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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 318 में से

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पृष्ठ 40

भारतवर्ष में लिखने के प्रचार की प्राचीनता.
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तथा लौकिक संस्कृत का छन्दःशास्त्र बड़ा ही जटिल है, एक एक छंद के अनेक भेद हैं और उन भेदों
के अनुसार उनके नाम भिन्न भिन्न हैं. ब्राह्मण और वेदों में मिलने वाले छंदों के नाम आदि उस
समय में लेखनकला की उन्नत दशा के सूचक हैं.
उ.क. ऋग्वेद में ऋषि नाभानेदिष्ठ हज़ार अष्टकर्णी गौएं दान करने के कारण राजा सावर्णि की
स्तुति करता है¹. यहां पर 'अष्टकर्णी' शब्द का अर्थ यही है कि जिसके कान पर आठ के अंक का
चिन्ह हो².
वैदिक काल में जुआ खेलने का प्रचार बहुत था. एक प्रकार के खेल में चार पासे होते थे जिनके नाम
कृत, त्रेता, द्वापर और कलि³ थे और जिनपर क्रमशः ४, ३, २, १ के अंक या चिह्न लिखे या खुदे होते थे⁴.
चार के चिह्न वाला पासा या कृत जिताने वाला पासा था⁵. ऋग्वेद में एक पूरा सूक्त⁶ जुआरी (कितव) के
विलाप का है जिसमें वह कहता है कि एकपर⁷ पासे के कारण मैंने अपनी पतिव्रता स्त्री खो दी. यहां
एकपर का अर्थ यही है कि जिसपर एक का चिह्न बना हुआ हो⁸ (अर्थात् हराने वाला पासा).
१. 'सहस्रं मे ददतो अष्टकर्ण्यः' (ऋग्वेद सं. १०. ६२. ७).
२. देखो ऊपर पृ. ८, टिप्पण १.
३. कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः। उत्तिष्ठंस्त्रेता भवति कृतं संपद्यते चरन् ॥ चरैवे ॥ (ऐतरेय ब्रा. ७. १५).
(कलि [नामक पासा] सो गया है, द्वापर स्थान छोड़ चुका है, त्रेता अभी खड़ा है, कृत चल रहा है [तेरी सफलता की
संभावना है] परिश्रम करता जा). नाक्षान्क्षिपत्ति गाण्डीवं न कृतं द्वापरं न च । ज्वलतो निशितान्बाणांस्तांस्तान् क्षिपति गाण्डिवम् ॥
(महाभारत, विराटपर्व, कुंभकोणं संस्करण, ५०. ३७); (इस पर टीका—चकारात् त्रेतापि समुच्चीयते. कृतादयो द्यूतशास्त्रप्रसिद्धाः
पाशकाः). 'कृतमयानां...त्रेतायानां...द्वापरोऽयानां...आस्कन्दोऽयानां...अभिभूरयानां' (तैत्ति. सं. ४. ३. ३). 'अक्षराजाय कितवं कृतायादि-
नवदशं त्रेतायै कल्पिनं द्वापरायाधिकल्पिनमास्कन्दाय सभास्थाणुं' (यजु. वाज. सं. ३०.१८). शतपथ ब्राह्मण (५.४.४.६) से जाना
जाता है कि कलि का ही नाम अभिभू था (एष वा अयानभिभूर्यत्कलिरेष हि सर्वानयानभिभवति) और तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.४.१. १६
को यजु. वाज. सं. ३०.१८ से मिलाने से स्पष्ट है कि कलि = अभिभू = अक्षराज. ये यजुर्वेद के ग्रन्थों में दिए हुए नाम एक
दूसरे पांच पासे वाले खेल के सूचक हैं जिसमें कलि पर ५ का अंक होता था और वह सब को जीतता (अभिभू) था.
'अथ ये पञ्च कलिः सः' (तैत्ति. ब्रा. १. ५. ११. १).
४. रॉथ और बोथलिङ्क का संस्कृत कोश (वार्टेरबुख).
५. कृतं यजमानो विजिनाति (आपस्तम्ब श्रौतसूत्र, ५.२०.१); कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः (अथर्व. सं. ७.५०
(५२) ८); ससंतु विश्वतो भगो अनाधृष्टं कृतं मम (अथ. सं. ७. ५० (५२). २); चतुरश्चिद्ददमानाद्विभीयादा निधातोः (ऋग्वेद सं. १.
४१. ६), यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति (छान्दोग्य उपनि., ४. १. ४. ६.)
इस का शंकराचार्य का भाष्य—'कृतो नाम अयो द्यूतसमये प्रसिद्धश्चतुरङ्कः स यदा जयति तन्ते प्रहस्तानां तस्मै विजिताय तदर्थमितरे
त्रिद्वयेकाङ्काः अधरेयाः त्रेताद्वापरकलिनामानः संयन्ति संगच्छन्ते अन्तर्भवन्ति,' इस पर आनंदगिरि की टीका से जान पड़ता है कि एक
ही पासे के चारों ओर ४, ३, २, १ अंक बने होते थे. वैदिक काल में एक ही पासे के चारों ओर अंक होते थे, या एक एक
अंक वाला पासा अलग होता था यह गौण विषय है. वैदिक समय के पासे बिभीदक (बहेड़ा) के फल के होते थे
(ऋग्वेद सं. ७. ८६. ६; १०. ३४. १). उनके चौरस न होने तथा पासों के लिये बहुवचन आदि का प्रयोग (अक्षरे अक्षाः; ऊपर देखो)
यही दिखाता है कि पासे का एक पार्श्व ही अंक से चिह्नित होता होगा.
राजसूय यज्ञ में यजमान के हाथ में पांच पासे 'अभिभूरसि' (तू जीतने वाला है) इस मन्त्र (यजु. वाज. सं. १०. २८)
से दिए जाते थे. फिर वहीं यज्ञभूमि में जुआ खिलाया जाता था. या तो वेही पांच पासे डलाये जाते थे (शतपथ ब्राह्मण,
५. ४. ४. २३) या 'कृतादि (चार पासे का) द्यूत' कराया जाता था जिसमें राजा के हाथ से कृत और सजात (उसी गोत्र
के ज़मींदार) से कलि का पासा डलवाते, जिससे सजात की हार हो जाती (क्योंकि सजातों पर ही राजा की प्रधानता
दिखाना उद्देश्य था) और उसकी गौ, जो जुए में लगाई थी, जीत ली जाती. (द्यूतभूमौ हिरण्मयं निधायाभिजुहोति······अक्षान्विवप-
ति.·····गां दीव्यध्वमित्याह. कृतादि वा निदध्याद्वाजप्रसतिभ्यः सजाताय कलिम्. गामस्य घ्नन्ति. कात्यायन श्रौतसूत्र, १५. १५-२०).
'कृत' शब्द चार के अर्थ में भी इसी से आने लगा, जैसे शतपथ ब्राह्मण में 'चतुष्टोमेन कृतेनायानां' (१३. ३. २. १);
तैत्तिरीय ब्राह्मण में 'ये वै चत्वारः स्तोमाः कृतं तत्' (१.५. ११. १).
६. ऋग्वेद सं. १०. ३४.
७. अक्षस्याहमकपरस्य हेतोरनुव्रतामप जायामरोधम् (ऋग्वेद सं. १०. ३४. २).
८. एक-पर, द्वा-पर, त्रे-ता के अर्थ स्पष्ट हैं. पाणिनि के एक सूत्र अक्षशलाकासंख्याः परिणा २. १. १०) से जाना जाता
है कि अक्ष-परि, शलाका-परि, और संख्यावाचक शब्दों के साथ 'परि' के समास से बने हुए (एकपरि, द्विपार, आदि)