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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 318 में से

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पृष्ठ 62

खरोष्ठी लिपि की उत्पत्ति. ३३
कुशनवंशी १ राजाओं के समय के हैं इनमें से कितने एक में राजाओं के नाम मिलते हैं,
और दूसरों में साधारण पुरुषों २ के ही नाम हैं, राजाओं के नहीं. ये बौद्ध स्तूपों में रक्खे हुए
पत्थर आदि के पात्रों और सोने, चांदी या तांबे के पत्रों पर; अथवा चटानों और शिलाओं
या मूर्त्तियों के आसनों पर खुदे हुए मिले हैं. इनमें से अधिकतर गांधारदेश से ही मिले हैं,
और वहां भी विशेषकर तक्षशिला (शाहढेरी, पंजाब के ज़िले रावलपिंडी में) और चारसड्डा
(पुष्कलावती) से. पंजाब के बाहर अफ़गानिस्तान में वर्डक (ज़िले वर्डक में) तथा हिड्डा (जलालाबाद
से ५ मील दक्षिण) आदि में, और मथुरा में, मिले हैं, अन्यत्र ३ नहीं.
१. कुशनवंशी राजाओं के समय के खरोष्ठी लिपि के लेख अधिक संख्या में मिले हैं. राजा कनिष्क के समय का
एक शिलालेख (सं. ११ का) ज़ेड़ा (ज़िले यूसफ़ज़ई में) से (ज. ए; ई. स. १८६०, भाग १, पृ. १३६); एक ताम्रलेख
(सं. ११ का) सुएविहार (पंजाब के बहावलपुर राज्य में) से (इं. ऐं; जि. १०, पृ. ३२६; और जि. ११, पृ. १२८); एक लेख
माणिक्यिाल से (क; आ. स. रि; जि ५, पृ. १६० के सामने का सेट); और पेशावर के कनिष्कविहार के स्तूप से मिले
हुए डिब्बे पर खुदे हुए तीन छोटे छोटे लेख (आ. स; ई. स. १९०६-१०, पृ. १३६-३८) मिले हैं. आरा नामक
नाले (बागनीलाब से २ मील पर-पंजाब में) के अंदर के एक पुराने कुए में से वाक्षेष्प के पुत्र कनिष्क के समय का एक
शिलालेख (सं. ४१ का) मिला है (इं. ऐं; जि. ३७, पृ. ५८). हुविष्क के समय का एक लेख (सं. ५१ का) वर्डक (अफ़ग़ा-
निस्तान में) के स्तूप में से मिले हुए एक पीतल के पात्र पर खुदा है (ए. इं; जि. ११, पृ २१०-११). पंजतार (ज़िले यूसफ़ज़ई
में) से एक शिलालेख (सं. १२२ का) किसी गुशन (कुशन) वंशी राजा के समय का (क; आ. स. रि; जि. ५, पृ. १६१,
और सेट १६, संख्या ४), तथा महाराज राजातिराज देवपुत्र खुशन (कुशन. उक्त नाम के राजा या कुशन वंशी किसी राजा)
का एक लेख (सं १३६ का) रौप्यपत्र पर खुदा हुआ तक्षशिला से मिला है (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९१४, पृ. ९७२-७६.
और ई. स. १९१५, पृ. १६२ के सामने का सेट).
२. हिड्डा के स्तूप से मिले हुए मिट्टी के पात्र पर (सं. २८ का) लेख (ज. रॉ. ए. सो; ई स. १९१५, पृ. ६२, और उस
के सामने का सेट); शकदरी (पंजाब के ज़िले अटक में) से मिला हुआ (सं. ४० का) शिलालेख (इं. ऐं; जि. ३७, पृ. ६६);
ओहिंद (यूसफ़ज़ई ज़िले में) का (सं. ६१ का) लेख (क; आ. स. रि; जि. ५ पृ. ५८; सेट १६, संख्या २.); फतहजंग
(ज़िले अटक में) का (सं. ६८ का) शिलालेख (ज. ए; ई. स १८६०, भाग १, पृ. १३०); सुचइ (ज़िले यूसफ़ज़ई में) से
मिला हुआ (सं. ८१) का शिलालेख (इं. ऐं; जि. ३७, पृ. ६४); बोज़ पहाड़ का (सं. १०२ का) लेख (ज. ए; ई. स. १८६४,
भाग २, पृ. ५१४); पाजा (ज़िले यूसफ़ज़ई में) का (सं. १११ का) शिला लेख (इं. ऐं; जि. ३७, पृ. ६५); कलदरां नदी
(पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश में दर्गाई के पास) में से मिला हुआ (सं. ११३) का शिलालेख (इं. ऐं; जि. ३७, पृ. ६६);
स्कारहढेरी (चारसड्डा अर्थात् हश्तनगर से ८ मील उत्तर में) से मिली हुई हारिती की मूर्त्ति के आसनपर खुदा हुआ (सं.
१७६ का) लेख (आ. स; ई. स. १९०३-४; पृ. २५५; सेट ७०, संख्या ६); देवाई (ज़िले यूसफ़ज़ई में) का (सं २०० का) शि-
लालेख (ज. ए; ई. स. १८६४. भाग २, पृ. ५१०); लोरियन तंगाइ (ज़िले स्वात में) से मिली हुई बुद्ध की मूर्त्ति के आसन
पर खुदा हुआ (सं. ३१८ का) लेख (आ. स; ई. स. १९०३-४; पृ. २५१; सेट ७०, संख्या ४); हश्तनगर (पेशावर ज़िले की
चारसड्डा तहसील में) से मिली हुई बुद्ध की (अपने शिष्यों सहित) मूर्त्ति के आसन पर खुदा हुआ (सं. ३८४ का) लेख
(ए. इं; जि. १२, पृ. २०२). ये सब साधारण पुरुषों के संवत् वाले लेख हैं. इन लेखों में जो संवत् लिखा है वह कौन सा
है यह अभी तक पूर्णतया निश्चित नहीं हुआ, परंतु हमारी संमति में उनमें से अधिकतर लेखों का संवत् शक संवत् ही होना
चाहिये. बिना संवत् वाले लेख ये हैं—
तक्षशिला के गंगू नामक स्तूप से मिला हुआ सुवर्णपत्र पर खुदा हुआ लेख (क; आ. स. रि; जि. २, पृ. १३०,
और सेट ५६); माणिक्यिाल के