प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ प्राचीनलिपिमाला.
भी बौद्ध धर्म के तत्वों को जानने के लिये संस्कृत और प्राकृत का पठन पाठन होने लगा और वहां के
बहुतेरे विद्वानों ने समय समय पर अपनी भाषा में बौद्ध धर्म के संबंध में अनेक ग्रंथ रचे जिनमें
हमारे यहां की कई प्राचीन बातों का पता लगता है. ई. स. ६६८ में बौद्ध विश्वकोष 'फा युअन
चु लिन' बना, जिसमें 'ललितविस्तर' के अनुसार ६४ लिपियों के नाम दिये हैं, जिनमें पहिला
ब्राह्मी और दूसरा खरोष्टी (किय-लु-से-टो=क-लु-से-टो=ख-रो-स-ट=खरोष्ठ) है और 'खरोष्ट' के
विवरण में लिखा है कि चीनी भाषा में इस शब्द का अर्थ 'गधे का होठ' होता है१. उसी पुस्तक
में भिन्न भिन्न लिपियों के वर्णन में लिखा है कि 'लिखने की कला का शोध तीन दैवी शक्ति वाले
आचार्यों ने किया, उनमें से सब से प्रसिद्ध ब्रह्मा है, जिसकी लिपि (ब्राह्मी) बाईं ओर से दाहिनी ओर पढ़ी
जाती है. उसके बाद किय-लु (किय-लु-से-टो=खरोष्ठ का संक्षिप्त रूप) है, जिसकी लिपि दाहिनी
ओर से बाईं ओर पढ़ी जाती है और सब से कम महत्व का त्सं-की है, जिसकी लिपि (चीनी) ऊपर
से नीचे की तरफ पढ़ी जाती है. ब्रह्मा और खरोष्ठ भारतवर्ष में हुए और त्सं-की चीन में. ब्रह्मा
और खरोष्ठ ने अपनी लिपियां देवलोक से पाईं और त्सं-की ने अपनी लिपि पक्षी आदि के पैरों के
चिह्नों पर से बनाई.'२
उक्त चीनी पुस्तक के लेख से स्पष्ट हो गया कि जो लिपि बाईं से दाहिनी ओर लिखी जाती है
उसका प्राचीन नाम 'ब्राह्मी' और दाहिनी से बाईं ओर लिखी जाने वाली का 'खरोष्ठी' था. 'ब्राह्मी'३
लिपि इस देश की स्वतंत्र और सार्वदेशिक लिपि होने से ही जैन और बौद्धों के ग्रंथ भी उसीमें लिखे
जाने लगे और इसी से उन्होंने लिपियों की नामावलि में इसको प्रथम स्थान दिया.
जब कितने एक यूरोपियन् विद्वानों ने यह मान लिया कि हिंदू लोग पहिले लिखना नहीं जानते
थे तब उनको यह भी निश्चय करने की आवश्यकता हुई कि उनकी प्राचीन लिपि (ब्राह्मी) उन्होंने
स्वयं बनाई वा दूसरों से ली. इस विषय में भिन्न भिन्न विद्वानों ने कई भिन्न भिन्न अटकलें लगाईं
जिनका सारांश नीचे लिखा जाता है.
डॉ. आल्फ्रेड मूलर का अनुमान है कि सिकंदर के समय यूनानी लोग हिन्दुस्तान में आये उन-
से यहां वालों ने अक्षर सीखे. प्रिन्सेप और सेनार्ट ४ ने भी यूनानी लिपि से ब्राह्मी लिपि का
बनना अनुमान किया और विलसन ५ ने यूनानी अथवा फिनिशियन् लिपि से उसका उद्भव माना.
हलेवे ६ ने लिखा है कि 'ब्राह्मी एक मिश्रित लिपि है जिसके आठ व्यंजन तो ज्यों के त्यों ई. स. पूर्व की
चौथी शताब्दी के 'अरमइक' अक्षरों से; ६ व्यंजन, दो प्राथमिक स्वर, सब मध्यवर्ती स्वर और अनु-
स्वार आरियेनो-पाली (=खरोष्ठी) से; और पांच व्यंजन तथा तीन प्राथमिक स्वर प्रत्यक्ष या गौणरूप से
प्रज्ञ नामक श्रमण ई. स. ७८२ में चीन गया और ई. स. ७८५ और ८१० के बीच उसने और एक दूसरे श्रमण ने मिल कर
'महायानबुद्धिषट्पारमितासूत्र' तथा तीन दूसरे पुस्तकों का चीनी अनुवाद किया. ये थोड़े से नाम केवल उदाहरणार्थ
दिये गये हैं.
१. इं. ऍ; जिल्द ३४, पृ. २१. २. इं. ऍ., जिल्द ३४, पृ. २१.
३. ब्राह्मी लिपि वास्तव में 'नागरी' (देवनागरी) का प्राचीन रूप ही है. 'नागरी' नाम कब से प्रसिद्धि में आया
यह निश्चित नहीं परंतु तांत्रिक समय में 'नागर' (नागरी) नाम प्रचलित था, क्यों कि 'नित्याषोडशिकार्णव' की 'सेतुबंध'
नामक टीका का कर्ता भास्करराय एकार (ए) का त्रिकोण रूप 'नागर' (नागरी) लिपि में होना बतलाता है (कोशत्रयवपु-
र्बभ्रौ खेखो वस्र तनं । नागरलिप्या साम्प्रदायिकैरेकारस्य त्रिकोणाकारतयैव लेखनात् । इं. ऍ; जिल्द ३५, पृ. २८३) . 'वातुलागम'
की टीका में लिखा है कि शिव मंत्र (ह्रीं) के अक्षरों से शिव की मूर्ति 'नागर' (नागरी) लिपि से बन सकती है; दूसरी
लिपियों से बन नहीं सकती (शिवमन्त्रोऽप्येतैराकारैः नागरलिपिभिरुद्धारयितुं शक्यते । व्यतिरिक्तलिपिभिर्नोद्धारयितुं शक्यते । इं. ऍ;
जिल्द ३५, पृ. २७६).
यूरोपियन विद्वानों ने 'ब्राह्मी' लिपि का 'पाली', 'इंडियन् पाली,' 'साउथ (दक्षिणी) अशोक' या 'लाट' लिपि
आदि नामों से भी परिचय दिया है परंतु हम इस लेख में सर्वत्र 'ब्राह्मी' नाम का ही प्रयोग करेंगे.
४. इं. ऍ; जिल्द ३५, पृ. २५३. ५. ज. ए; ई. स. १८८५, पृ. २६८.