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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 318 में से

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पृष्ठ 45

१६ प्राचीनलिपिमाला.
और भोजपत्र प्रकृति ने यहां बहुत प्रचुरता से उत्पन्न किये हैं. मिसर के 'पंपायरस' की तरह उन्हें
खेती करके प्राप्त करने की यहां आवश्यकता न थी. भारतवासी रूई से कागज़ बनाना भी ई. स.
पूर्व की चौथी शताब्दी से पहिले जान गये थे२. पुराणों में पुस्तक लिखवा कर दान करने का
बड़ा पुण्य माना गया है. चीनी यात्री हुएंत्सग यहां से चीन को लौटने समय बीस घोड़ों पर
पुस्तकें लाद कर अपने साथ ले गया जिनमें ६५७ भिन्न भिन्न पुस्तक थे. मध्यभारत का श्रमण
पुण्योपाय ई. स. ६५५ में १५०० से अधिक पुस्तक लेकर चीन को गया था. ये बौद्ध भिक्षु कोई
यूरोप या अमेरिका के धनाढ्य तो थे नहीं कि यहां तोड़े खोल कर पुस्तक मोल लें. उन्हें
जितने पुस्तक मिले वे गृहस्थों, भिक्षुओं, मठों या राजाओं से दान में मिले होंगे. जब दान ही
दान में इतने ग्रंथ उनको मिल गये तो सहज ही में अनुमान हो सकता है कि लिखित पुस्तकों की
यहां कितनी प्रचुरता थी.
१. 'पंपायरस' बरू (सरकंडा) की जाति के एक पौधे का नाम है, जिसकी खेती मिसर में नाइल नदी के मुहानों
के बीच के दलदल वाले प्रदेश में बहुत प्राचीन काल से होती थी. यह पौधा चार हाथ ऊंचा और इसका डंठल तिधारा
या त्रिकोण आकृति का होता था, जिसमें से ४ १/२ इंच से ६ १/२ इंच तक की लंबाई के टुकड़े काटे जाते थे. उनकी छाल (न
कि गूदे से, देखो पं. सा. त्रि. जिल्द ३३, पृ. ८६१) से बहुत कम चौड़ाई की चिंधियां निकलती थीं. उनको लेई आदि से एक दूसरी
से चिपका कर पन्ना बनाया जाता था. ये पत्र पहिले दबाये आते थे फिर उनको सुखाते थे. जब वे बिलकुल सूख जाते तब
हाथीदांत या शंख से घोट कर उनको चिकणा और समान बनाते थे, तभी वे लिखने योग्य होते थे. इस प्रकार तय्यार
किये हुए पत्रों को यूरोपवाले 'पंपायरस्' कहते हैं. उन्हीं पर पुस्तकें, चिट्ठियां तथा आवश्यककीय तहरीरें आदि लिखी
जाती थीं, क्योंकि उस समय कागज़ का काम ये ही देते थे. इस प्रकार तय्यार किये हुए कई पत्रों को एक दूसरे के साथ चिप-
का कर उनके लंबे लंबे खरड़े भी बनाये जाते थे, जो मिसर की प्राचीन कब्रों में से मिल आते हैं. वे या तो लकड़ी की सं-
दूकों में यत्नपूर्वक रक्खी हुई लाशों के हाथों में रक्खे हुए या उनके शरीर पर लपेटे हुए मिलते हैं. मिसर में ई. स. पूर्व
२००० के आस पास तक के ऐसे खरड़े (पंपायरस) मिले हैं, क्योंकि वहां वर्षा का प्रायः अभाव होने से ऐसी वस्तु
अधिक काल तक नष्ट नहीं होती. लिखने की कुदरती सामग्री सुलभ न होने से ही बड़े परिश्रम से उक्त पौधे की छाल की
चिंधियों को चिपका चिपका कर पत्रे बनाते थे तिस पर भी उसकी खेती राज्य के हाथ में रहती थी. यूरोप में भी प्राचीन
काल में लेखनसामग्री का अभाव होने से चमड़े को साफ कर उसपर भी लिखते थे. ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी में ग्रीक
लोगों ने मिसर से बने बनाये 'पंपायरस' अपने यहां मंगवाना शुरू किया. फिर यूरोप में उनका व्यवहार होने लगा और
अरबों के राजत्वकाल में इटली आदि में वह पौधा भी बोया जाने लगा, जिससे यूरोप में भी 'पंपायरस' तय्यार होने लगे.
ई. स. ७०४ में अरबों ने समरकंद नगर विजय किया जहां पर उन्होंने पहिले पहिल रूई और चीथड़ों से कागज़ बनाना सीखा,
फिर दमास्कस (दमिशक) में भी कागज़ बनने लगे. ई. स. की नवीं शताब्दी में अरबी पुस्तकें प्रथम ही प्रथम कागज़ों पर
लिखी गईं और १२ वीं शताब्दी के आस पास अरबों द्वारा कागज़ों का प्रवेश यूरोप में हुआ. फिर 'पंपायरस' का बनना
बंद होकर यूरोप में १३ वीं शताब्दी से कागज़ ही लिखने की मुख्य सामग्री हुई.
२. देखो ऊपर पृ. ३, और टिप्पण ७. ३. सिम; अ. हि. ई; पृ. ३५२ (तृतीय संस्करण).
४. बु. नं; डॉ. बु. त्रि; पृ. ४३७.