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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 318 में से

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पृष्ठ 65

३६ प्राचीनलिपिमाला.
काक्षरों का प्रयोग विरलही होता था, इसमें लिखे हुए मिले हैं, परंतु यह लिपि संस्कृत ग्रंथों १ के लिखने
के योग्य नहीं थी. शुद्धता और संपूर्णता के विचार से देखा जावे तो इसमें और ब्राह्मी में उतना
१. कलकत्ता हाई कोर्ट के भूतपूर्व जज एफ. ई. पार्जिटर नामक विद्वान् ने 'दी पुराण टेक्स्ट ऑफ़ दी डाइनेस्टीज़
ऑफ़ दी कलि एज' (कलियुग के राजवंशों के संबंध के पुराणों के मूल पाठ) नामक पुस्तक में यह बतलाने का यत्न किया
है कि पुराणों के ये पाठ मूल में खरोष्ठी लिपि में और पीछे से उसपर से ब्राह्मी में लिखे गये होंगे. इसके प्रमाण में लिखा
है कि 'विष्णुपुराण में बहुधा अशोकवर्धन नाम मिलता है परंतु उसकी एक हस्तलिखित प्रति (k Vs) में अयोशोक-
वर्धन पाठ है. यहां पर लेखक ने 'शो' को गलती से 'यो' पढ़ कर वैसा ही लिखा. बाद उसने (या किसी दूसरे ने) यह
गलती देखी और उस प्रति में 'शो' लिखा या बढ़ा दिया, परंतु 'यो' को काटा नहीं और अशुद्ध नाम अयोशोक बना
रहा और जब वह प्रति (k Vs) लिखी गई तब तक वैसी ही नकल होती रही. हिंदुस्तान की केवल खरोष्ठी लिपि में ही
'यो' और 'शो' अक्सर एक से लिखे जाते हैं अत एव यह प्रायः निश्चित ही है कि विष्णुपुराण में यह अंश अवश्य मूल
खरोष्ठी हस्तलिखित प्रति से लिया गया होगा' (पृ. ८४). इसी तरह विष्णुपुराण की एक प्रति (cy Vs) में 'कोशल'
के स्थान पर 'कोयल' और वायुपुराण की एक प्रति (e Va) में 'शालिशूक' के स्थान पर 'शालियूक' पाठ मिला. इन
तीनों स्थानों में 'श' के स्थान पर 'य' लिखा है. इसी तरह मत्स्यपुराण की एक हस्तलिखित प्रति (dj Mt) में 'काशेयाः'
के स्थान पर 'कालेयाः' और वायुपुराण में कहीं कहीं 'शृंगभृत्य' के स्थान पर 'शृंगकृत्य' पाठ मिला (पृ. ८५). इन थोड़े से
लेखक दोषों पर से मि. पार्जिटर ने यह अनुमान कर लिया कि लेखक ने 'श' को 'य' वा 'ल' और 'भ' को 'क' पढ़ लिया
और यह अशुद्धता खरोष्ठी से ब्राह्मी में नकल करने से ही हुई होगी. परंतु खरोष्ठी लिपि के जितने लेख अब तक मिले हैं
उन सब में, सिवाय बर्डक के पात्र पर के लेख के, 'श' और 'य' में स्पष्ट भेद पाया जाता है (देखो लिपिपत्र ६५-७०).
'श' और 'ल' में, और 'भ' तथा 'क' में भ्रम होने की संभावना बहुत ही कम है क्योंकि उनमें स्पष्ट अंतर है. खरोष्ठी लिपि
में वास्तव में भ्रम उत्पन्न कराने वाले अक्षरों में से 'ण' और 'न' में विशेष भेद बहुधा नहीं मिलता, तथा 'त,' 'न' और 'र'
इन तीन अक्षरों में परस्पर भेद मालूम करना मामूली लेखक के लिये कठिन है. इसी तरह स्वरों तथा उनकी मात्राओं में
ह्रस्व दीर्घ का भेद न होने तथा विसर्ग और हलंत व्यंजनों का अभाव होने से दीर्घ स्वरों तथा उनकी मात्राओं एवं विसर्ग, हलंत
व्यंजन तथा संयुक्त व्यंजनों की शुद्ध नकल होना सर्वथा असंभव है. इस लिये यदि पुराणों के ये अंश खरोष्ठी से ब्राह्मी में
नकल किये गये होते तो उनमें 'ऋ', 'ॠ', 'ऌ', 'ॡ' और 'औ' अक्षर तथा उनकी मात्राओं का तथा विसर्ग और हलंत
व्यंजनों का सर्वथा अभाव होता और 'न' तथा 'ण', एवं 'त', 'न' और 'र' अक्षरों वाले शब्दों में हज़ारहां गलतियां मिलतीं
क्योंकि पुस्तकों की नकल करने वाले संस्कृत के विद्वान् नहीं किंतु मामूली पढ़े हुए लोग होते हैं और जैसा वे मूल प्रति में
देखते हैं वैसा ही लिख डालते हैं (मक्षिकास्थाने मक्षिका). अत एव पुराणों के हस्तलिखित राजवंशवर्णन के अंश जिस
स्थिति में हमें इस समय मिलते हैं उस स्थिति में सर्वथा न मिलते किंतु कातंत्र व्याकरण के प्रारंभ के संधियों तक के पांच
पादों के सूत्रों की जो दशा हम राजपूताने की 'सीधो' * की पांच पाटियों में देखते हैं उससे भी बुरी दशा में
मिलते, परंतु ऐसा न होना यही बतलाता है कि वे प्रारंभ से ही ब्राह्मी लिपि में लिखे गये थे और उनकी नक़्लें
ब्राह्मी तथा उससे निकली हुई भिन्न भिन्न लिपियों में समयानुसार होती रहीं. मि. पार्जिटर ने खरोष्ठी से ब्राह्मी में नक़्ल
करने में जहां हज़ारहां अशुद्धियां होने का संभव था उन अक्षरों का तो तनिक भी विचार न किया, ऐसी दशा में हम उक्त
कथन को किसी तरह आदरणीय नहीं मान सकते. प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. स्टेन कॉनो ने भी उक्त पुस्तक की समालो-

  • राजपूताने में विद्यार्थियों को पहिले कातंत्र व्याकरण पढ़ाया जाता था और उस प्राचीन परिपाटी के अनुसार अब
    तक भी पुराने ढंग की पाठशालाओं में उसके प्रारंभ के संधि विषयक पांच पाद रटाये जाते हैं. कातंत्र व्याकरण के प्रथम
    सूत्र का पहिला शब्द 'सिद्धो' (सिद्धो वर्णसमाम्नायः) होने से उनको 'सीधो' कहते हैं और उक्त पांच पादों को 'सीधो
    की पांच पाटी' कहते हैं. संस्कृत न जानने वालों के द्वारा उनकी नक़लें तथा पढ़ाई होते होते इस समय उनकी कैसी
    दुर्दशा होगई है और मूल में तथा उनमें कितना अंतर पड़ गया है, यह बतलाने के लिये उनके प्रारंभ के थोड़े से सूत्र नीचे
    उद्धृत किये जाते हैं—
    कातंत्र—सिद्धो वर्णसमाम्नायः । तत्र चतुर्दशादौ स्वराः । दश समानाः । तेषां द्वौ द्वावन्योन्यस्य सवर्णौ ।
    सीधो—सीधो बरना समामुनाया । चउचुत्रउदासा दउसंँवारा । दसे समाना । तेसुदुव्वावरणो नसीसवरणो ।
    कातंत्र—पूर्वो ह्रस्वः । परो दीर्घः । स्वरोऽवर्णवज्र्जो नामी । एकारादीनि सन्ध्यक्षराणि । कादीनि व्यञ्जनानि ।
    सीधो—पूरबो हंसवा । पारो दीरघा । सारो बरणा विगान्जो नामी । ईकरादिणी संधकराणी । कादीनावू विणज्यौनामी ।
    कातंत्र—ते वर्गाः पञ्च पञ्च ।
    सीधो—ते विरघा पंचा पंचा ।