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प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 318 में से

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पृष्ठ 69

४० प्राचीनलिपिममाला.
पादरी जेम्स स्टिवन्सन ने भी प्रिन्सेप की नांई इसी शोध में लग कर 'क,' 'ज,' 'प' और
'व' अक्षरों१ को पहिचाना और इन अक्षरों की सहायता से लेखों को पढ़ कर उनका अनुवाद
करने का उद्योग किया गया परंतु कुछ तो अक्षरों के पहिचानने में भूल हो जाने, कुछ वर्णमाला पूरी
ज्ञात न होने२ और कुछ उन लेखों की भाषा को संस्कृत मान कर उसी भाषा के नियमानुसार
पढ़ने से वह उद्योग निष्फल हुआ. इससे भी प्रिन्सेप को निराशा न हुई. ई. स. १८३६ में
प्रसिद्ध विद्वान् लैसन ने एक बाक्ट्रियन ग्रीक सिक्के पर इन्हीं अक्षरों में अगॅथॉक्लिस का नाम पढ़ा.
ई. स. १८३७ में मि. प्रिन्सेप ने सांची के स्तूपों से संबंध रखने वाले स्तंभों आदि पर खुदे हुए
कई एक छोटे छोटे लेखों की छापें एकत्र कर उन्हें देखा तो उनके अंत के दो अक्षर एकसे दिखाई
दिये और उनके पहिले प्रायः 'स' अक्षर पाया गया जिसको प्राकृत भाषा के संबंध कारक के
एक वचन का प्रत्यय (संस्कृत 'स्य' से) मान कर यह अनुमान किया कि ये सब लेख अलग
अलग पुरुषों के दान प्रकट करते होंगे और अंत के दोनों अक्षर, जो पढ़े नहीं जाते और जिनमें
से पहिले के साथ 'आ' की मात्रा और दूसरे के साथ अनुस्वार लगा है उनमें से पहिला अक्षर
'दा' और दूसरा 'नं' (दानं) ही होगा. इस अनुमान के अनुसार 'द' और 'न' के पहिचाने
जाने पर वर्णमाला संपूर्ण हो गई और देहली, अलाहाबाद, सांची, मथिया, रधिया, गिरनार,
धौली आदि के लेख सुगमता पूर्वक पढ़ लिये गये. इससे यह भी निश्चय हो गया कि उनकी
भाषा जो पहिले संस्कृत मान ली गई थी वह अनुमान ठीक न था, वरन उनकी भाषा उक्त स्थानों
की प्रचलित देशी (प्राकृत) भाषा थी. इस प्रकार प्रिन्सेप् आदि विद्वानों के उद्योग से
ब्राह्मी अक्षरों के पढ़े जाने से पिछले समय के सब लेखों का पढ़ना सुगम हो गया क्योंकि भारत-
वर्ष की समस्त प्राचीन लिपियों का मूल यही ब्राह्मी लिपि है.
कर्नल जेम्स टॉड ने एक बड़ा संग्रह बाक्ट्रियन ग्रीक, शक, पार्थियन और कुशनवंशी
खरोष्ठी लिपि. राजाओं के प्राचीन सिक्कों का किया था जिनकी एक ओर प्राचीन ग्रीक और दूसरी
ओर खरोष्ठी अक्षरों के लेख थे. जनरल वेंदुरा ने ई. स. १८३० में मानिकिआल के स्तूप
को खुदवाया तो उसमें से कई एक सिक्के और दो लेख खरोष्ठी लिपि के३ मिले. इनके अतिरिक्त
सर अलेकज़ेंडर बर्न्स आदि प्राचीन शोधकों ने भी बहुत से प्राचीन सिक्के एकत्र किये जिनके
एक ओर के प्राचीन ग्रीक अक्षर तो पढ़े जाते थे परंतु दूसरी ओर के खरोष्ठी अक्षरों के पढ़ने के
लिये कोई साधन न था. इन अक्षरों के लिये भिन्न भिन्न कल्पनाएं होने लगीं. ई. स. १८२४ में कर्नल
जेम्स टॉड ने कदफिसेस् के सिक्के पर के इन अक्षरों को 'ससेनियन' प्रकट किया४. ई. स. १८३३
में ऍपॉलोडॉटसं के सिक्के पर के इन्हीं अक्षरों को प्रिन्सेप ने पहलवी५ माना और एक दूसरे सिक्के
पर की इसी लिपि६ को तथा मानिकिआल के लेख की लिपि को भी पाली७ (ब्राह्मी) बतलाया
और उनकी आकृति टेढ़ी होने से यह अनुमान किया कि छापे और महाजनी लिपि के नागरी
अक्षरों में जैसा अंतर८ है वैसा ही देहली आदि के अशोक के लेखों की पाली (ब्राह्मी) लिपि
और इनकी लिपि में है, परंतु पीछे से स्वयं प्रिन्सेप को अपना अनुमान अयुक्त जंचने लगा.
१. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ४०४.
२. 'न' को 'र' पढ़ लिया था और 'द' को पहिचाना न था.
३. प्रिं; ऐं; जि. १, पृ. ६३-६६. ४. ए. रि; जि. १८, पृ. ५७८.
५. ज. ए. सो. बंगा; जि. २, पृ. ३१३. ६. ज. ए. सो. बंगा; जि. २, पृ. ३१३, ३१६.
७. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ३१८. ८. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ३१६.