प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 66, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्राचीन लिपियों का पढ़ा जाना. ३७
ही अंतर पाया जाता है जितना कि इस समय छपी हुई नागरी की पुस्तकों तथा राजपूताने के अधिकतर
रजवाड़ों के मामूली पढ़े हुए अहल्कारों की लिखावटों में.
ई. स. की तीसरी शताब्दी के आस पास तक इस लिपि का कुछ प्रचार पंजाब में बना
रहा, जिसके बाद यह इस देश में से सदा के लिये अस्त हो गई और इसका स्थान ब्राह्मी ने ले लिया,
तो भी हिंदुकुश पर्वत से उत्तर के देशों तथा चीनी तुर्किस्तान आदि में, जहां बौद्ध धर्म और भारतीय
सभ्यता दृढ़ हो रही थी, कई शताब्दी पीछे तक भी इस लिपि का प्रचार बना रहा. प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता
डॉ. सर ऑरल स्टाइन ने चीनी तुर्किस्तान आदि प्रदेशों से असाधारण श्रम कर जो प्राचीन वस्तुएं एक-
त्रित की हैं उनमें इस लिपि में लिखे हुए पुस्तक और लकड़ी की लिखित तख्तियां आदि बहुमूल्य
सामग्री भी है.
४-प्राचीन लिपियों का पढ़ा जाना.
भारतवर्ष के विद्वान् ई. स. की १४ वीं शताब्दी के पहिले ही अपने देश की प्राचीन लिपि
ब्राह्मी तथा उससे निकली हुई ई. स. की छठी शताब्दी तक की लिपियों का पढ़ना भूल गये थे, परंतु
पिछली अर्थात् ७ वीं शताब्दी से इधर की लिपियां, संस्कृत और प्राकृत के विद्वान्, जिनको प्राचीन
हस्तलिखित पुस्तकों के पढ़ने का अभ्यास था, यत्न करने से पढ़ सकते थे. ई. स. १३५६ में देहली
के सुल्तान फ़ीरोज़शाह तुग़लक़ ने बड़े उत्साह के साथ टोपरा¹ तथा मेरठ से अशोक के लेखों वाले
दो विशाल स्तंभ उठवा कर असाधारण श्रम² से देहली में लाकर एक (सवाल्क स्तंभ) को फ़ीरोज़-
शाह के कोटले में और दूसरे को 'कुश्क शिकार' (शिकार का महल) के पास³ खड़ा करवाया. उस
ने उन स्तंभों पर के लेखों का आशय जानने के लिये बहुत से विद्वानों को एकत्र किया परंतु किसी से
वे पढ़े न गये⁴. यह भी प्रसिद्धि है कि बादशाह अकबर को भी उक्त लेखों का आशय जानने की बहुत
कुछ जिज्ञासा रही परंतु उस समय एक भी विद्वान ऐसा न था कि उनको पढ़ कर बादशाह की जि-
ज्ञासा पूर्ण कर सकता.
हिंदुस्तान में अंगरेज़ों का राज्य होने पर फिर विद्या के सूर्य का उदय हुआ और प्राचीन
वस्तुओं का मान होने लगा. तारीख़ १५ जनवरी सन् १७८४ ई. को सर विलियम जोन्स की प्रेरणा
से एशिया खंड के प्राचीन शिलालेख, ताम्रपत्र, सिक्के, इतिहास, भूगोल, भिन्न भिन्न शास्त्र, रीत रवाज़,
शिल्प आदि विद्या से संबंध रखने वाले सभी विषयों का शोध करने के निमित्त 'एशियाटिक सोसा-
चना करते समय उक्त कथन का विरोध किया है (इ. पँ; जि. ४२, पृ. १६६). यह निश्चित है कि ब्राह्मणों ने खरोष्ठी लिपि को
अपने धर्मग्रंथों में कभी स्थान नहीं दिया क्योंकि वह उनके लिखे जाने के योग्य ही न थी और जितने लेख अब तक उस
लिपि के मिले हैं उनमें एक भी ऐसा नहीं है जो ब्राह्मणों के धर्म से संबंध रखता हो.
१. पंजाब के ज़िले अंबाला में (सवाल्क में).
२. टोपरा का (सवाल्क) स्तंभ किस प्रकार महान् परिश्रम तथा उत्साह के साथ देहली में लाया गया इसका वृत्तान्त
समकालीन लेखक शम्स-इ-शीराज ने तारीख़-इ-फ़ीरोज़शाही में किया है (इ; हि. इं; जि. ३, पृ. ३५०-५३).
३. यह स्तंभ देहली में 'रिज' नामक पहाड़ी पर ग़दर की यादगार के स्थान के पास है.
४. क; आ. स. रि; जि. १, पृ. १६३.