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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 318 में से

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पृष्ठ 41

१२ प्राचीनलिपिमाला.
अथर्ववेद में जुए में जीत की प्रार्थना करने का एक सूक्त १ है जिसमें लिखा है २ कि मैंने तुम से संलि-
खित (अर्थात् जुए के हिसाब में तेरी जीत का लिखा हुआ धन) और संरुद्ध (जुए में धरा हुआ धन)
जीत लिया. इससे पाया जाता है कि पशुओं के कानों की तरह पासों पर भी अंक रहते थे और जुए
में जीते धन का हिसाब लिखा जाता था.
यजुर्वेद संहिता (वाजसनेयि) के पुरुषमेध प्रकरण में जहां भिन्न भिन्न पेशे वाले बहुत से पुरुष
गिनाये हैं वहां 'गणक' भी लिखा है ३, जिसका अर्थ गणित करने वाला (गण् धातु से) अर्थात्
ज्योतिषी होता है. उसी संहिता में एक, दश (१०), शत (१००), सहस्र (१०००), अयुत (१००००),
नियुत (१०००००), प्रयुत (१००००००), अर्बुद (१०००००००), न्यर्बुद (१००००००००), समुद्र
(१०००००००००), मध्य (१००००००००००), अन्त (१०००००००००००) और परार्ध
(१००००००००००००) तक की संख्या दी है ४ और ठीक यही संख्या तैत्तिरीय संहिता में भी
मिलती है ५.
सामवेद के पंचविंश ब्राह्मण में यज्ञ की दक्षिणाओं का विधान है, जिसमें सब से छोटी दक्षिणा
१२ [कृष्णल] भर सोना है और आगे की दक्षिणाएं द्विगुणित क्रम से बढ़ती हुई २४, ४८, ९६, १९२,
३८४, ७६८, १५३६, ३०७२, ६१४४, १२२८८, २४५७६, ४९१५२, ९८३०४, १९६६०८ और ३९३२१६
भर तक की बतलाई हैं ६. इसमें श्रेढीगणित का बड़ा अच्छा उदाहरण है और इस प्रकार का लाखों
का गणित लिखने और गणित के ज्ञान के बिना हो ही नहीं सकता.
शतपथ ब्राह्मण के अग्निचयन प्रकरण में हिसाब लगाया है कि ऋग्वेद के अक्षरों से १२०००
बृहती (३६ अक्षर का) छंद प्रजापति ने बनाये अर्थात् ऋग्वेद के कुल अक्षर (१२००० x ३६=) ४३२०००
हुए. इसी तरह यजु के ८००० और साम के ४००० बृहती छंद बनने से उन दोनों के भी ४३२०००
अक्षर हुए. इन्हीं अक्षरों से पंक्ति छंद (जिसमें आठ आठ अक्षरों के पांच पद अर्थात् ४० अक्षर
होते हैं) बनाने से ऋग्वेद के (४३२०००÷४०=) १०८०० पंक्ति छंद हुए और उतने ही यजु और साम के
मिल कर हुए. एक वर्ष के ३६० दिन और एक दिन के ३० मुहूर्त होने से वर्ष भर के मुहूर्त भी
१०८०० होते हैं अर्थात् तीनों वेदों से उतने पंक्ति छंद दुबारा बनते हैं जितने कि वर्ष के मुहूर्त होते हैं ७.
उसी ब्राह्मण में समयविभाग के विषय में लिखा है कि रातदिन के ३० मुहूर्त, एक मुहूर्त के १५
क्षिप्र, एक क्षिप्र के १५ एतर्हि, एक एतर्हि के १५ इदानीं और एक इदानीं के १५ प्राण होते हैं ८ अर्थात्
रातदिन के (३० x १५ x १५ x १५ x १५=) १५१८७५० प्राण होते हैं. इस गणना के अनुसार एक
प्राण एक सेकंड के १०/९ के लगभग आता है.
शब्द काम में आते थे. इस सूत्र के व्याख्यान में कात्यायन और पतंजलि ने लिखा है कि जुआरियों के (सांकेतिक)
व्यवहार में ये प्रयोग काम में आते थे और इनका भाव यह है कि पहले का सा जुआ नहीं हुआ (अर्थात् खेल में हार गये).
अक्ष और शलाका शब्दों से 'परि' का समास एकवचन में ही होता है. इससे सिद्ध है कि द्वि-परि का अर्थ 'दो पासों से
पहले का सा खेल नहीं हुआ' यह नहीं है किंतु 'दो के अङ्क से पहले का सा खेल न हुआ' (अर्थात् हार हुई) यही है.
ऐसे एकपरि (या एक-पर), द्विपार (या द्वापरि, या द्वापर) या त्रिपार शब्द ही हारने के सूचक हैं क्योंकि चार (कृत) में तो
जीत ही होती थी. काशिका ने 'पञ्चिका' नामक पांच पासों के खेल का उल्लेख करके लिखा है कि उसमें अधिक से अधिक
(परंप्रेण) चतुष्परि शब्द [इस अर्थ में] बन सकता है, क्योंकि पांच में तो जय ही होता है.
१. अथर्व. सं., ७. ५० (५२).
२. यज्जितं वा संलिखितसंजैषमुत संरुधम् (अथर्व. सं. ७. ५० (५२). ४).
३. ग्रामण्यां गणकमभिकोशकं तान्मक्षसे (यजु. वाज. सं. ३०. २०). ४. यजु. वाज. सं १७. २.
५. तै. सं. ४. ४०. ११. ४; ७. २.२०.१. यही संख्या कुछ फेर फार के साथ मैत्रायणी (२.८. १४) और काठक (३९.६)
संहिता में मिलती है.
६. पंचविंश ब्रा. १८. ३. ७. शतपथ ब्रा; १०.४.२.२२-२४. ८. शतपथ ब्रा. १२.३.२.१.