प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति. २१
ई. स. पूर्व की सातवीं शताब्दी के आसपास फिनिशियन् लिपि से ग्रीक (यूनानी) अक्षर बने,
जो प्रारंभ में दाहिनी ओर से बाईं ओर को लिखे जाते थे, परंतु पीछे से बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखे
जाने लगे जिससे कुछ अक्षरों¹ का रुख़ बदल गया. इस फेरफार के पीछे उनसे पुराने लैटिन और
लैटिन से अंग्रेज़ी (रोमन) अक्षर बने. यों फिनिशियन् और वर्तमान अंग्रेज़ी (रोमन) अक्षरों का
लगभग २६०० वर्ष पूर्व का संबंध होने पर भी उनका परस्पर मिलान किया जावे तो A (ए), b (बी),
D (डी), E (ई), H (ऐच्), K (के), L (ऐल), M (ऐम्), N (ऐन्), P (पी), Q (क्यू), R
(आर) और T (टी) ये १३ अक्षर अपने मूल फिनिशियन् अक्षरों से बहुत कुछ मिलते हुए हैं.
इसी तरह अशोक के समय की ब्राह्मी लिपि का उपर्युक्त हिअरोटिक, फिनिशियन् आदि लिपियों
के साथ मिलान करने पर यदि ब्राह्मी उनमें से किसी से निकली हो तो उस लिपि के साथ ब्राह्मी
की समानता, अंग्रेज़ी और फिनिशियन् के बीच की समानता से बहुत अधिक होनी चाहिये थी क्यों
कि वर्तमान अंग्रेज़ी की अपेक्षा ब्राह्मी का फिनिशियन् के साथ क़रीब २२०० वर्ष पहिले का संबंध
होता है; परंतु ब्राह्मी का उक्त लिपियों के साथ मिलान करने से पाया जाता है कि:—
इजिप्त (मिसर) की हिअरोटिक² लिपि का एक भी अक्षर समान उच्चारण वाले ब्राह्मी अक्षर
से नहीं मिलता.
असीरिया³ की 'क्युनिफ़ॉर्म' लिपि से न तो फिनिशियन् आदि सेमिटिक लिपियों का और न
ब्राह्मी का निकलना संभव है. वह लिपि भी प्रारंभ में चित्रात्मक थी परंतु पीछे से ईरानियों ने उसे
वर्णात्मक बनाया तो भी उसके अक्षर चलती हुई क़लम से लिखे नहीं जा सकते. उसका प्रत्येक
अक्षर तीर के फल की सी आकृति के कई चिन्हों को मिलाने से बनता है. वह भी एक प्रकार से
चीनी लिपि की नांईं चित्रलिपि सी ही है और उसका लिखना सरल नहीं किंतु विकट है.
फिनिशियन् लिपि की वर्णमाला में २२ अक्षर हैं जिनमें से केवल एक 'गिमेल' (ग) अक्षर (मो-
अब के लेख का) ब्राह्मी के 'ग'⁴ से मिलता है.
प्राचीन ग्रीक (यूनानी) लिपि के दो अक्षर 'गामा' (ग) और 'थीटा'५ (थ) ब्राह्मी के 'ग' और
'थ' से मिलते हैं.
१. फिनिशियन् के अक्षर 'हे' 'वाव्' 'काफ्' और 'रेश' से क्रमशः निकले हुए चार ग्रीक (यूनानी) अक्षरों
'एप्सिलन्', 'वाओ', 'कप्पा' और 'हौ' का रुख़ बदल गया. पीछे से ग्रीक लिपि में 'वाओ' का प्रचार न रहा.
२. मिसर में बहुत प्राचीन काल में जो लिपि प्रचलित थी वह अक्षरात्मक नहीं किंतु चित्रलिपि थी. उसमें अक्षर
न थे किंतु केवल आशय सूचक चित्र बनाये जाते थे जैसे कि 'मनुष्य ने प्रार्थना की' कहना हो तो हाथ जोड़े हुए मनुष्य का
चित्र बना दिया जाता था. इसी तरह कई भिन्न भिन्न चित्रों द्वारा कोई एक विषय बतलाया जाता था. उसके पीछे उसी
चित्रलिपि से वर्णात्मक लिपि बनी जिसको यूरोपियन् विद्वान् 'हिअरोटिक' कहते हैं. उसीसे फिनिशियन् लिपि का
निकलना माना जाता है.
३. एशिया के पश्चिमी भाग में युफ़्रेटिज़ नदी के पास का एक प्रदेश जो तुर्क राज्य में है. प्राचीन काल में यह बड़ा
प्रतापी राज्य था जिसकी राजधानी निवेवा थी. इस राज्य का विस्तार बढ़ता घटता रहा और एक समय मोड़िआ,
पर्शिआ (ईरान), अर्मीनिआ, सीरिआ आदि देश इसीके अंतर्गत थे. ऐसा पाया जाता है कि यह राज्य प्राचीन
बाबीलन के राज्य में से निकला और पीछा उसीमें मिल गया. मुसलमानों के राजत्वकाल में बड़ी आबादी वाला यह राज्य
ऊजड़ सा हो गया. 'क्युनिफॉर्म' लिपि यहीं के लोगों ने प्रचलित की थी.
४. यदि केवल आकृति की समानता देखी जावे तो फिनिशियन् का 'दालेथ्' (द) ब्राह्मी के 'ए' से, 'तेथ्' (त) 'ध'
से (कुछ कुछ), 'ऐन्' (ए) 'ठ' से, 'त्साधे' (स) 'झ' से (कुछ कुछ) और 'ताव्' (त) 'क' से (ठीक) मिलता हुआ है.
यह समानता ठीक वैसी ही है जैसी कि ऊपर (पृ. २० में) बतलाई हुई वर्तमान अंग्रेज़ी टाइप (छापे के अक्षरों) के १०
अक्षरों की ब्राह्मी के १० अक्षरों से.
५. ग्रीक थीटा (थ) फिनिशियन् 'तेथ्' से निकला है जिसका मूल उच्चारण 'त' था और उसीसे अरबी का 'तोए'
(ط) निकला. ग्रीक में 'त' का उच्चारण न होने से फिनिशियन् 'ताओ' का ग्रीक में टाओ (ट) बनाया गया और तेथ् को
थीटा (थ). फिनिशियन् में 'ट' या 'थ' का उच्चारण ही न था.