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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 318 में से

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पृष्ठ 68

प्राचीन लिपियों का पढ़ा जाना. ३६
ई. स. १८३५ में डब्ल्यू एच. वॉथन ने वल्लभी के कितने एक दानपत्र पढ़े¹.
ई. स. १८३७-३८ में जेम्स प्रिन्सेप ने देहली, कहाउं और एरण के स्तंभों तथा सांची और
अमरावती के स्तूपों और गिरनार के चटान पर के गुप्तलिपि के लेख पढ़े². कप्तान् ट्रायर, डा. मिल्
तथा जेम्स प्रिन्सेप के श्रम से चार्ल्स विल्किन्सन् की गुप्तलिपि की अधूरी वर्णमाला पूर्ण हो गई और
गुप्तवंशी राजाओं के समय के शिलालेख, ताम्रपत्र और सिक्कों के पढ़ने में सुगमता हो गई.
ब्राह्मी लिपि गुप्तलिपि से पुरानी होने के कारण उसका पढ़ना बड़ा दुस्तर था. ई. स. १७९५
[ब्राह्मीलिपि.] में सर चार्ल्स मेलेट ने इलोरा की गुफाओं के कितने एक छोटे छोटे लेखों की छापें तय्यार
कर सर विलियम् जोन्स के पास भेजीं. फिर ये छापें विल्फर्ड के पास पढ़ने को भेजी गईं
परंतु जब वे पढ़ी न गईं तो एक पंडित ने कितनी एक प्राचीन लिपियों की वर्णमालाओं का पुस्तक
विल्फर्ड को बतला कर उन लेखों को अपनी इच्छा के अनुसार कुछ का कुछ पढ़ा दिया. विल्फर्ड ने
इस तरह पढ़े हुए वे लेख अंग्रेज़ी अनुवाद सहित सर विलियम् जोन्स के पास भेज दिये. बहुत
बरसों तक उन लेखों के शुद्ध पढ़े जाने में किसी को शंका न हुई परंतु पीछे से उनका पढ़ना और अनु-
वाद कपोल कल्पित सिद्ध हुए.
बंगाल एशियाटिक सोसाइटी के संग्रह में देहली और अलाहाबाद के स्तंभों तथा खंडगिरि के
चटान पर खुदे हुए लेखों की छापें आ गई थीं परंतु विल्फर्ड का यत्न निष्फल होने से कितने एक वर्षों
तक उन लेखों के पढ़ने का उद्योग न हुआ. उन लेखों का आशय जानने की जिज्ञासा रहने के कारण
जेम्स प्रिन्सेप ने ई. स. १८३४-३५ में अलाहाबाद, राधिया और मथिया के स्तंभों पर के लेखों की
छापें मंगवाईं और उनको देहली के लेख से मिला कर यह जानना चाहा कि उनमें कोई शब्द एकसा
है या नहीं. इस प्रकार उन चारों लेखों को पास पास रख कर मिलाने से तुरंत ही यह पाया
गया कि वे चारों लेख एक ही हैं. इस बात से प्रिन्सेप का उत्साह बढ़ा और उसे अपनी जिज्ञासा
पूर्ण होने की दृढ़ आशा बंधी. फिर अलाहाबाद के स्तंभ के लेख से भिन्न भिन्न आकृति के अक्षरों
को अलग अलग छांटने पर यह विदित हो गया कि गुप्ताक्षरों के समान उनमें भी कितने एक अक्षरों
के साथ स्वरों की मात्राओं के पृथक् पृथक् चिह्न लगे हुए हैं, जो एकत्रित कर प्रकट किये
गये³. इससे कितने एक विद्वानों को उक्त अक्षरों के यूनानी होने का जो भ्रम⁴ था वह दूर हो
गया. स्वरों के चिह्नों को पहिचानने के बाद मि. प्रिन्सेप ने अक्षरों के पहिचानने का उद्योग
करना शुरू किया और उक्त लेख के प्रत्येक अक्षर को गुप्तलिपि से मिलाना और जो मिलता गया
उसको वर्णमाला में क्रमवार रखना प्रारंभ किया. इस प्रकार बहुत से अक्षर पहिचान में आ गये.
१. ज. ए. सो. बंगा; जि. ४, पृ. ४७७.
२. ज. ए. सो. बंगा; जि. ६, पृ. २१८, ४५५; जि. ७, पृ. ३६, ३३७, ६२६, ६३२.
३. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ७, प्लेट ५.
४. अशोक के लेखों की लिपि मामूली देखने वाले को अंग्रेज़ी या ग्रीक लिपि का भ्रम उत्पन्न करा दे ऐसी है. टॉम
कोरिअट् नामक मुसाफ़िर ने अशोक के देहली के स्तंभ के लेख को देख कर ऐल. हिटकर को एक पत्र में लिखा कि 'मैं इस
देश (हिंदुस्तान) के देली (देहली) नामक शहर में आया जहां पर 'अलेक्ज़ेंडर दी ग्रेट' (सिकंदर) ने हिंदुस्तान के राजा पोरस
को हराया और अपनी विजय की यादगार में उसने एक बृहत् स्तंभ खड़ा करवाया जो अब तक वहां विद्यमान है' (केर्स
वॉयेजिज़ ऐंड ट्रैवल्स, जि. ६, पृ. ४२३; क; आ. स. रि; जि. १, पृ. १६३). इस तरह जब टॉम कोरिअट् ने अशोक के लेखवाले
स्तंभ को बादशाह सिकंदर का खड़ा करवाया हुआ मान लिया तो उस पर के लेख के पढ़े न जाने तक दूसरे यूरोपियन
यात्री आदि का उसकी लिपि को ग्रीक मान लेना कोई आश्चर्य की बात नहीं है. पादरी एडवर्ड टेरी ने लिखा है कि, टॉम
कोरिअट ने मुझ से कहा कि मैंने देली (देहली) में ग्रीक लेख वाला एक बहुत बड़ा पाषाण का स्तंभ देखा जो 'अलेक्ज़ेंडर
दी ग्रेट' ने उस प्रसिद्ध विजय की यादगार के निमित्त उस समय वहां पर खड़ा करवाया था' (क; आ. स. रि; जि. १,
पृ. १६३-६४). इसी तरह दूसरे लेखकों ने उस लेख को ग्रीक लेख मान लिया था.