअन और ब्राह्मी की लेखन प्रणाली एक दूसरे से विपरीत होने के कारण बहुत से
अक्षरों की परस्पर समानता बतलाने में बाधा पड़ती थी जिसके लिये बूलर ने यह मान लिया कि
'ब्राह्मी लिपि का रुख पलटने से (अर्थात् जो लिपि पहिले दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी २ जाती थी
उसे पीछे से बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखने से) कितने एक [सेमिटिक] अक्षरों का रुख ग्रीक
अक्षरों की नांई दाहिनी ओर से बाईं ओर को बदल गया'३.
जब इन फेरफारों से भी काम न चला तब बूलर ने २२ अक्षरों में से प्रत्येक की उत्पत्ति बतला
ने के समय बहुत से और फेरफार भी मान लिये जिनमें से मुख्य ये हैं:-
कहीं लकीर को कुछ [इधर उधर] हटा दिया ४, जहां लकीर न थी वहां नई खींच दी५, कहीं
मिटा दी६, कहीं बढ़ा दी७, कहीं घटा दी८, कहीं नीचे लटकती हुई लकीर ऊपर की तरफ़ फिरा दी९, तिरछी
लकीर सीधी करदी१, आड़ी लकीर खड़ी करदी", दो लकीरों के बीच के अंतर को नई लकीर से जोड़
दिया१२, एक दूसरी को काटने वाली दो लकीरों के स्थान में बिंदु बना दिया१३, बाईं तरफ मुड़ी हुई
लकीर के अंत को ऊपर बढ़ा कर गांठ बनादी१४, त्रिकोण को धनुषाकार बना दिया१५, कोण या
कोणों को मिटा कर उनके स्थान में अर्धवृत्त सा बना दिया१६ आदि. इतना करने पर भी सात १७
अक्षरों की उत्पत्ति तो ऐसे अक्षरों से माननी पड़ी कि जिनका उच्चारण बिलकुल बेमेल है.
ऊपर बतलाये हुए फेरफार करने पर फिनिशिअन अक्षरों से ब्राह्मी अक्षरों की उत्पत्ति बूलर
ने किस तरह सिद्ध की जिसके केवल चार उदाहरण नीचे दिये जाते हैं:-
१-अलेफ से 'अ' - K > > d
२-हेथ १८ से 'घ' - 日 日 四 ⊓ し
३-योध् से 'य' - Z 7 F ५ 山 山
४-मेम् से 'म' - y y ୪
इन चारों अक्षरों की उत्पत्ति में पहिला अक्षर प्राचीन फिनिशिअन लिपि का है और
अंतिम अक्षर अशोक के लेखों से है. बाकी के सब अक्षर परिवर्तन की बीच की दशा के सूचक अनु-
मान किये गये हैं कहीं लिखे हुए नहीं मिले. इन रूपान्तरों का विवरण यह है कि:-
१. बू; इं. पे; पृ. ११.
२. ब्राह्मी लिपि पहिले दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी वा नहीं यह विचार आगे किया जायगा.
३. बू; इं. पे; पृ. ११. ४. अलेफ़ से 'अ' की उत्पत्ति में; बू; इं.पे; पृ. १२.
५. ज़ाइन् से 'ज' की उत्पत्ति में 'ज' के बीच की आड़ी लकीर.
६. ज़ाइन् से 'ज' की उत्पत्ति में; हेथ से 'घ' की उत्पत्ति में. ७. हेथ से 'घ' की उत्पत्ति में.
८. ज़ाइन् से 'ज' की उत्पत्ति में ज़ाइन् के ऊपर और नीचे की दोनों आड़ी लकीरों के बाईं तरफ़ बाहर निकले
हुए अंशों का कम करना.
९. योध् से 'य' की उत्पत्ति में. १०. नून् से 'न' की उत्पत्ति में; योध् से 'य' की उत्पत्ति में.
११. दालेथ से 'ध' की उत्पत्ति में. १२. वाव से 'व' की उत्पत्ति में. १३. तैथ से 'थ' की उत्पत्ति में.
१४. मेम् से 'म' की उत्पत्ति में. १५. दालेथ से 'ध' की उत्पत्ति में. १६. मेम् से 'म' की उत्पत्ति में.
१७. दालेथ (द) से 'ध' की; हेथ् (ह) से 'घ' की; तैथ् (त) से 'थ' की; सामेख (स) से 'ष' की; फे
(फ) से 'प' की; त्साधे (स) से 'च' की; और क़ोफ् (क़) से 'ख' की.
१८. ए.सा.ब्रि; जि. १, पृ. ६०० में तथा डॉ. ई. रॉडिजर संपादित और परिवर्धित जेसेनियस के हिब्रू ग्रामर (व्याक-
रण) में इस अक्षर का नाम चेथ (च) लिखा है (पृ. १३) परंतु बंबई की छपी हुई 'हिब्रू प्राइमरी रीडर' नामक छोटी
पुस्तक में, जिसमें हिब्रू अक्षरों के नाम तथा उच्चारख अंग्रेजी और मराठी (नागरी लिपि) दोनों में दिये हैं, इसका नाम 'हेथ्'
(पृ. १) और इसका ध्वनिसूचक चिह्न 'ह' (पृ. ३) दिया है. इसीसे ग्रीक (यूनानी) अक्षर 'एटा' बना जिससे अंग्रेज़ी
का 1 (ऐच) अक्षर, जो 'ह' की ध्वनि का सूचक है, तथा इसीसे अरबी का ८ (हे), जो 'ह' का सूचक है, निकला है.
अत एव हमने इस अक्षर का नाम 'हिब्रू प्राइमरी रीडर' के अनुसार 'हेथ्' लिखा है.