प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति. २४
१-अलेफ् के पहिले रूप का रुख बदलने से दूसरा रूप बना. दूसरे की खड़ी लकीर को दा-
हिनी तरफ़ हटाने से तीसरा बना. उसपर से चौथा रूप बन गया.
२-हेथ् के पहिले रूप की खड़ी लकीरों को समान लंबाई की बनाने और तीनों आड़ी लकीरों
को सीधी करने से दूसरा रूप बना. इस प्रकार सीधे बने हुए खड़े अक्षर को आड़ा करने से
तीसरा रूप बना, जिसके ऊपर के भाग की आड़ी लकीरों को मिटा देने से चौथा रूप बना. फिर
बाईं ओर की पहिली खड़ी लकीर को लंबी कर देने से पांचवां रूप बन गया.
३-योध् की सब तिरछी लकीरों को सीधी करने से दूसरा रूप बना, जिसका रुख बद-
लने से तीसरा रूप बना. इस खड़े अक्षर को आड़ा करने से चौथा रूप बना. उसकी नीचे लट-
कती हुई लकीर को ऊपर की तरफ़ फिरा देने से पांचवां रूप बना, जिसकी मध्य की खड़ी लकीर
को लंबी करने से छठा रूप बना और उसपर से सातवां.
४-मेम् के नीचे वाली बाईं ओर मुड़ी हुई लकीर को ऊपर की तरफ़ बढ़ा कर ग्रंथि बना देने से
दूसरा रूप बना. फिर ऊपर के बाईं तरफ़ के कोण वाले हिस्सों को मिटा कर उनकी जगह अर्धवृत्त
सी रेखा बना देने से तीसरा रूप बना. उसके ग्रंथि वाले भाग को बढ़ा कर ऊपर निकालने से
चौथा रूप बन गया.
बूलर के माने हुए अक्षरों के ये फेरफार ऐसे हैं कि उनके अनुसार अक्षरों का तोड़ मरोड़
करने से केवल फिनिशियन् से ब्राह्मी की उत्पत्ति बतलाई जा सकती है ऐसा ही नहीं, किंतु दुनिया भर
की चाहे जिस लिपि से किसी भी लिपि की उत्पत्ति आसानी से सिद्ध हो सकती है. उदाहरण
के लिये तक्षशिला के अरमइक लिपि के लेख के अक्षरों से तथा वर्तमान अंग्रेज़ी टाइप (छापे के अक्षरों)
से ब्राह्मी लिपि के अक्षर कितनी आसानी से बनाये जा सकते हैं यह नीचे बतलाया जाता है-
तक्षशिला के लेख से—
१-अलेफ् से 'अ'- 𐡀 X 𑀅
२-बेथ् से 'ब'- د ⊃ 𑀩
३-गिमेल् से 'ग'- 人 𑀕
४-दालेथ् से 'द'- ד ל 𑀤
५-हे से 'ह'- ת v 𑀳 ᒐ
६-वाव् से 'व'- ˥ ⌋ 𑀯
इन ६ अक्षरों के रूपांतरों में प्रत्येक का पहिला रूप तक्षशिला के लेख से लिया गया है
और अंतिम रूप अशोक के लेखों के अनुसार है. बीच के परिवर्तन बूलर के माने हुए नियमों के अनु-
सार अनुमान किये गये हैं, जिनका ब्यौरा इस तरह है—
१-अलेफ् के पहिले रूप के ऊपर के तथा नीचे के कोनों को कुछ चौड़े करने से दूसरा रूप बना.
उसकी दाहिनी तरफ की दोनों तिरछी लकीरों को सीधी करने से तीसरा रूप बन गया.
२-बेथ् के पहिले रूप के ऊपर की छोटी सी खड़ी लकीर को मिटाने से दूसरा रूप बना. उस-
की बाईं तरफ एक खड़ी लकीर खींचने से तीसरा रूप बन गया.
३-गिमेल् 'ग' से मिलता ही है.
४-दालेथ् के पहिले रूप के नीचे की खड़ी लकीर के साथ बाईं तरफ एक आड़ी लकीर जोड़ने
से दूसरा रूप बना और उस नई जुड़ी हुई लकीर के बाएं किनारे पर ज़रासी छोटी खड़ी लकीर जोड़ने
से तीसरा रूप बन गया.
५-हे के पहिले रूप को उलट देने से दूसरा रूप बना; उसका रुख पलटने से तीसरा रूप बन गया
जो अशोक के सारनाथ के लेख के 'ह' से मिलता हुआ है और चौथा रूप गिरनार के लेख से है.