प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभारतवर्ष में लिखने के प्रचार की प्राचीनता. १५
रचना हुई और इसी लिये ज्योतिष, वैद्यक आदि के ग्रंथ भी बहुधा श्लोकबद्ध लिखे जाने
लगे. और तो और, कोश के सदृश ग्रंथ भी श्लोकबद्ध लिखे गये कि कंठस्थ किये जा
सकें और अंकगणित तथा बीजगणित के नियम और उदाहरण भी श्लोकों में लिखे गये.
श्लोकबद्ध कोशों को देख कर यदि कोई यह अटकल लगावे कि इनकी रचना के समय लेख-
प्रणाली न थी अथवा लेखनसामग्री की कमी थी, या लीलावती के श्लोकबद्ध नियमों और उदाहरणों
से यह कहा जाय कि हिसाब ज़बानी ही होते थे तो यह कहना वैसा ही है जैसा कि यह कहना कि
व्याकरण के सूत्र, कल्पसूत्र, ब्राह्मण तथा वेदों तक की रचना ज़बानी ही हुई. रचनाकाल में सब ग्रंथ
विचारपूर्वक लिखकर ही बनाये गये, केवल अध्ययनप्रणाली में कंठस्थ करना ही मुख्य समझा
जाता था.
हिंदू लोग प्राचीन रीतियों का धर्म की तरह आग्रहपूर्वक पालन करते हैं और उनमें भरसक
परिवर्तन नहीं करते. कपड़े से बने हुए कागज़ का बहुत प्रचार होने पर भी मंत्र, यंत्र आदि को
भोजपत्र पर लिखना ही अब तक पवित्र माना जाता है. सस्ती और सुंदर छापे की पुस्तकें प्रच-
लित हुए एक शताब्दी बीतने आई तो भी पूजापाठ में हस्तलिखित पुस्तकों का ही बहुधा प्रचार है
और जो कर्मकांडी छपी हुई पद्धति लेकर विवाह आदि कराने जाता है उसका बहुधा अनादर होता
है. जैसे आजकल कर्मकांडी या पौराणिक छपी पुस्तकों पर से पढ़ते हैं परंतु कर्म या पारायण
के समय बहुधा हस्तलिखित पुस्तक ही काम में लाते हैं वैसे ही प्राचीन काल में विचार, स्वाध्याय
और व्याख्यान के लिये लिखित पुस्तक काम में आते थे, परंतु पढ़ाना, मंत्रपाठ और शास्त्रार्थ मुखस्थ
विद्या की पुरानी रीति से होता था.
बूलर लिखता है १ कि 'इस अनुमान को रोकने के लिये कोई कारण नहीं है कि वैदिक
समय में भी लिखित पुस्तकें मौखिक शिक्षा और दूसरे अवसरों पर सहायता के लिये काम में
ली जाती थीं.'
बोथलिंग कहता है २ कि 'मेरे मत में साहित्य के प्रचार में लिखने का उपयोग नहीं होता
था परंतु नये ग्रंथों के बनाने में इसको काम में लेते थे. ग्रंथकार अपना ग्रंथ लिख कर बनाता
परंतु फिर उसे या तो स्वयं कंठस्थ कर लेता या औरों को कंठस्थ करा देता. कदाचित् प्राचीन
समय में एक बार लिखे ग्रंथ की प्रति नहीं उतारी जाती थी परंतु मूल लिखित प्रति ग्रंथकार के
वंश में उसकी पवित्र यादगार की तरह रक्खी जाती और गुप्त रहती थी. यह भी संभव है
कि ग्रंथकार अपने ग्रंथ को कंठस्थ करके उसकी प्रति को स्वयं नष्ट कर देता जिससे दूसरे उसका
अनुकरण न करें और अपने आप को ब्राह्मण जाति के विरुद्ध काम करने का दोषी न बनना
पड़े.'
रॉथ लिखता है कि 'लिखने का प्रचार भारतवर्ष में प्राचीन समय से ही होना चाहिये
क्योंकि यदि वेदों के लिखित पुस्तक विद्यमान न होते तो कोई पुरुष प्रातिशाख्य बना न सकता.'
प्राचीन काल में हिंदुस्तान के समान लेखनसामग्री की प्रचुरता कहीं भी न थी. ताड़पत्र
समय पर पुस्तक देखना न पड़े और प्रसंग का विषय याद से सुनाया जा सके. इस तरह शास्त्र का आशय कंठस्थ रखने
के लिये ही कितने एक विस्तृत गद्य ग्रन्थों में भी मुख्य मुख्य बातें एक या दो कारिकाओं (संग्रहश्लोकों) में उपसंहार की तरह
लिखी जाती थीं, जैसे पतंजलि के महाभाष्य और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कई जगह.
१. बू; इं. पे; पृ. ४.
२. गोल्डस्टकर की 'मानवकल्पसूत्र' के संस्करण की अंग्रेज़ी भूमिका (अलाहाबाद की छपी), पृ. ६६. इस विस्तृत
भूमिका का मुख्य उद्देश मैक्समूलर के इस कथन का खंडन ही है कि 'वैदिक काल में लेखनप्रणाली न थी.'