प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ प्राचीनलिपिमोल़ा.
वज्र की तरह समर्थ मानी जाती थी^१, बिलकुल न होने पावें. इसी लिये वैदिक लोग न केवल मंत्रों को,
परंतु उनके पदपाठ को, और दो दो पद मिला कर क्रमपाठ को, और इसी तरह पदों के उलट फेर से
घन, जटा आदि के पाठों को स्वरसहित कंठस्थ करते थे. गुरु मंत्र का एक एक अंश शिष्यों को
सुनाता और वे उसे ज्यों का त्यों रट कर कंठस्थ करते, फिर पूरा मंत्र सुन कर उसे याद कर लेते.
ऋग्वेद के समय में वेदों के पढ़ने की यही रीति^२ थी और अब तक भी कुछ कुछ चली आती है,
परंतु यह पठनशैली केवल वेदों के लिये ही थी, अन्यशास्त्रों के लिये नहीं. वेदों के पठन की यही
रीति, जिससे स्वरों का शुद्ध ज्ञान होता था, बनी रहे और श्रोत्रिय ब्राह्मणों का आदर घट न जाय,
इसी लिये लिखित पुस्तक पर से वेदों का पढ़ना निषिद्ध माना गया है^३, परंतु लिखितपाठक को
अधमपाठक^४ कहना ही सिद्ध करता है कि पहिले भी वेद के लिखित पुस्तक होते थे और उनपर से पढ़ना
सरल समझ कर लोग उधर प्रवृत्त होते थे; इसी लिये निषेध करना पड़ा कि प्राचीन रीति उच्छिन्न
न हो और स्वर आदि की मर्यादा नष्ट न हो. इस लिये वेद के पुस्तक लिखने का पेशा करना और
पुस्तकों को बेचना पाप माना गया है^५. वेद के पुस्तक विस्मृति में सहायता के लिये अवश्य रहते
थे और व्याख्यान, टीका, व्याकरण, निरुक्त, प्रातिशाख्य आदि में सुभीते के लिये उनका उपयोग
होता था.
वेद के पठनपाठन में लिखित पुस्तक का अनादर एक प्राचीन रीति हो गई और उसीकी
देखादेखी और शास्त्र भी जहां तक हो सके कंठस्थ किये जाने लगे, और अबतक जो विद्या मुखस्थ
हो वही विद्या मानी जाती है^६., कोई श्रोत्रिय पुस्तक हाथ में लेकर मंत्र नहीं पढ़ता था, होता
स्तोत्र ज़बानी सुनाता और उद्गाता समय समय पर साम भी मुख से सुनाता. अबतक भी
अच्छे कर्मकांडी सारी विधि और सारे मंत्र मुख से पढ़ते हैं, ज्योतिषी या वैद्य या धर्मशास्त्री
फल कहने, निदान करने और व्यवस्था देने में श्लोक सुनाना ही पांडित्य का लक्षण समझते
हैं, यहां तक कि वैयाकरण भी वही सराहा जाता है जो बिना पुस्तक देखे महाभाष्य
पढ़ा दे. वेदमंत्रों के शुद्ध उच्चारण की और यज्ञादि कर्मों में जहां जो प्रसंग पड़े वहां तत्तत्क्षण
उस विषय के मंत्रों को पढ़ने की आवश्यकता तथा वेदसंबंधी प्राचीन रीति का अनुकरण
करने की रुचि, इन तीन कारणों से हिंदुओं की परिपाटी शताब्दियों से यही हो गई कि
मस्तिष्क और स्मृति ही पुस्तकालय का काम दे. इसी लिये सूत्रग्रंथों^७ की संक्षेपशैली से
१. दुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥ पतंज-
लि का महाभाष्य, प्रथम आह्निक).
२. ऋग्वेद, ७ १०३ ५. 'एक मेंढक दूसरे की बोली के पीछे यों बोलता है जैसे गुरु के पीछे सीखने वाला '
(यदेषामन्यो अन्यस्य वाचं शाक्तस्येव वदति शिक्षमाणः).
३. यद्येतान्वाचविषयात्तात दालभ्येत्यादिपूर्वकात्। शूद्रदृष्टाधिगतादापि धर्मज्ञानं न संसतम् ॥ (कुमारिल का तंत्रवार्तिक, १. ३)
४. गीती शीघ्रौ शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः। अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः ॥ (याज्ञवल्क्य शिक्षा).
५. वेदविक्रयिणश्चैव वेदानां चैव दूपकाः। वेदानां लेखकाश्चैव ते वै निरयगामिनः (महाभारत, अनुशासनपर्व, ६३. २८).
महाभारत में जिस प्रसंग में यह श्लोक है वह दानपात्र ब्राह्मणों के विषय में है. यहां पर 'वेदानां दूषकाः' का अर्थ 'वेदों
में हेर फेर आदि मिलाने वाले' ही है, क्योंकि इस श्लोक से कुछ ही ऊपर इससे मिलता हुआ 'समयानां च दूषकाः' है जिस
का अर्थ 'प्रतिज्ञापत्र या इकरारनामों में घटा बढ़ा कर जाल करने वाले' है.
६. पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम् । कार्यकाले तु संप्राप्ते न सा विद्या न तद्धनम् ॥ (चाणक्यनीति ).
७. जो लोग श्रौतसूत्र, समयाचार (धर्म) सूत्र, गृह्यसूत्र, शुल्वसूत्र और व्याकरण आदि शास्त्रों के सूत्रों की संक्षिप्त
प्रणाली को देख कर यह अटकल लगाते हैं कि लेखनसामग्री की कमी से ये इतने संक्षिप्त और क्लिष्ट बनाये गये और पिछले
वैयाकरणों ने आधी मात्रा की किफायत को पुत्रोत्सव के समान हर्षदायक माना वे भूल करते हैं. यदि लेखनसामग्री की
कमी से ऐसा करते तो ब्राह्मण ग्रंथ इतने विस्तार से क्यों लिखे जाते? यह शैली केवल इसी लिये काम में लाई गई कि
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