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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 318 में से

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पृष्ठ 72

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ब्राह्मी लिपि. ४३

के लेखों में इसका प्रचार ई. स. की १६ वीं शताब्दी के पीछे तक किसी प्रकार मिल आता है. दक्षिण
में इसको 'नंदिनागरी' कहते हैं. प्राचीन नागरी की पूर्वी शाखा से बंगला लिपि निकली, और
नागरी से ही कैथी, महाजनी, राजस्थानी (राजपूताने की) और गुजराती लिपियां निकली हैं.
४. शारदा—इस का प्रचार भारतवर्ष के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों अर्थात् कश्मीर और पंजाब में
रहा. ई. स. की ८ वीं शताब्दी के राजा मेरुवर्मा के लेखों से (देखो लिपिपत्र २२ वां) पाया जाता है
कि उस समय तक तो पंजाब में भी कुटिल लिपि का प्रचार था, जिसके पीछे उसी लिपि से शारदा
लिपि बनी. उसके जितने लेख अब तक मिले हैं उनमें सब से पुराना लेख सराहां (चंबा राज्य में) की
प्रशस्ति.है, जो ई. स. की दसवीं शताब्दी की अनुमान की जा सकती है. इसी लिपि से वर्तमान कश्मीरी
और टाकरी लिपियां निकली हैं और पंजाबी अर्थात् गुरुमुखी के अधिकतर अक्षर भी इसीसे निकले हैं.
५. बंगला—यह लिपि नागरी की पूर्वी शाखा से ई. स. की १० वीं शताब्दी के आस पास निकली
है. बदाल के स्तंभ पर खुदे हुए नारायणपाल के समय के लेख में, जो ई. स. की १० वीं शताब्दी का
है, बंगला का झुकाव दिखाई देता है. इसीसे नेपाल की ११ वीं शताब्दी के बाद की लिपि, तथा
वर्तमान बंगला, मैथिल और उड़िया लिपियां निकली हैं.
दक्षिणी शैली की लिपियां प्राचीन ब्राह्मी लिपि के उस परिवर्तित रूप से निकली हैं जो क्षत्रप
और आंध्रवंशी राजाओं के समय के लेखों में, तथा उनसे कुछ पीछे के दक्षिण की नासिक, कार्ली
आदि गुफाओं के लेखों में पाया जाता है.
दक्षिणी शैली की लिपियां नीचे लिखी हुई हैं—
१. पश्चिमी—यह लिपि काठियावाड़, गुजरात, नासिक, खानदेश और सतारा ज़िलों में, हैदरा-
बाद राज्य के कुछ अंशों में, कौंकण में तथा कुछ कुछ मासोर राज्य में, ई. स. की पांचवीं शताब्दी के
आस पास से नवीं शताब्दी के आस पास तक मिलती है. ई. स. की पांचवीं शताब्दी के आस पास
इसका कुछ कुछ प्रचार राजपूताना तथा मध्य भारत में भी पाया जाता है. इसपर उत्तरी लिपि का
बहुत कुछ प्रभाव पड़ा है. भारतवर्ष के पश्चिमी विभाग में इसका अधिकतर प्रचार होने के कारण
इसका 'पश्चिमी' यह नाम कल्पित किया गया है.
२. मध्यदेशी—यह लिपि मध्यप्रदेश, हैदराबाद राज्य के उत्तरी विभाग, तथा बुंदेलखंड के
कुछ हिस्सों में ई. स. की पांचवीं शताब्दी से लगा कर आठवीं शताब्दी के पीछे तक मिलती है.
इस लिपि के अक्षरों के सिर चौकूंटे या संदूक की सी आकृति के होते हैं जो भीतर से बहुधा खाली,
परंतु कभी कभी भरे हुए भी, होते हैं. अक्षरों की आकृति बहुधा समकोणवाली होती है, अर्थात्
उनके बनाने में आड़ी और खड़ी रेखाएं काम में लाई गई हैं, न कि गोलाईदार. इस लिपि के ताम्र-
पत्र ही विशेष मिले हैं, शिलालेख बहुत कम.
३. तेलुगु-कनडी—यह लिपि बंबई इहाते के दक्षिणी विभाग अर्थात् दक्षिणी मराठा प्रदेश,
शोलापुर, बीजापुर, बेलगांव, धारवाड़ और कारवाड़ ज़िलों में, हैदराबाद राज्य के दक्षिणी हिस्सों में,
मासोर राज्य में, एवं मद्रास इहाते के उत्तर-पूर्वी विभाग अर्थात् विज़गापट्टम, गोदावरी, कृष्णा, कर्नूल,
बिलारी, अनंतपुर, कड्डुप्पा, और नेल्लोर ज़िलों में मिलती है. ई. स. की पांचवीं शताब्दी से १४ वीं
शताब्दी तक इसके कई रूपांतर होते होते इसीसे वर्तमान तेलुगु और कनडी लिपियां बनीं. इसीसे
इसका नाम तेलुगु-कनडी रक्खा गया है.
४. ग्रंथलिपि—यह लिपि मद्रास इहाते के उत्तरी व दक्षिणी आर्कट, सलेम्, ट्रिचिनापल्ली,
मदुरा और तिन्नेवेल्लि ज़िलों में मिलती है. ई. स. की सातवीं शताब्दी से १५ वीं शताब्दी तक इसके
कई रूपांतर होते होते इससे वर्त्तमान ग्रंथलिपि बनी और उससे वर्तमान मलयालम् और तुलु लिपियां