प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
४४ प्राचीनलिपिमाला.
निकलीं. मद्रास इहाते के जिन हिस्सों में तामिळ लिपि का, जिसमें वर्णों की अपूर्णता के कारण
संस्कृत ग्रंथ लिखे नहीं जा सकते, प्रचार है वहां पर संस्कृत ग्रंथ इसी लिपि में लिखे जाते हैं इसीसे
इसका नाम 'ग्रंथलिपि' (संस्कृत ग्रंथों की लिपि) पड़ा हो ऐसा अनुमान होता है.
५. कलिंग लिपि—यह लिपि मद्रास इहाते में चिकाकोल और गंजाम के बीच के प्रदेश में वहां
के गंगवंशी राजाओं के दानपत्रों में ई. स. की ७ वीं से ११ वीं शताब्दी के पीछे तक मिलती है.
इसका सब से पहिला दानपत्र [गांगेय]संवत् ८७ का मिला है जो गंगवंशी राजा देवेंद्रवर्मन् का है.
उसकी लिपि मध्यदेशी लिपि से मिलती हुई है. अक्षरों के सिर संदूक की आकृति के, भीतर से
भरे हुए, हैं और अक्षर बहुधा समकोणवाले हैं (लिपिपत्र ५७ में दी हुई राजा देवेंद्रवर्मन् के दानपत्र
की लिपि को लिपिपत्र ४१ से मिला कर देखो); परंतु पिछले ताम्रपत्रों में अक्षर समकोणवाले नहीं,
किंतु गोलाई लिये हुए हैं और उनमें नागरी, तेलुगु-कनडी तथा ग्रंथलिपि का मिश्रण होता गया है.
६. तामिळलिपि—यह लिपि मद्रास इहाते के जिन हिस्सों में प्राचीन ग्रंथलिपि प्रचलित थी वहां
के, तथा उक्त इहाते के पश्चिमी तट अर्थात् मलवार प्रदेश के तामिळ भाषा के लेखों में ई. स. की
सातवीं शताब्दी से बराबर मिलती चली आती है. इस लिपि के अधिकतर अक्षर ग्रंथलिपि से
मिलते हुए हैं (लिपिपत्र ६० में दी हुई लिपि को लिपिपत्र ५२ और ५३ में दी हुई लिपियों से
मिला कर देखो); परंतु 'क', 'र' आदि कुछ अक्षर उत्तर की ब्राह्मी लिपि से लिये हुए हैं. इसका
रूपांतर होते होते वर्तमान तामिळलिपि बनी इस वास्ते इसका नाम तामिळ रक्खा गया है.
वट्टॆऴुत्तु—यह तामिळ लिपि का ही भेद है और इसे त्वरा से (घसीट) लिखी जाने वाली
तामिळ लिपि कह सकते हैं. इसका प्रचार मद्रास इहाते के पश्चिमी तट तथा सब से दक्षिणी
विभाग के ई. स. की ७ वीं से १४ वीं शताब्दी तक के लेखों तथा दानपत्रों में मिलता है परंतु
कुछ समय से इसका प्रचार नहीं रहा.
ब्राह्मी लिपि के वैदिक काल में ब्राह्मी लिपि के ध्वनिसूचक संकेत या अक्षर नीचे लिखे अनुसार
अक्षर. माने जाते थे—
स्वर. ह्रस्व. अ इ उ ऋ १ ऌ २
दीर्घ. आ ई ऊ ॠ [ॡ?]
प्लुत ३. आ ३ ई ३ ऊ ३ ॠ ३ [ॡ ३?]
संध्यक्षर. ए ऐ ओ औ
इनके प्लुत. ए ३ ऐ ३ ओ ३ औ ३
१. आज कल 'ऋ' और 'ऌ' का उच्चारण बहुधा सब लोग 'रि' और 'लि' के सदृश करते हैं. दक्षिण के कुछ
लोग 'रु' और 'लु' के से विलक्षण उच्चारण करते हैं और उत्तर-भारत के कितने एक वैदिक 'र्ॅ' और 'लॅ' के से उच्चा-
रण करते हैं; परंतु वास्तव में ये तीनों उच्चारण कल्पित ही हैं. 'ऋ' और 'ऌ', 'र' और 'ल' से स्वरमय उच्चारण थे
जो बिना किसी और स्वर की सहायता के होते थे, परंतु बहुत काल से वे लुप्त हो गये हैं. अब तो केवल उनके अक्षरसं-
केत रह गये हैं.
२. 'ऌ' स्वर वेद में केवल 'क्लृप्' धातु में मिलता है और संस्कृत साहित्य भर में उक्त धातु को छोड़ कर कहीं उसका
प्रयोग नहीं मिलता. वैयाकरणों ने तोतले बोलने वाले बच्चों के 'ऋ' के अशुद्ध उच्चारण के अनुकरण में इसे माना है, तो
भी इसके प्लुत का प्रयोग मानने को वे तय्यार नहीं हैं; क्योंकि इसका व्यवहार ही नहीं है. शुक्ल यजुर्वेद के प्रातिशाख्य में
अन्य स्वरों से समानता करने के लिये 'ऌ' के दीर्घ और प्लुत रूप माने हैं परंतु उनका प्रयोग कहीं नहीं मिलता. ह्रस्व
ऌकार वाले शब्द के कल्पित संबोधन में प्लुत 'ऌ ३' का होना वैयाकरण और कुछ शिक्षाकार मानते हैं, तो भी वास्तव में
'ऌ' केवल ह्रस्व ही है.
३. आज कल त्रिमात्रिक स्वर अर्थात् प्लुत के लिये दीर्घ स्वर के आगे ३ का अंक लगाते हैं परंतु यह रीति प्राचीन
नहीं जान पड़ती. दीर्घ स्वरों के लिये जैसे ह्रस्व के आगे २ का अंक नहीं लगाया जाता परंतु ब्राह्मी और वर्तमान नागरी में
अ' पर ही मात्रा लगा कर काम चलाया जाता है (ॲ, ॲ, ओ, औ-गुजराती) वैसे ही प्लुत केWait, look at(ॲ, ॲ, ओ, औ-गुजराती): Wait! In Gujarati, E and AI on A: ॲ, ॲ? Wait, look at the characters: (ॲ, ॲ? No, Gujarati અwith matras! In Gujarati types:ઍ, ઐ! Wait, look at the typeset characters: It is (ઍ, ઐ, ઓ, ઔ-गुजराती)! Wait, let's look at the image: (thenઍ(orॲ), then ,thenऐ? Look at the image: First character: अwith a matra? Look closely: It'sॲ? No, it's ऐonअ? In Gujarati script: એis written asઅwith matra:ઍorએ? Look at the printed text: ( ઍ, ऐ, ओ, औ-गुजराती )or( ॲ, ... )? Wait, it's Devanagari अwith matras! First one:अwith a single slanted matra (likeेonअ): ॲ? No, अे`!
Second
४६ प्राचीनलिपिम़ाला.
अन्तस्थ. य र ल व
ऊष्मन्. श ष १ स ह
यम.२ कुँ खुँ गुँ घुँ
इस तरह वैदिक साहित्य में अधिक से अधिक ६४ (ऋग्वेद में ६४३ और यजुर्वेद में ६३४)
ध्वनिसूचक संकेत अर्थात् वर्ण थे, परंतु पीछे से साधारण मनुष्यों एवं जैन और बौद्धों में, जिन-
का प्रारंभिक साहित्य प्राकृत में था, ४६ या ४७५ अक्षर व्यवहार में आते थे. ई. स. की चौथी
१. याज्ञवल्क्य के अनुसार उत्तर-भारत के यजुर्वेदी लोग संहितापाठ में टवर्ग के साथ के संयोग को छोड़ कर और
सर्वत्र ‘ष’ को ‘ख’ बोलते हैं, जैसे षष्ठी=खष्ठी; इसीसे मिथिला, बंगाल, पंजाब आदि के संस्कृतज्ञ तथा अन्य लोग
भी संस्कृत एवं ‘भाखा’ में बहुधा ‘ष’ को ‘ख’ बोलने लग गये. इसी वैदिक उच्चारण से प्राकृत में ‘क्ष’ के दो रूप छ (च्छ)
और ख (क्ख) हो गये.
२. वर्गों के पहिले चार वर्णों का जब किसी वर्ग के पांचवें वर्ण से संयोग होता है तब उस अनुनासिक वर्ण के पहिले
वैदिक काल में एक विलक्षण ध्वनि होती थी जिसे यम कहते थे, जैसे ‘पत्नी’ में ‘त्’ और ‘न्’ के बीच में. इस तरह बीस
यम होने चाहियें, परंतु प्रातिशाख्यों में तथा शिक्षाओं में चार ही यम माने हैं और उनके नाम या संकेत ‘कुँ’, ‘खुँ’, ‘गुँ’ और
‘घुं’ दिये हैं. इसका तात्पर्य यह है कि वर्गों के पहिले अक्षरों अर्थात् क, च, ट, त, प के संयोग से जो यम उत्पन्न होता
था वह ‘कु’ कहलाता था, और उसके लिये एक चिह्न नियत था. इसी तरह ख, छ, ठ, थ, फ के संयोग से उत्पन्न होने-
वाले यम के लिये ‘खु’ प्रकृति का चिह्न, ग, ज, ड, द, ब के संयोग से बने हुए यम के लिये ‘गु’ प्रकृति का कोई तीसरा
चिह्न, और घ, झ, ढ, ध, भ के संयोग से उद्धत यम के लिये ‘घ’ प्रकृति का कोई और चिह्न नियत था. ये चिह्न कैसे थे
इसका पता न तो शिलालेखादि में और न पुस्तकों में मिलता है, किंतु व्याकरणवाले इन यमों को क, ख, ग, घ से बतलाते
हैं, जैसे-
पत्नी= पत् ( मूल व्यंजन ) क् ( यम ) नी= पत्क्नी
सक्थ्ना= सक्थ ( ,, ,, ) ख् ( ,, ) ना= सक्थ्खना
अग्नि= अग् ( ,, ,, ) ग् ( ,, ) नि= अग्ग्नि
यज्ञ= •यज् ( ,, ,, ) ग् ( ,, ) ञ= यज्ग्ञ
गृभ्णामि= गृभ् ( ,, ,, ) घ् ( ,, ) णामि= गृभ्घ्णामि.
३. ऋग्वेद में २१ स्वर (‘लृ’ के दीर्घ और प्लुत को छोड़ने से), ४ अयोगवाह (अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय और
उपध्मानीय), २५ स्पर्श वर्ण (पांचों वर्गों के २५ और ‘ळ’ तथा ‘ळ्ह’), ४ अंतःस्थ, ४ ऊष्मन् और ४ यम, मिलकर ६४ वर्ण
होते हैं.
४. यजुर्वेद में वर्णसंख्या बहुधा ऋग्वेद के समान ही है, केवल ‘ळ’ और ‘ळ्ह’ का प्रयोग उसमें नहीं होता परंतु
उसमें अनुस्वार का ऴ रूप अलग होता है. इसीसे उसमें ६३ वर्ण काम में आते हैं.
५. जैनों के दृष्टिवाद में, जो लुप्त हो गया है, ब्राह्मी अक्षरों की संख्या ४६ मानी है, (वे; इं. स्ट, १६, २८१), जो अ,
आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः, क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब,
भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह और ळ (या क्ष) होने चाहिये. हुएन्त्सँग अक्षरों की संख्या ४७ बतलाता है (बी; बु. रे. वे.
घ; जिल्द १, पृ. ७८), जो 'अ' से 'ह' तक के ४५ अक्षर तो ऊपर लिखे अनुसार और बाकी के दो अक्षर 'क्ष' और 'ज्ञ'
होने चाहियें. बौद्ध और जैनों के प्राकृत ग्रंथों में ऋ, ॠ, लृ, ॡ इन चार स्वरों का प्रयोग नहीं है. प्राकृत साहित्य में इन-
की आवश्यकता ही नहीं रहती. जहां संस्कृत शब्द के प्रारंभ में 'ऋ' होता है वहां प्राकृत में 'रि' हो जाता है (ऋषभ=
रिसभ, ऋक्ष=रिच्छ या रिक्ख); और जहां व्यंजन के साथ 'ऋ' की मात्रा लगी होती है वहां 'ऋ' के स्थान में 'अ', 'इ'
या 'उ' हो जाता है (मृग=मग, तृषा=तिसा, सुर्वण=सुहंग; निभृत=निहुअ). ये चारों वर्ण (ऋ, ॠ, लृ, ॡ) अब भी
साधारण लोगों के व्यवहार में नहीं आते और प्रारंभिक पढ़ने वालों की 'बारखड़ी' (द्वादशाक्षरी) में भी इनको स्थान नहीं
मिलता. यह आरंभिक पठनशैली आधुनिक नहीं है, किंतु अशोक के समय अर्थात् ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी में भी
ऐसी ही थी, क्योंकि बुद्धगया के अशोक के समय के बने हुए महाबोधी मंदिर के पास बुद्ध के चंक्रम अर्थात् भ्रमणस्थान में
दोनों ओर ११, ११ स्तंभों की दो पंक्तियां हैं उन स्तंभों की कुंभियों (आधार) पर शिल्पियों ने एक एक करके 'अ' को छोड़ कर
'आ' से 'ह' तक के अक्षर खोदे हैं. उनमें भी ये चारों स्वर नहीं है. यद्यपि सामान्य लोगों के व्यवहार में ये चार वर्ण
नहीं आते थे तो भी वर्णमाला में उनको स्थान अवश्य मिलता था, क्योंकि जापान के होर्युजी नामक स्थान के बौद्ध
मठ में रक्खी हुई ई. स. की छठी शताब्दी की 'उष्णीषविजयधारणी' नामक ताड़पत्र पर लिखी हुई बौद्ध पुस्तक
ब्राह्मी लिपि. ४७
शताब्दी के पीछे, लेखनशैली में अक्षरों के रूपों में परिवर्त्तन होते होते संयुक्ताक्षर 'क्ष' में 'क्'
और 'ष' के मूल रूप अस्पष्ट होकर उसका एक विलक्षण ही रूप 'क्ष' बन गया तब बौद्धों
ने 'क्ष' को भी वर्णों अर्थात् मातृकाओं (सिद्धमातृकाओं) में स्थान दिया. इसी तरह पीछे से
संयुक्ताक्षर 'ज्ञ' के 'ज्' और 'ञ' के रूप अस्पष्ट होकर उसका एक विलक्षण रूप 'ज्ञ' बन गया
तब उसको भी लोगों ने वर्णों में स्थान दिया. तंत्रग्रंथों में 'क्ष' और 'ज्ञ' की वर्णों अर्थात् मातृका-
ओं में संज्ञा की गई है परंतु ये दोनों सर्वथा वर्ण नहीं किंतु संयुक्तवर्ण हैं और उनके घटक दो दो
अक्षरों के मूलरूप न रहने पर एक ही विलक्षण नया संकेत बन जाने से ही उनकी वर्णों में गणना
हुई है जैसे कि वर्तमान काल में नागरी की वर्णमाला में 'त्र' की भी².
लिपिपत्र पहिला.
यह लिपिपत्र गिरनार पर्वत के पास के चट्टान पर खुदे हुए मौर्यवंशी राजा अशोक के लेख की
अपने हाथ से तय्यार की हुई छापों से बनाया गया है. यह लेख मौर्यराज्य के पश्चिमी विभाग का
होने से वहां की ब्राह्मी लिपि को प्रकट करता है. इसमें स्वरों की मात्राओं के चिह्न इस प्रकार
मिलते हैं-
'आ' की मात्रा एक छोटीसी आड़ी लकीर (-) है जो व्यंजन की दाहिनी तरफ बहुधा अक्षर
के ऊपर की ओर (देखो, खा, रा) परंतु कभी कभी मध्य में भी, (देखो, जा, मा, बा) लगाई जाती
है. 'ज' के साथ 'आ' की मात्रा का योग केवल 'ज' के मध्य की लकीर को कुछ अधिक लंबी कर
के बतलाया है जिससे कभी कभी 'ज' और 'जा' में भ्रम हो जाता है.
'इ' की मात्रा का नियत चिह्न ┘ है जो व्यंजन की दाहिनी ओर ऊपर की तरफ लगता है
(देखो, नि), परंतु कहीं कहीं समकोण के स्थान पर गोलाइदार या तिरछी लकीर भी मिलती है
(देखो, टि, लि).
'ई' की मात्रा का नियत चिह्न ╜ है, जो व्यंजन की दाहिनी ओर ऊपर की तरफ़ जोड़ा
जाता है (देखो, टी, ठी), परंतु कहीं कहीं आड़ी सीधी लकीर को तिरछा कर दिया है, और समकोण के
स्थान में गोलाई मिलती है (देखो, पी, मी); 'धी' बनाने में 'ध' के साथ केवल दो तिरछी लकीरें ही
लगा दी गई हैं.
अशोक के पूर्व के बर्ली गांव के लेख में 'वीराय' के 'वी' ६ अक्षर के साथ 'ई' की मात्रा
का चिह्न ( है, जो अशोक के समय में लुप्त हो चुका था और उसके स्थान में ऊपर लिखा हुआ
नया चिह्न बर्ताव में आने लग गया था (देखो, ऊपर पृष्ठ ३ और वहीं का टिप्पण २).
के अंत में जिस लेखक ने वह पुस्तक लिखी है उसीके हाथ की लिखी हुई उस समय की पूरी वर्णमाला है
जिसमें इन चार वर्णों को स्थान दिया गया है (देखो, लिपिपत्र १६). ऐसे ही हन्नाकोल से मिले हुए ई. स. की
१२ वीं शताब्दी के बौद्ध तांत्रिक शिलालेख में प्रत्येक वर्ण पर अनुस्वार लगा कर पूरी वर्णमाला के बीज बनाए हैं जिनमें
भी ये चारों वर्ण हैं (लिपिपत्र ३५) और उदयादित्य के समय के उज्जैन के शिलालेख के अंत में खुदी हुई पूरी वर्णमाला
में भी ये चारों वर्ण दिये हुए हैं (देखो लिपिपत्र २५).
२. वर्तमान 'त्र' में मूल घटक दोनों अक्षरों में से एक अर्थात् 'र' का चिह्न तो पहिचाना जाता है, परंतु 'त्' का
नहीं, किंतु 'क्ष' और 'ज्ञ' में दोनों ही के मूल अक्षरों का पता नहीं रहा. इतना ही नहीं, 'ज्ञ' में तो वास्तविक उच्चारण
भी नष्ट हो गया. दक्षिणी लोग कोई कोई इसे 'द्न्य' बोलते हैं (देखो बंबई के अंगरेजी पत्र ज्ञानप्रकाश का अंगरेज़ी
अक्षरांतर Dnan Prakash) और उत्तर में 'ज्ञ' का स्पष्ट 'ग्य' उच्चारण है, केवल कुछ संस्कृतज्ञ 'ज्ज्य' के सदृश उच्चारण
करते हैं. ऐसी दशा में जब इन संकेतों से मूल अक्षरों का भान नहीं होता तब उच्चारण और वर्णज्ञान की शुद्धि के लिये
इन्हें 'क्-ष' और 'ज्-ञ' लिखना और छापना ही उचित है.
४८ प्राचीनलिपिमाला.
'उ', और 'ऊ' के चिह्न क्रमशः एक और दो आड़ी ( - = ) या खड़ी ( । ॥) लकीरें हैं जो
व्यंजन के नीचे को लगाई जाती हैं. जिन व्यंजनों का नीचे का हिस्सा गोल या आड़ी लकीरवाला
होता है उनके साथ खड़ी, और जिनका खड़ी लकीरवाला होता है उनके साथ आड़ी (दाहिनी ओर)
लगाई जाती हैं (देखो, तु, धु, नु, सु, कू, जू,).
'ए' और 'ऐ' के चिह्न क्रमशः एक और दो आड़ी लकीरें ( - = ) हैं जो बहुधा व्यंजन की
बाईं ओर ऊपर की तरफ़ परंतु कभी कभी मध्य में भी लगाई जाती हैं, (देखो, के, टे, ऐ, थै).
'ओ' का चिह्न दो आड़ी लकीरें हैं ( - - ) जिनमें से एक व्यंजन की दाहिनी ओर को
'आ' की मात्रा की नांईं, और दूसरी बाईं ओर को 'ए' की मात्रा के समान लगाई जाती है
(देखो, ओ, नो).
'औ' का चिह्न इस लेख में नहीं है किंतु उसमें 'ओ' के चिह्न से इतनी ही विशेषता है कि
बाईं ओर को एक के स्थान में दो आड़ी लकीरें ( = ) होती हैं जैसे कि लिपिपत्र आठवें में 'पौ' में.
अनुस्वार का चिह्न एक बिंदु ( ˙ ) है जो बहुधा अक्षर की दाहिनी ओर ऊपर की तरफ़ रक्खा
जाता है (देखो, अं).
विसर्ग का चिह्न इस लेख में तथा अशोक के दूसरे लेखों में भी कहीं नहीं मिलता, परंतु
ई. स. की दूसरी शताब्दी के लेखों में वह मिलता है जो वर्तमान विसर्ग के चिह्न के सदृश ही है
और वैसे ही अक्षर के पास आगे लगता है (देखो, लिपिपत्र ७, मूल की पहिली पंक्ति में 'राज्ञः'.)
अशोक के समय ऋ, ॠ, लृ और लॄ की मात्राओं के चिह्न कैसे थे इसका पता नहीं लगता
इतना ही नहीं, किंतु पिछले लेखों में भी 'ऋ' और 'लृ' की मात्राओं के चिह्नों का कहीं पता नहीं
है. 'ऋ' की मात्रा का चिह्न पहिले पहिल ई. स. की दूसरी शताब्दी के लेखों में मिलता है
(देखो, लिपिपत्र ६ में मथुरा के लेखों के अक्षरों में 'गृ', 'मृ' और 'वृ'; लिपिपत्र ७ में 'कृ'
और 'वृ'; और लिपिपत्र आठवें में 'कृ', 'गृ' और 'वृ'). संयुक्त व्यंजनों में कितने एक स्थानों में
पहिले उच्चारण होनेवाले को ऊपर और पीछे उच्चारण होनेवाले को उसके नीचे जोड़ा है (देखो,
म्य, म्हि, र्व, स्ति, स्व) जो शुद्ध है, परंतु कहीं कहीं दूसरे को ऊपर और पहिले को नीचे लिखा है
(देखो, त्र, त्या, व्यो, स्टा, स्ना) जो अशुद्ध है, और यह प्रकट करता है कि लेखक शुद्ध लिखना नहीं
जानता था. हमने उन अक्षरों के ऊपर वर्तमान नागरी के शुद्ध अक्षर जान कर दिये हैं, जैसे खुदे हैं वैसा
अक्षरांतर नहीं किया. 'क्र' में 'र' को अलग नहीं जोड़ा किंतु 'क' की खड़ी लकीर को 'र' का
रूप देकर उसके साथ आड़ी लकीर जोड़ दी है. ऐसे ही 'ब्र' में 'ब' की बाईं तरफ़ की
खड़ी लकीर को भीतर दबा कर उसमें कोण बना दिया है. ऐसे रूप अशोक के किसी दूसरे
लेख में अथवा पिछले लेखों में कहीं नहीं मिलते.
संयुक्त व्यंजनों में पहिले आनेवाले 'र' (रेफ) तथा पीछे आनेवाले 'र' का भेद तो इस
लेख का लेखक जानता ही न था जिससे उसने संयुक्त व्यंजनों में जहां जहां 'र' आया उसको
सर्वत्र पहिले ही लिखा है और उसको (चिह्न से बतलाया है जो उसके लिखे हुए 'र' का अग्रभाग
है (देखो, त्र और र्व).
इस लेख में 'ई', 'ऊ', 'ऐ', 'औ', 'ङ', 'ठ', 'श', और 'ष' अक्षर नहीं है. 'ई' का
रूप गॆ होना चाहिये, जिससे मिलता हुआ रूप क्षत्रपों के सिक्कों में (देखो, लिपिपत्र १०); अमरावती
के लेख में (देखो, लिपिपत्र १२) और कई पिछले लेखों में मिलता है. 'ऊ', ह्रस्व 'उ' के नीचे दाहिनी
ओर एक और आडी लकीर जोड़ने से बनता था जैसा कि भरहुत स्तूप के लेखों से उद्धृत किये हुए
ब्राह्मी लिपि. ४६
अक्षरों में (लिपिपत्र ३) दिया गया है. 'ऐ', 'ए' के अग्रभाग के साथ बाईं ओर एक आड़ी लकीर जोड़ने
से बनता था जैसा कि हाथीगुंफा के लेख में मिलता है (देखो, लिपिपत्र ३). 'औ' का प्राचीन रूप
अशोक के लेखों में अथवा गुप्तों के समय के पूर्व के किसी लेख में नहीं मिलता. उसका अशोक के समय
का रूप ⅂ होना चाहिये. 'ङ' बुद्धगया के उपर्युक्त मंदिर के स्तंभ पर मिलता है जिसकी आ-
कृति [ है. 'ठ' का रूप बिलकुल वृत्त O है और वह देहली के सवालक स्तंभ पर के अशोक के लेख
में मिलता है (देखो, लिपिपत्र २). 'श' और 'ष' अशोक के खालसी के लेख में मिलते हैं (देखो,
लिपिपत्र २).
इस लेख में बहुतेरे अक्षरों के एक से अधिक रूप मिलते हैं. संभव है कि कुछ तो उस समय
भिन्न भिन्न रूप से लिखे जाते हों परंतु यह भी हो सकता है कि उक्त लेख का लेखक जैसे शुद्ध लिखना
नहीं जानता था वैसे ही बहुत सुंदर अक्षर लिखनेवाला भी न था; क्योंकि इस लेख की लिपि वैसी सुंदर
नहीं है जैसी कि अशोक के देहली के सवालक स्तंभ और पडेरिया (रुंमिंदेई) के स्तंभ के लेखों की है, और
जैसे उनमें अक्षर तथा स्वरों की मात्राओं के चिह्न एकसा मिलते हैं वैसे इस लेख में नहीं हैं. यह भी संभव
है कि लेखक सिद्धहस्त न हो और त्वरा से लिखता हो जिससे अक्षर एकसा नहीं लिख सका.
इसीसे कहीं सीधी खड़ी लकीर को तिरछा (देखो, उ, झ, न और प के दूसरे रूप) या गोलाईदार
(देखो, ग और फ के दूसरे रूप) कर दिया है और कहीं गोलाईदार को तिरछा (देखो, 'अ' का चौथा
रूप और 'घ' का तीसरा रूप) बना दिया है.
लिपिपत्र पहिले की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
इयं धंमलिपी देवानं प्रियेन प्रियदसिना राजा लेखा-
पिता इध न किंचि जीवं आरभित्या प्रजूहितव्यं न
च समाजो कतव्यो बहुकं हि दोसं समाजम्हि पसति
देवानं प्रियो प्रियदसि राजा अस्ति पि तु एकचा समा-
जा साधुमत्ता देवानं प्रियस प्रियदसिनो राज्ञो पुरा महा-
नसम्हि देवानं प्रियस प्रियदसिनो राज्ञो अनुदिवसं ब-
लिपिपत्र दूसरा.
यह लिपिपत्र देहली के सवालक स्तंभ¹, खालसी², जोगड³ और सिद्धापुर⁴ के चटानों तथा राधिआ⁵,
सारनाथ⁶ और सांची⁷ के स्तंभों पर खुदे हुए अशोक के लेखों के फोटों से बनाया गया है और इसमें
बहुधा वे ही अक्षर लिये गये हैं जिनमें लिपिपत्र पहिले के अक्षरों से या तो कुछ भिन्नता पाई जाती है
या जो लिपिपत्र पहिले में नहीं मिले. यह भिन्नता कुछ तो देशभेद से है और कुछ लेखक की
रुचि और त्वरा से हुई है.
देहली के सवालक स्तंभ के लेख की लिपि बड़ी सुंदर और जमी हुई है और वह सारा लेख
सावधानी के साथ लिखा गया है. उसमें 'आ' में 'आ' की मात्रा का चिह्न ऊपर नहीं किंतु मध्य में लगा
१. ई. ऍ; जि. १३. पृ. ३०६-१० के बीच के सेट. २. ऍ. इं; जि. २, पृ. ४५०-६० के बीच के सेट.
३. आ. स. स. इं; जि. १, सेट ६७-६६. ४. ऍ. इं; जि. ३, पृ. १३८-४० के बीच के सेट.
५. ऍ. इं; जि. २, पृ. २४८-४६ के बीच के सेट. ६. ऍ. इं; जि. ८, पृ. १६८ के पास का प्लेट.
७. ऍ. इं; जि. २, पृ. ३६६ के पास का प्लेट.
५० प्राचीनलिपिमाला.
है. 'द' का मध्य भाग कहीं कहीं गोलाईदार नहीं किंतु समकोणवाला है. 'घ' को कहीं कहीं उलटा
भी लिखा है१. 'ज' के मध्य की दाहिनी तरफ़ की आडी लकीर को कुछ अधिक लंबा कर 'जा' बनाने
से 'ज' और 'जा' में भ्रम होने की संभावना रहती थी जिसको स्पष्ट करने के लिये ही लेखक ने 'ज' के
मध्य की लकीर के अंत में बिंदी बनाकर फिर 'आ' की मात्रा का चिह्न लगाया है. जिन अक्षरों का ऊपर
का भाग खडी लकीरवाला है उनके साथ 'ई' की मात्रा गिरनार के लेख की 'इ' की मात्रा के समान लगाई
है परंतु कुछ नीचे की तरफ़ से, जिससे 'ई' की मात्रा का रूप बन जाता है (देखो, 'पिं' और 'ली' में
'इ' और 'ई' की मात्राओं का भेद). अनुस्वार का चिह्न कहीं अक्षर के ऊपर परंतु विशेष कर आगे ही
धरा है (देखो, 'पिं' और 'भ्युं' )
खालसी के चटान के लेख की लिपि भद्दी है और त्वरा से लिखी हुई प्रतीत होती है जिससे अक्षर
सर्वत्र सम नहीं मिलते और स्वरों की मात्राओं में कहीं कहीं अंतर पड़ गया है (देखो, 'ता', 'शा', 'तु', 'खे',
'गे' और 'ले'). एक स्थान में 'ए' का रूप 'ठ' से मिल गया है. 'घ' और 'ल' का नीचे का भाग कहीं
कहीं गोल नहीं किंतु समकोणवाला बना दिया है (देखो, 'घ', और 'ल' का दूसरा रूप). 'छ' के
ऊपरी भाग में ∨ आकृति का सिर बना दिया है जिससे अनुमान होता है कि उस समय किसी किसी
लिपि में अक्षरों के सिर भी बनते हों, जिसका कुछ आभास भट्टिपोलु के लेखों में स्वरों की मात्रारहित
व्यंजनों में होता है. 'छ' का नीचे का भाग कलम को उठाये बिना ही (चलती कलम से) लिखा है. ऐसे
ही 'ज' को भी कहीं कहीं लिखा है जिससे बीच की आडी लकीर के स्थान में ग्रंथि हो गई है. अशोक
के लेखों में केवल एक यही लेख ऐसा है कि जिसमें 'श' और 'ष' के रूप मिलते हैं.
जोगड़ के लेख में 'ओ' उलटा लिखा है और एक स्थान में 'स' को चलती कलम से लिख दिया है
जिससे मध्य में गांठ बन गई है (जोगड के लेख के इस 'स' को गिरनार, सवालक स्तंभ और खालसी
के लेखों के 'स' से मिलाकर देखो).
सिद्धापुर के लेख में कहीं कहीं 'अ', 'फ', 'म' और 'र' की आकृतियां कुछ विलक्षण बनी हैं.
रधिआ के लेख में 'ड' के नीचे बिंदी बनाई है.
गिरनार के लेख और अशोक के अन्य लेखों के अक्षरों में कहां कहां अंतर है यह लिपिपत्र
दूसरे में दिये हुए अक्षरों को लिपिपत्र पहिले के अक्षरों से मिलाने से स्पष्ट हो जायगा. प्रत्येक अक्षर
की भिन्नता का विवेचन करने की आवश्यकता नहीं.
लिपिपत्र दूसरे की मूल पंक्तियों२ का नागरी अक्षरांतर―
देवानं पिये पियदसि लाज हेवं आहा सडुवीसति वस
अभिसितेन मे इयं धंमलिपि लिखापिता हिदतपालते
दुसंप्पटिपादये अंनत अगाया धंमकामताया अगाय
पलीखाया अगाय सुसूसाया अगेन भयेना अगेन उसा-
हेना एस चु खो मम अनुसथिया धंमापेखा धंमकां-
मता चा सुवे सुवे वढिता वढीसति चेवा पुलिसा पि
च मे उकसा चा गेवया चा मझिमा चा अनुविधियंती
――――
१. देखो ऊपर पृ. २७ का टिप्पण ६. २. ये मूल पंक्तियां देहली के सवालक स्तंभ के लेख से हैं.
ब्राह्मी लिपि. ५१
लिपिपत्र तीसरा.
यह लिपिपत्र रामगढ़१, घोसुंडी२, बेसनगर३ (विदिशा), नागार्जुनी गुफा४, नानाघाट५, भर-
हुत६ और सांची७ के स्तूपों और हाथीगुंफा८ के लेखों से तय्यार किया गया है और मुख्य मुख्य अक्षर
ही दिये गये हैं. उक्त लेखों में से पहिले ७ में कोई संवत् नहीं है, केवल हाथीगुंफा के लेख में मुरिय
काल९ (मौर्य संवत्) १६४ (गत) दिया है, अतएव इस लिपिपत्र का समय अनुमान के आधार
पर ही दिया गया है.
घोसुंडी के लेख में 'त्रे' में 'त्' के साथ 'र' को जोड़ने में 'त' के नीचे की दाहिनी ओर
की तिरछी लकीर को कुछ लंबा कर दिया है (इसी तरह बेसनगर के लेख के 'त्रे' में भी). 'प्रा'
में 'र' नीचे की तरफ जोड़ा गया है और 'ष्रे' में 'ष' के प्रारंभ की सीधी खड़ी लकीर को
अधिक लंबा कर 'र' का रूप उसीमें बता दिया है.
बेसनगर (विदिशा) के लेख में 'त्रा' और 'द्र' में 'र' को अधिक लंबी वक्र रेखा का रूप
देकर नीचे की तरफ जोड़ा है.
नानाघाट के लेख में 'इं' ⁝·१० बनाया है जिसमें तीन बिंदी तो 'इ' की हैं और चौथी अनुस्वार
की है. 'थो' में 'ओ' की मात्रा की दोनों तरफ की आड़ी लकीरों को जोड़ कर एक ही लकीर बना दी है
जो 'थ' से ऊपर अलग ही लगाई है परंतु 'लो' में 'ओ' की मात्रा की दोनों लकीरों को जोड़ कर
एक कर दिया है और उसे 'ल' के अग्रभाग के साथ ही ठीक ठीक जोड़ा है. 'प्र', 'ब्र' और
'व्र' में 'र' को नीचे की तरफ जोड़ा है जो 'उ' की मात्रा का भ्रम उत्पन्न कराता है.
भरहुत के लेख में 'वि' के साथ की 'इ' की मात्रा के अग्र भाग को दाहिनी तरफ़ बढ़ा कर
उसमें सुंदरता लाने का यत्न किया है और 'गी' के साथ की 'ई' की मात्रा की दोनों खड़ी लकीरों
को कुछ बाईं ओर झुकाया है.
१. आ. स. इं; ई. स. १६०३-४; प्लेट ४३ वां (B).
२. उदयपुर के विक्टोरिआ हाल में रक्खे हुए उक्त लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से.
३. आ. स. इं; ई. स. १६०८-६, प्लेट ४६ वां. ४. इं. अँ; जि. २०, पृ. ३६४-५ के पास के प्लेट.
५. आ. स. वे. इं; जि. ५; प्लेट ५१, लेख सं. १-२. ६. इं. अँ; जि. १४; पृ. १३६.
७. बू; इं. पे; प्लेट २, पंक्ति १८, अक्षर संख्या ४१.
८. बू; इं. पे; प्लेट २; पंक्ति २१-२२; और पं. भगवानलाल इंद्राजी संपादित 'हाथीगुंफा अँड थ्री अदर इन्स्क्रिप्शन्स्'
के साथ का प्लेट, लेख संख्या १.
९. यदि मौर्य संवत् का प्रारंभ मौर्यवंश के संस्थापक चंद्रगुप्त के राज्याभिषेक अर्थात् ई. स. पूर्व ३२१ से माना जावे
तो उक्त लेख का समय (३२१-१६४=) ई. स. पूर्व १५७ होगा.
१०. डॉ. बूलर ने इस चिह्न :: को 'ई' माना है (बू; इं. पे; पृ. ३४) और कोई कोई यूरोपियन् विद्वान् इसे बूलर के कथना-
नुसार ही पढ़ते हैं (ए. इं; जि. ८, पृ. ६०) परंतु वास्तव में यह 'इं' ही है. 'इ' की तीन बिंदियों के साथ अनुस्वार की चौथी
बिंदी लगने ही ऐसा रूप बनता है और चार बिंदी होने से ही उनको समान रेखा में लिखा है. अब तक केवल निम्न
लिखित ५ लेखों में ही यह चिह्न मिला है जहां सर्वत्र 'इं' पढ़ना ही युक्त है—
नानाघाट के लेख में—'नमो इंदस' (आ. स. वे. इं; जि. ५, प्लेट ५१, पंक्ति पहिली). बुद्धगया के २ लेखों में—'इंदागिमित्तास'
(क; भ. बो; प्लेट १०, संख्या ६-१०). मथुरा के लेख में—'गोतिपुत्रस इंद्रपा[ल...'] (ए. इं; जि. २, पृ. २०१ के पास का
प्लेट, लेख संख्या ६). नासिक के लेख में—'धंमदेवपुतस इंद्राग्निदतस' (ए. इं; जि. ८, पृ. ६०).
इन पांचों लेखों में यह चिह्न 'इंद्र' शब्द के प्राकृत रूप 'इंद' में प्रयुक्त हुआ है जहां 'ईद' पढ़ना ठीक नहीं हो सकता.
नानाघाट के लेख का कर्ता जहां प्राकृत में अनुस्वार की आवश्यकता नहीं थी वहां भी अनुस्वार लगाता है (नमो संकंसन-
बासुदेवानं......चतूंनं चं लोकपालानं) तो वह 'इंद्र' के प्राकृत रूप को 'इंद' न लिख कर 'ईद' लिखे यह संभव
ही नहीं.
सांची के लेख के 'ली' में 'ई' की मात्रा की दोनों खड़ी लकीरों को दाहिनी ओर झुकाया है.
हाथीगुंफा के लेख में अक्षरों के सिर बनाने का यत्न पाया जाता है परंतु वे वर्त्तमान नागरा अक्षरों
के सिरों जैसे लंबे नहीं किंतु बहुत छोटे हैं. ये सिरे पहिले पहिल इसी लेख में मिलते हैं. 'भि' और
और 'लिं' में 'इ' की मात्रा भरहुत स्तूप के उपर्युक्त 'वि' के साथ लगी हुई 'इ' की मात्रा के सदृश
है और 'दी' में 'ई' की मात्रा की दाहिनी ओर की खड़ी लकीर को भी वैसा ही रूप दिया है. 'ले' में
'ल' के अग्रभाग को दाहिनी ओर नीचे को झुकाया है और 'गो' में 'ओ' की मात्रा नानाघाट के
लेख के 'थो' के साथ की 'ओ' की मात्रा की नांई व्यंजन के ऊपर उसे स्पर्श किये बिना एक ही आड़ी
लकीर के रूप में धरी है.
लिपिपत्र तीसरे की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
१सुगनं रजे रञो गागीपुतस विसदेवस पौतेण गोति-
पुतस आगरजुस पुतेण वाछिपुतेन धनभूतिन
कारितं तोरनां(णं) सिलाकंमंता च उपंणा.
२धमंस नमो इंदस नमो संकंसनवासुदेवानं चं-
दस्स......मा...तानं चतुंनं चं लोकपालानं यमवरुन-
कुबेरवासवानं नमो कुमारवरस वेदिसिरिस र...
लिपिपत्र चौथा.
यह लिपिपत्र भट्टीप्रोलु के स्तूप से निकले हुए पत्थर के ३ पात्रों के ढक्कनों पर खुदे हुए ६
लेखों से तथा स्फटिक के एक छोटे से टुकड़े पर, जो वहीं से मिला था, खुदे हुए लेख से तय्यार किया
गया है.३ 'अ' से 'सं' तक के अक्षर उक्त नौ लेखों से और अंतिम ६ अक्षर ('ग' से 'हि' तक) स्फटिक
पर के लेख से लिये हैं, जिसकी लिपि पहिले तीन लिपिपत्रों की शैली की (ब्राह्मी) है. पाषाण के
पात्रों पर खुदे हुए ६ लेखों की लिपि में 'घ', 'द', 'भ', 'म', 'ल', 'ष' और 'ळ' इन ७ अक्षरों में पहिले
तीन लिपिपत्रों के अक्षरों से भिन्नता है (इन अक्षरों को लिपिपत्र १ से ३ तक के अक्षरों से मिलाकर
देखो). दूसरा भेद यह है कि प्रत्येक व्यंजन जब स्वरों की मात्रा से रहित होता है तब उसके साथ दाहिनी
ओर एक आड़ी लकीर लगाई गई है जैसे अशोक के लेखों में 'आ' की मात्रा लगाई जाती थी. यह
लकीर बहुधा व्यंजन के अग्रभाग से सटी रहती है परंतु कभी कभी कुछ नीचे की तरफ़ और कभी
मध्य में लगाई जाती है. 'ज' के साथ जब स्वर की कोई मात्रा नहीं होती तब वह अशोक के लेखों
के 'ज' के समान होता है (बीच की आड़ी लकीर स्वरचिह्नरहित दशा की है); परंतु जब उसके
साथ कोई स्वर की मात्रा लगी रहती है उस समय उसका रूप बहुधा [ मिलता है (देखो, जु, जू, जे, जं).
इन भेदों से पाया जाता है कि उक्त लेखों की लिपि पिप्रावा, बर्ली और अशोक के लेखों की लिपि से
नहीं निकली किंतु उस मूल लिपि से निकली होगी जिससे स्वयं पिप्रावा, बर्ली और अशोक के लेखों
की लिपि निकली है४. संभवतः यह द्रविड (द्राविडी) लिपि५ हो.
१. ये पहिली तीन पंक्तियां भरहुत के स्तूप के लेख से हैं (इं. ऐं.; जि. १४, पृ. १३६).
२. यहां से तीन पंक्तियां नानाघाट के लेख से हैं (आ. स. वे. इं; जि. ५, प्लेट ५१, लेख संख्या १).
३. ऐं. इं; जि. २, पृ. ३२८-२९ के बीच के प्लेट. ४. देखो ऊपर पृ. ४२.
५. भट्टीप्रोलु के उक्त ६ लेखों के अतिरिक्त इस शैली की लिपि (द्राविडी) का और कोई शिलालेख अब तक नहीं
मिला, परंतु आंध्रवंशी राजा गौतमपुत्र श्रीयज्ञशातकर्णी के एक प्रकार के सिक्के पर एक तरफ़ 'रञो गोतमिपुतस सिरियञ-
ब्राह्मी लिपि. ५३
इस लिपि में 'आ' की मात्रा का चिह्न बहुधा ⌉ है परंतु कहीं कहीं-कोण के स्थान में गोलाई
भी मिलती है (देखो, का, खा, ता). 'ऊ' की मात्रा में भी अशोक के लेखों से भिन्नता है (देखो,
जू, ब्रू, ब्रू) परंतु बाकी की मात्राओं में विशेष अंतर नहीं है. केवल कहीं कहीं सीधी लकीर को
तिरछा या गोलाईदार बना दिया है.
लिपिपत्र चौथे की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
¹कुरुपितुनेा च कुरुमातु च कुरुच च सिवका च स-
जुसं पणति फाल्लिग यमुन. ²ब बुधसरिगनं निखेतु.
³बलवपुतस कुरुश षपितुकप सजुम. ⁴उतारे पि-
गहपुतो काणीठो. ⁵अरहदिसानं गोठिया मजू-
स च पण्गो च तनकम येन कुबिरको राजा
अंकि. ⁶नेगमा वळो चद्यो जेतो जंधो तिसो रेतो
अचिन पभिका अखघो केलो केसो महे। सेटे। छदि-
लिपिपत्र पांचवां.
यह लिपिपत्र पभोसा के २ लेखों, मथुरा के छोटे छोटे ४ जैन लेखों तथा महाक्षत्रप शोडास के
मथुरा के लेख से तय्यार किया गया है. पभोसा के लेखों के अक्षरों में 'अ' की दाहिनी तरफ़ की
खड़ी लकीर को नीचे के छोर से बाईं तरफ मोड़कर ऊपर की ओर कुछ बढ़ा लिया है, जैसे कि ई. स.
की दूसरी शताब्दी से दक्षिण के लेखों में मिलता है. 'री' में 'ई' की मात्रा और 'पू' में 'ऊ'
की मात्रा में पहिले के लिपिपत्रों से भिन्नता है (देखो, 'री' और 'पू'). मथुरा के लेखों
में 'ख' और 'म
५४ प्राचीनलिपिमाला.
१समनस माहूरखितास अंतेवासिस वलौपुत्रस सावकास
उत्तरदासकस पसादो तोरणं. २अधिछत्राया राज्ञो शोन-
कायनिपुत्रस्य वंगपालस्य पुत्रस्य रजे(ज्ञो) तेवणीपुत्रस्य
भागवतस्य पुत्रेण वैहिदरीपुत्रेण अ(आ)षाढसेनेन कारितं.
लिपिपत्र छठा.
यह लिपिपत्र कुशनवंशी राजाओं के समय के मथुरा१, सारनाथ२ और चारगांव३ से मिले हुए लेखों
से तय्यार किया गया है. मथुरा के कई एक लेखों से अक्षर छांटे गये हैं, जिनमें कई अक्षरों के एक से अधिक
रूप मिलते हैं जो भिन्न भिन्न लेखकों की लेखन रुचि की भिन्नता प्रकट करते हैं. पहिली 'इ' में तीन
बिंदियों के स्थान पर तीन आड़ी रेखाएं बना दी हैं और दूसरी 'इ' में दो आड़ी लकीरों के आगे दाहिनी
ओर एक खड़ी लकीर बनाई है. 'उ' (पहिले) की दाहिनी ओर की आड़ी लकीर को नीचे की तरफ़
मोड़ा है. यही मोड़ बढ़ने पर नागरी का 'उ' बनता है (देखो, लिपिपत्र
ब्राह्मी लिपि. ५५
इसी लिपिपत्र के आधारभूत एक लेख में हलंत व्यंजन पहिले पहिल मिलता है, जिसको सिरों की पंक्ति
से नीचे लिखा है. इसके अतिरिक्त हलंत और स्वर व्यंजन में कोई अंतर नहीं है. 'भू' के साथ
की 'ऊ' की मात्रा नागरी की 'ऊ' की मात्रा से मिलती हुई है, 'र्णा' में 'आ' की मात्रा रेफ के साथ
लगाई है. और स्वरों की संधियां बहुधा नहीं की हैं.
लिपिपत्र सातवें की मूल पंक्तियों' का नागरी अक्षरांतर-
सिद्धम् राज्ञः क्षहरातस्य क्षत्रपस्य नहपानस्य जामा-
त्रा दीनीकपुत्रेण उषवदातेन त्रिगोशतसहस्रदेन न-
द्या(द्यां) बाणासायां सुवर्णदानतीर्थकरेण देवताभ्यः ब्राह्मणे-
भ्यश्च षोडशग्रामदेन अनुवर्षं ब्राह्मणशतसहस्री-
भोजापयित्रा प्रभासे पुण्यतीर्थे ब्राह्मणेभ्यः अष्टभार्याप्रदेन
भरुकच्छे दशपुरे गोवर्धने शोर्पारगे च चतुशालवसध-
प्रतिश्रयप्रदेन आरामतडागउदपानकरेण इबापारदादमण-
तापीकरबेणादाहनुकानावापुण्यतरकरेण एतासां च नदी-
लिपिपत्र आठवां.
यह लिपिपत्र उपर्युक्त अशोक के लेखवाले गिरनार के पास के चट्टान की पिछली तरफ़ खुदे
हुए महाक्षत्रप रुद्रदामन् के लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से बनाया गया है. यह लेख
शक संवत् ७२ (ई. स. १५०) से कुछ पीछे का है. इस लेख में 'पौ' के साथ जो 'औ' की मात्रा
जुड़ी है वह तो अशोक के लेखों की शैली से ही है और 'यौ' के साथ की मात्रा उसीका परि-
वर्तित रूप है जो पिछले लेखों में भी कुछ परिवर्तन के साथ मिल आता है, परंतु 'नौ' और 'मा'
के साथ जो 'औ' की मात्रा जुड़ी है वह न तो अशोक के लेखों में और न उनसे पिछले किसी लेख
में मिलती है अतएव संभव है कि वह चिह्न अशोक से पूर्व का हो. हलंत व्यंजन इसमें भी
पंक्ति से नीचे लिखा है.
लिपिपत्र आठवें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर-
परमलक्षणव्यंजनैरुपेतकान्तमूर्तिना स्वयमधिगतमहाक्षत्रप-
नाम्ना नरेंद्रकन्यास्वयंवरानेकमाल्यप्राप्तदाम्ना महाक्षत्रपेण
रुद्रदाम्ना वर्षसहस्राय गोब्रा......त्थं धर्मकीर्तिवृद्ध्यर्थं
च अपीडयित्वा करविष्टिप्रणयक्रियाभिः पौरजानपदं जनं
स्वस्मात्कोषा[त्] महता धनौघेन अनतिमहता च कालेन
त्रिगुणदृढतरविस्तारायामं सेतुं विधा...... सुदर्शनतरं
कारितमिति... स्मिन्नर्थे महाक्षत्रपस्य मतिसचिवकर्मसचिवै-
रमत्यगुणसमुद्युक्तैरप्यति महत्वाद्भेदस्यानुत्साहविमुखमतिभि-
१. ये मूल पंक्तियां ए. इं; जि. ८. प्लेट ४. लेख संख्या १० से हैं.
२. देखो, ऊपर पृ. ३, टिप्पण २.
५६ प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र नवां.
यह लिपिपत्र वासिष्ठीपुत्र पुळुमायि आदि आंध्रवंशी राजाओं के नासिक के पास की गुफाओं के
७ लेखों १ से तय्यार किया गया है. वासिष्ठीपुत्र पुळुमायि के लेख में 'नु' के साथ की 'उ' की मात्रा के
अंत में एक आड़ी लकीर और लगी हुई है और 'ह्य' में 'य' को ऊपर और 'ह' को नीचे लिखा है जो
लेखकदोष है. गौतमीपुत्र यज्ञशातकर्णि के लेख में पहिले 'त' को बिना कलम उठाये ही पूरा
लिखा है जिससे उसकी आकृति मथुरा के लेखों के दूसरे 'न' (लिपिपत्र ६) से ठीक मिलती हुई है.
यह दोष अन्यत्र भी पाया जाता है.
'लिपिपत्र नवें की मूलपंक्तियों २ का नागरी अक्षरांतर—
सिद्धं (द्धं) रञो वासिठिपुतस सिरिपुळुमायिस संवछरे एकु-
नवीसे १० ९ गिम्हाण पखे वितीये २ दिवसे तेरसे
१० ३ राजरञो गोतमीपुतस हिमवतमेरुमंदरपवतस-
मसारस असिकअसकमूळकसुरठकुकुरापरांत अनूपविद-
भझाकरावतिराजस विंझछवतपारिचातसह्यकह्वगिरिमच-
लिपिपत्र दसवां.
यह लिपिपत्र पश्चिमी क्षत्रप ३, त्रैकूटक ४ तथा आंध्रवंशी ५ राजाओं के सिक्कों पर के लेखों से तय्यार
किया गया है. क्षत्रपों के छोटे सिक्कों पर लंबा लेख होने से कितने एक सिक्कों पर के कोई कोई अक्षर अधिक
सिकुड़ गये हैं जिससे उनकी आकृति स्पष्ट नहीं रही (देखो 'य' का तीसरा रूप; 'स' का दूसरा रूप;
'ह' का तीसरा, चौथा और पांचवां रूप; 'च' का पांचवां रूप; 'ज्ञ' का दूसरा रूप), और कहीं कहीं स्वरों
की मात्राएं भी अस्पष्ट होगई हैं. त्रैकूटकों के सिक्कों में 'न, व', 'ह', 'त्त', 'त्र', 'व्य' और 'ष्ण' के रूप
विलक्षण मिलते हैं. आंध्रों के सिक्कों के अक्षरों में से अंतिम तीन अक्षर ( ष, हा, हि ) उपर्युक्त गौतमीपुत्र
१ वासिष्ठीपुत्र पुळुमायि के ४ लेखों से—एं. इं; जि. ८,
ब्राह्मी लिपि. ५७
श्रीयज्ञशातकर्णि के द्राविडी लिपिवाले लेख से लिये हैं और दूसरों से भिन्न होने के कारण अंत
में अलग दिये हैं.
लिपिपत्र १० वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
राज्ञो क्षहरातस नहपानस . राज्ञो महाक्षत्रपस घसमोतिकपुत्र-
स चष्टनस . राज्ञो महाक्षत्रपस ईश्वरदत्तस वर्षे प्रथमे .
राज्ञो महाक्षत्रपस दामसेनस पुत्रस राज्ञः क्षत्रपस यशोदाम्नः . राज्ञो
महाक्षत्रपस दामसेनपुत्रस राज्ञो महाक्षत्रपस दामजदश्रियः . राज्ञो महाक्ष-
त्रपस रुद्रसेनपुत्रस राज्ञो महाक्षत्रपस भर्तृदाम्नः . राज्ञ क्षत्रपस रुद्र-
सेनपुत्रस राज्ञ क्षत्रपस यशदाम्नः . . राज्ञ महाक्षत्रपसस्वम(स्वामि)रुद्रद(दा)मपुत्रस
लिपिपत्र ११ वां.
इस लिपिपत्र में भाजा, पित्तलखोरा, महाड आदि दक्षिण की भिन्न भिन्न गुफाओं के कई लेखों २
से मुख्य मुख्य अक्षर ही उद्धृत किये गये हैं.
भाजा के लेख में 'ठ' को त्वरा से लिखने के कारण उसकी आकृति वृत्त सी न बन कर उससे भिन्न
बन गई है. महाड के लेख में 'म' की आकृति दो अलग अलग अंशों में विभक्त हो गई है. वास्तव
में ये दोनों अंश जुड़ने चाहिये थे. कन्हेरी के लेख के 'लो' के साथ लगी हुई 'ओ' की मात्रा (कलम
को उठाये बिना मात्रा सहित अक्षर लिखने के कारण) गांठवाली बन गई है और दक्षिणी शैली के
पिछले कई लेखों में ऐसा ही 'लो' मिलता है (देखो लिपिपत्र ३६, ४३, ४४, ४६, ४७ आदि). यदि
कलम को उठा कर मात्रा का चिह्न लगाया जाता तो 'लो' की आकृति लिपिपत्र छठे में मथुरा के
लेखों से दी हुई 'लो' की आकृति से मिलती हुई होनी चाहिये थी. कार्ले के लेख में 'न' अक्षर की
जो आकृति मिलती है वह भी कलम को उठाये बिना पूरा अक्षर लिखने से ही बनी है परंतु कलम को
ऊपर की तरफ़ न बढ़ा नीचे की तरफ़ बढ़ाकर आड़ी लकीर खींची है जिससे ग्रंथिवाला रूप (जैसा
कि लिपिपत्र ६, ३६, ३७, ३८, ३९ आदि में है) न बन कर यह नया विलक्षण रूप बन गया है,
जिसके परिवर्तित रूप लिपिपत्र १३ और १४ में मिलते हैं. जुन्नर के लेख में 'मि' में जो 'म' का रूप
मिलता है उसीके परिवर्तित रूप से लिपिपत्र १३ और १४ में दिये हुए 'म' के विलक्षण रूप बने
हैं, जो अन्य लेखों में नहीं मिलते. 'व' और 'स' के सिर त्रिकोण आकृति के (भीतर से खाली)
बने हैं और कहीं 'इ' और 'ई' की मात्राओं में सुंदरता लाने का यत्न करने से उनकी आकृतियां
पहिले से अधिक विलक्षण हो गई हैं (देखो, रि, री, लि, वी). 'थ' में प्रथम 'थ' तो प्राचीन रूप
का और दूसरा 'थ' नागरी से मिलता हुआ है जो कलम को उठाये बिना ही पूरा अक्षर लिखने से बना है.
नासिक के लेखों के अक्षरों में 'मृ' के साथ लगी हुई 'ऋ' की मात्रा के दोनों छोर एक दूसरे के साथ
मिल गये हैं और 'न्ये' में 'य' को 'न्' की खड़ी लकीर के मध्य में जोड़ा है. कुड़ा के लेखों के
१. ये मूल पंक्तियां क्षत्रपों के सिक्कों पर के लेखों से हैं.
२. भाजा—आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ४४, लेखसंख्या ७. पित्तलखोरा—आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ४४, लेख-
सं. ६. महाड—आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ५६, लेखसं. २, ३, ४. सेलारवाडी—आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ४८, लेखसंख्या
१६. बेडसा—आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ४७, लेखसंख्या ३. कन्हेरी—आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ५१, लेखसंख्या २,
३, ४, ५, १४, १५. कार्ले—आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ४७, ४८, ५१, ५४, लेखसंख्या ३, ५, ६, ११, १३, १७, १८, २०, २१,
२२. जुन्नर—आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ४८-५१, लेखसंख्या २--६, १०, १४, १५, २०, २४, २५, २८. नासिक—एपें. इं; जि. ८, नासिक
के लेखों का प्लेट ५, लेखसंख्या १८; प्लेट ३, सं. ६; प्लेट ८, सं. ८; प्लेट ५, सं. २३. आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ५५, लेख-
संख्या १६, २२, २४, २५ (नासिक). कुडा—आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ३५--३६ लेखसंख्या १, ५, ६, ११, १३, २०, २४.
५८ प्राचीनलिपिमाला.
अक्षरों में 'अ', 'क', 'र' आदि खड़ी लकीर वाले अक्षरों की तथा 'पु' में 'उ' की मात्रा की खड़ी
लकीर को लंबा कर नीचे के भाग में बाईं ओर ग्रंथि सी बना कर अक्षर में अधिक सुंदरता लाने का
यत्न स्पष्ट पाया जाता है.
लिपिपत्र ११ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
सिधं ओतराहस दांतामितियकस यणकस धंमदेवपुतस
इंद्राग्निदतस धंमात्मना इमं लेणं पवते तिरणहुम्हि खा-
नितं अभंतरं च लेणस चेतियघरो पोढियो च माता-
पितरो उदिस इम लेण कारितं सवबुधपुजाय चातुदि-
शस भिखुसंघस नियातितं सह पुतेन धंमरखितेन.
लिपिपत्र १२ वां.
यह लिपिपत्र अमरावती के कई एक लेखों¹ तथा जग्गयपेट के ३ लेखों² से तय्यार किया गया
है. अमरावती के लेखों के अक्षरों में 'इ' की तीन बिंदियों के स्थान में तीन आड़ी लकीरें बनाई हैं
इतना नहीं किंतु उनको वक्र भी बनाया है और 'जा' में 'आ' की मात्रा को नीचे की ओर झुकाया है.
जग्गयपेट के लेखों में 'अ', 'क', 'ञ' आदि अक्षरों की खड़ी लकीरों को नीचे की ओर बहुत बढ़ा
कर उनमें बाईं ओर घुमाव डाला है. और 'ल' की खड़ी लकीर को ऊपर की ओर बढ़ाकर घुमाया है, ऐसे
ही 'इ', 'ई' को और कहीं 'उ' की मात्राओं को भी; 'इ' के चिह्न की तीन बिंदियों के स्थान में अधिक
मुड़ी हुई लकीरें बनाई हैं. 'इ' के पहिले रूप की इन तीनों लकीरों को चलती कलम से जोड़ कर
लिखने से वर्तमान तामिळ लिपि के 'इ' का पूर्वरूप बन जाता है (देखो, लिपिपत्र ८४ में तामिळ
लिपि की उत्पत्ति में 'इ' का तीसरा रूप).
लिपिपत्र १२ वें की मूल पंक्तियों⁴ का नागरी अक्षरांतर—
सिधं। रञो (ञो) माढरिपुतस इखाकुना (णं) सिरिविरपुरिसदतस सं-
वछर २० वासापखं ६ दिवसं १० कमाकरथे णडतुरे
आवेनिस नाकचंदस पूतो गामे महाकांदूरुरे आवेसनि
सिधथो आपणो मातरं नागिलनिं पुरतो कातुनं घरनिं
लिपिपत्र १३ वां.
यह लिपिपत्र मोग्रिडवोलु से मिले हुए पल्लववंशी शिवस्कंदवर्मन् के दानपत्र⁵ से तय्यार किया
गया है. इसमें 'ए', 'ज', 'त', 'न', 'म' और 'स' अक्षर विलक्षण हैं. 'ए' की त्रिकोण
आकृति मिटकर नया रूप बना है जो त्वरा से लिखने के कारण ऐसा हुआ है. कलम उठाये बिना
ही 'त' को पूरा लिखने से उसके बीच में ग्रंथि बन गई है⁶. 'न' कार्ले के लेख में मिलनेवाले
१. ये मूल पंक्तियां इंद्राग्निदत्त के लेख से हैं (एं. इं; जि. ८, नासिक के लेखों का प्लेट ५, लेखसंख्या १८.)
२. आ. स. स. इं; जि. १, प्लेट ५६, लेखसंख्या १, १३, १६, १७, १८, ३०, ३१, ३८, ४०, ४१, ४५, ५३.
३. आ. स. स. इं; जि. १, प्लेट ६२, ६३, लेखसंख्या १-३.
४. ये मूल पंक्तियां आ. स. स. इं; प्लेट ६३, लेखसंख्या ३ से हैं.
५. ऎं. इं; जि. ६, पृ. ८४ से ८८ के बीच के ५ प्लेटों से.
६. 'त' का ऐसा ही रूप कन्हेरी के एक लेख में भी मिलता है (देखो, लिपिपत्र ११ में).
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ब्राह्मी लिपि. ५६
उक्त अक्षर का कुछ परिवर्तित रूप है१. 'म' जुन्नर के लेख के 'मि' में जो 'म' अक्षर है उसका विकार
मात्र है२. 'स' की बाईं तरफ़ लगनेवाली वक्र रेखा को अक्षर के मुख्य अंश से अलग कर उसको
दाहिनी तरफ़ अधिक ऊपर बढ़ाने से यह विलक्षण 'स' बना है.
लिपिपत्र १३ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
...३चौपुरातो युवमहाराजो भारदायसगोत्तो प-
ल्लवानं सिवखंदवम्मो धंजकड़े वापतं आन-
पयति अम्हेहि दानि अंह वेजयिके धंमा-
युबलवधनिके य बम्हनानं अगिवेससगो-
लिपिपत्र १४ वां.
यह लिपिपत्र कोंडमुडि से मिले हुए राजा जयवर्मन् के दानपत्र४ से तय्यार किया गया है.
इसमें 'ई' की खड़ी लकीर को तिरछा कर दिया है. 'ड' और 'न' में स्पष्ट अंतर नहीं है. 'ज',
'न', 'म' और 'स' अक्षर लिपिपत्र १३ के उक्त अक्षरों से मिलते जुलते ही हैं इतना ही नहीं किंतु
इस दानपत्र की लिपि बहुधा वैसी ही है जैसी कि लिपिपत्र १३ वें की है.
लिपिपत्र १४ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
विजयखंधावारा नगरा कूटूरातो महेस्वरपादप-
रिगहिते बृहत्फलायनसगोतो राजा सिरिजय-
वंमो आनपयति कूटूरे वापतं अंम्हे दानि
अंम्हवेजयिके आयुवर्धनिके च बम्हनानं
गोतमसगोत्तजायाणरस सवगुतजस ट तानवस
लिपिपत्र १५ वां.
यह लिपिपत्र हीरहडगल्ली से मिले हुए पल्लववंशी राजा शिवस्कंदवर्मन् के दानपत्र५ से
तय्यार किया गया है. इसमें 'इ' और 'ध' की बिंदियों के स्थान में + चिह्न लगाये हैं. 'ए'
की आकृति नागरी के 'व' (बिना सिर के) से कुछ कुछ मिलती हुई बन गई है. 'ब' की बांई
तरफ़ की खड़ी लकीर को भीतर की ओर अधिक दबा कर बीच में गोलाई दी है. 'ब' का यह
रूप दक्षिण की शैली की पिछली लिपियों में बराबर मिलता है. 'म्' को पंक्ति से नीचे लिखा है
और उसके ऊपर के दोनों शृंगों के साथ सिर की छोटी लकीरें नहीं जोड़ी जो सस्वर 'म' के
साथ जुड़ी हुई मिलती हैं. 'गा' के साथ 'आ' की मात्रा नीचे की तरफ़ से लगाई है.
लिपिपत्र १५ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
सिद्धम् ॥ कांचिपुरा अग्गिट्टो(त्थो)मवाजपेयस्समेधयाजी
धम्ममहाराजाधिराजो भारद्वायो पल्लवाण सिव-
खंदवमो अम्ह विसये सव्वत्थ राजकुमारसे-
नापतिरट्ठिकमाडबिकदेसाधिकतादिके गामागाम-
भोजके वल्लवे गोवल्लवे अम्हे आरणधिकते
१. देखो, लिपिपत्र ११ में कार्ले के लेखों के अक्षरों में 'न'. २. देखो, लिपिपत्र ११ में जुन्नर के लेखों का 'मि'.
३. पहिला अक्षर 'कां' है परंतु मूल में स्पष्ट नहीं है. ४. एँ. इं; जि. ६, पृ. ३१५ से ३१९ के बीच के ४ प्लेटों से.
५. एँ. इं; जि. १, पृ. ६-७ के बीच के ३ प्लेटों से.
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ई-गुप्तलिपि.
ई. स. की चौथी और पांचवीं शताब्दी ( लिपिपत्र १५-१७ ).
गुप्तों के राज्य के समय सारे उत्तरी भारत में ब्राह्मी लिपि का जो परिवर्तित रूप प्रचलित
था उसका कल्पित¹ नाम 'गुप्तलिपि' रक्खा गया है. यह लिपि गुप्तवंशी राजाओं के, जो उत्तरी
भारत के बड़े हिस्से के स्वामी थे, लेखों में, एवं उनके समकालीन परिव्राजक और राजर्षितुल्य
वंशियों तथा उच्छ्रकल्प के महाराजाओं के दानपत्रादि में, जो अधिकतर मध्यभारत से और कुछ
मध्यप्रदेश से मिले हैं, पाई जाती है. ऐसे ही उक्त समय के अन्य राजवंशियों तथा साधारण
पुरुषों के लेखादि में भी मिलती है. राजपूताना,² मध्यभारत³ तथा मध्यप्रदेश⁴ में गुप्तकाल में भी
कहीं कहीं दक्षिणी शैली की ( पश्चिमी ) लिपि भी मिल आती है, जिसका एक कारण यह भी है
कि लेख को लिखने के लिये बहुधा सुंदर अक्षर लिखनेवाला पसंद किया जाता है और वह जिस शैली
की लिपि का ज्ञाता होता है उसीमें लिखता है. देशभेद और समय के साथ भी अक्षरों की
आकृति में कुछ अंतर पड़ ही जाता है और उसीके अनुसार लिपियों के उपविभाग भी किये जा सकते
हैं परंतु हम उनकी आवश्यकता नहीं समझते.
गुप्तों के समय में कई अक्षरों की आकृतियां नागरी से कुछ कुछ मिलती हुई होने लगीं. सिरों
के चिह्न जो पहिले बहुत छोटे थे बढ़ कर कुछ लंबे बनने लगे और स्वरों की मात्राओं के प्राचीन
चिह्न लुप्त हो कर नये रूपों में परिणत हो गये हैं.
१. गुप्तलिपि का ही नहीं परंतु पृ. ४२-४४ में ब्राह्मीलिपि के विभागों के जो नाम रक्खे गये हैं वे बहुधा सब ही
कल्पित हैं और अक्षरों की आकृति, देश या उन लिपियों से निकली हुई वर्तमान लिपियों के नामों से ही उनके नामों की
कल्पना की गई है. इसी तरह उनके लिये जो समय माना गया है वह भी अनुमानिक ही है क्योंकि कई अक्षरों के वे ही
रूप अनुमान किये हुए समय से पहिले और पीछे भी मिलते हैं.
२. राजपूताने में बहुधा लेख उत्तरी शैली के ही मिलते हैं परंतु गंगधार (झालावाड़ राज्य में) से मिला हुआ वि.
सं. ४८० (ई. स. ४२३) का लेख (फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या १७), जो विश्ववर्मन् का है, दक्षिणी शैली की लिपि का है
और बयाने (भरतपुरराज्य में) के किले (विजयगढ़) में विष्णुवर्द्धन के पुंडरीक यज्ञ के यूप (= स्तंभ) पर खुदे हुए लेख
(फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ५६) में, जो वि. सं. ४२८ (ई. स ३७२) का है, दक्षिणी शैली का कुछ मिश्रण पाया जाता है.
३. मध्यभारत में भी गुप्तकाल के लेख बहुधा उत्तरी शैली के ही मिलते हैं परंतु कहीं कहीं दक्षिणी शैली के भी मिल
आते हैं; जैसे कि चंद्रगुप्त (दूसरे) का सांची का लेख (फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ५); नरवर्मन् का मंदसोर से मिला हुआ
मालव (विक्रम) सं. ४६१ का (पै. इं; जि. १२, पृ. ३२०-२१) और कुमारगुप्त के समय का मालव (विक्रम) सं. ५२६ का
(फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या १८) लेख. उदयगिरि से मिला हुआ चंद्रगुप्त (दूसरे) के समय का एक लेख (फ्ली; गु. इं; लेख-
संख्या ६) उत्तरी शैली की लिपि का है, परंतु वहीं से मिला हुआ उसी राजा के समय का दूसरा लेख (फ्ली; गु. इं; लेख-
संख्या ३) दक्षिणी शैली का है और वहीं से मिले हुए तीसरे लेख की (फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ६१), जो गुप्त संवत १०६
(ई. स. ४२५-६) का है, लिपि उत्तरी शैली की होने पर भी उसमें दक्षिणी शैली का कुछ कुछ मिश्रण पाया जाता है. इस
प्रकार एक ही स्थान के लेखों में भिन्न शैली की लिपियों का मिलना यही बतलाता है कि उनके लेखक भिन्न लिपियों के ज्ञाता
थे न कि देशभेद ही इस अंतर का कारण था.
४. मध्यप्रदेश में भी गुप्तों के समय उत्तरी शैली की लिपि का प्रचार था परंतु कोई कोई लेख दक्षिणी शैली के भी
मिल आते हैं; जैसा कि एरण से मिला हुआ समुद्रगुप्त के समय का लेख (फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या २), परंतु वहीं से मिले
हुए बुधगुप्त और गोपराज के लेख उत्तरी शैली के हैं (फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या १६ और २०).
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गुप्त लिपि. ६१
लिपिपत्र १६ वां.
यह लिपिपत्र गुप्तवंशी राजा समुद्रगुप्त के अलाहाबाद के स्तंभ के लेख¹ से तय्यार किया गया
है. इसमें 'इ' का चिह्न दो बिंदियों के आगे एक खड़ी लकीर है. 'उ' की खड़ी लकीर में वक्रता
है और नीचे की आड़ी लकीर गोलाई के साथ दाहिनी तरफ़ ऊपर की ओर मुड़ी है, जैसा कि
दक्षिणी शैली की लिपियों में पाया जाता है. ड, ढ, त, द, प, भ, म और 'ष' (पहिले) के रूप
नागरी से कुछ मिलने लगे हैं. 'ष' (दूसरे) और 'स' के रूपों की आकृतियां कुछ विलक्षण हैं.
लिपिपत्र १६ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
महाराजश्रीगुप्तप्रपौत्रस्य महाराजश्रीघटोत्कचपौत्रस्य महाराजा-
धिराजश्रीचन्द्रगुप्तपुत्रस्य लिच्छविदौहित्रस्य महादेव्यं कुमारदे-
व्यामुत्प(त्प)न्नस्य महाराजाधिराजश्रीसमुद्रगुप्तस्य सर्व्वपृथिवीविजय-
जनितोदयव्याप्तनिखिलावनितलां कीर्त्तिमितस्त्रिदशपतिभवनगमनावा-
प्तललि(डि=लि)तसुखविचरणामाचक्षाण इव भुवो बाहुरयमुच्छ्रितः
स्तम्भः यस्य । प्रदानभुजविक्रमप्रशमशास्त्रवाक्योदयैरुपर्युपरिसं-
चयोच्छ्रितमनेकमागं यशः पुनाति भुवनत्रयं पशुपतेर्ज्टान्तर्गहा-
लिपिपत्र १७ वां.
यह लिपिपत्र गुप्तों के राजत्वकाल के उदयगिरि², मिहरोली³, बिलसद⁴, करंडांडा⁵ और कुड़ा⁶
के शिलालेखों तथा महाराज लक्ष्मण और जयनाथ के दानपत्रों⁷ से तय्यार किया गया है और इसमें
केवल मुख्य मुख्य अक्षर ही उद्धृत किये गये हैं. उदयगिरि के लेख में पहिले पहिल जिह्वामूलीय और
उपध्मानीय के चिह्न मिलते हैं, जो क्रमशः 'क' और 'प' के ऊपर उक्त अक्षरों से जुड़े हुए लगे हैं.
मिहरोली के लेख में कितने एक अक्षर समकोणवाले हैं. 'स्थि' और 'स्थे' में 'स' की आकृति कुछ
विलक्षण हो गई है. ऐसे ही 'स्थि' में 'थ' अक्षर का रूप 'छ' से मिलता हुआ है न कि 'थ' से.
बिलसद के लेख में स्वरों की उन मात्राओं में, जो अक्षरों के ऊपर लगती हैं, अधिक विकास पाया
जाता है और उन्हीं के परिवर्तन से कुटिल लिपि में उनके विलक्षण लंबे रूप बने हैं. करंडांडा के लेख में
'म' की आकृति विलक्षण बनाई है. महाराज लक्ष्मण के पाली गांव के दानपत्र में कहीं कहीं सिरों
तथा खड़ी, आड़ी या तिरछी लकीरों के अंतिम भाग को चीर दो हिस्से बनाकर अक्षरों में सुंदरता
लाने का यत्न किया है. 'म' के नीचे के ग्रंथिवाले हिस्से को बाईं तरफ़ बढ़ा कर लंबी लकीर का
रूप दिया है और 'त्र' में 'र' को नागरी की 'उ' की मात्रा के समान ग्रंथित बनाया है. जयनाथ के
दानपत्र में 'इ' की तीन बिंदियों में से ऊपर की बिंदी के स्थान में आड़ी लकीर बनाई है. 'इ' के इसी
रूप के परिवर्तन से पीछे से नागरी की 'इ' बनी है (देखो लिपिपत्र ८२ में 'इ' की उत्पत्ति). तोर-
माण के कुड़ा के लेख के अक्षरों में 'ग' की बाईं तरफ की खड़ी लकीर को बांईं ओर ऊपर की तरफ
मोड़ा है जिससे उक्त अक्षर का रूप वर्तमान नागरी के 'ग' से मिलता हुआ बन गया है, केवल
सिर की आड़ी लकीर का ही अभाव है.
१. फ्ली; गु. इं; प्लेट १. २. फ्ली; गु. इं; प्लेट ४ (A). ३. फ्ली; गु. इं; प्लेट २१ (A).
४. फ्ली; गु. इं; प्लेट ५. ५. ऍ. इं; जि. १०, पृ. ७१ के पास का प्लेट.
६. ऍ. इं; जि. १, पृ. २४० के पास का प्लेट.
७. लक्ष्मण का दानपत्र-ऍ. इं; जि. २, पृ. ३६४ के पास का प्लेट; और जयनाथ का दानपत्र-फ्ली; गु. इं; प्लेट १६.
६२ | प्राचीनलिपिमला.
लिपिपत्र १७ वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति जयपुरात्परममाहेश्वरः श्रीममहाराजलक्ष्म-
णः कुशली फेलापर्व्वतिकाग्रामे ब्राह्मणादीन्प्रतिवासिकु-
टुम्बिनः समाज्ञापयति विदितं वोस्तु यथैष ग्रा-
मो मया मातापित्रोरात्मनश्च पुण्याभिवृद्धये कौत्सस-
७—कुटिल लिपि.
ई. स. की छठी से नवीं शताब्दी (लिपिपत्र १८ से २३).
ई. स. की छठी से नवीं शताब्दी तक की बहुधा सारे उत्तरी भारतवर्ष की लिपि का, जो
गुप्तलिपि का परिवर्तित रूप है, नाम 'कुटिललिपि' कल्पना किया गया है. 'कुटिलाक्षर' नाम का
प्राचीन प्रयोग² भी मिलता है परंतु वह भी उसके वर्णों और विशेष कर मात्राओं की कुटिल
आकृतियों के कारण रक्खा गया हो ऐसा अनुमान होता है³. इस लिपि के अक्षरों के सिर बहुधा
▾ ऐसे होते हैं परंतु कभी कभी छोटी सी आड़ी लकीर से भी वे बनाये जाते हैं. अ, आ, घ, प, म,
य, ष और 'स' का ऊपर का अंश दो विभागवाला होता है और बहुधा प्रत्येक विभाग पर सिर का चिह्न
जोड़ा जाता है.
यह लिपि मंदसोर से मिले हुए राजा यशोधर्मन् के लेखों⁴, महानामन् के बुद्धगया के लेखों⁵,
¹ ये मूल पंक्तियां पाली गांव से मिले हुए महाराज लक्ष्मण के दानपत्र (पं. इं; जि. २, पृ. ३६४ के पास के प्लेट)
से उद्धृत की गई हैं.
² देवल (युक्तप्रदेश में पीलीभीत से २० मील पर) गांव से मिली हुई वि. सं. १०४६ (ई. स. ९९२) की प्रशस्ति में
'कुटिलाक्षराणि' (विष्णोहरेस्तनयेन च लिखिता गौडेन करणिकेनैषा। कुटिलाक्षराणि विदुषा तच्चादित्याभिधानेन ॥ ऍ. इं; जि. १,
पृ. ८१) और विक्रमांकदेवचरित में 'कुटिललिपिभिः' (नौ कायस्थैः कुटिललिपिभिर्नो विटैश्चाटदत्तैः १८. ४२) लिखा मिलता है.
उनमें 'कुटिल' शब्द क्रमशः अक्षरों तथा लिपि का विशेषण है; परंतु उनमें उस समय की नागरी की, जो कुटिल से मिलती हुई
थी, 'कुटिल' संज्ञा मानी है. मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा अपराजित के समय की वि. सं. ७१८ (ई. सं. ६६१) की प्रशस्ति के
अक्षरों को 'विकटाक्षर' कहा है (यशोभटेन पूज्यसुतकीर्त्तणा विकटाक्षरा ॥ ऍ. इं; जि. ४, पृ. ३२), और अफसद के लेख में
(फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ४२) 'विकटाक्षराणि' लिखा मिलता है. 'विकट' और 'कुटिल' दोनों पर्याय हैं और
अक्षरों की आकृति के सूचक हैं.
³ कुटिललिपि में अक्षरों की खड़ी रेखाएं नीचे की तरफ बाईं ओर मुड़ी हुई होती हैं और स्वरों की मात्राएं अधिक
टेढ़ी मेढ़ी तथा लंबी होती हैं इसी से उसका नाम कुटिल पड़ा.
⁴ राजा यशोधर्मन् के तीन लेख मंदसोर से मिले हैं जिनमें से एक मालव (विक्रम) सं. ५८९ (ई. स. ५३२) का है
(फ्ली; गु. इं; प्लेट २१ B, C, और २२).
⁵ महानामन् नामवाले दो लेख बुद्धगया से मिले हैं (फ्ली; गु. इं; प्लेट ४१ A और B) जिनमें से एक में
संवत् २६९ है. यदि यह गुप्त संवत् माना जावे तो इसका समय ई. स. ५८८-९ होगा.
कुटिल लिपि. ६३
मोखरियों के लेख और मुद्रा १, वर्मलात के समय के वसंतगढ़ के लेख २, राजा हर्ष के दानपत्रादि ३,
नेपाल के अंशुवर्मन् के लेखों ४, मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा शीलादित्य और अपराजित के लेखों ५,
मगध के गुप्तवंशी आदित्यसेन और जीवितगुप्त (दूसरे) के लेखों ६, कुदारकोट के लेख ७, झालरा-
पटण से मिले हुए राजा दुर्गगण के लेखों ८, कोटा के निकट कणस्वा (कणवाश्रम) के मंदिर में लगी हुई
राजा शिवगण की प्रशस्ति ९, बनारस से मिले हुए पंथ के लेख १०, कामां (कामवन)
से मिले हुए यादवों के लेख ११, लाखामंडल की प्रशस्ति १२, चंबा राज्य से मिले हुए राजा
मेरुवर्मन् के लेखों १३, राजपूताना और मालवे से मिले हुए प्रतिहार (पड़िहार) वंशियों के लेखादि १४
१. मौखरी (मुखर) वंशी राजा ईशानवर्मन् का हड़ाह का शिलालेख वि. सं ६११ (ई. स. ५५३) का है (सरस्वती,
ई. स. १६१६, पृ. ८१-८३). आसीरगढ़ से मिली हुई ईशानवर्मन् के पुत्र शर्ववर्मन् की मुद्रा में कोई संवत् नहीं है (फ्ली; गु.
इं; सेट ३० A). अनंतवर्मन के बराबर और नागार्जुनी पहाड़ियों की गुफाओं के लेखों (फ्ली; गु. इं; प्लेट ३० B, ३१ A
और B) में भी संवत् नहीं मिलता परंतु उसका ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आस पास होना अनुमान किया जा
सकता है. जौनपुर का लेख भी, जिसका प्रारंभ का हिस्सा बचने नहीं पाया, संभवतः उपर्युक्त ईशानवर्मन् के समय का
हो (फ्ली; गु. इं; प्लेट ३२ A). २. यह लेख वि. सं. ६८२ (ई. स. ६२५-६) का है (ऍ. इं; जि. ६, पृ. १८० के पास का प्लेट).
३. बैसवंशी राजा हर्ष का बांसखेड़ा का दानपत्र हर्ष संवत् २२ (वि. सं. ६८८-६) का (ऍ. इं; जि. ४, पृ. २१० के
पास का प्लेट) और मधुबन से मिला हुआ दानपत्र हर्ष संवत् २५ (ई. स. ६३१) का है (ऍ. इं; जि. १. पृ. ७२-७३).
सोनपत से मिली हुई उक्त राजा की मुद्रा (फ्ली; गु. इं; प्लेट ३२ B) में संवत् नहीं है.
४. अंशुवर्मन् के समय के लेखों में से एक में संवत् ३१६ (या ३१८?) है (इं. पं; जि. १४, पृ. ६८. बें; ज. ने; पृ. ७४)
जिसको गुप्त संवत् माना जावे तो उसका समय ई. स. ६३५-६ (या ६३७-८?) होगा. उसके दूसरे लेखों में संवत् ३४, ३६, ४५ (?)
और ४८ मिलते हैं (बें; ज. ने; पृ; ४. इं. पं; जि. ६, पृ. १७०-७१). यदि इन संवतों को हर्ष संवत् मानें तो इनका
समय ई. सं. ६४० से ६५४ तक स्थिर होगा.
५. मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा शीलादित्य (शील) के समय का एक शिला लेख वि. सं. ७०३ (ई. स. ६४६)
का मेवाड़ के भोमट इलाके के सामोली गांव से मिला है जो मैंने राजपूताना म्यूज़िअम (अजमेर) को भेट किया. यह
लेख अभी तक छुपा नहीं है. राजा अपराजित का लेख वि. सं. ७१८ (ई. स. ६६१) का है (ऍ. इं; जि. ४, पृ. ३०
के पास का सेट).
६. आदित्यसेन के समय के तीन लेखों में से दो में संवत् नहीं है (फ़्ली; गु. इं; सेट २८, और पृ. २१२) परंतु तीसरा
जो शाहपुर से मिली हुई सूर्य की मूर्ति के आसन पर खुदा है [हर्ष] संवत् ६६ (ई. स. ६७२) का है (फ़्ली; गु. इं; सेट
२६ A). आदित्यसेन के प्रपौत्र जीवितगुप्त (दूसरे) के समय का एक लेख देवबर्नाकं से मिला है वह भी बिना संवत्
का है (फ़्ली; गु. इं; सेट २६ B).
७. कुदारकोट के लेख में संवत् नहीं है परंतु उसकी लिपि आदि से उसका समय ई. स. की सातवीं शताब्दी
अनुमान किया जा सकता है (ऍ. इं; जि. १, पृ. १८० के पास का सेट).
८. झालरापाटण से मिले हुए राजा दुर्गगण के दो लेख एक ही शिला पर दोनों ओर खुदे हैं जिनमें से एक वि. सं.
७४६ (ई. स. ६८६) का है (इं. ऍ; जि. ५, पृ. १८१-८२ के बीच के प्लेट).
९. शिवगण की कणस्वा की प्रशस्ति वि. सं. ७९५ (ई. स. ७३८) की है (इं ऍ; जि. १६, पृ. ५८ के पास का प्लेट).
१०. इस लेख में संवत् नहीं है परंतु इसकी लिपि ई. स. की ७ वीं शताब्दी के आस पास की अनुमान की जा सकती
है (ऍ. इं; जि. ६, पृ. ६० के पास का सेट).
११. इस लेख में संवत् नहीं है परंतु इसकी लिपि ई. स. की आठवीं शताब्दी की अनुमान की जा सकती है (इं. ऍ;
जि. १०, पृ. ३४ के पास का प्लेट).
१२. महा के लखामंडल नामक मंदिर की प्रशस्ति में संवत् नहीं है परंतु उसकी लिपि ई. स. की आठवीं शताब्दी
के आसपास की प्रतीत होती है (ऍ. इं; जि. १, पृ. १२ के पास का प्लेट).
१३. मेरुवर्मन् के पांच लेखों में से एक शिला पर (वो; पँ. चं. स्टे; प्लेट ११) और चार पित्तल की मूर्तियों के आस-
नों पर खुदे हुए मिले हैं (वॊ; ऍ. चं. स्टे; प्लेट १०). उन सब में संवत् नहीं है परंतु लिपि के आधार पर उनका समय
ई. स. की आठवीं शताब्दी माना जा सकता है.
१४. प्रतिहार राजा नागभट का बुचकला का लेख वि. सं. ८७२ (ई. स. ८१५) का (ऍ. इं; जि. ६, पृ. २०० के पास
प्लेट); बाउक का जोधपुर का वि. सं. ८९४ (ई. स. ८३७) का (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६४ पृ. ४); कक्कुक का
घटिआले का वि. सं. ९१८ (ई. स. ८६१) का (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६५ पृ. ५१६); भोजदेव (प्रथम) का वि. सं.
६०० का दानपत्र (ऍ. इं; जि. ५ पृ. २११-२); और ५ शिला लेख; जिन में से देवगढ़ का वि. सं. ९१६ (ई. स. ८६२) का