प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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अवशेषों तक अभी वह नहीं पहुंच सका है. अभी तक प्राचीन शिलालेख जो मिले हैं वे
ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी से पहिले के नहीं हैं, परंतु साहित्य में प्रत्यक्ष या गौण रीति
से लेखनकला के जो हवाले मिलते हैं वे बहुत प्राचीन समय तक जाते हैं. उन सब से सिद्ध
होता है कि लेखनकला सर्वसाधारण में प्रचलित, एक पुरानी बात थी जिसमें कोई अनोखापन
न था. जितने प्रमाण मिले हैं, चाहे प्राचीन शिलालेखों के अक्षरों की शैली, और चाहे साहित्य
के उल्लेख, सभी यह दिखाते हैं कि लेखनकला अपनी प्रौढ़ावस्था में थी. उसके आरम्भिक विकास के
समय का पता नहीं चलता. ऐसी दशा में यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि ब्राह्मी लिपि का
आविष्कार कैसे हुआ और इस परिपक्व रूप में, कि जिसमें ही हम उसे पाते हैं, वह किन किन परिव-
र्तनों के बाद पहुंची. मिसर आदि में जैसे भावों के संकेतरूप चित्र हुए और वे शब्दों के संकेत हो
कर उनसे अक्षरों के संकेत बने, इस तरह यहां भी किसी चित्रलिपि से ब्राह्मी लिपि बनी, या प्रारम्भ
से ध्वनि के ही सूचक चिन्ह बना लिये गये, यह कुछ निश्चय के साथ नहीं कहा जा सकता. निश्चय
के साथ इतना ही कहा जा सकता है कि इस विषय के प्रमाण जहां तक मिलते हैं वहां तक ब्राह्मी
लिपि अपनी प्रौढ़ अवस्था में और पूर्ण व्यवहार में आती हुई मिलती है और उसका किसी बाहरी
स्रोत और प्रभाव से निकलना सिद्ध नहीं होता.
आर. शाम शास्त्री ने 'देवनागरी लिपि की उत्पत्ति के विषय का सिद्धांत' नामक एक विस्तृत
लेख १ में यह सिद्ध करने का यत्न किया है कि देवताओं की मूर्तियां बनने के पूर्व उनकी उपासना सां-
केतिक चित्रों द्वारा होती थी जो कई त्रिकोण तथा चक्रों आदि से बने हुए यंत्र के, जो 'देवनगर' कह-
लाता था, मध्य में लिखे जाते थे. देवनगर के मध्य लिखे जाने वाले अनेक प्रकार के सांकेतिक चिन्ह
कालांतर में उन उन नामों के पहिले अक्षर माने जाने लगे और देवनगर के मध्य उनका स्थान होने से
उनका नाम 'देवनागरी' हुआ. वह लेख बड़ी गवेषणा के साथ लिखा गया है और युक्तियुक्त अवश्य
है, परंतु जब तक यह सिद्ध न हो कि जिन तांत्रिक पुस्तकों से अवतरण उद्धृत किये गये हैं वे
वैदिक साहित्य के समय के पहिले के, या कम से कम मौर्यकाल से पहिले के, हैं, तब तक हम उनका
मत स्वीकार नहीं कर सकते.
बाबू जगन्मोहनवर्मा ने एक लंबा चौड़ा लेख २ लिख कर यह बतलाने का यत्न किया है कि
'वैदिक चित्रलिपि या उससे निकली हुई सांकेतिक लिपि से ब्राह्मी लिपि का विकास हुआ', परन्तु उस
लेख में कल्पित वैदिक चित्रलिपि के अनेक मनमाने चित्र अनुमान कर उनसे भिन्न अक्षरों के विकास
की जो कल्पना की गई है उसमें एक भी अक्षर की उत्पत्ति के लिये कोई भी प्राचीन लिखित प्रमाण
नहीं दिया जा सका. ऐसी दशा में उनकी यह कल्पना रोचक होने पर भी प्रमाणरहित होने से
स्वीकार नहीं की जा सकती. बाबू जगन्मोहनवर्मा ने दूसरी बात यह ३ भी निकाली है कि 'ट,'
'ठ,' 'ड,' 'ढ' और 'ण' ये पांच मूर्धन्य वर्ण आर्यों के नहीं थे. वैदिक काल के आरंभ में अनार्यों
की भाषा में मूर्धन्य वर्णों का प्रयोग जब आर्यों ने देखा तब वे उनके कानों को बड़े मनोहर लगे,
अतएव उन्होंने उन्हें अपनी भाषा में ले लिया.'
इसके प्रमाण में लिखा है कि 'पारसी आर्यों की वर्णमाला में मूर्धन्य वर्णों का सर्वथा
अभाव है और धातुपाठ में थोड़े से धातुओं को छोड़ कर शेष कोई धातु ऐसा नहीं जिसके आदि में
मूर्धन्यवर्ण हो', परंतु पारसी आर्यों के यहां केवल मूर्धन्यवर्णों का ही अभाव है यही नहीं किंतु उन
की वर्णमाला में 'छ,' 'झ' और 'ल' वर्ण भी नहीं हैं और वैदिक या संस्कृत साहित्य में 'ञ' से
प्रारंभ होने वाला कोई धातु या शब्द भी नहीं है, तो क्या 'छ,' 'झ', 'ल' और 'ञ' वर्ण
१. इं. ऐं; जि. ३५, पृ. २५३-६७; २७०-६०; ३११-२४. २. सरस्वती; ई. स. १९१३ से १९१५ तक कई जगह.
३. सरस्वती; ई. स. १९१५, पृ. ३७०-७१.