प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंखरोष्ठी लिपि की उत्पत्ति. ३१
भी अनार्यों से ही लिये गये? 'ट' १, 'ड' २, 'ढ' ३ और 'ण' ४ से प्रारंभ होने वाले बहुत से धातु हैं,
और जिनमें मूर्धन्य वर्णों का प्रयोग हुआ हो ऐसे हज़ारहां शब्द वैदिक साहित्य में पाये जाते
हैं. ग्रीक आर्यों की भाषा में 'ट' और 'ड' ही हैं, 'त' और 'द' का सर्वथा अभाव है और
सेमिटिक् अनार्यों की लिपियों में मूर्धन्य वर्णों का सर्वथा अभाव पाया जाता है (देखो पृ. २३ में
छुपा हुआ नक्शा); इसी से ग्रीकों ने फ़िनिशियन् अक्षर 'ताव' ('त' का सूचक) से टाओ
('ट'), और दालेथ ('द') से डेल्टा ('ड') बनाया. ऐसी दशा में बाबू जगन्मोहनवर्मा का यह
दूसरा कथन भी आदरणीय नहीं हो सकता.
३—खरोष्ठी ५ लिपि की उत्पत्ति.
मौर्यवंशी राजा अशोक के अनेक लेखों ६ में से केवल शहबाज़गढ़ी और मान्सेरा के चटा-
नों पर खुदे हुए लेख खरोष्ठी लिपि में हैं; जिनसे पाया जाता है कि यह लिपि ई. स. पूर्व की
तीसरी शताब्दी में केवल भारतवर्ष के उत्तरी-पश्चिमी सीमांत प्रदेश के आस पास, अर्थात्
पंजाब के गांधार ७ प्रदेश में, प्रचलित थी. अशोक से पूर्व का इस लिपि का कोई शिलालेख
अब तक नहीं मिला, परंतु ईरानियों के कितने एक चांदी के मोटे सिक्कों ८ पर ब्राह्मी या खरोष्ठी
लिपि के एक एक अक्षर का ठप्पा ९ लगा हुआ मिलता है, जिससे अनुमान होता है कि पंजाब
की तरफ़ चलने वाले ये ईरानी सिक्के संभवतः सिकंदर से पूर्व के अर्थात् ई. स. पूर्व की चौथी
शताब्दी के हों; क्योंकि सिकंदर के विजय से ईरानियों का अधिकार पंजाब पर से उठ गया था.
१. 'ट' से प्रारंभ होने वाले धातु टंक्, टल्, टिक्, टिप्, टीक और ट्वल् हैं.
२. 'ड' से प्रारंभ होने वाले धातु डप्, डम्, डंबू, डंभ्, डिप्, डिम् और डीं हैं.
३. 'ढ' से प्रारंभ होने वाला धातु ढौक् है.
४. पाणिनि ने धातुपाठ में बहुत से धातु 'ण' से आरंभ होने वाले माने हैं (णो नः; पा. .६ । १ । ६५; उपसर्गा-
दसमासेऽपि णोपदेशस्य; पा. ८ । ४ । १४ ).
५. युरोपियन् विद्वानों ने 'खरोष्ठी' लिपि का बाकट्रिअन, बाकट्रिअन पाली, आरिअनोपाली, नॉर्थ (उत्तरी) अशोक,
काबुलिअन और गांधार आदि नामों से भी परिचय दिया है, परंतु हम इस लेख में 'खरोष्ठी' नाम का ही प्रयोग करेंगे.
खरोष्ठी नाम के लिये देखो ऊपर पृ. १८.
६. राजा अशोक के लेख जिन जिन स्थानों में मिले हैं उनके लिये देखो ऊपर पृ. २, टिप्पण ५. उक्त टिप्पण में दिये
हुए स्थानों के नामों में अलाहाबाद (प्रयाग) का नाम भी जोड़ना चाहिये, जो वहां छपने से रह गया है.
७. प्राचीन काले में 'गांधार देश' में पंजाब का पश्चिमी हिस्सा तथा अफ़गानिस्तान का पूर्वी हिस्सा अर्थात् उत्तर-
पश्चिमी सीमान्त प्रदेश के ज़िले पेशावर और रावलपिंडी तथा अफ़गानिस्तान का ज़िला काबुल गिना जाता था.
८. ईरान के प्राचीन चांदी के सिक्के गोली की आकृति के होते थे जिनपर ठप्पा लगाने से वे कुछ चपटे पड़ जाते थे
परंतु बहुत मोटे और भद्दे होते थे. उनपर कोई लेख नहीं होता था किंतु मनुष्य आदि की भद्दी शकलों के ठप्पे लगते थे;
ईरान के ही नहीं किंतु लीडिआ, ग्रीस, आदि के प्राचीन चांदी के सिक्के भी ईरानी सिक्कों की नाईं गोल, भद्दे, गोली की शकल
के चांदी के टुकड़े ही होते थे. केवल हिंदुस्तान में ही प्राचीन काल में चौकूंटे या गोल चांदी के सुंदर चपटे सिक्के, जिन्हें
कार्षापण कहते थे, बनते थे, कॉरिंथिया वालों ने भी पीछे से चपटे सिक्के बनाये जिसकी देखा देखी दूसरे देशवालों ने भी
चपटे सिक्के बनाये (क; कॉ. ए. इं; पृ. ३).
९. प्रॉफेसर रैप्सन् ने कितने एक ईरानी चांदी के सिक्कों के चित्र विवरण सहित छापे हैं (ज रॉ. ए. सो; ई. स.
१८६५, पृ. ८६५-७७, तथा पृ. ८६४ के सामने का सेट, संख्या १-२५) जिनपर ब्राह्मी लिपि के 'यो' 'व', 'प', 'ज' और
'गो' अक्षर और खरोष्ठी लिपि के 'म', 'मे', 'मं,' 'ति' 'द' और 'ह' अक्षरों के ठप्पे लगे हुए हैं.