प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
भारतवर्ष में लिखने के प्रचार की प्राचीनता. ६
छांदोग्य उपनिषद् १ में 'अक्षर' २ शब्द मिलता है तथा 'ई', 'ऊ' और 'ए' स्वर, ईकार, ऊकार
और एकार शब्दों से सूचित किये हैं ३ और स्वरों का संबंध इंद्र से, ऊष्मन् का प्रजापति से और
स्पर्शवर्णों का मृत्यु से बतलाया है ४. ऐसे ही तैत्तिरीय उपनिषद् में वर्ण और मात्रा का उल्लेख मिलता
है ५.
ऐतरेय आरण्यक में ऊष्मन्, स्पर्श, स्वर और अंतःस्थ ६ का; व्यंजन और घोष ७ का; णकार
और षकार (मूर्धन्य) के नकार और सकार (दंत्य) से भेद ८ का तथा 'संधि' ९ का विवेचन मिलता
है. ये सब बहुधा शांखायन आरण्यक में भी हैं.
ऐतरेय ब्राह्मण में 'ॐ' अक्षर, को अकार, उकार और मकार वर्णों के संयोग से बना हुआ
बतलाया है १०.
शतपथ ब्राह्मण में 'एकवचन,' ११ बहुवचन ' ११ तथा तीनों 'लिंगों' १२ के भेद का विवेचन मिलता है.
तैत्तिरीय संहिता में ऐंद्रवायव नामक ग्रह (सोमपात्र) दोनों देवताओं (इंद्र और वायु) को
एक ही दिये जाने के कारण का वर्णन करते समय लिखा है कि '[पहले] वाणी अस्पष्ट और अनि-
यमित (बिना व्याकरण के) थी. देवताओं ने इंद्र से कहा कि तुम इसका हमारे लिये व्याकरण
(नियमबंधन) कर दो. इंद्र ने कहा कि मैं [इस काम के लिये] यह वर मांगता हूं कि यह (सोम-
पात्र) मेरे तथा वायु के लिये एक ही लिया जाय. इससे ऐंद्रवायव ग्रह शामिल ही लिया जाता
है. इंद्र ने वाणी को बीच में से पकड़ कर व्याकृत किया. इसलिये वाणी व्याकृत (व्याकरणवाली,
नियमबद्ध) कही जाती है' १३. यही कथा शतपथ ब्राह्मण में भी मिलती है परंतु उसमें 'वि+आ+कृ'
धातु के स्थान पर 'निर्+वच्' धातु से बने हुए 'निर्वचन' और 'निरुक्त' शब्द काम में लिये हैं,
और यह कहा है कि इंद्रने पशु, वयस् (पक्षी) और सरीसृपों (रेंगनेवालों) की वाणी को छोड़ कर
१. पाणिनि के सूत्रपाठ में एक जगह (१.४.७६) और गणपाठ में दो जगह (ऋगयनादि ४.३.७३, और वेतनादि
४.४ १२ में) उपनिषद् शब्द आता है.
२. हिंकार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं तत्समं । १ । आदिरिति द्व्यक्षरं (छांदोग्य उप. २. १०). 'अक्षर' शब्द तो
संस्कृत के प्राचीन साहित्य में दोनों अर्थों में मिलता है अर्थात् ध्वन्यात्मक (उच्चारित) और संकेतात्मक (लिखित), परंतु
'वर्ण' शब्द केवल संकेतात्मक चिह्न के लिये ('वर्ण' धातु से=रंगना या बनाना) आता है और ईकार, ऊकार आदि में 'कार'
('कृ' धातु से=करना) केवल वर्ण के लिये; अतएव 'वर्ण' और 'कार' प्रत्ययवाले शब्द लिखित संकेतों के ही सूचक हैं.
३. अग्निरीकारः आदित्य ऊकारो निष्ठव एकारः (छांदोग्य उप. १. १३).
४. सर्वे स्वरा इन्द्रस्यात्मानः सर्व ऊष्माणः प्रजापतेरात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानः यदि खरेषूपालभेतेन्द्र शरणं... (छांदोग्य
उप. २. २२. ३).
५. वर्णः स्वरः । मात्रा बलम् (तैत्तिरीय उप. १. १).
६. तस्यैतस्यात्मनः प्राण ऊष्मरूपमस्थीनि स्पर्शरूपं मज्जानः स्वररूपं मांसं लोहितमित्येतदन्यच्चतुर्थमन्तःस्था रूपमिति (ऐ. आ.
३. २. १).
७. तस्य यानि व्यंजनानि तच्छरीरं यो घोषः स आत्मा य ऊष्माणः स प्राणः (ऐ. आ. २. २. ४.)
८. स यदि विचिकित्सेत्सणकारं ब्रवाणो ३ अषकारं ३ इति ..... सपकारं ब्रवाणी ३ अपकारा ३ इति (ऐ. आ. ३.२.६).
९. पूर्वमेवाक्षरं पूर्व्यरूपमुत्तरमुत्तररूपं योऽवकाशः पूर्व्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण येन सन्धिं विवर्त्तयति येन खराक्षरं विजानाति येन
मात्रामात्रां विभजते ...... संधिविज्ञपनी साम् ... (ऐ. आ. ३. १. ५).
१०. तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयो वर्णा अजायन्ताकार उकारो मकार इति तानकधा समभरत्तदेतदो३मिति (ऐ. ब्रा. ५. ३२). ऐसा
ही कौशीतकी ब्राह्मण (२६.४) और आश्वलायन श्रौतसूत्र (१०.४) में भी लिखा मिलता है.
११. अथी नेदेकवचनेन बहुवचनं ब्रवायामेति (शतपथ ब्रा. १३.५.१.१८).
१२. त्रेधाविचित्ता इयंका उपधीयन्ते पुंनाम्न्यः स्त्रीनाम्न्यो नपुंसकनाम्न्य स्तेधाविचित्तानि उ एवेमानि पुरुषस्याङ्गानि पुंनामानि
स्त्रीनामानि नपुंसकनामानि (शतपथ ब्रा. १०.५.१.२). वाक् छ एवैतत्सर्वं यत्स्त्री पुमान् नपुंसकं (शतपथ ब्रा. १०.५.२.३).
१३. वाग्वै पराच्यव्याकृतावदत् ते. देवा इन्द्रमब्रुवन् 'इमां नो व्याकुरु' इति सोऽब्रवीद्वरं वृणै मह्यं चैवैष वायवे च सह गृह्याता'
इति तस्मादैन्द्रवायवः सह गृह्यते. तामिन्द्रो मध्यतोऽवक्रम्य व्याकरोत्तस्मादियं व्याकृता वागुद्यते. तस्मात्सकृदिन्द्राय मध्यतो गृह्यते ......
(तैत्ति. सं. ६. ४. ७).
उसके चौथे अंश अर्थात् मनुष्यों की ही वाणी का निर्वचन (व्याकरण) किया क्योंकि उसको ग्रह में
से चतुर्थांश ही मिला था१.
उपर्युक्त प्रमाणों से पाया जाता है कि उपनिषद, आरण्यक, ब्राह्मण और तैत्तिरीय संहिता के
समयतक व्याकरण के होने का पता चलता है. यदि उस समय लिखने का प्रचार न होता तो व्या-
करण और उसके पारिभाषिक शब्दों की चर्चा भी न होती, क्योंकि जो जातियां लिखना नहीं जानती
वे छंदोबद्ध गीत और भजन अवश्य गाती हैं, कथाएं कहती हैं परंतु उनको स्वर, व्यंजन, घोष, संधि,
एकवचन, बहुवचन, लिंग आदि व्याकरण के पारिभाषिक शब्दों का ज्ञान सर्वथा नहीं होता. इसका
प्रत्यक्ष उदाहरण हिंदुस्तान में ही भली भांति मिल सकता है, जहां ३१३४१५३८६ मनुष्यों की आबादी
में से केवल १८४३६५७८ मनुष्य लिखना पढ़ना जानते हैं बाकी के २९४९७८८०८ अभी तक लिखना
पढ़ना नहीं जानते२. उनमें किसीको भी व्याकरण के पारिभाषिक शब्दों का कुछ भी ज्ञान नहीं है.
व्याकरण की रचना लेखनकला की उन्नत दशा में ही होती है और उसके लिये भाषा का सारा
साहित्य टटोलना पड़ता है और उसके प्रथम रचयिता को उसके पारिभाषिक शब्द गढ़ने पड़ते हैं.
भारतवर्ष की जिन असभ्य और प्राथमिक जातियों के यहां लिखित साहित्य नहीं है उनकी भाषाओं
के व्याकरण लिखना जानने वाले यूरोपियन विद्वानों ने अभी अभी बनाये हैं.
छन्द. ऋग्वेद में गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुभ्, बृहती, विराज्, त्रिष्टुभ् और जगती छंदों के नाम
मिलते हैं३. वाजसनेयि संहिता में इनके अतिरिक्त 'पंक्ति' छंद का भी नाम मिलता है और द्वि-
पदा, त्रिपदा, चतुष्पदा, षट्पदा, ककुभ् आदि छंदों के भेद भी लिखे हैं४. अथर्ववेद में भिन्न भिन्न
स्थानों में पृथक नामों के अतिरिक्त एक स्थान पर छंदों की संख्या ११ लिखी है५. शतपथ ब्राह्मण में
मुख्य छंदों की संख्या ८ दी है६; और तैत्तिरीय संहिता७, मैत्रायणी संहिता८, काठक संहिता९
तथा शतपथ ब्राह्मण१० में कई छंदों और उनके पादों के अक्षरों की संख्या तक गिनाई है.
लिखना न जाननेवाली जातियां छंदोबद्ध गीत और भजन गाती हैं, और हमारे यहां की स्त्रियां,
जिनमें केवल ६५ पीछे एक लिखना जानती है११ और जिनकी स्मरणशक्ति बहुधा पुरुषों की अपेक्षा
प्रबल होती हैं, विवाह आदि सांसारिक उत्सवों के प्रसंग प्रसंग के, एवं चौमासा, होली आदि त्यौहारों
के गीत और बहुतेरे भजन, जिनमें विशेष कर ईश्वरोपासना, देवी देवताओं की स्तुति या वेदांत के
उपदेश हैं, गाती हैं. यदि उनका संग्रह किया जावे तो संभव है कि वेदों की संहिताओं से भी
उनका प्रमाण बढ़ जावे, परंतु उनको उनके छंदों के नामों का लेश मात्र भी ज्ञान नहीं होता. छंदःशास्त्र
का प्रथम रचयिता ही छंदोबद्ध साहित्यसमुद्र को मथ कर प्रत्येक छंद के अक्षर या मात्राओं की
संख्या के अनुसार उनके वर्ग नियत कर उनके नाम अपनी तरफ से स्थिर करता है, तभी लोगों में
उनकी प्रवृत्ति होती है. लिखना न जानने वाली जातियों में छंदों का नामज्ञान नहीं होता. वैदिक
१. शतपथ ब्रा. ४. १. ३. १२, १५-१६.
२. ई. स. १९११ की हिन्दुस्तान की मर्दुमशुमारी की रिपोर्ट, जिल्द १, भाग २, पृ. ७०-७१.
३. ऋग्वे. सं. (१०.१४.१६; १०.१३२.३.४).
४. यजु. वाज. सं. (११.८; १४. १६; २३.३३, २८. १४ आदि).
५. अथ. सं. (८.६.१६).
६. विराडष्टमानि छन्दांसि (श. ब्रा. ८. ३. ३. ६).
७. सप्तच्छ्रं प्रथमं पदं अष्टाक्षराणि त्रीणि ...... षडष्टाक्षरा तेन गायत्री यदेकादशाक्षरा तेन त्रिष्टुब्यद्द्वादशाक्षरा तेन जगती
............ सप्तपदा शक्वरी (तै. सं. ६.१.१.६-७).
८. अनुष्टुभं ...... चतुर्धा व्योतस्या अष्टा अष्टा अक्षराणि बृहतीं ...... चतुर्धा व्योतस्या नव नवाक्षराणि । इत्यादि (मै. सं. १.११.१०)
९. गायत्रीं ...... चतुर्धा वि तस्याष्टाष्टौ षडक्षराणि उष्णिक ...... चतुर्धा वि तस्यास्सप्त सप्ताक्षराणि । इत्यादि (का. सं. १४.४. )
१०. द्वादशाक्षरा वै जगती । ४। ...... षट्त्रिंशदक्षरा बृहती ...... । ८। ...... दशाक्षरा विराट् । ११। (श. ब्रा. ८. ३. ३.) इत्यादि
कई जगह.
११. हिन्दुस्तान की ई. स. १९११ की मर्दुमशुमारी की रिपोर्ट, जिल्द १, भाग २, पृष्ठ ७०-७१.
भारतवर्ष में लिखने के प्रचार की प्राचीनता.
११
तथा लौकिक संस्कृत का छन्दःशास्त्र बड़ा ही जटिल है, एक एक छंद के अनेक भेद हैं और उन भेदों
के अनुसार उनके नाम भिन्न भिन्न हैं. ब्राह्मण और वेदों में मिलने वाले छंदों के नाम आदि उस
समय में लेखनकला की उन्नत दशा के सूचक हैं.
उ.क. ऋग्वेद में ऋषि नाभानेदिष्ठ हज़ार अष्टकर्णी गौएं दान करने के कारण राजा सावर्णि की
स्तुति करता है¹. यहां पर 'अष्टकर्णी' शब्द का अर्थ यही है कि जिसके कान पर आठ के अंक का
चिन्ह हो².
वैदिक काल में जुआ खेलने का प्रचार बहुत था. एक प्रकार के खेल में चार पासे होते थे जिनके नाम
कृत, त्रेता, द्वापर और कलि³ थे और जिनपर क्रमशः ४, ३, २, १ के अंक या चिह्न लिखे या खुदे होते थे⁴.
चार के चिह्न वाला पासा या कृत जिताने वाला पासा था⁵. ऋग्वेद में एक पूरा सूक्त⁶ जुआरी (कितव) के
विलाप का है जिसमें वह कहता है कि एकपर⁷ पासे के कारण मैंने अपनी पतिव्रता स्त्री खो दी. यहां
एकपर का अर्थ यही है कि जिसपर एक का चिह्न बना हुआ हो⁸ (अर्थात् हराने वाला पासा).
१. 'सहस्रं मे ददतो अष्टकर्ण्यः' (ऋग्वेद सं. १०. ६२. ७).
२. देखो ऊपर पृ. ८, टिप्पण १.
३. कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः। उत्तिष्ठंस्त्रेता भवति कृतं संपद्यते चरन् ॥ चरैवे ॥ (ऐतरेय ब्रा. ७. १५).
(कलि [नामक पासा] सो गया है, द्वापर स्थान छोड़ चुका है, त्रेता अभी खड़ा है, कृत चल रहा है [तेरी सफलता की
संभावना है] परिश्रम करता जा). नाक्षान्क्षिपत्ति गाण्डीवं न कृतं द्वापरं न च । ज्वलतो निशितान्बाणांस्तांस्तान् क्षिपति गाण्डिवम् ॥
(महाभारत, विराटपर्व, कुंभकोणं संस्करण, ५०. ३७); (इस पर टीका—चकारात् त्रेतापि समुच्चीयते. कृतादयो द्यूतशास्त्रप्रसिद्धाः
पाशकाः). 'कृतमयानां...त्रेतायानां...द्वापरोऽयानां...आस्कन्दोऽयानां...अभिभूरयानां' (तैत्ति. सं. ४. ३. ३). 'अक्षराजाय कितवं कृतायादि-
नवदशं त्रेतायै कल्पिनं द्वापरायाधिकल्पिनमास्कन्दाय सभास्थाणुं' (यजु. वाज. सं. ३०.१८). शतपथ ब्राह्मण (५.४.४.६) से जाना
जाता है कि कलि का ही नाम अभिभू था (एष वा अयानभिभूर्यत्कलिरेष हि सर्वानयानभिभवति) और तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.४.१. १६
को यजु. वाज. सं. ३०.१८ से मिलाने से स्पष्ट है कि कलि = अभिभू = अक्षराज. ये यजुर्वेद के ग्रन्थों में दिए हुए नाम एक
दूसरे पांच पासे वाले खेल के सूचक हैं जिसमें कलि पर ५ का अंक होता था और वह सब को जीतता (अभिभू) था.
'अथ ये पञ्च कलिः सः' (तैत्ति. ब्रा. १. ५. ११. १).
४. रॉथ और बोथलिङ्क का संस्कृत कोश (वार्टेरबुख).
५. कृतं यजमानो विजिनाति (आपस्तम्ब श्रौतसूत्र, ५.२०.१); कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः (अथर्व. सं. ७.५०
(५२) ८); ससंतु विश्वतो भगो अनाधृष्टं कृतं मम (अथ. सं. ७. ५० (५२). २); चतुरश्चिद्ददमानाद्विभीयादा निधातोः (ऋग्वेद सं. १.
४१. ६), यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति (छान्दोग्य उपनि., ४. १. ४. ६.)
इस का शंकराचार्य का भाष्य—'कृतो नाम अयो द्यूतसमये प्रसिद्धश्चतुरङ्कः स यदा जयति तन्ते प्रहस्तानां तस्मै विजिताय तदर्थमितरे
त्रिद्वयेकाङ्काः अधरेयाः त्रेताद्वापरकलिनामानः संयन्ति संगच्छन्ते अन्तर्भवन्ति,' इस पर आनंदगिरि की टीका से जान पड़ता है कि एक
ही पासे के चारों ओर ४, ३, २, १ अंक बने होते थे. वैदिक काल में एक ही पासे के चारों ओर अंक होते थे, या एक एक
अंक वाला पासा अलग होता था यह गौण विषय है. वैदिक समय के पासे बिभीदक (बहेड़ा) के फल के होते थे
(ऋग्वेद सं. ७. ८६. ६; १०. ३४. १). उनके चौरस न होने तथा पासों के लिये बहुवचन आदि का प्रयोग (अक्षरे अक्षाः; ऊपर देखो)
यही दिखाता है कि पासे का एक पार्श्व ही अंक से चिह्नित होता होगा.
राजसूय यज्ञ में यजमान के हाथ में पांच पासे 'अभिभूरसि' (तू जीतने वाला है) इस मन्त्र (यजु. वाज. सं. १०. २८)
से दिए जाते थे. फिर वहीं यज्ञभूमि में जुआ खिलाया जाता था. या तो वेही पांच पासे डलाये जाते थे (शतपथ ब्राह्मण,
५. ४. ४. २३) या 'कृतादि (चार पासे का) द्यूत' कराया जाता था जिसमें राजा के हाथ से कृत और सजात (उसी गोत्र
के ज़मींदार) से कलि का पासा डलवाते, जिससे सजात की हार हो जाती (क्योंकि सजातों पर ही राजा की प्रधानता
दिखाना उद्देश्य था) और उसकी गौ, जो जुए में लगाई थी, जीत ली जाती. (द्यूतभूमौ हिरण्मयं निधायाभिजुहोति······अक्षान्विवप-
ति.·····गां दीव्यध्वमित्याह. कृतादि वा निदध्याद्वाजप्रसतिभ्यः सजाताय कलिम्. गामस्य घ्नन्ति. कात्यायन श्रौतसूत्र, १५. १५-२०).
'कृत' शब्द चार के अर्थ में भी इसी से आने लगा, जैसे शतपथ ब्राह्मण में 'चतुष्टोमेन कृतेनायानां' (१३. ३. २. १);
तैत्तिरीय ब्राह्मण में 'ये वै चत्वारः स्तोमाः कृतं तत्' (१.५. ११. १).
६. ऋग्वेद सं. १०. ३४.
७. अक्षस्याहमकपरस्य हेतोरनुव्रतामप जायामरोधम् (ऋग्वेद सं. १०. ३४. २).
८. एक-पर, द्वा-पर, त्रे-ता के अर्थ स्पष्ट हैं. पाणिनि के एक सूत्र अक्षशलाकासंख्याः परिणा २. १. १०) से जाना जाता
है कि अक्ष-परि, शलाका-परि, और संख्यावाचक शब्दों के साथ 'परि' के समास से बने हुए (एकपरि, द्विपार, आदि)
१२ प्राचीनलिपिमाला.
अथर्ववेद में जुए में जीत की प्रार्थना करने का एक सूक्त १ है जिसमें लिखा है २ कि मैंने तुम से संलि-
खित (अर्थात् जुए के हिसाब में तेरी जीत का लिखा हुआ धन) और संरुद्ध (जुए में धरा हुआ धन)
जीत लिया. इससे पाया जाता है कि पशुओं के कानों की तरह पासों पर भी अंक रहते थे और जुए
में जीते धन का हिसाब लिखा जाता था.
यजुर्वेद संहिता (वाजसनेयि) के पुरुषमेध प्रकरण में जहां भिन्न भिन्न पेशे वाले बहुत से पुरुष
गिनाये हैं वहां 'गणक' भी लिखा है ३, जिसका अर्थ गणित करने वाला (गण् धातु से) अर्थात्
ज्योतिषी होता है. उसी संहिता में एक, दश (१०), शत (१००), सहस्र (१०००), अयुत (१००००),
नियुत (१०००००), प्रयुत (१००००००), अर्बुद (१०००००००), न्यर्बुद (१००००००००), समुद्र
(१०००००००००), मध्य (१००००००००००), अन्त (१०००००००००००) और परार्ध
(१००००००००००००) तक की संख्या दी है ४ और ठीक यही संख्या तैत्तिरीय संहिता में भी
मिलती है ५.
सामवेद के पंचविंश ब्राह्मण में यज्ञ की दक्षिणाओं का विधान है, जिसमें सब से छोटी दक्षिणा
१२ [कृष्णल] भर सोना है और आगे की दक्षिणाएं द्विगुणित क्रम से बढ़ती हुई २४, ४८, ९६, १९२,
३८४, ७६८, १५३६, ३०७२, ६१४४, १२२८८, २४५७६, ४९१५२, ९८३०४, १९६६०८ और ३९३२१६
भर तक की बतलाई हैं ६. इसमें श्रेढीगणित का बड़ा अच्छा उदाहरण है और इस प्रकार का लाखों
का गणित लिखने और गणित के ज्ञान के बिना हो ही नहीं सकता.
शतपथ ब्राह्मण के अग्निचयन प्रकरण में हिसाब लगाया है कि ऋग्वेद के अक्षरों से १२०००
बृहती (३६ अक्षर का) छंद प्रजापति ने बनाये अर्थात् ऋग्वेद के कुल अक्षर (१२००० x ३६=) ४३२०००
हुए. इसी तरह यजु के ८००० और साम के ४००० बृहती छंद बनने से उन दोनों के भी ४३२०००
अक्षर हुए. इन्हीं अक्षरों से पंक्ति छंद (जिसमें आठ आठ अक्षरों के पांच पद अर्थात् ४० अक्षर
होते हैं) बनाने से ऋग्वेद के (४३२०००÷४०=) १०८०० पंक्ति छंद हुए और उतने ही यजु और साम के
मिल कर हुए. एक वर्ष के ३६० दिन और एक दिन के ३० मुहूर्त होने से वर्ष भर के मुहूर्त भी
१०८०० होते हैं अर्थात् तीनों वेदों से उतने पंक्ति छंद दुबारा बनते हैं जितने कि वर्ष के मुहूर्त होते हैं ७.
उसी ब्राह्मण में समयविभाग के विषय में लिखा है कि रातदिन के ३० मुहूर्त, एक मुहूर्त के १५
क्षिप्र, एक क्षिप्र के १५ एतर्हि, एक एतर्हि के १५ इदानीं और एक इदानीं के १५ प्राण होते हैं ८ अर्थात्
रातदिन के (३० x १५ x १५ x १५ x १५=) १५१८७५० प्राण होते हैं. इस गणना के अनुसार एक
प्राण एक सेकंड के १०/९ के लगभग आता है.
शब्द काम में आते थे. इस सूत्र के व्याख्यान में कात्यायन और पतंजलि ने लिखा है कि जुआरियों के (सांकेतिक)
व्यवहार में ये प्रयोग काम में आते थे और इनका भाव यह है कि पहले का सा जुआ नहीं हुआ (अर्थात् खेल में हार गये).
अक्ष और शलाका शब्दों से 'परि' का समास एकवचन में ही होता है. इससे सिद्ध है कि द्वि-परि का अर्थ 'दो पासों से
पहले का सा खेल नहीं हुआ' यह नहीं है किंतु 'दो के अङ्क से पहले का सा खेल न हुआ' (अर्थात् हार हुई) यही है.
ऐसे एकपरि (या एक-पर), द्विपार (या द्वापरि, या द्वापर) या त्रिपार शब्द ही हारने के सूचक हैं क्योंकि चार (कृत) में तो
जीत ही होती थी. काशिका ने 'पञ्चिका' नामक पांच पासों के खेल का उल्लेख करके लिखा है कि उसमें अधिक से अधिक
(परंप्रेण) चतुष्परि शब्द [इस अर्थ में] बन सकता है, क्योंकि पांच में तो जय ही होता है.
१. अथर्व. सं., ७. ५० (५२).
२. यज्जितं वा संलिखितसंजैषमुत संरुधम् (अथर्व. सं. ७. ५० (५२). ४).
३. ग्रामण्यां गणकमभिकोशकं तान्मक्षसे (यजु. वाज. सं. ३०. २०). ४. यजु. वाज. सं १७. २.
५. तै. सं. ४. ४०. ११. ४; ७. २.२०.१. यही संख्या कुछ फेर फार के साथ मैत्रायणी (२.८. १४) और काठक (३९.६)
संहिता में मिलती है.
६. पंचविंश ब्रा. १८. ३. ७. शतपथ ब्रा; १०.४.२.२२-२४. ८. शतपथ ब्रा. १२.३.२.१.
भारतवर्ष में लिखने के प्रचार की प्राचीनता. १३
लिखना न जानने वालों को न तो परार्ध तक की संख्या का ज्ञान होता है और न उनको
'प्रयुत,' 'अयुत' आदि बड़ी संख्याओं के सूचक शब्दों के गढ़ने या जानने की आवश्यकता होती है.
ऐसी संख्या का जानना लिखना जानने के पीछे भी केवल उस दशा में होता है जब गणितविद्या
अच्छी अवस्था को पहुंच जाती है. ग्रीक लोग जब लिखना नहीं जानते थे उस समय उनको अधिक से
अधिक १०००० तक का ज्ञान था और रोमन् लोग ऐसी दशा में केवल १००० तक ही जानते थे. इस
समय भी हमारे यहां के जो मनुष्य लिखना नहीं जानते वे बहुधा १०० तक भी अच्छी तरह नहीं गिन
सकते; यदि उनसे पचासी कहा जावे तो वे कुछ न समझेंगे और यही प्रश्न करेंगे कि पचासी कितने
होते हैं? जब उनको यह कहा जायगा कि 'चार बीसी और पांच' तभी उनको उक्त संख्या का ठीक ज्ञान
होगा. वे २० तक की गिनती जानते हैं जिसको 'बीसी' कहते हैं; फिर एक बीसी और सात (२७),
चार बीसी और पांच (८५), इस तरह गिनते हैं.
यदि हम यह चेष्टा करें कि लिखना न जानने वाले दो पुरुषों को बिठला कर एक से कहें कि
'तुम कोई एक लंबा गीत गाओ' और दूसरे से कहें कि 'यह जो गीत गाता है उसके तुम अक्षर
गिन कर बतलाओ कि वे कितने हुए और फिर छत्तीस छत्तीस अक्षरों से एक छंद बनाया जावे तो
१४ प्राचीनलिपिमोल़ा.
वज्र की तरह समर्थ मानी जाती थी^१, बिलकुल न होने पावें. इसी लिये वैदिक लोग न केवल मंत्रों को,
परंतु उनके पदपाठ को, और दो दो पद मिला कर क्रमपाठ को, और इसी तरह पदों के उलट फेर से
घन, जटा आदि के पाठों को स्वरसहित कंठस्थ करते थे. गुरु मंत्र का एक एक अंश शिष्यों को
सुनाता और वे उसे ज्यों का त्यों रट कर कंठस्थ करते, फिर पूरा मंत्र सुन कर उसे याद कर लेते.
ऋग्वेद के समय में वेदों के पढ़ने की यही रीति^२ थी और अब तक भी कुछ कुछ चली आती है,
परंतु यह पठनशैली केवल वेदों के लिये ही थी, अन्यशास्त्रों के लिये नहीं. वेदों के पठन की यही
रीति, जिससे स्वरों का शुद्ध ज्ञान होता था, बनी रहे और श्रोत्रिय ब्राह्मणों का आदर घट न जाय,
इसी लिये लिखित पुस्तक पर से वेदों का पढ़ना निषिद्ध माना गया है^३, परंतु लिखितपाठक को
अधमपाठक^४ कहना ही सिद्ध करता है कि पहिले भी वेद के लिखित पुस्तक होते थे और उनपर से पढ़ना
सरल समझ कर लोग उधर प्रवृत्त होते थे; इसी लिये निषेध करना पड़ा कि प्राचीन रीति उच्छिन्न
न हो और स्वर आदि की मर्यादा नष्ट न हो. इस लिये वेद के पुस्तक लिखने का पेशा करना और
पुस्तकों को बेचना पाप माना गया है^५. वेद के पुस्तक विस्मृति में सहायता के लिये अवश्य रहते
थे और व्याख्यान, टीका, व्याकरण, निरुक्त, प्रातिशाख्य आदि में सुभीते के लिये उनका उपयोग
होता था.
वेद के पठनपाठन में लिखित पुस्तक का अनादर एक प्राचीन रीति हो गई और उसीकी
देखादेखी और शास्त्र भी जहां तक हो सके कंठस्थ किये जाने लगे, और अबतक जो विद्या मुखस्थ
हो वही विद्या मानी जाती है^६., कोई श्रोत्रिय पुस्तक हाथ में लेकर मंत्र नहीं पढ़ता था, होता
स्तोत्र ज़बानी सुनाता और उद्गाता समय समय पर साम भी मुख से सुनाता. अबतक भी
अच्छे कर्मकांडी सारी विधि और सारे मंत्र मुख से पढ़ते हैं, ज्योतिषी या वैद्य या धर्मशास्त्री
फल कहने, निदान करने और व्यवस्था देने में श्लोक सुनाना ही पांडित्य का लक्षण समझते
हैं, यहां तक कि वैयाकरण भी वही सराहा जाता है जो बिना पुस्तक देखे महाभाष्य
पढ़ा दे. वेदमंत्रों के शुद्ध उच्चारण की और यज्ञादि कर्मों में जहां जो प्रसंग पड़े वहां तत्तत्क्षण
उस विषय के मंत्रों को पढ़ने की आवश्यकता तथा वेदसंबंधी प्राचीन रीति का अनुकरण
करने की रुचि, इन तीन कारणों से हिंदुओं की परिपाटी शताब्दियों से यही हो गई कि
मस्तिष्क और स्मृति ही पुस्तकालय का काम दे. इसी लिये सूत्रग्रंथों^७ की संक्षेपशैली से
१. दुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥ पतंज-
लि का महाभाष्य, प्रथम आह्निक).
२. ऋग्वेद, ७ १०३ ५. 'एक मेंढक दूसरे की बोली के पीछे यों बोलता है जैसे गुरु के पीछे सीखने वाला '
(यदेषामन्यो अन्यस्य वाचं शाक्तस्येव वदति शिक्षमाणः).
३. यद्येतान्वाचविषयात्तात दालभ्येत्यादिपूर्वकात्। शूद्रदृष्टाधिगतादापि धर्मज्ञानं न संसतम् ॥ (कुमारिल का तंत्रवार्तिक, १. ३)
४. गीती शीघ्रौ शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः। अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः ॥ (याज्ञवल्क्य शिक्षा).
५. वेदविक्रयिणश्चैव वेदानां चैव दूपकाः। वेदानां लेखकाश्चैव ते वै निरयगामिनः (महाभारत, अनुशासनपर्व, ६३. २८).
महाभारत में जिस प्रसंग में यह श्लोक है वह दानपात्र ब्राह्मणों के विषय में है. यहां पर 'वेदानां दूषकाः' का अर्थ 'वेदों
में हेर फेर आदि मिलाने वाले' ही है, क्योंकि इस श्लोक से कुछ ही ऊपर इससे मिलता हुआ 'समयानां च दूषकाः' है जिस
का अर्थ 'प्रतिज्ञापत्र या इकरारनामों में घटा बढ़ा कर जाल करने वाले' है.
६. पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम् । कार्यकाले तु संप्राप्ते न सा विद्या न तद्धनम् ॥ (चाणक्यनीति ).
७. जो लोग श्रौतसूत्र, समयाचार (धर्म) सूत्र, गृह्यसूत्र, शुल्वसूत्र और व्याकरण आदि शास्त्रों के सूत्रों की संक्षिप्त
प्रणाली को देख कर यह अटकल लगाते हैं कि लेखनसामग्री की कमी से ये इतने संक्षिप्त और क्लिष्ट बनाये गये और पिछले
वैयाकरणों ने आधी मात्रा की किफायत को पुत्रोत्सव के समान हर्षदायक माना वे भूल करते हैं. यदि लेखनसामग्री की
कमी से ऐसा करते तो ब्राह्मण ग्रंथ इतने विस्तार से क्यों लिखे जाते? यह शैली केवल इसी लिये काम में लाई गई कि
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भारतवर्ष में लिखने के प्रचार की प्राचीनता. १५
रचना हुई और इसी लिये ज्योतिष, वैद्यक आदि के ग्रंथ भी बहुधा श्लोकबद्ध लिखे जाने
लगे. और तो और, कोश के सदृश ग्रंथ भी श्लोकबद्ध लिखे गये कि कंठस्थ किये जा
सकें और अंकगणित तथा बीजगणित के नियम और उदाहरण भी श्लोकों में लिखे गये.
श्लोकबद्ध कोशों को देख कर यदि कोई यह अटकल लगावे कि इनकी रचना के समय लेख-
प्रणाली न थी अथवा लेखनसामग्री की कमी थी, या लीलावती के श्लोकबद्ध नियमों और उदाहरणों
से यह कहा जाय कि हिसाब ज़बानी ही होते थे तो यह कहना वैसा ही है जैसा कि यह कहना कि
व्याकरण के सूत्र, कल्पसूत्र, ब्राह्मण तथा वेदों तक की रचना ज़बानी ही हुई. रचनाकाल में सब ग्रंथ
विचारपूर्वक लिखकर ही बनाये गये, केवल अध्ययनप्रणाली में कंठस्थ करना ही मुख्य समझा
जाता था.
हिंदू लोग प्राचीन रीतियों का धर्म की तरह आग्रहपूर्वक पालन करते हैं और उनमें भरसक
परिवर्तन नहीं करते. कपड़े से बने हुए कागज़ का बहुत प्रचार होने पर भी मंत्र, यंत्र आदि को
भोजपत्र पर लिखना ही अब तक पवित्र माना जाता है. सस्ती और सुंदर छापे की पुस्तकें प्रच-
लित हुए एक शताब्दी बीतने आई तो भी पूजापाठ में हस्तलिखित पुस्तकों का ही बहुधा प्रचार है
और जो कर्मकांडी छपी हुई पद्धति लेकर विवाह आदि कराने जाता है उसका बहुधा अनादर होता
है. जैसे आजकल कर्मकांडी या पौराणिक छपी पुस्तकों पर से पढ़ते हैं परंतु कर्म या पारायण
के समय बहुधा हस्तलिखित पुस्तक ही काम में लाते हैं वैसे ही प्राचीन काल में विचार, स्वाध्याय
और व्याख्यान के लिये लिखित पुस्तक काम में आते थे, परंतु पढ़ाना, मंत्रपाठ और शास्त्रार्थ मुखस्थ
विद्या की पुरानी रीति से होता था.
बूलर लिखता है १ कि 'इस अनुमान को रोकने के लिये कोई कारण नहीं है कि वैदिक
समय में भी लिखित पुस्तकें मौखिक शिक्षा और दूसरे अवसरों पर सहायता के लिये काम में
ली जाती थीं.'
बोथलिंग कहता है २ कि 'मेरे मत में साहित्य के प्रचार में लिखने का उपयोग नहीं होता
था परंतु नये ग्रंथों के बनाने में इसको काम में लेते थे. ग्रंथकार अपना ग्रंथ लिख कर बनाता
परंतु फिर उसे या तो स्वयं कंठस्थ कर लेता या औरों को कंठस्थ करा देता. कदाचित् प्राचीन
समय में एक बार लिखे ग्रंथ की प्रति नहीं उतारी जाती थी परंतु मूल लिखित प्रति ग्रंथकार के
वंश में उसकी पवित्र यादगार की तरह रक्खी जाती और गुप्त रहती थी. यह भी संभव है
कि ग्रंथकार अपने ग्रंथ को कंठस्थ करके उसकी प्रति को स्वयं नष्ट कर देता जिससे दूसरे उसका
अनुकरण न करें और अपने आप को ब्राह्मण जाति के विरुद्ध काम करने का दोषी न बनना
पड़े.'
रॉथ लिखता है कि 'लिखने का प्रचार भारतवर्ष में प्राचीन समय से ही होना चाहिये
क्योंकि यदि वेदों के लिखित पुस्तक विद्यमान न होते तो कोई पुरुष प्रातिशाख्य बना न सकता.'
प्राचीन काल में हिंदुस्तान के समान लेखनसामग्री की प्रचुरता कहीं भी न थी. ताड़पत्र
समय पर पुस्तक देखना न पड़े और प्रसंग का विषय याद से सुनाया जा सके. इस तरह शास्त्र का आशय कंठस्थ रखने
के लिये ही कितने एक विस्तृत गद्य ग्रन्थों में भी मुख्य मुख्य बातें एक या दो कारिकाओं (संग्रहश्लोकों) में उपसंहार की तरह
लिखी जाती थीं, जैसे पतंजलि के महाभाष्य और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कई जगह.
१. बू; इं. पे; पृ. ४.
२. गोल्डस्टकर की 'मानवकल्पसूत्र' के संस्करण की अंग्रेज़ी भूमिका (अलाहाबाद की छपी), पृ. ६६. इस विस्तृत
भूमिका का मुख्य उद्देश मैक्समूलर के इस कथन का खंडन ही है कि 'वैदिक काल में लेखनप्रणाली न थी.'
१६ प्राचीनलिपिमाला.
और भोजपत्र प्रकृति ने यहां बहुत प्रचुरता से उत्पन्न किये हैं. मिसर के 'पंपायरस' की तरह उन्हें
खेती करके प्राप्त करने की यहां आवश्यकता न थी. भारतवासी रूई से कागज़ बनाना भी ई. स.
पूर्व की चौथी शताब्दी से पहिले जान गये थे२. पुराणों में पुस्तक लिखवा कर दान करने का
बड़ा पुण्य माना गया है. चीनी यात्री हुएंत्सग यहां से चीन को लौटने समय बीस घोड़ों पर
पुस्तकें लाद कर अपने साथ ले गया जिनमें ६५७ भिन्न भिन्न पुस्तक थे. मध्यभारत का श्रमण
पुण्योपाय ई. स. ६५५ में १५०० से अधिक पुस्तक लेकर चीन को गया था. ये बौद्ध भिक्षु कोई
यूरोप या अमेरिका के धनाढ्य तो थे नहीं कि यहां तोड़े खोल कर पुस्तक मोल लें. उन्हें
जितने पुस्तक मिले वे गृहस्थों, भिक्षुओं, मठों या राजाओं से दान में मिले होंगे. जब दान ही
दान में इतने ग्रंथ उनको मिल गये तो सहज ही में अनुमान हो सकता है कि लिखित पुस्तकों की
यहां कितनी प्रचुरता थी.
१. 'पंपायरस' बरू (सरकंडा) की जाति के एक पौधे का नाम है, जिसकी खेती मिसर में नाइल नदी के मुहानों
के बीच के दलदल वाले प्रदेश में बहुत प्राचीन काल से होती थी. यह पौधा चार हाथ ऊंचा और इसका डंठल तिधारा
या त्रिकोण आकृति का होता था, जिसमें से ४ १/२ इंच से ६ १/२ इंच तक की लंबाई के टुकड़े काटे जाते थे. उनकी छाल (न
कि गूदे से, देखो पं. सा. त्रि. जिल्द ३३, पृ. ८६१) से बहुत कम चौड़ाई की चिंधियां निकलती थीं. उनको लेई आदि से एक दूसरी
से चिपका कर पन्ना बनाया जाता था. ये पत्र पहिले दबाये आते थे फिर उनको सुखाते थे. जब वे बिलकुल सूख जाते तब
हाथीदांत या शंख से घोट कर उनको चिकणा और समान बनाते थे, तभी वे लिखने योग्य होते थे. इस प्रकार तय्यार
किये हुए पत्रों को यूरोपवाले 'पंपायरस्' कहते हैं. उन्हीं पर पुस्तकें, चिट्ठियां तथा आवश्यककीय तहरीरें आदि लिखी
जाती थीं, क्योंकि उस समय कागज़ का काम ये ही देते थे. इस प्रकार तय्यार किये हुए कई पत्रों को एक दूसरे के साथ चिप-
का कर उनके लंबे लंबे खरड़े भी बनाये जाते थे, जो मिसर की प्राचीन कब्रों में से मिल आते हैं. वे या तो लकड़ी की सं-
दूकों में यत्नपूर्वक रक्खी हुई लाशों के हाथों में रक्खे हुए या उनके शरीर पर लपेटे हुए मिलते हैं. मिसर में ई. स. पूर्व
२००० के आस पास तक के ऐसे खरड़े (पंपायरस) मिले हैं, क्योंकि वहां वर्षा का प्रायः अभाव होने से ऐसी वस्तु
अधिक काल तक नष्ट नहीं होती. लिखने की कुदरती सामग्री सुलभ न होने से ही बड़े परिश्रम से उक्त पौधे की छाल की
चिंधियों को चिपका चिपका कर पत्रे बनाते थे तिस पर भी उसकी खेती राज्य के हाथ में रहती थी. यूरोप में भी प्राचीन
काल में लेखनसामग्री का अभाव होने से चमड़े को साफ कर उसपर भी लिखते थे. ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी में ग्रीक
लोगों ने मिसर से बने बनाये 'पंपायरस' अपने यहां मंगवाना शुरू किया. फिर यूरोप में उनका व्यवहार होने लगा और
अरबों के राजत्वकाल में इटली आदि में वह पौधा भी बोया जाने लगा, जिससे यूरोप में भी 'पंपायरस' तय्यार होने लगे.
ई. स. ७०४ में अरबों ने समरकंद नगर विजय किया जहां पर उन्होंने पहिले पहिल रूई और चीथड़ों से कागज़ बनाना सीखा,
फिर दमास्कस (दमिशक) में भी कागज़ बनने लगे. ई. स. की नवीं शताब्दी में अरबी पुस्तकें प्रथम ही प्रथम कागज़ों पर
लिखी गईं और १२ वीं शताब्दी के आस पास अरबों द्वारा कागज़ों का प्रवेश यूरोप में हुआ. फिर 'पंपायरस' का बनना
बंद होकर यूरोप में १३ वीं शताब्दी से कागज़ ही लिखने की मुख्य सामग्री हुई.
२. देखो ऊपर पृ. ३, और टिप्पण ७. ३. सिम; अ. हि. ई; पृ. ३५२ (तृतीय संस्करण).
४. बु. नं; डॉ. बु. त्रि; पृ. ४३७.
१७
२-ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति.
——————
मौर्यवंशी राजा अशोक के लेखों तथा ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दि से लगाकर ई. स. की तीसरी
शताब्दि के आसपास तक के कितने एक सिक्कों आदि से पाया जाता है कि उस समय इस देश में
दो लिपियां प्रचलित थीं; एक तो नागरी की नांई बाईं तरफ से दाहिनी ओर लिखी जाने वाली सार्व-
देशिक, और दूसरी फ़ारसी की तरह दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाने वाली एकदेशिक. इन
लिपियों के प्राचीन नाम क्या थे इस विषय में ब्राह्मणों के पुस्तकों में तो कुछ भी लिखा नहीं मिलता.
जैनों के 'पण्णवणासूत्र' और 'समवायांगसूत्र' में १८ लिपियों १ के नाम मिलते हैं, जिनमें सब से
पहिला नाम 'बंभी' (ब्राह्मी) है, और भगवतीसूत्र में 'बंभी' (ब्राह्मी) लिपि को नमस्कार करके
(नमो बंभीए लिविए) सूत्र का प्रारंभ किया गया है. बौद्धों के संस्कृत पुस्तक 'ललितविस्तर' २ में
६४ लिपियों ३ के नाम मिलते हैं जिनमें सब से पहिला 'ब्राह्मी' और दूसरा 'खरोष्टी' है. चीन में
बौद्ध धर्म का प्रचार होने के पश्चात् ई. स. की पहिली से आठवीं शताब्दि तक हिंदुस्तान से कितने ही
बौद्ध श्रमण अपने धर्म के प्रचार के निमित्त समय समय पर चीन में गये और उन्होंने बौद्धों के अनेक
संस्कृत और प्राकृत ग्रंथों के चीनी भाषा में अनुवाद किये ४ या उस काम में सहायता दी. चीन में
१. बंभी, जवणालि (या जवणाणिया), दोसापुरिया (या दोसापुरिसा), खरोट्ठी (या खरोठी), पुक्खरसारिया,
भोगवइया, पहाराइया (या पहराइया), उयअंतरिक्खिया (या उयंतरकरिया, अक्खरपिट्ठिया (या अक्खरपुंठिया), तेव-
णड्या (या वेणइया), गि[णि] गहइया (या गिणहत्तिया), अंकलिवि (या अंकलिक्खा), गणितलिवि (या गणियलिवि),
गंधव्वलिवि, आदंसलिवि (या आयसलिबि), माहेसरी (या माहेस्सरी), दामिली और पोलिंदी. ये नाम पण्णवणासूत्र की
दो प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकों से उद्धृत किये गये हैं.
२. 'ललितविस्तर' में बुद्ध का चरित है. यह ग्रंथ कब बना यह निश्चित नहीं, परंतु इसका चीनी अनुवाद ई. स.
३०८ में हुआ था.
३. ब्राह्मी, खरोष्टी, पुष्करसारी, अंगलिपि, वंगलिपि, मगधलिपि, मांगल्यलिपि, मनुष्यलिपि, अंगुलीयालिपि, शकारि-
लिपि, ब्रह्मवल्लीलिपि, द्राविडलिपि, कनारिलिपि, दक्षिणलिपि, उग्रलिपि, संख्यालिपि, अनुलोमलिपि, ऊर्ध्वधनुर्लिपि, दर-
दलिपि, खास्यलिपि, चीनलिपि, हूणलिपि, मध्याक्षरविस्तरलिपि, पुष्पलिपि, देवलिपि, नागलिपि, यक्षलिपि, गन्धर्वलिपि,
किन्नरलिपि, महोरगलिपि, असुरलिपि, गरुडलिपि, मृगचक्रलिपि, चक्रलिपि, वायुमरुलिपि, भौमदेवलिपि, अंतरिक्षदेवलिपि,
उत्तरकुरुद्वीपलिपि, अपरगोडालिलिपि, पूर्वविदेहलिपि, उत्क्षेपलिपि, निक्षेपलिपि, विक्षेपलिपि, प्रक्षेपलिपि, सागरलिपि,
वज्रलिपि, लेखप्रतिलेखलिपि, अनुद्रुतलिपि, शास्त्रावर्तलिपि, गणावर्तलिपि, उत्क्षेपावर्तलिपि, विक्षेपावर्तलिपि, पादलिखित-
लिपि, द्विरुत्तरपद्सन्धिलिखितलिपि, दशोत्तरपदसन्धिलिखितलिपि, अध्याहारिणीलिपि, सर्वरुत्संग्रहणीलिपि, विद्यानुलोम-
लिपि, विमिश्रितलिपि, ऋषितपस्तप्तलिपि, धरणीप्रेक्षणालीपि, सर्वौषधनिष्यन्दालिपि, सर्वसारसंग्रहणीलिपि और सर्वभूतरुद्-
ग्रहणीलिपि (ललितविस्तर, अध्याय १०). इनमें से अधिकतर नाम कल्पित हैं.
४. ई. स. ६७ में काश्यप मातंग चीन के बादशाह मिंग-टी के निमंत्रण से वहां गया, और उसके पीछे मध्यभारत का
श्रमण गोभरण भी वहां पहुंचा. इन दोनों ने मिलकर एक सूत्रग्रंथ का अनुवाद किया और काश्यप के मरने के बाद गोभ-
रण ने ई.स. ६८ और ७० के बीच ५ सूत्रों के अनुवाद किये. मध्यभारत के श्रमण धर्मकाल ने चीन में रह कर ई.स. २५०
में 'पातिमोक्ख' का; धर्मप्रिय ने ई.स. ३८२ में 'दशसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता' का; कुमारजीव ने ई. स. ४०२ और ४१२ के
बीच 'सुखावतीव्यूह' (छोटा), 'वज्रच्छेदिका' आदि कई ग्रंथों का; श्रमण पुण्यरत्न और कुमारजीव ने मिलकर
ई. स. ४०४ में 'सर्वास्तिवादविनय' का; मध्यभारत के श्रमण धर्मजातयशस् ने ई. स. ४८१ में 'अमृतार्थसूत्र' का; बुद्धशांत
ने ई. स. ५२४ और ५३६ के बीच १० ग्रंथों का और प्रभाकरमित्र ने ई. स. ६२७ और ६३३ के बीच ३ ग्रंथों का चीनी भाषा
में अनुवाद किया. मध्यभारत का श्रमण पुण्यौपाय (नाथी या नदी ?) ई. स. ६५५ में बौद्धों के दोनों संप्रदायों (महायान
और हीनयान) के त्रिपिटक से संबंध रखने वाले १५०० से अधिक पुस्तक, जो उसने हिन्दुस्तान और सीलोन (सिंहलद्वीप,
लंका) में संग्रह किये थे, लेकर चीन में गया. दक्षिण का श्रमण वज्रबोधि और उसका शिष्य अमोघबज्र ई. स. ७१९ में
चीन में गये. वज्रबोधी ने ई. स. ७२३ और ७३० के बीच ४ ग्रंथों का अनुवाद किया और वह ई. स. ७३२ में ७० वर्ष की
अवस्था में मरा, जिसके बाद अमोघबज्र ने ई. स. ७४१ में हिन्दुस्तान और सीलोन की यात्रा की. ई. स. ७४६ में वह फिर
चीन में पहुंचा और उक्त सन से लगा कर उसकी मृत्यु तक, जो ई.स. ७७४ में हुई, उसने ७७ ग्रंथों के चीनी अनुवाद किये.
१८ प्राचीनलिपिमाला.
भी बौद्ध धर्म के तत्वों को जानने के लिये संस्कृत और प्राकृत का पठन पाठन होने लगा और वहां के
बहुतेरे विद्वानों ने समय समय पर अपनी भाषा में बौद्ध धर्म के संबंध में अनेक ग्रंथ रचे जिनमें
हमारे यहां की कई प्राचीन बातों का पता लगता है. ई. स. ६६८ में बौद्ध विश्वकोष 'फा युअन
चु लिन' बना, जिसमें 'ललितविस्तर' के अनुसार ६४ लिपियों के नाम दिये हैं, जिनमें पहिला
ब्राह्मी और दूसरा खरोष्टी (किय-लु-से-टो=क-लु-से-टो=ख-रो-स-ट=खरोष्ठ) है और 'खरोष्ट' के
विवरण में लिखा है कि चीनी भाषा में इस शब्द का अर्थ 'गधे का होठ' होता है१. उसी पुस्तक
में भिन्न भिन्न लिपियों के वर्णन में लिखा है कि 'लिखने की कला का शोध तीन दैवी शक्ति वाले
आचार्यों ने किया, उनमें से सब से प्रसिद्ध ब्रह्मा है, जिसकी लिपि (ब्राह्मी) बाईं ओर से दाहिनी ओर पढ़ी
जाती है. उसके बाद किय-लु (किय-लु-से-टो=खरोष्ठ का संक्षिप्त रूप) है, जिसकी लिपि दाहिनी
ओर से बाईं ओर पढ़ी जाती है और सब से कम महत्व का त्सं-की है, जिसकी लिपि (चीनी) ऊपर
से नीचे की तरफ पढ़ी जाती है. ब्रह्मा और खरोष्ठ भारतवर्ष में हुए और त्सं-की चीन में. ब्रह्मा
और खरोष्ठ ने अपनी लिपियां देवलोक से पाईं और त्सं-की ने अपनी लिपि पक्षी आदि के पैरों के
चिह्नों पर से बनाई.'२
उक्त चीनी पुस्तक के लेख से स्पष्ट हो गया कि जो लिपि बाईं से दाहिनी ओर लिखी जाती है
उसका प्राचीन नाम 'ब्राह्मी' और दाहिनी से बाईं ओर लिखी जाने वाली का 'खरोष्ठी' था. 'ब्राह्मी'३
लिपि इस देश की स्वतंत्र और सार्वदेशिक लिपि होने से ही जैन और बौद्धों के ग्रंथ भी उसीमें लिखे
जाने लगे और इसी से उन्होंने लिपियों की नामावलि में इसको प्रथम स्थान दिया.
जब कितने एक यूरोपियन् विद्वानों ने यह मान लिया कि हिंदू लोग पहिले लिखना नहीं जानते
थे तब उनको यह भी निश्चय करने की आवश्यकता हुई कि उनकी प्राचीन लिपि (ब्राह्मी) उन्होंने
स्वयं बनाई वा दूसरों से ली. इस विषय में भिन्न भिन्न विद्वानों ने कई भिन्न भिन्न अटकलें लगाईं
जिनका सारांश नीचे लिखा जाता है.
डॉ. आल्फ्रेड मूलर का अनुमान है कि सिकंदर के समय यूनानी लोग हिन्दुस्तान में आये उन-
से यहां वालों ने अक्षर सीखे. प्रिन्सेप और सेनार्ट ४ ने भी यूनानी लिपि से ब्राह्मी लिपि का
बनना अनुमान किया और विलसन ५ ने यूनानी अथवा फिनिशियन् लिपि से उसका उद्भव माना.
हलेवे ६ ने लिखा है कि 'ब्राह्मी एक मिश्रित लिपि है जिसके आठ व्यंजन तो ज्यों के त्यों ई. स. पूर्व की
चौथी शताब्दी के 'अरमइक' अक्षरों से; ६ व्यंजन, दो प्राथमिक स्वर, सब मध्यवर्ती स्वर और अनु-
स्वार आरियेनो-पाली (=खरोष्ठी) से; और पांच व्यंजन तथा तीन प्राथमिक स्वर प्रत्यक्ष या गौणरूप से
प्रज्ञ नामक श्रमण ई. स. ७८२ में चीन गया और ई. स. ७८५ और ८१० के बीच उसने और एक दूसरे श्रमण ने मिल कर
'महायानबुद्धिषट्पारमितासूत्र' तथा तीन दूसरे पुस्तकों का चीनी अनुवाद किया. ये थोड़े से नाम केवल उदाहरणार्थ
दिये गये हैं.
१. इं. ऍ; जिल्द ३४, पृ. २१. २. इं. ऍ., जिल्द ३४, पृ. २१.
३. ब्राह्मी लिपि वास्तव में 'नागरी' (देवनागरी) का प्राचीन रूप ही है. 'नागरी' नाम कब से प्रसिद्धि में आया
यह निश्चित नहीं परंतु तांत्रिक समय में 'नागर' (नागरी) नाम प्रचलित था, क्यों कि 'नित्याषोडशिकार्णव' की 'सेतुबंध'
नामक टीका का कर्ता भास्करराय एकार (ए) का त्रिकोण रूप 'नागर' (नागरी) लिपि में होना बतलाता है (कोशत्रयवपु-
र्बभ्रौ खेखो वस्र तनं । नागरलिप्या साम्प्रदायिकैरेकारस्य त्रिकोणाकारतयैव लेखनात् । इं. ऍ; जिल्द ३५, पृ. २८३) . 'वातुलागम'
की टीका में लिखा है कि शिव मंत्र (ह्रीं) के अक्षरों से शिव की मूर्ति 'नागर' (नागरी) लिपि से बन सकती है; दूसरी
लिपियों से बन नहीं सकती (शिवमन्त्रोऽप्येतैराकारैः नागरलिपिभिरुद्धारयितुं शक्यते । व्यतिरिक्तलिपिभिर्नोद्धारयितुं शक्यते । इं. ऍ;
जिल्द ३५, पृ. २७६).
यूरोपियन विद्वानों ने 'ब्राह्मी' लिपि का 'पाली', 'इंडियन् पाली,' 'साउथ (दक्षिणी) अशोक' या 'लाट' लिपि
आदि नामों से भी परिचय दिया है परंतु हम इस लेख में सर्वत्र 'ब्राह्मी' नाम का ही प्रयोग करेंगे.
४. इं. ऍ; जिल्द ३५, पृ. २५३. ५. ज. ए; ई. स. १८८५, पृ. २६८.
ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति. १६
यूनानी लिपि से लिये गये हैं, और यह मिश्रण ई. स. पूर्व ३२५ के आस पास (अर्थात् सिकंदर के
इस देश में आने के बाद) हुआ माना जाता है.'
कस्ट १ का मानना है कि एशिया के पश्चिम में रहने वाले फिनिशियन् लोग ई. स. पूर्व की
आठवीं शताब्दी में लिखना जानते थे और उनका वाणिज्यसंबंध इस देश (हिन्दुस्तान) के साथ
रहने तथा उन्हींके अक्षरों से ग्रीक, रोमन तथा सेमेटिक भाषाओं के अक्षर बनने से अनुमान होता है
कि ब्राह्मी लिपि भी फिनिशियन् लिपि से बनी होगी.
सर् विलियम जोन्स १ ने सेमेटिक से ब्राह्मी की उत्पत्ति होना अनुमान किया, जिसका कॉप २
तथा लेप्सिअस २ ने अनुमोदन किया. फिर वेबर ३ ने सेमेटिक और ब्राह्मी अक्षरों के बीच कुछ स-
मानता दिखला कर उसी मत को पुष्ट किया जिसको बेनफ़ी ४, पॉट् ४, वेस्टरगार्ड ४, मैक्समूलर ४, फ्रेडरिख
मूलर ४, साइस् ४, व्हिट्नी ४ आदि विद्वानों ने थोड़े बहुत संदेह के साथ स्वीकार किया.
स्टिवन्सन ५ का अनुमान है कि ब्राह्मी लिपि या तो फिनिशियन् लिपि से बनी हो या मिसर के
अक्षरों से.
पॉल गोल्डस्मिथ ६ का मानना है कि फिनिशियन् अक्षरों से सिलोन (सिंहलद्वीप, लंका) के
अक्षर बने और उनसे भारतवर्ष के; परंतु ई. मूलर ७ का कथन है कि सीलोन में लिखने का प्रचार
होने के पहिले भारतवर्ष में लिखने का प्रचार था.
बर्नेल ८ का मत यह है कि फिनिशियन् से निकले हुए अरमइक अक्षरों से ब्राह्मी अक्षर बने,
परंतु आइजक टेलर ९ लिखता है कि अरमइक और ब्राह्मी अक्षर परस्पर नहीं मिलते.
लेनोर्मेट १० कहता है कि फिनिशियन् अक्षरों से अरब के हिमिअरैटिक अक्षर बने और उनसे
ब्राह्मी.
डीके ११ का मत यह है कि ब्राह्मी लिपि असीरिआ १२ की 'क्युनिफॉर्म' १३ लिपि से किसी प्राचीन
दक्षिणी १४ सेमिटिक लिपि के द्वारा, जिससे हिमिअरैटिक लिपि निकली, बनी है.
आइजक टेलर लिखता है कि 'ब्राह्मी लिपि किसी अज्ञात दक्षिणी सेमिटिक लिपि से निकली
होगी. वास्तव में वह किस लिपि से निकली यह अब तक मालूम नहीं हुआ परंतु ओमन १५ या हड्रॅमाँट १६
या ओर्मज् १७ आदि के खंडहरों में उस (मूललिपि) का पता एक न एक दिन लगना संभव है.'
ऐडवर्ड क्लॉड १८ लिखता है कि फिनिशियन् से सेबियन् (हिमिअरैटिक) लिपि निकली और
उससे ब्राह्मी.
१. ज. रॉ. ए. सो; जिल्द १६, पृ ३२६, ३५६. २. इं. ऍ; जि. ३५ पृ. २५३. ३. Indische Skizzen, p. 225-250.
४. इं. ऍ; जि. ३५, पृ. २५३. ५. ज. बॉ. ब्रॅ. रॉ. ए. सो; जि. ३, पृ. ७५. ६. ऍकेडेमी; ई. स. १८७७ ता. ६ जनवरी.
७. मू; रि. ए. इं. सी; पृ. २४. ८. ब; सा. इं. पे; पृ. ६. ९. टे; आ; जि. २, पृ. ३१२.
१०. ऍस्से ऑन फिनिशियन् आल्फ़ावेद; जि. १, पृ. १५०.
११. Zeitschrift der Deutschen Morgenlandischen Gessellschaft, Band, XXXI, 398 f.
१२. असीरिआ के लिये देखो पृ. १, टि. ३.
१३. यूरोपियन् विद्वानों ने 'क्युनिफॉर्म' उस लिपि का नाम रक्खा है जिसके अक्षर तीर के फल की आकृति के कई
चिह्नों को मिलाने से बनते हैं. इस बहुत प्राचीन और विचित्र लिपि के लेख असीरिआ, बाबीलन् तथा ईरान आदि में
मिलते हैं. ईरान के प्रसिद्ध बादशाह दारा ने अपना वृत्तान्त इसी लिपि में (तीन भाषाओं में) बेहिस्तान नामक स्थान के
चट्टान पर खुदवाया था.
१४. फिनिशियन् लिपि से निकली हुई लिपियों में से हिमिअरैटिक (सेबियन्), इथिओपिक्, कूफ़ी और अरबी आदि
दक्षिणी, और अरमइक, सीरिअक और चाल्डिअन् उत्तरी सेमिटिक लिपियां कहलाती हैं.
१५. अरब के एक प्रदेश का नाम जिसका प्रधान नगर मस्कत है.
१६. अरब के दक्षिण तट पर का एक इलाका जो ओमन से पश्चिम की तरफ है.
१७. ईरान के समुद्र तट पर का एक प्राचीन शहर.
१८. स्टोरी ऑफ दी आलफ़ाबेट; पृ. २०७.
(एल) से, 'ठ'
O (ओ) से, 'प' U (यू) से, 'क' X (ऐक्स) से और 'ओ' Z (जॅड्) से बहुत कुछ मिलता हुआ है. इस
प्रकार उर्दू के तीन और अंग्रेज़ी के दश अक्षर ब्राह्मी से आकृति में मिलने पर भी यह नहीं कहा जा
सकता कि ब्राह्मी लिपि उर्दू या अंग्रेज़ी से निकली है क्यों कि समान उच्चारण वाले एक भी अक्षर में
(सिवाय उर्दू के 'लाम्' ل और ब्राह्मी के 'ल' के) समानता, जो लिपियों के परस्पर संबंध को निश्चय
करने की एक मात्र कसौटी है, पाई नहीं जाती.
Footnotes:
१. मैक; हि. सं. लि; पृ. १६. २. डे; बु. इं; पृ. ११४.
३. बा; पं. इं; पृ. २४५. ४. रै; ए. इं; पृ. १७-१८.
Let's double-check the character in L33:
'ऊ' or 'ऊ' ⅃ or 'ऊ' 𑀊:
Wait, let's look at the character between 'ऊ' and (एल):
It's an L shape, but reversed, with a middle horizontal tick. In Unicode, that is:
Ⅎ (U+2
ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति. २१
ई. स. पूर्व की सातवीं शताब्दी के आसपास फिनिशियन् लिपि से ग्रीक (यूनानी) अक्षर बने,
जो प्रारंभ में दाहिनी ओर से बाईं ओर को लिखे जाते थे, परंतु पीछे से बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखे
जाने लगे जिससे कुछ अक्षरों¹ का रुख़ बदल गया. इस फेरफार के पीछे उनसे पुराने लैटिन और
लैटिन से अंग्रेज़ी (रोमन) अक्षर बने. यों फिनिशियन् और वर्तमान अंग्रेज़ी (रोमन) अक्षरों का
लगभग २६०० वर्ष पूर्व का संबंध होने पर भी उनका परस्पर मिलान किया जावे तो A (ए), b (बी),
D (डी), E (ई), H (ऐच्), K (के), L (ऐल), M (ऐम्), N (ऐन्), P (पी), Q (क्यू), R
(आर) और T (टी) ये १३ अक्षर अपने मूल फिनिशियन् अक्षरों से बहुत कुछ मिलते हुए हैं.
इसी तरह अशोक के समय की ब्राह्मी लिपि का उपर्युक्त हिअरोटिक, फिनिशियन् आदि लिपियों
के साथ मिलान करने पर यदि ब्राह्मी उनमें से किसी से निकली हो तो उस लिपि के साथ ब्राह्मी
की समानता, अंग्रेज़ी और फिनिशियन् के बीच की समानता से बहुत अधिक होनी चाहिये थी क्यों
कि वर्तमान अंग्रेज़ी की अपेक्षा ब्राह्मी का फिनिशियन् के साथ क़रीब २२०० वर्ष पहिले का संबंध
होता है; परंतु ब्राह्मी का उक्त लिपियों के साथ मिलान करने से पाया जाता है कि:—
इजिप्त (मिसर) की हिअरोटिक² लिपि का एक भी अक्षर समान उच्चारण वाले ब्राह्मी अक्षर
से नहीं मिलता.
असीरिया³ की 'क्युनिफ़ॉर्म' लिपि से न तो फिनिशियन् आदि सेमिटिक लिपियों का और न
ब्राह्मी का निकलना संभव है. वह लिपि भी प्रारंभ में चित्रात्मक थी परंतु पीछे से ईरानियों ने उसे
वर्णात्मक बनाया तो भी उसके अक्षर चलती हुई क़लम से लिखे नहीं जा सकते. उसका प्रत्येक
अक्षर तीर के फल की सी आकृति के कई चिन्हों को मिलाने से बनता है. वह भी एक प्रकार से
चीनी लिपि की नांईं चित्रलिपि सी ही है और उसका लिखना सरल नहीं किंतु विकट है.
फिनिशियन् लिपि की वर्णमाला में २२ अक्षर हैं जिनमें से केवल एक 'गिमेल' (ग) अक्षर (मो-
अब के लेख का) ब्राह्मी के 'ग'⁴ से मिलता है.
प्राचीन ग्रीक (यूनानी) लिपि के दो अक्षर 'गामा' (ग) और 'थीटा'५ (थ) ब्राह्मी के 'ग' और
'थ' से मिलते हैं.
१. फिनिशियन् के अक्षर 'हे' 'वाव्' 'काफ्' और 'रेश' से क्रमशः निकले हुए चार ग्रीक (यूनानी) अक्षरों
'एप्सिलन्', 'वाओ', 'कप्पा' और 'हौ' का रुख़ बदल गया. पीछे से ग्रीक लिपि में 'वाओ' का प्रचार न रहा.
२. मिसर में बहुत प्राचीन काल में जो लिपि प्रचलित थी वह अक्षरात्मक नहीं किंतु चित्रलिपि थी. उसमें अक्षर
न थे किंतु केवल आशय सूचक चित्र बनाये जाते थे जैसे कि 'मनुष्य ने प्रार्थना की' कहना हो तो हाथ जोड़े हुए मनुष्य का
चित्र बना दिया जाता था. इसी तरह कई भिन्न भिन्न चित्रों द्वारा कोई एक विषय बतलाया जाता था. उसके पीछे उसी
चित्रलिपि से वर्णात्मक लिपि बनी जिसको यूरोपियन् विद्वान् 'हिअरोटिक' कहते हैं. उसीसे फिनिशियन् लिपि का
निकलना माना जाता है.
३. एशिया के पश्चिमी भाग में युफ़्रेटिज़ नदी के पास का एक प्रदेश जो तुर्क राज्य में है. प्राचीन काल में यह बड़ा
प्रतापी राज्य था जिसकी राजधानी निवेवा थी. इस राज्य का विस्तार बढ़ता घटता रहा और एक समय मोड़िआ,
पर्शिआ (ईरान), अर्मीनिआ, सीरिआ आदि देश इसीके अंतर्गत थे. ऐसा पाया जाता है कि यह राज्य प्राचीन
बाबीलन के राज्य में से निकला और पीछा उसीमें मिल गया. मुसलमानों के राजत्वकाल में बड़ी आबादी वाला यह राज्य
ऊजड़ सा हो गया. 'क्युनिफॉर्म' लिपि यहीं के लोगों ने प्रचलित की थी.
४. यदि केवल आकृति की समानता देखी जावे तो फिनिशियन् का 'दालेथ्' (द) ब्राह्मी के 'ए' से, 'तेथ्' (त) 'ध'
से (कुछ कुछ), 'ऐन्' (ए) 'ठ' से, 'त्साधे' (स) 'झ' से (कुछ कुछ) और 'ताव्' (त) 'क' से (ठीक) मिलता हुआ है.
यह समानता ठीक वैसी ही है जैसी कि ऊपर (पृ. २० में) बतलाई हुई वर्तमान अंग्रेज़ी टाइप (छापे के अक्षरों) के १०
अक्षरों की ब्राह्मी के १० अक्षरों से.
५. ग्रीक थीटा (थ) फिनिशियन् 'तेथ्' से निकला है जिसका मूल उच्चारण 'त' था और उसीसे अरबी का 'तोए'
(ط) निकला. ग्रीक में 'त' का उच्चारण न होने से फिनिशियन् 'ताओ' का ग्रीक में टाओ (ट) बनाया गया और तेथ् को
थीटा (थ). फिनिशियन् में 'ट' या 'थ' का उच्चारण ही न था.
२२ प्राचीनलिपिमाला.
हिमिअरिटिक १ लिपि के २२ अक्षरों में से केवल एक 'गिमे'ल' (ग) अक्षर टेढ़ा करने पर ब्राह्मी
के 'ग' से मिलता है.
अरमइक २ लिपि में से भी केवल एक गिमेल अक्षर 'ग' से मिलता है.
खरोष्ठी लिपि की वर्णमाला के ३७ अक्षरों में से एक भी अक्षर ब्राह्मी लिपि से नहीं मिलता.
लिपियों के इस मिलान को पढ़ कर पाठक लोग यह प्रश्न किये बिना न रहेंगे कि जब बूलर
फिनिशिअन् लिपि के २२ अक्षरों से ब्राह्मी के २२ अक्षरों की उत्पत्ति बतलाता है तब तुम इन लिपियों
के समान उच्चारण वाले अक्षरों में से केवल एक 'गिमेल' (ग) अक्षर की ब्राह्मी के 'ग' से समानता
होना प्रकट करते हो यह क्या बात है? इसके उत्तर में मेरा कथन यह है कि पृष्ठ २३ में प्राचीन अक्षरों
का एक नक्शा ३ दिया है जिसमें मिसर के हिअरेटिक, फिनिशिअन्, हिमिअरिटिक (सेबियन्) और
अरमइक लिपियों के प्राचीन अक्षर दिये हैं और उनके साथ ही साथ समान उच्चारण वाले खरोष्ठी
तथा ब्राह्मी अक्षर भी दिये हैं. उनका परस्पर मिलान करने से पाठकों को मालूम हो ही जायगा कि
सेमिटिक और ब्राह्मी लिपि में वास्तविक समानता कितनी सी है. तो भी उनको यह जिज्ञासा
रह जायगी कि समान उच्चारण वाले अक्षर तो परस्पर मिलते नहीं, ऐसी दशा में बूलर ने फिनिशिअन्
के २२ अक्षरों से, जो ब्राह्मी के १८ उच्चारणों ४ का ही काम दे सकते हैं, ब्राह्मी के २२ अक्षरों का निकलना
कैसे बता दिया. इस लिये हम बूलर के मिलान का कुछ परिचय यहां करा देते हैं.
सेमिटिक और ब्राह्मी लिपि की बनावट में बड़ा अंतर यह है कि फिनिशिअन् आदि अक्षरों का
ऊपर का भाग बहुधा स्थूल ५ होता है और नीचे का भाग खड़ी या तिरछी लकीर से बनता है परंतु
ब्राह्मी अक्षरों में से अधिक अक्षरों का ऊपर का भाग पतली लकीर से प्रारंभ होता है और नीचे
आ कर स्थूल ६ बनता है. इस वैषम्य के एकीकरण के लिये बूलर ने यह मान लिया कि 'हिंदुओं ने
[कितने एक] सेमिटिक अक्षरों को उलट दिया है अर्थात् उनका ऊपर का हिस्सा नीचे और नीचे का
१. मुसलमानी धर्म के प्रादुर्भाव से बहुत पहिले दक्षिणी अरब में फिनिशिअन् से कुछ ही मिलती हुई एक प्रकार की
लिपि प्रचलित थी जिसको 'हिमिअरिटिक' कहते हैं. उक्त लिपि के प्राचीन लेख वहां के 'सबा' नामक राज्य में विशेष
मिलने के कारण उसी लिपि को 'सेबियन्' भी कहते हैं.
२. ग्रीक (यूनानी) लोग जिस प्रदेश को सीरिआ कहते थे क़रीब क़रीब उसीको प्राचीन सेमिटिक भाषा में 'अरम्'
कहते थे. उसके अंतर्गत एशिया के पश्चिम का 'मेसोपोटेमिआ' प्रदेश था, सिवाय पेलेस्टाइन् के. वहां की भाषा और
लिपि को अरमइक या अरमिअन् कहते हैं.
३. इस नक्शे में दस खड़ी पंक्तियां बनाई गई हैं, जिनमें से पहिली पंक्ति में सेमिटिक वर्णमाला के अक्षरों के नाम
तथा उनकी ध्वनि के सूचक अक्षर नागरी में दिये हैं; दूसरी पंक्ति में मिसर की हिअरेटिक् लिपि के अक्षर दिये हैं (ए. ब्रि;
जिल्द १, पृ. ६०० से-नवां संस्करण); तीसरी में प्राचीन फिनिशिअन् अक्षर (ए. ब्रि; जि. १, पृ. ६०० से); चौथी में मोअब
के राजा मेशा के ई. स. पूर्व की नवीं शताब्दी के शिलालेख से फिनिशिअन् अक्षर (ए. ब्रि; जि. ३३, पृ. ६०२ से-दसवां संस्क-
रण); पांचवीं में हिमिअरिटिक् लिपि के अक्षर (ए. ब्रि; जि. ३३, पृ. ६०२ से); छठी में सक्कारा (मिसर में), टीमा (अरब में)
आदि के ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी के शिला लेखों से अरमइक अक्षर (इं. ऐं; जि. २४, पृ. २८६ के सामने के सेट से);
सातवीं में मिसर के पॅपायरसों से अरमइक अक्षर (इं; ऐं; जि. २४, पृ. २८६ से ); आठवीं में डॉ. सर जॉन मार्शल के उद्योग
से तक्षशिला से मिले हुए ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी के अरमइक लेख के फोटो (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६१५, पृ. ३४०
के सामने के सेट) से अक्षर छांटे गये हैं; नवीं में समान उच्चारण वाले खरोष्ठी अक्षर अशोक के लेखों से लिये हैं; और दसवीं
में समान उच्चारण वाले ब्राह्मी लिपि के अक्षर अशोक के लेखों से उद्धृत किये गये हैं.
४. जैसे अंग्रेजी में C (सी), K (के) और Q (क्यू) ये तीन अक्षर 'क' की ध्वनि के सूचक हैं और उर्दू में 'से'
ث 'सीन्' س और 'स्वाद' ص 'स' की ध्वनि के सूचक हैं ऐसे ही फिनिशिअन् अक्षरों में भी आठ अक्षर ऐसे हैं जो चार ही
उच्चारण का काम देते हैं अर्थात् 'हे' और 'हेथ्' (जिससे अरबी का 'हे' ح और अंग्रेजी का H 'एच' निकला) इन दोनों
से 'ह'; 'तेथ' (जिससे अरबी का 'तोय' ط) और 'ताव्' (जिससे 'ते' ت निकला) दोनों से 'त'; 'काफ्' और
'क़ॉफ़' से 'क,' ऐसे ही 'सामेख' (जिससे अरबी का सीन س) और 'त्साधे' (जिस से 'स्वाद' ص निकला) से 'स' का
उच्चारण होता है, जिससे फिनिशिअन २२ अक्षर ब्राह्मी के १८ उच्चारणों का ही काम दे सकते हैं.
५. देखो आगे पृष्ठ २३ में दिया हुआ नक्शा. ६. देखो लिपिपत्र पहिला.
ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति. २३
सेमिटिक् वर्णमालाओं के अक्षरों का नक्शा—
समान उच्चारण वाले खरोष्ठी तथा ब्राह्मी अक्षरों सहित.
[तालिका-शीर्षक]:
१. सेमिटिक् अक्षरों के नाम तथा उच्चारण.
२. हिए-रेटिक्.
३. फ़िनिशियन्. [उप-स्तम्भ: प्राचीन. | मोअब के लेख से.]
४. हिमियरिटिक् (सेबियन)
५. अरमइक्. [उप-स्तम्भ: सक्कारा, तीमा, आदि के लेखों से. | पॅपायरसों से. | तक्षशिला के लेख से.]
६. समान उच्चारण वाले खरोष्ठी तथा ब्राह्मी अक्षर (अशोक के लेखों से). [उप-स्तम्भ: खरोष्ठी. | ब्राह्मी.]
[तालिका के अक्षर-नाम एवं उच्चारण]:
अलेफू (अ)
बेथ् (ब)
गिमेल् (ग)
दालेथ् (द)
हे (ह)
वाव् (व)
ज़ाइन् (ज़)
हेथ् (ह)
तेथ् (त)
योद् (य)
काफ़् (क)
लामेध् (ल)
मेम् (म)
नून् (न)
सामेख् (स)
आइन् (ए)
पे (प)
त्साधे (स)
कॉफ़् (क़)
रेश् (र)
शिन् (श)
तावू (त)
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitized by eGangotri
२४ प्राचीनलिपिमला.
ऊपर कर दिया है अथवा [खड़े] अक्षरों को आड़ा कर दिया है और [कितने एक] के कोणों को
खोल दिया है १.
फिनिशिअन और ब्राह्मी की लेखन प्रणाली एक दूसरे से विपरीत होने के कारण बहुत से
अक्षरों की परस्पर समानता बतलाने में बाधा पड़ती थी जिसके लिये बूलर ने यह मान लिया कि
'ब्राह्मी लिपि का रुख पलटने से (अर्थात् जो लिपि पहिले दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी २ जाती थी
उसे पीछे से बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखने से) कितने एक [सेमिटिक] अक्षरों का रुख ग्रीक
अक्षरों की नांई दाहिनी ओर से बाईं ओर को बदल गया'३.
जब इन फेरफारों से भी काम न चला तब बूलर ने २२ अक्षरों में से प्रत्येक की उत्पत्ति बतला
ने के समय बहुत से और फेरफार भी मान लिये जिनमें से मुख्य ये हैं:-
कहीं लकीर को कुछ [इधर उधर] हटा दिया ४, जहां लकीर न थी वहां नई खींच दी५, कहीं
मिटा दी६, कहीं बढ़ा दी७, कहीं घटा दी८, कहीं नीचे लटकती हुई लकीर ऊपर की तरफ़ फिरा दी९, तिरछी
लकीर सीधी करदी१, आड़ी लकीर खड़ी करदी", दो लकीरों के बीच के अंतर को नई लकीर से जोड़
दिया१२, एक दूसरी को काटने वाली दो लकीरों के स्थान में बिंदु बना दिया१३, बाईं तरफ मुड़ी हुई
लकीर के अंत को ऊपर बढ़ा कर गांठ बनादी१४, त्रिकोण को धनुषाकार बना दिया१५, कोण या
कोणों को मिटा कर उनके स्थान में अर्धवृत्त सा बना दिया१६ आदि. इतना करने पर भी सात १७
अक्षरों की उत्पत्ति तो ऐसे अक्षरों से माननी पड़ी कि जिनका उच्चारण बिलकुल बेमेल है.
ऊपर बतलाये हुए फेरफार करने पर फिनिशिअन अक्षरों से ब्राह्मी अक्षरों की उत्पत्ति बूलर
ने किस तरह सिद्ध की जिसके केवल चार उदाहरण नीचे दिये जाते हैं:-
१-अलेफ से 'अ' - K > > d
२-हेथ १८ से 'घ' - 日 日 四 ⊓ し
३-योध् से 'य' - Z 7 F ५ 山 山
४-मेम् से 'म' - y y ୪
इन चारों अक्षरों की उत्पत्ति में पहिला अक्षर प्राचीन फिनिशिअन लिपि का है और
अंतिम अक्षर अशोक के लेखों से है. बाकी के सब अक्षर परिवर्तन की बीच की दशा के सूचक अनु-
मान किये गये हैं कहीं लिखे हुए नहीं मिले. इन रूपान्तरों का विवरण यह है कि:-
१. बू; इं. पे; पृ. ११.
२. ब्राह्मी लिपि पहिले दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी वा नहीं यह विचार आगे किया जायगा.
३. बू; इं. पे; पृ. ११. ४. अलेफ़ से 'अ' की उत्पत्ति में; बू; इं.पे; पृ. १२.
५. ज़ाइन् से 'ज' की उत्पत्ति में 'ज' के बीच की आड़ी लकीर.
६. ज़ाइन् से 'ज' की उत्पत्ति में; हेथ से 'घ' की उत्पत्ति में. ७. हेथ से 'घ' की उत्पत्ति में.
८. ज़ाइन् से 'ज' की उत्पत्ति में ज़ाइन् के ऊपर और नीचे की दोनों आड़ी लकीरों के बाईं तरफ़ बाहर निकले
हुए अंशों का कम करना.
९. योध् से 'य' की उत्पत्ति में. १०. नून् से 'न' की उत्पत्ति में; योध् से 'य' की उत्पत्ति में.
११. दालेथ से 'ध' की उत्पत्ति में. १२. वाव से 'व' की उत्पत्ति में. १३. तैथ से 'थ' की उत्पत्ति में.
१४. मेम् से 'म' की उत्पत्ति में. १५. दालेथ से 'ध' की उत्पत्ति में. १६. मेम् से 'म' की उत्पत्ति में.
१७. दालेथ (द) से 'ध' की; हेथ् (ह) से 'घ' की; तैथ् (त) से 'थ' की; सामेख (स) से 'ष' की; फे
(फ) से 'प' की; त्साधे (स) से 'च' की; और क़ोफ् (क़) से 'ख' की.
१८. ए.सा.ब्रि; जि. १, पृ. ६०० में तथा डॉ. ई. रॉडिजर संपादित और परिवर्धित जेसेनियस के हिब्रू ग्रामर (व्याक-
रण) में इस अक्षर का नाम चेथ (च) लिखा है (पृ. १३) परंतु बंबई की छपी हुई 'हिब्रू प्राइमरी रीडर' नामक छोटी
पुस्तक में, जिसमें हिब्रू अक्षरों के नाम तथा उच्चारख अंग्रेजी और मराठी (नागरी लिपि) दोनों में दिये हैं, इसका नाम 'हेथ्'
(पृ. १) और इसका ध्वनिसूचक चिह्न 'ह' (पृ. ३) दिया है. इसीसे ग्रीक (यूनानी) अक्षर 'एटा' बना जिससे अंग्रेज़ी
का 1 (ऐच) अक्षर, जो 'ह' की ध्वनि का सूचक है, तथा इसीसे अरबी का ८ (हे), जो 'ह' का सूचक है, निकला है.
अत एव हमने इस अक्षर का नाम 'हिब्रू प्राइमरी रीडर' के अनुसार 'हेथ्' लिखा है.
ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति. २४
१-अलेफ् के पहिले रूप का रुख बदलने से दूसरा रूप बना. दूसरे की खड़ी लकीर को दा-
हिनी तरफ़ हटाने से तीसरा बना. उसपर से चौथा रूप बन गया.
२-हेथ् के पहिले रूप की खड़ी लकीरों को समान लंबाई की बनाने और तीनों आड़ी लकीरों
को सीधी करने से दूसरा रूप बना. इस प्रकार सीधे बने हुए खड़े अक्षर को आड़ा करने से
तीसरा रूप बना, जिसके ऊपर के भाग की आड़ी लकीरों को मिटा देने से चौथा रूप बना. फिर
बाईं ओर की पहिली खड़ी लकीर को लंबी कर देने से पांचवां रूप बन गया.
३-योध् की सब तिरछी लकीरों को सीधी करने से दूसरा रूप बना, जिसका रुख बद-
लने से तीसरा रूप बना. इस खड़े अक्षर को आड़ा करने से चौथा रूप बना. उसकी नीचे लट-
कती हुई लकीर को ऊपर की तरफ़ फिरा देने से पांचवां रूप बना, जिसकी मध्य की खड़ी लकीर
को लंबी करने से छठा रूप बना और उसपर से सातवां.
४-मेम् के नीचे वाली बाईं ओर मुड़ी हुई लकीर को ऊपर की तरफ़ बढ़ा कर ग्रंथि बना देने से
दूसरा रूप बना. फिर ऊपर के बाईं तरफ़ के कोण वाले हिस्सों को मिटा कर उनकी जगह अर्धवृत्त
सी रेखा बना देने से तीसरा रूप बना. उसके ग्रंथि वाले भाग को बढ़ा कर ऊपर निकालने से
चौथा रूप बन गया.
बूलर के माने हुए अक्षरों के ये फेरफार ऐसे हैं कि उनके अनुसार अक्षरों का तोड़ मरोड़
करने से केवल फिनिशियन् से ब्राह्मी की उत्पत्ति बतलाई जा सकती है ऐसा ही नहीं, किंतु दुनिया भर
की चाहे जिस लिपि से किसी भी लिपि की उत्पत्ति आसानी से सिद्ध हो सकती है. उदाहरण
के लिये तक्षशिला के अरमइक लिपि के लेख के अक्षरों से तथा वर्तमान अंग्रेज़ी टाइप (छापे के अक्षरों)
से ब्राह्मी लिपि के अक्षर कितनी आसानी से बनाये जा सकते हैं यह नीचे बतलाया जाता है-
तक्षशिला के लेख से—
१-अलेफ् से 'अ'- 𐡀 X 𑀅
२-बेथ् से 'ब'- د ⊃ 𑀩
३-गिमेल् से 'ग'- 人 𑀕
४-दालेथ् से 'द'- ד ל 𑀤
५-हे से 'ह'- ת v 𑀳 ᒐ
६-वाव् से 'व'- ˥ ⌋ 𑀯
इन ६ अक्षरों के रूपांतरों में प्रत्येक का पहिला रूप तक्षशिला के लेख से लिया गया है
और अंतिम रूप अशोक के लेखों के अनुसार है. बीच के परिवर्तन बूलर के माने हुए नियमों के अनु-
सार अनुमान किये गये हैं, जिनका ब्यौरा इस तरह है—
१-अलेफ् के पहिले रूप के ऊपर के तथा नीचे के कोनों को कुछ चौड़े करने से दूसरा रूप बना.
उसकी दाहिनी तरफ की दोनों तिरछी लकीरों को सीधी करने से तीसरा रूप बन गया.
२-बेथ् के पहिले रूप के ऊपर की छोटी सी खड़ी लकीर को मिटाने से दूसरा रूप बना. उस-
की बाईं तरफ एक खड़ी लकीर खींचने से तीसरा रूप बन गया.
३-गिमेल् 'ग' से मिलता ही है.
४-दालेथ् के पहिले रूप के नीचे की खड़ी लकीर के साथ बाईं तरफ एक आड़ी लकीर जोड़ने
से दूसरा रूप बना और उस नई जुड़ी हुई लकीर के बाएं किनारे पर ज़रासी छोटी खड़ी लकीर जोड़ने
से तीसरा रूप बन गया.
५-हे के पहिले रूप को उलट देने से दूसरा रूप बना; उसका रुख पलटने से तीसरा रूप बन गया
जो अशोक के सारनाथ के लेख के 'ह' से मिलता हुआ है और चौथा रूप गिरनार के लेख से है.
२६ प्राचीनलिपिमाला.
६-वावू के पहिले रूप को उलटने से दूसरा रूप बना, जिसका रुख पलटने से तीसरा बना,
फिर उसकी दाहिनी तरफ़ की झुकी हुई लकीर के स्थान में ग्रंथि बना देने से चौथा रूप बना.
वर्तमान अंग्रेज़ी छापे के अक्षरों से—
१-'ए' से 'अ' A A H 𑀅
२-'बी' से 'ब' B B ☐
३-'सी' से 'च' C D d
४-'डी' से 'द' D כ כ
५-'ई' से 'ए' E [ ▷ 𑀏
६-'ऐफ़' से 'फ' F E b 𑀨
इनमें से प्रत्येक अक्षर के रूपांतरों में पहिला रूप वर्तमान अंग्रेज़ी छापे का अक्षर और अं-
तिम रूप अशोक के लेखों से है. बीच के कुल रूप बूलर के सूत्रों के अनुसार अनुमान किये हैं जिनका
विवरण इस तरह है—
१-'ए' के पहिले रूप के ऊपर के कोण को खोल देने से दूसरा रूप बना, जिसकी दोनों
तिरछी खड़ी लकीरों को सीधी करने से तीसरा रूप हुआ और उससे चौथा.
२-'बी' की बीच की लकीर को मिटाने से दूसरा रूप और उसकी दाहिनी तरफ़ की वक्र रेखा
को सीधी करने से तीसरा बना.
३-'सी' की दाहिनी तरफ़ एक खड़ी लकीर जोड़ने से दूसरा रूप बन गया और उससे तीसरा.
४-'डी' की बाईं ओर की खड़ी लकीर को मिटाने से दूसरा रूप बना, जिसके बाईं तरफ़
के किनारों के साथ एक एक छोटी खड़ी लकीर जोड़ने से तीसरा रूप बन गया.
५ 'ई' की बीच की लकीर मिटा देने से दूसरा रूप; उसकी दाहिनी तरफ़ की दोनों लकीरों
को तिरछी करने से तीसरा रूप और उससे चौथा बन गया.
६ ऐफ़ को उलटने से दूसरा रूप बना, जिसके नीचे की दाहिनी तरफ़ की दो आड़ी लकीरों
को एक खड़ी लकीर से जोड़ देने से तीसरा रूप और उससे चौथा बन गया.
तक्षशिला के अरमइक लेख से तथा अंग्रेज़ी के छापे के अक्षरों से ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति
बताने में फिनिशियन की अपेक्षा अधिक सरलता होने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि उनसे
ब्राह्मी अक्षर बने हैं. ऐसी दशा में बूलर का मत किसी तरह स्वीकार नहीं हो सकता क्योंकि फिनि-
शियन् के गिमेल (ग) और ब्राह्मी के 'ग' को छोड़ कर अन्य किसी समान उच्चारण वाले अक्षर में
समानता नहीं है. बूलर का सारा यत्न खींचतान ही है. इसीसे बूलर की 'भारतवर्ष की ब्राह्मी लिपि
की उत्पत्ति' के छपने के बाद 'बुद्धिस्ट इंडिया' नामक पुस्तक के कर्ता डॉ. राइस डेविड्ज़ को यह
मानना पड़ा कि 'ब्राह्मी लिपि के अक्षर न तो उत्तरी और न दक्षिणी सेमिटिक अक्षरों से बने हैं'१, ऐसे
ही 'एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटॅनिका' नामक महान अंग्रेज़ी विश्वकोश में इस विषय में यह लिखा गया कि
'बूलर का कथन यद्यपि पाण्डित्य और चतुराई से भरा हुआ है तो भी यह मानना पड़ता है कि
वह अधिक निश्चय नहीं दिलाता. इस लिपि का उद्भव कहां से हुआ इसका निर्णय निश्चित रूप से कर-
ने के पहिले इसके प्राचीन इतिहास के और भी प्रमाणों का ढूंढ़ना आवश्यक है, और ऐसे प्रमाण मिल
सकेंगे इसमें कोई संदेह नहीं'२.
यदि ब्राह्मी और खरोष्ठी दोनों लिपियां फिनिशियन् से, जिसकी उत्पत्ति ई. स. पूर्व की १० वीं
शताब्दी के आस पास मानी जाती है, निकली होतीं तो ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी में, अर्थात्
अशोक के समय, उनमें परस्पर बहुत कुछ समानता होनी चाहिये थी जैसी कि अशोक के समय की
१ देखो ऊपर, पृ. २०.
२ ए., ब्रि; जि ३३, पृ. ६०३.
ब्राह्मी से निकली हुई ई. स. की पांचवीं और छठी शताब्दी की गुप्त और तेलुगु-कनड़ी लिपियों के बीच
पाई जाती है, परंतु उन दोनों (ब्राह्मी और खरोष्ठी) में एक भी अक्षर की समानता का न होना भी
यही सिद्ध करता है कि ये दोनों लिपियां एक ही मूल लिपि से सर्वथा नहीं निकलीं १, अर्थात् खरोष्ठी
सेमिटिक से निकली हुई है और ब्राह्मी सेमिटिक से नहीं.
फिनिशियन लिपि से ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति मानने का सिद्धान्त कहां तक प्रामाणिक और
स्वीकार करने योग्य है इसका विचार यहां तक किया गया. अब वूलर के इस दूसरे कथन की समीक्षा
आवश्यक है कि 'ब्राह्मी लिपि पहिले दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी.'
वूलर को फिनिशियन लिपि से ब्राह्मी की उत्पत्ति सिद्ध करने के यत्न में कितने एक अक्षरों
का रुख बदलने की आवश्यकता थी. ई. स. १८६१ में जनरल कनिंगहाम ने 'कॉइन्स ऑफ एन्श्यंट्
इंडिया' नामक भारतवर्ष के प्राचीन सिक्कों के विषय का एक पुस्तक प्रकट किया जिसमें एरण २ से
मिले हुए कई एक तांबे के सिक्के भी छापे. उनमें से एक पर का ब्राह्मी लिपि का लेख 'धमपालस' ३
दाहिनी ओर से बाईं ओर को पढ़ा जाता है. इस उलटे लेख के तिनके के सहारे को वूलर ने बड़े
महत्व का माना और इसीके आधार पर अपनी 'ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति' विषयक पुस्तक में लिखा
कि 'सेमिटिक से ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति सिद्ध करने के प्रमाणों की श्रृंखला को पूर्ण करने के लिये
जिस कड़ी की त्रुटि थी वह वास्तव में यही है' ४; तथा उस सिक्के को ई. स. पूर्व ३५० के आस पास
का मान कर यह सिद्धांत कर लिया कि 'उस समय ब्राह्मी लिपि दाहिनी ओर से बाईं ओर तथा
बाईं ओर से दाहिनी ओर (दोनों तरह) लिखी जाती थी' ५.
इस कल्पना का मुख्य आधार एरण का सिक्का ही है, क्योंकि अब तक कोई शिलालेख इस
देश में ऐसा नहीं मिला कि जिसमें ब्राह्मी लिपि फारसी की नांई उलटी लिखी हुई मिली हो ६. किसी
सिक्के पर लेख का उलटा आ जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि सिक्के पर उभरे हुए अक्षर
सीधे आने के लिये सिक्के के ठप्पे में अक्षर उलटे खोदने पड़ते हैं अर्थात् जो लिपियां बाईं ओर से दाहिनी
ओर (जैसे कि ब्राह्मी और उससे निकली हुई सब लिपियां और अंगरेज़ी भी) लिखी जाती हैं उनके
ठप्पों में सिक्के की इबारत की पंक्ति का आरंभ दाहिनी ओर से करके प्रत्येक अक्षर उलटा खोदना
पड़ता है, परंतु यदि खोदनेवाला इसमें चूक जाय और ठप्पे पर बाईं ओर से खोदने लग जाय तो
सिक्के पर सारा लेख उलटा आ जाता है, जैसा कि एरण के सिक्के पर पाया जाता है. यदि वह एक
१. ई. स. १८६४ में मैंने 'प्राचीनलिपिमाला' का प्रथम संस्करण छापा, जिसकी एक प्रति डॉ. वूलर को भेंट की.
उसकी पहुंच स्वीकार करने के साथ डॉ. वूलर ने लिखा 'कि तुम ब्राह्मी लिपि को भारतवासियों की निर्माण की हुई स्वतंत्र लिपि
मानते हो यह ठीक नहीं. ब्राह्मी लिपि सेमिटिक लिपि से निकली हुई है.' इसके उत्तर में मैंने लिखा कि 'यदि ब्राह्मी
और खरोष्ठी दोनों लिपियां एक ही मूल लिपि की शाखें हैं तो ७०० वर्ष के भीतर ही उनमें परस्पर एक भी अक्षर की
समानता न रही इसका क्या कारण है सो आप कृपा कर सूचित कीजिये.' परंतु इसका कुछ भी उत्तर वे न दे सके और न
अब भी कोई दे सकता है.
२. मध्य प्रदेश के सागर ज़िले का एक प्राचीन नगर. ३. क; कॉ. ए. इं; पृ. १०१; प्लेट ११, संख्या १८.
४. वू; इं. स्ट; संख्या ३, पृ. ३ (ई. स. १८६५). ५. वू; इं. स्ट; संख्या ३, पृ. ४३.
६. वूलर ने लिखा है कि 'अशोक के लेखों में दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखने के चिह्न बहुत कम मिलते हैं.
जौगड़ और धौली के लेखों में 'ओ' उलटा है; और जौगड़ तथा देहली के सिवालिक स्तंभ के लेख में 'ध' कचित् उलटा
मिलता है' (वू; इं. पे; पृ. ६), परंतु ये तो मामूली लेखकों के हस्तदोष या देशभेद के तुच्छ अंतर हैं. क्योंकि 'ओ'
की आकृति, एक खड़ी लकीर के ऊपर के छोर से बाईं ओर को और नीचे के छोर से दाहिनी ओर को एक एक आड़ी लकी-
र खींचने से, बनती है. यह संभव है कि असावधान लेखक पहिले खड़ी लकीर खींच कर आड़ी लकीरें खींचने में ग़लती
कर जावे. 'ध' की आकृति धनुष के सदृश होने के कारण उसकी प्रत्यंचा चाहे दाहिनी तरफ रहे या बाईं तरफ इसमें मा-
मूली अनपढ़ लेखक शायद ही फ़र्क माने. देशभेद से भी कभी कभी किसी अक्षर की आकृति उलटी लिखी मिलती है जैसे
कि ई. स. की छठी शताब्दी के यशोधर्मन् के लेख में 'उ' नागरी के 'उ' का सा है (देखो लिपिपत्र १८ वां) परंतु उसी
शताब्दी के गार्लुलक सिंहादित्य के दानपत्र में उससे उलटा है (लिपिपत्र ३८ वां). वर्तमान बंगला लिपि का 'ख' उलट,
२८ प्राचीनलिपिमाला.
दो अक्षरों को ही उलटा खोदना भूल कर सीधा खोद दे तो केवल वे ही अक्षर सिक्के पर उलटे आ
जावेंगे.
ऐसी गलतियां कभी कभी हो जाने के उदाहरण मिल आते हैं. सातवाहन (आंध्र) वंश के
राजा शातकर्णी के भिन्न प्रकार के दो सिक्कों पर 'शतकणिस' (शातकर्णे:) सारा लेख एरण के सिक्के
की नांई उलटा आ गया है १. पार्थियन् अचद्गमिस्र् के एक सिक्के पर के खरोष्ठी लेख का एक अंश उलटा
आ गया है अर्थात् नागरी की नांई बाईं ओर से दाहिनी ओर है (रै; इं. कॉ; पृ. १५). विक्रम संवत्
१९४३ के बने हुए इंदौर राज्य के पैसे पर 'एक पाव आना इंदोर' यह लेख उलटा आगया है २.
महाक्षत्रप रंजुवुल (राजुल) के एक सिक्के पर खरोष्ठी लेख की तरफ के ग्रीक अक्षर Y और E से
बने हुए मोनोग्राम ३ में E अक्षर उलटा आगया है ४ परंतु दूसरे सिक्कों पर सीधा है ५. एक प्राचीन
मुद्रा पर 'श्रीमसपकुल' लेख है, जिसमें 'श्री' और 'प' ये दो अक्षर उलटे आ गये हैं ६. ऐसे ही पटना
से मिली हुई एक मुद्रा पर के 'अगपलश' (अंगपालस्य) लेख में 'अ' उलटा आगया है ७.
ऐसी दशा में एरण के सिक्के पर के उलटे लेख के आधार पर यह मान लेना कि, 'ब्राह्मी लिपि
पहिले दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी' किसी तरह आदरणीय नहीं हो सकता ८.
प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. हुल्श (Hultzsch) ने लिखा है ९ कि 'बूलर एरण के सिक्के को, जिस
पर के अक्षर दाहिनी ओर से बाईं ओर हैं, ब्राह्मी के सेमिटिक लिपि से निकलने का प्रमाण मानता है,
इसमें मैं उससे सहमत नहीं हो सकता. यह जानी हुई बात है कि सिक्के पर अक्षर ठीक आने के
लिये ठप्पे पर उनको उलटा खोदना चाहिये; इस बात को हिन्दुस्तानी ठप्पा खोदने वाले अक्सर भूल
जाते हैं.' डॉ. फ्लीट १० ने भी ऐसा ही मत प्रकट किया है.
ब्राह्मी लिपि के न तो अक्षर फिनिशियन् या किसी अन्य लिपि से निकले हैं और न उसकी
बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखने की प्रणाली किसी और लिपि से बदल कर बनाई गई है. यह
भारतवर्ष के आर्यों का अपनी खोज से उत्पन्न किया हुआ मौलिक आविष्कार है. इसकी प्राची-
नता और सर्वांगसुंदरता से चाहे इसका कर्त्ता ब्रह्मा देवता माना जा कर इसका नाम ब्राह्मी पड़ा,
लिखा जाता है (लिपि पत्र ७८) परंतु पहिले ऐसा न था (लिपिपत्र ३२-३५).
१. रा; कँ. कॉ. आं. क्ष; पृ. ४, प्लेट १, संख्या ६ और ११. २. इं. पँ; जि. २६, पृ. ३३६.
३. पूरे नाम के प्रत्येक अंश के प्रारंभ के सांकेतिक दो या तीन वर्णों को मिला कर जो एक विलक्षण चिह्न बनाया
जाता है उसे अंग्रेज़ी में 'मोनोग्राम' (एकाक्षर) कहते हैं.
४. गा; कॉ. ग्री. सी; पृ. ६७, संख्या ५. ५. गा; कॉ. ग्री. सी; पृ. ६७, संख्या ६.
६. ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९०१, पृ. १०४, संख्या ६. ७. क; आ. स. रि; जि. १५, प्लेट ३, संख्या २.
८. ई. स. १८९५ में डॉन मार्टिनो डी. ज़िल्वा विक्रमसिंगे ने रॉयल एशिआटिक सोसाइटी के जर्नल (त्रैमासिक पत्रिका)
में एक पत्र प्रकाशित कर यह बतलाना चाहा था कि 'सीलोन में कई शिलालेख प्राचीन ब्राह्मी लिपि के मिले हैं, जिनमें से
दो में अक्षर उलटे हैं, परंतु उनकी छापों के अभाव में उनका विवेचन नहीं किया जा सकता' (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८९५,
पृ. ८६५-६८) और ई. स. १९०१ में एक लेख उसी जर्नल में फिर छपवाया जिसमें उलटा खुदा हुआ कोई शिलालेख तो प्रका-
शित न किया किंतु उनकी छापें शीघ्र प्राप्त करने का यत्न करने की इच्छा प्रकट की, और अशोक के गिरनार के लेख में 'प्र'
के स्थान में 'पै' 'त्र' के स्थान में 'तं' आदि जो अशुद्धियां मिलती हैं उनपर से यह सिद्धांत निकाला कि 'ब्राह्मी लिपि का
रुख बदलने से ये अक्षर इस तरह लिखे गये' (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९०१, पृ. ३०१-५); परंतु गिरनार के सारे लेख को ध्यान-
पूर्वक पढ़नेवाले को यह अवश्य मालूम हो जायगा कि उसके लिखनेवाले को संयुक्ताक्षरों का ठीक ठीक ज्ञान न था और
संयुक्ताक्षर में प्रथम आने वाले 'र्' (रेफ) तथा द्वितीय आने वाले 'र' का अन्तर तो वह समझता ही न था जिससे उसने
संयुक्ताक्षरों में ऐसी ऐसी अनेक अशुद्धियां की हैं. यदि इन अशुद्धियों पर से ही यह सिद्धांत स्थिर किया जा सकता हो
कि ये ब्राह्मी लिपि के उलटे लिखे जाने के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं तो बात दूसरी है.
ई. स. १९०३ में डॉ. राइस डेविड्स ने विक्रमसिंगे के ऊपर लिखे हुए पत्र और लेख के हवाले से मान लिया कि
ब्राह्मी लिपि उलटी भी लिखी जाती थी (डे; बु. इं; पृ. ११५), परंतु साथ में यह भी लिख दिया कि 'अब तक उलटी
लिपि का कोई शिलालेख प्रसिद्ध नहीं हुआ.'
९. इं. पँ; जि. २६, पृ. ३३६.
१०. बू; ई. पे. के अंग्रेज़ी अनुवाद की भूमिका; पृ. ३-४.