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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 318 में से

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पृष्ठ 71

४२ प्राचीनलिपिमाला
पिप्रावा, बर्ली और अशोक के लेखों की लिपि से बहुत कुछ भिन्नता पाई जाती है जिससे
अनुमान होता है कि भट्टिप्रोलु के लेखों की लिपि अशोक के लेखों की लिपि से नहीं निकली
किंतु उस प्राचीन ब्राह्मी से निकली होगी जिससे पिप्रावा, बर्ली और अशोक के लेखों की लिपि
निकली है. यह भी संभव है कि भट्टिप्रोलु के स्तूप की लिपि ललितविस्तर की 'द्राविड़ लिपि'
हो क्योंकि वे लेख द्रविड़ देश के कृष्णा जिले में ही मिले हैं.
अशोक से पूर्व के जैन 'समवायांग सूत्र' में तथा पिछले बने हुए 'ललितविस्तर' में ब्राह्मी
के अतिरिक्त और बहुतसी लिपियों के नाम मिलते हैं, परंतु उनका कोई लेख अब तक नहीं
मिला जिसका कारण शायद यह हो कि प्राचीन काल में ही वे सब अस्त हो गई हों और उन-
का स्थान अशोक के समय की ब्राह्मी ने ले लिया हो जैसा कि इस समय संस्कृत ग्रंथों के
लिखने तथा छपने में भारतवर्ष के भिन्न भिन्न विभागों की भिन्न भिन्न लिपियों का स्थान बहुधा
नागरी ने ले लिया है. ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दि से पहिले की ब्राह्मी का कोई लेख अब-
तक नहीं मिला; अतएव इस पुस्तक की ब्राह्मी लिपि का प्रारंभ ई. स. पूर्व ५०० के आस
पास से ही होता है.
हस्तलिखित लिपियों में सर्वत्र ही समय के साथ और लेखकों की लेखन रुचि के अनुसार
परिवर्तन हुआ ही करता है. ब्राह्मी लिपि भी इस नियम से बाहर नहीं जा सकती. उसमें
भी समय के साथ बहुत कुछ परिवर्तन हुआ और उससे कई एक लिपियां निकलीं जिनके
अक्षर मूल अक्षरों से इतने बदल गये कि जिनको प्राचीन लिपियों का परिचय नहीं है वे
सहसा यह स्वीकार न करेंगे कि हमारे देश की नागरी, शारदा (कश्मीरी), गुरमुखी (पंजाबी),
बंगला, उड़िया, तेलुगु, कनडी, ग्रन्थ, तामिळ आदि समस्त वर्तमान लिपियां एक ही मूल लिपि
ब्राह्मी से निकली हैं. ब्राह्मी लिपि के परिवर्तनों के अनुसार हमने अपने सुभीते के लिये उसके
विभाग इस तरह किये हैं—
ई. स. पूर्व ५०० के आस पास से लगा कर ई. स. ३५० के आस पास तक की समस्त
भारतवर्ष की लिपियों की संज्ञा ब्राह्मी मानी है. इसके पीछे उसका लेखन प्रवाह दो
स्रोतों में विभक्त होता है जिनको उत्तरी और दक्षिणी शैली कहेंगे. उत्तरी शैली का प्रचार
विंध्य पर्वत से उत्तर के तथा दक्षिणी का दक्षिण के देशों में बहुधा रहा तो भी विंध्य से उत्तर
में दक्षिणी, और विंध्य से दक्षिण में उत्तरी शैली के लेख कहीं कहीं मिल ही आते हैं.
उत्तरी शैली की लिपियां ये हैं—
१. गुप्तलिपि—गुप्तवंशी राजाओं के समय के लेखों में सारे उत्तरी हिंदुस्तान में इस
लिपि का प्रचार होने से इसका नाम 'गुप्तलिपि' कल्पित किया गया है. इसका प्रचार ई. स.
की चौथी और पांचवीं शताब्दी में रहा.
२. कुटिललिपि—इसके अक्षरों तथा विशेष कर स्वरों की मात्राओं की कुटिल आकृतियों
के कारण इसका नाम कुटिल रक्खा गया. यह गुप्तलिपि से निकली और इसका प्रचार ई. स.
की छठी शताब्दी से नवीं तक रहा, और इसीसे नागरी और शारदा लिपियां निकलीं.
३. नागरी—उत्तर में इसका प्रचार ई. स. की ६ वीं शताब्दी के अंत के आस पास से
मिलता है परंतु दक्षिण में इसका प्रचार ई. स. की आठवीं शताब्दी से होना पाया जाता है क्योंकि
दक्षिण के राष्ट्रकूट (राठौड़) वंशी राजा दंतिदुर्ग के सामनगढ़ (कोल्हापुर राज्य में) से मिले हुए शक
संवत् ६७५ (ई. स. ७५४) के दानपत्र १ की लिपि नागरी ही है और दक्षिण के पिछले कई राजवंशों
१. इं. ऐं; जि. ११, पृ. ११० से ११२ के सामने के प्लेट.