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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 318 में से

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पृष्ठ 38

भारतवर्ष में लिखने के प्रचार की प्राचीनता. ६
छांदोग्य उपनिषद् १ में 'अक्षर' २ शब्द मिलता है तथा 'ई', 'ऊ' और 'ए' स्वर, ईकार, ऊकार
और एकार शब्दों से सूचित किये हैं ३ और स्वरों का संबंध इंद्र से, ऊष्मन् का प्रजापति से और
स्पर्शवर्णों का मृत्यु से बतलाया है ४. ऐसे ही तैत्तिरीय उपनिषद् में वर्ण और मात्रा का उल्लेख मिलता
है ५.
ऐतरेय आरण्यक में ऊष्मन्, स्पर्श, स्वर और अंतःस्थ ६ का; व्यंजन और घोष ७ का; णकार
और षकार (मूर्धन्य) के नकार और सकार (दंत्य) से भेद ८ का तथा 'संधि' ९ का विवेचन मिलता
है. ये सब बहुधा शांखायन आरण्यक में भी हैं.
ऐतरेय ब्राह्मण में 'ॐ' अक्षर, को अकार, उकार और मकार वर्णों के संयोग से बना हुआ
बतलाया है १०.
शतपथ ब्राह्मण में 'एकवचन,' ११ बहुवचन ' ११ तथा तीनों 'लिंगों' १२ के भेद का विवेचन मिलता है.
तैत्तिरीय संहिता में ऐंद्रवायव नामक ग्रह (सोमपात्र) दोनों देवताओं (इंद्र और वायु) को
एक ही दिये जाने के कारण का वर्णन करते समय लिखा है कि '[पहले] वाणी अस्पष्ट और अनि-
यमित (बिना व्याकरण के) थी. देवताओं ने इंद्र से कहा कि तुम इसका हमारे लिये व्याकरण
(नियमबंधन) कर दो. इंद्र ने कहा कि मैं [इस काम के लिये] यह वर मांगता हूं कि यह (सोम-
पात्र) मेरे तथा वायु के लिये एक ही लिया जाय. इससे ऐंद्रवायव ग्रह शामिल ही लिया जाता
है. इंद्र ने वाणी को बीच में से पकड़ कर व्याकृत किया. इसलिये वाणी व्याकृत (व्याकरणवाली,
नियमबद्ध) कही जाती है' १३. यही कथा शतपथ ब्राह्मण में भी मिलती है परंतु उसमें 'वि+आ+कृ'
धातु के स्थान पर 'निर्+वच्' धातु से बने हुए 'निर्वचन' और 'निरुक्त' शब्द काम में लिये हैं,
और यह कहा है कि इंद्रने पशु, वयस् (पक्षी) और सरीसृपों (रेंगनेवालों) की वाणी को छोड़ कर
१. पाणिनि के सूत्रपाठ में एक जगह (१.४.७६) और गणपाठ में दो जगह (ऋगयनादि ४.३.७३, और वेतनादि
४.४ १२ में) उपनिषद् शब्द आता है.
२. हिंकार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं तत्समं । १ । आदिरिति द्व्यक्षरं (छांदोग्य उप. २. १०). 'अक्षर' शब्द तो
संस्कृत के प्राचीन साहित्य में दोनों अर्थों में मिलता है अर्थात् ध्वन्यात्मक (उच्चारित) और संकेतात्मक (लिखित), परंतु
'वर्ण' शब्द केवल संकेतात्मक चिह्न के लिये ('वर्ण' धातु से=रंगना या बनाना) आता है और ईकार, ऊकार आदि में 'कार'
('कृ' धातु से=करना) केवल वर्ण के लिये; अतएव 'वर्ण' और 'कार' प्रत्ययवाले शब्द लिखित संकेतों के ही सूचक हैं.
३. अग्निरीकारः आदित्य ऊकारो निष्ठव एकारः (छांदोग्य उप. १. १३).
४. सर्वे स्वरा इन्द्रस्यात्मानः सर्व ऊष्माणः प्रजापतेरात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानः यदि खरेषूपालभेतेन्द्र शरणं... (छांदोग्य
उप. २. २२. ३).
५. वर्णः स्वरः । मात्रा बलम् (तैत्तिरीय उप. १. १).
६. तस्यैतस्यात्मनः प्राण ऊष्मरूपमस्थीनि स्पर्शरूपं मज्जानः स्वररूपं मांसं लोहितमित्येतदन्यच्चतुर्थमन्तःस्था रूपमिति (ऐ. आ.
३. २. १).
७. तस्य यानि व्यंजनानि तच्छरीरं यो घोषः स आत्मा य ऊष्माणः स प्राणः (ऐ. आ. २. २. ४.)
८. स यदि विचिकित्सेत्सणकारं ब्रवाणो ३ अषकारं ३ इति ..... सपकारं ब्रवाणी ३ अपकारा ३ इति (ऐ. आ. ३.२.६).
९. पूर्वमेवाक्षरं पूर्व्यरूपमुत्तरमुत्तररूपं योऽवकाशः पूर्व्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण येन सन्धिं विवर्त्तयति येन खराक्षरं विजानाति येन
मात्रामात्रां विभजते ...... संधिविज्ञपनी साम् ... (ऐ. आ. ३. १. ५).
१०. तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयो वर्णा अजायन्ताकार उकारो मकार इति तानकधा समभरत्तदेतदो३मिति (ऐ. ब्रा. ५. ३२). ऐसा
ही कौशीतकी ब्राह्मण (२६.४) और आश्वलायन श्रौतसूत्र (१०.४) में भी लिखा मिलता है.
११. अथी नेदेकवचनेन बहुवचनं ब्रवायामेति (शतपथ ब्रा. १३.५.१.१८).
१२. त्रेधाविचित्ता इयंका उपधीयन्ते पुंनाम्न्यः स्त्रीनाम्न्यो नपुंसकनाम्न्य स्तेधाविचित्तानि उ एवेमानि पुरुषस्याङ्गानि पुंनामानि
स्त्रीनामानि नपुंसकनामानि (शतपथ ब्रा. १०.५.१.२). वाक् छ एवैतत्सर्वं यत्स्त्री पुमान् नपुंसकं (शतपथ ब्रा. १०.५.२.३).
१३. वाग्वै पराच्यव्याकृतावदत् ते. देवा इन्द्रमब्रुवन् 'इमां नो व्याकुरु' इति सोऽब्रवीद्वरं वृणै मह्यं चैवैष वायवे च सह गृह्याता'
इति तस्मादैन्द्रवायवः सह गृह्यते. तामिन्द्रो मध्यतोऽवक्रम्य व्याकरोत्तस्मादियं व्याकृता वागुद्यते. तस्मात्सकृदिन्द्राय मध्यतो गृह्यते ......
(तैत्ति. सं. ६. ४. ७).