प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 63, कुल 318 में से
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खरोष्ठी लिपि की लेखन शैली फ़ारसी की नांई दाहिनी ओर से बाईं ओर होने से निश्चित है
कि यह लिपि सेमिटिक् वर्ग की है, और इसके ११ अक्षर—'क'१, 'ज'२, 'द'३, 'न'४, 'ब'५, 'य'६,
'र'७, 'व'८, 'ष'९, 'स'१० और 'ह'११ समान उच्चारण वाले अरमइक् अक्षरों से बहुत कुछ मिलते
हुए हैं.
सेमिटिक् लिपि संबंधी आधुनिक शोध से अनुमान होता है कि असीरिया और बाबीलन में
क्यूनिफ़ॉर्म लिपि का प्रचार होने पर भी राजकीय और व्यापार के कामों में अरमइक् लिपि१२ काम
में आती थी. हखामनी १३ (अकॅमीनिअन्) वंश के बादशाहों के समय ईरान के राज्य का प्रताप
बहुत बढ़ा और दूर दूर के देश १४ उक्त राज्य के अधीन हो गये. उस समय के अरमइक् लिपि के अनेक
शिलालेख मिसर १५, अरब १६ और एशिया माइनर १७ में मिले हैं और एक ईरान १८ में तथा एक हिंदुस्तान
है कि उक्त लेख का लेखक 'पड' (पंड) पंजाब की तरफ़ का होना चाहिये, जिसको खरोष्ठी लिपि का भी ज्ञान होगा जिसे
जतलाने के लिये ही उसने ये अंतिम पांच अक्षर उस लिपि में लिखे हों. इसी तरह भरहुत के प्रसिद्ध स्तूप के द्वार पर
कहीं एक एक अक्षर खरोष्ठी का खुदा हुआ मिला है (कः भ. स्तृ; सेट ८) : ये पंजाब की तरफ से आये हुए शिल्पियों के
खोदे हुए होने चाहिये.
१. खरोष्ठी का 'क' तक्षशिला के लेख तथा पॅपायरसों के 'कॉफ' से मिलता हुआ है (देखो पृ. २३ पर छपा हुआ
नक्शा).
२. 'ज' सक्कारा, टीमा आदि के लेखों के 'ज़ाइन' से मिलता हुआ है.
३. 'द' तक्षशिला के लेख, पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'दालेथ' से मिलता है.
४. 'न' तक्षशिला के लेख, पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'नून' से मिलता है.
५. 'ब' तक्षशिला के लेख, पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'बेथ' से मिलता है.
६. 'य' तक्षशिला के लेख, पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'योध्' से मिलता है.
७. 'र' तक्षशिला के लेख तथा पॅपायरसों के 'रेश' से मिलता है.
८. 'व' तक्षशिला तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'वाव' से मिलता है.
९. 'ष' को उलटा करने पर वह पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'शिन' से मिलता है.
१०. 'स' तक्षशिला और सक्कारा के लेखों के 'त्साधे' से मिलता है.
११. 'ह' तक्षशिला के लेख के 'हे' से मिलता हुआ है.
१२. ज. रॉय. ए. सो; ई. स. १९१५, पृ. ३४६-४७.
१३. आर्य जाति के हखामन (ऍकॅमीनि) नामक ईरानी राजवंशी (जो ई. स. पूर्व की ८ वीं शताब्दी में हुआ हो)
के नाम पर से उसके वंशज, ईरान के बादशाह, हखामनी वंशी कहलाते हैं. पहिले ईरान का राज्य मीडिया के अधीन था
और हखामन के वंशज साइरस (कुरु, कुरुष-कैखुसरो) ने, जो प्रारंभ में अनशान (ईरान में) का स्वामी या शासक था,
मीडिया के राजा अस्त्यगिस (इष्टुविगु) को छलवल से परास्त कर समस्त ईरान और मीडिया पर अपना साम्राज्य ई. स.
पूर्व ५४८ के आस पास जमाया, जिसकी समाप्ति ई. स. पूर्व ३३१ में यूनान के बादशाह सिकंदर ने बादशाह दारा (तीसरे)
को परास्त कर की.
१४. हखामनी वंश के साम्राज्य के संस्थापक साइरस ने ईरान, मीडिया, लीडिआ (एशिआ माइनर का पूर्वी आधा
हिस्सा), एशिया माइनर का पश्चिमी हिस्सा जिसमें यूनानियों के कई उपनिवेश थे, आयोनिया (मीडिया से पश्चिम का
एशिया माइनर का समुद्रतट का प्रदेश), खीवा, समरकंद, बुखारा, अफ़गानिस्तान तथा गांधार आदि देश अपने अधीन किये.
उसके पुत्र कंबैसिस (कंबुजीय) ने मिसर देश विजय किया. कंबैसिस के पुत्र दारा (प्रथम) ने ग्रीस के थ्रेस तथा मसी-
डन आदि हिस्सों पर अपना अधिकार जमाया और पूर्व में हिंदुस्तान में आगे बढ़कर सिंधुत्तट का प्रदेश अपने अधीन किया.
१५. मिसर में सक्कारा, सेरापिअम तथा एंबिडॉस आदि स्थानों में अरमइक् लिपि के लेख मिले हैं, जिनमें से सक्का-
रा का लेख ई. स. पूर्व ४८२ का है (पेलिओग्राफिक सोसाइटीज़ ओरिएंटल सीरीज़, प्लेट ६३).
१६. अरब में हजाज से उत्तर के टीमा नामक स्थान में कुछ अरमइक् लिपि के लेख मिले हैं, जिनमें से एक ई. स.
पूर्व ५०० के आसपास का माना जाता है. टीमा में अरमइक् भाषा का व्यवहार करने वाले व्यापारियों की आबादी थी
(प. ब्रि; जि. २१, पृ. ६४७).
१७. एशिया माइनर—टर्की के एशियाई राज्य का पश्चिमी हिस्सा जो टर्की के यूरोपी राज्य से मिला हुआ है.
१८. ईरान के सँक कलिह (तेहरान और तेब्रीज़ के बीच) नामक स्थान में एक लेख मिला है (ई. पॅ; जि. २४, पृ. २८७).