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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 318 में से

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पृष्ठ 64

खरोष्ठी लिपि की उत्पत्ति. ३५
में तक्षशिला नगर १ से भी मिल चुका है. मिसर से हखामनियों के राजत्वकाल के उसी लिपि के बहुतेरे
पँपायरस् २ मिले हैं और एशिया माइनर से मिले हुए ईरानी क्षत्रपों (सत्रपों) के कई सिक्कों ३ पर
उसी लिपि के लेख मिलते हैं, जिनसे पाया जाता है कि हखामनी वंश के ईरानी बादशाहों की राज-
कीय लिपि और भाषा अरमइक् ही होनी चाहिये. व्यापार के लिये भी उसका उपयोग दूर दूर
तक होना पाया जाता है ४.
हिंदुस्तान का ईरान के साथ प्राचीन काल से संबंध रहा और हखामनी वंश के बादशाह सा-
इरस (ई. स. पूर्व ५५८-५३०) ने पूर्व में बढ़ कर गांधारदेश विजय किया और ई. स. पूर्व ३१६ के
कुछ ही बाद दारा (प्रथम) ने सिंधु तक का हिंदुस्तान का प्रदेश अपने अधीन किया जो ई. स. पूर्व
३३१ तक, जब कि यूनान के बादशाह सिकंदर ने गॉगमेला ५ की लड़ाई में ईरान के बादशाह दारा
(तीसरे) को परास्त कर ईरानी राज्य पर नाम मात्र के लिये अपना अधिकार जमाया, किसी न
किसी प्रकार बना रहा. अत एव संभव है कि ईरानियों के राजत्वकाल में उनके अधीन के हिंदुस्तान
के इलाकों में उनकी राजकीय लिपि अरमइक् का प्रवेश हुआ हो और उसीसे खरोष्ठी लिपि का उद्भव
हुआ हो, जैसे कि मुसलमानों के राज्य समय फ़ारसी लिपि का, जो उनकी राजकीय लिपि थी,
इस देश में प्रवेश हुआ और उसमें कुछ वर्ण बढ़ाने से उर्दू लिपि बनी.
अरमइक् लिपि में केवल २२ अक्षर होने तथा स्वरों की अपूर्णता और उनमें ह्रस्व दीर्घ का भेद न
होने एवं स्वरों की मात्राओं का सर्वथा अभाव होने से वह यहां की भाषा के लिये सर्वथा उपयुक्त न थी तो
भी राजकीय लिपि होने के कारण यहां वालों में से किसी ने ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी के आसपास
उसके अक्षरों की संख्या बढ़ा कर, कितने एक को आवश्यकता के अनुसार बदल तथा स्वरों की मात्राओं
की योजना कर उसपर से मामूली पढ़े लिखे लोगों, व्यापारियों तथा अहल्कारों के लिये काम चलाऊ
खरोष्ठी लिपि बना दी हो. संभव है कि इसका निर्माता चीन वालों के लेखानुसार खरोष्ठ नामक आचार्य ६
(ब्राह्मण) हो, जिसके नाम पर से इस लिपि का नाम खरोष्ठी हुआ, और यह भी संभव है कि तक्ष-
शिला जैसे गांधार के किसी प्राचीन विद्यापीठ में इसका प्रादुर्भाव हुआ हो.
जितने लेख अब तक इस लिपि के मिले ७ हैं उनसे पाया जाता है कि इसमें स्वरों तथा उनकी
मात्राओं में ह्रस्व दीर्घ का भेद न था. संयुक्ताक्षर केवल थोड़े ही मिलते हैं इतना ही नहीं, किंतु उनमें
से कितने एक में संयुक्त व्यंजनों के अलग अलग रूप स्पष्ट नहीं पाये जाते परंतु एक विलक्षण
ही रूप मिलता है जिससे कितने एक संयुक्ताक्षरों का पढ़ना अभी तक संशययुक्त ही है. बौद्धों
के प्राकृत पुस्तक ८, जिनमें स्वरों के ह्रस्व दीर्घ का विशेष भेद नहीं रहता था और जिनमें संयु-

१. ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६१५, पृ. ३४० के सामने का प्लेट.
२. मिसर से ई. स. पूर्व ५०० से लगा कर ई. स. पूर्व २०० तक के अरमइक् लिपि के पँपायरस् मिले हैं.
३. ई. ऐं; जि. २४, पृ. २८७. ४. ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६१५; पृ. ३४६-४७.
५. गॉगमेला (अरबैला) तुर्की के एशियाई राज्य का एक नगर, जो मोसल और बगदाद के बीच में है.
६. खरोष्ठ के लिये देखो ऊपर, पृ. १८.
७. खरोष्ठी लिपि के शिलालेखादि के लिये देखो ऊपर पृ. ३२, टि. ७-६; और पृ. ३३, टि. १, २.
८. हिड्डा के स्तूप (संख्या १३) से मिले हुए खरोष्ठी लेखवाले मिट्टी के पात्र के भीतर खरोष्ठी लिपि में लिखे हुए
कितने एक भोजपत्र एक पत्थर पर लिपटे हुए मिले थे परंतु बहुत प्राचीन होने के कारण वे बच न सके (ऐरिआना ॲंटिका, पृ.
५६-६०, ८४, ६४, १११, ११६). ये सब से पुराने हस्तलिखित भोजपत्र थे. ई. स. की तीसरी शताब्दी के आस पास की 'धम्मपद'
की एक प्रति खोतान से मिली है जिसमें स्वरों की मात्राओं में कुछ सुधार किया हुआ पाया जाता है (भू. इं. पे; पृ. १८-१६).