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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 51

२२ प्राचीनलिपिमाला.
हिमिअरिटिक १ लिपि के २२ अक्षरों में से केवल एक 'गिमे'ल' (ग) अक्षर टेढ़ा करने पर ब्राह्मी
के 'ग' से मिलता है.
अरमइक २ लिपि में से भी केवल एक गिमेल अक्षर 'ग' से मिलता है.
खरोष्ठी लिपि की वर्णमाला के ३७ अक्षरों में से एक भी अक्षर ब्राह्मी लिपि से नहीं मिलता.
लिपियों के इस मिलान को पढ़ कर पाठक लोग यह प्रश्न किये बिना न रहेंगे कि जब बूलर
फिनिशिअन् लिपि के २२ अक्षरों से ब्राह्मी के २२ अक्षरों की उत्पत्ति बतलाता है तब तुम इन लिपियों
के समान उच्चारण वाले अक्षरों में से केवल एक 'गिमेल' (ग) अक्षर की ब्राह्मी के 'ग' से समानता
होना प्रकट करते हो यह क्या बात है? इसके उत्तर में मेरा कथन यह है कि पृष्ठ २३ में प्राचीन अक्षरों
का एक नक्शा ३ दिया है जिसमें मिसर के हिअरेटिक, फिनिशिअन्, हिमिअरिटिक (सेबियन्) और
अरमइक लिपियों के प्राचीन अक्षर दिये हैं और उनके साथ ही साथ समान उच्चारण वाले खरोष्ठी
तथा ब्राह्मी अक्षर भी दिये हैं. उनका परस्पर मिलान करने से पाठकों को मालूम हो ही जायगा कि
सेमिटिक और ब्राह्मी लिपि में वास्तविक समानता कितनी सी है. तो भी उनको यह जिज्ञासा
रह जायगी कि समान उच्चारण वाले अक्षर तो परस्पर मिलते नहीं, ऐसी दशा में बूलर ने फिनिशिअन्
के २२ अक्षरों से, जो ब्राह्मी के १८ उच्चारणों ४ का ही काम दे सकते हैं, ब्राह्मी के २२ अक्षरों का निकलना
कैसे बता दिया. इस लिये हम बूलर के मिलान का कुछ परिचय यहां करा देते हैं.
सेमिटिक और ब्राह्मी लिपि की बनावट में बड़ा अंतर यह है कि फिनिशिअन् आदि अक्षरों का
ऊपर का भाग बहुधा स्थूल ५ होता है और नीचे का भाग खड़ी या तिरछी लकीर से बनता है परंतु
ब्राह्मी अक्षरों में से अधिक अक्षरों का ऊपर का भाग पतली लकीर से प्रारंभ होता है और नीचे
आ कर स्थूल ६ बनता है. इस वैषम्य के एकीकरण के लिये बूलर ने यह मान लिया कि 'हिंदुओं ने
[कितने एक] सेमिटिक अक्षरों को उलट दिया है अर्थात् उनका ऊपर का हिस्सा नीचे और नीचे का


१. मुसलमानी धर्म के प्रादुर्भाव से बहुत पहिले दक्षिणी अरब में फिनिशिअन् से कुछ ही मिलती हुई एक प्रकार की
लिपि प्रचलित थी जिसको 'हिमिअरिटिक' कहते हैं. उक्त लिपि के प्राचीन लेख वहां के 'सबा' नामक राज्य में विशेष
मिलने के कारण उसी लिपि को 'सेबियन्' भी कहते हैं.
२. ग्रीक (यूनानी) लोग जिस प्रदेश को सीरिआ कहते थे क़रीब क़रीब उसीको प्राचीन सेमिटिक भाषा में 'अरम्'
कहते थे. उसके अंतर्गत एशिया के पश्चिम का 'मेसोपोटेमिआ' प्रदेश था, सिवाय पेलेस्टाइन् के. वहां की भाषा और
लिपि को अरमइक या अरमिअन् कहते हैं.
३. इस नक्शे में दस खड़ी पंक्तियां बनाई गई हैं, जिनमें से पहिली पंक्ति में सेमिटिक वर्णमाला के अक्षरों के नाम
तथा उनकी ध्वनि के सूचक अक्षर नागरी में दिये हैं; दूसरी पंक्ति में मिसर की हिअरेटिक् लिपि के अक्षर दिये हैं (ए. ब्रि;
जिल्द १, पृ. ६०० से-नवां संस्करण); तीसरी में प्राचीन फिनिशिअन् अक्षर (ए. ब्रि; जि. १, पृ. ६०० से); चौथी में मोअब
के राजा मेशा के ई. स. पूर्व की नवीं शताब्दी के शिलालेख से फिनिशिअन् अक्षर (ए. ब्रि; जि. ३३, पृ. ६०२ से-दसवां संस्क-
रण); पांचवीं में हिमिअरिटिक् लिपि के अक्षर (ए. ब्रि; जि. ३३, पृ. ६०२ से); छठी में सक्कारा (मिसर में), टीमा (अरब में)
आदि के ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी के शिला लेखों से अरमइक अक्षर (इं. ऐं; जि. २४, पृ. २८६ के सामने के सेट से);
सातवीं में मिसर के पॅपायरसों से अरमइक अक्षर (इं; ऐं; जि. २४, पृ. २८६ से ); आठवीं में डॉ. सर जॉन मार्शल के उद्योग
से तक्षशिला से मिले हुए ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी के अरमइक लेख के फोटो (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६१५, पृ. ३४०
के सामने के सेट) से अक्षर छांटे गये हैं; नवीं में समान उच्चारण वाले खरोष्ठी अक्षर अशोक के लेखों से लिये हैं; और दसवीं
में समान उच्चारण वाले ब्राह्मी लिपि के अक्षर अशोक के लेखों से उद्धृत किये गये हैं.
४. जैसे अंग्रेजी में C (सी), K (के) और Q (क्यू) ये तीन अक्षर 'क' की ध्वनि के सूचक हैं और उर्दू में 'से'
ث 'सीन्' س और 'स्वाद' ص 'स' की ध्वनि के सूचक हैं ऐसे ही फिनिशिअन् अक्षरों में भी आठ अक्षर ऐसे हैं जो चार ही
उच्चारण का काम देते हैं अर्थात् 'हे' और 'हेथ्' (जिससे अरबी का 'हे' ح और अंग्रेजी का H 'एच' निकला) इन दोनों
से 'ह'; 'तेथ' (जिससे अरबी का 'तोय' ط) और 'ताव्' (जिससे 'ते' ت निकला) दोनों से 'त'; 'काफ्' और
'क़ॉफ़' से 'क,' ऐसे ही 'सामेख' (जिससे अरबी का सीन س) और 'त्साधे' (जिस से 'स्वाद' ص निकला) से 'स' का
उच्चारण होता है, जिससे फिनिशिअन २२ अक्षर ब्राह्मी के १८ उच्चारणों का ही काम दे सकते हैं.
५. देखो आगे पृष्ठ २३ में दिया हुआ नक्शा. ६. देखो लिपिपत्र पहिला.