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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 318 में से

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२-ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति.
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मौर्यवंशी राजा अशोक के लेखों तथा ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दि से लगाकर ई. स. की तीसरी
शताब्दि के आसपास तक के कितने एक सिक्कों आदि से पाया जाता है कि उस समय इस देश में
दो लिपियां प्रचलित थीं; एक तो नागरी की नांई बाईं तरफ से दाहिनी ओर लिखी जाने वाली सार्व-
देशिक, और दूसरी फ़ारसी की तरह दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाने वाली एकदेशिक. इन
लिपियों के प्राचीन नाम क्या थे इस विषय में ब्राह्मणों के पुस्तकों में तो कुछ भी लिखा नहीं मिलता.
जैनों के 'पण्णवणासूत्र' और 'समवायांगसूत्र' में १८ लिपियों १ के नाम मिलते हैं, जिनमें सब से
पहिला नाम 'बंभी' (ब्राह्मी) है, और भगवतीसूत्र में 'बंभी' (ब्राह्मी) लिपि को नमस्कार करके
(नमो बंभीए लिविए) सूत्र का प्रारंभ किया गया है. बौद्धों के संस्कृत पुस्तक 'ललितविस्तर' २ में
६४ लिपियों ३ के नाम मिलते हैं जिनमें सब से पहिला 'ब्राह्मी' और दूसरा 'खरोष्टी' है. चीन में
बौद्ध धर्म का प्रचार होने के पश्चात् ई. स. की पहिली से आठवीं शताब्दि तक हिंदुस्तान से कितने ही
बौद्ध श्रमण अपने धर्म के प्रचार के निमित्त समय समय पर चीन में गये और उन्होंने बौद्धों के अनेक
संस्कृत और प्राकृत ग्रंथों के चीनी भाषा में अनुवाद किये ४ या उस काम में सहायता दी. चीन में
१. बंभी, जवणालि (या जवणाणिया), दोसापुरिया (या दोसापुरिसा), खरोट्ठी (या खरोठी), पुक्खरसारिया,
भोगवइया, पहाराइया (या पहराइया), उयअंतरिक्खिया (या उयंतरकरिया, अक्खरपिट्ठिया (या अक्खरपुंठिया), तेव-
णड्या (या वेणइया), गि[णि] गहइया (या गिणहत्तिया), अंकलिवि (या अंकलिक्खा), गणितलिवि (या गणियलिवि),
गंधव्वलिवि, आदंसलिवि (या आयसलिबि), माहेसरी (या माहेस्सरी), दामिली और पोलिंदी. ये नाम पण्णवणासूत्र की
दो प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकों से उद्धृत किये गये हैं.
२. 'ललितविस्तर' में बुद्ध का चरित है. यह ग्रंथ कब बना यह निश्चित नहीं, परंतु इसका चीनी अनुवाद ई. स.
३०८ में हुआ था.
३. ब्राह्मी, खरोष्टी, पुष्करसारी, अंगलिपि, वंगलिपि, मगधलिपि, मांगल्यलिपि, मनुष्यलिपि, अंगुलीयालिपि, शकारि-
लिपि, ब्रह्मवल्लीलिपि, द्राविडलिपि, कनारिलिपि, दक्षिणलिपि, उग्रलिपि, संख्यालिपि, अनुलोमलिपि, ऊर्ध्वधनुर्लिपि, दर-
दलिपि, खास्यलिपि, चीनलिपि, हूणलिपि, मध्याक्षरविस्तरलिपि, पुष्पलिपि, देवलिपि, नागलिपि, यक्षलिपि, गन्धर्वलिपि,
किन्नरलिपि, महोरगलिपि, असुरलिपि, गरुडलिपि, मृगचक्रलिपि, चक्रलिपि, वायुमरुलिपि, भौमदेवलिपि, अंतरिक्षदेवलिपि,
उत्तरकुरुद्वीपलिपि, अपरगोडालिलिपि, पूर्वविदेहलिपि, उत्क्षेपलिपि, निक्षेपलिपि, विक्षेपलिपि, प्रक्षेपलिपि, सागरलिपि,
वज्रलिपि, लेखप्रतिलेखलिपि, अनुद्रुतलिपि, शास्त्रावर्तलिपि, गणावर्तलिपि, उत्क्षेपावर्तलिपि, विक्षेपावर्तलिपि, पादलिखित-
लिपि, द्विरुत्तरपद्सन्धिलिखितलिपि, दशोत्तरपदसन्धिलिखितलिपि, अध्याहारिणीलिपि, सर्वरुत्संग्रहणीलिपि, विद्यानुलोम-
लिपि, विमिश्रितलिपि, ऋषितपस्तप्तलिपि, धरणीप्रेक्षणालीपि, सर्वौषधनिष्यन्दालिपि, सर्वसारसंग्रहणीलिपि और सर्वभूतरुद्-
ग्रहणीलिपि (ललितविस्तर, अध्याय १०). इनमें से अधिकतर नाम कल्पित हैं.
४. ई. स. ६७ में काश्यप मातंग चीन के बादशाह मिंग-टी के निमंत्रण से वहां गया, और उसके पीछे मध्यभारत का
श्रमण गोभरण भी वहां पहुंचा. इन दोनों ने मिलकर एक सूत्रग्रंथ का अनुवाद किया और काश्यप के मरने के बाद गोभ-
रण ने ई.स. ६८ और ७० के बीच ५ सूत्रों के अनुवाद किये. मध्यभारत के श्रमण धर्मकाल ने चीन में रह कर ई.स. २५०
में 'पातिमोक्ख' का; धर्मप्रिय ने ई.स. ३८२ में 'दशसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता' का; कुमारजीव ने ई. स. ४०२ और ४१२ के
बीच 'सुखावतीव्यूह' (छोटा), 'वज्रच्छेदिका' आदि कई ग्रंथों का; श्रमण पुण्यरत्न और कुमारजीव ने मिलकर
ई. स. ४०४ में 'सर्वास्तिवादविनय' का; मध्यभारत के श्रमण धर्मजातयशस् ने ई. स. ४८१ में 'अमृतार्थसूत्र' का; बुद्धशांत
ने ई. स. ५२४ और ५३६ के बीच १० ग्रंथों का और प्रभाकरमित्र ने ई. स. ६२७ और ६३३ के बीच ३ ग्रंथों का चीनी भाषा
में अनुवाद किया. मध्यभारत का श्रमण पुण्यौपाय (नाथी या नदी ?) ई. स. ६५५ में बौद्धों के दोनों संप्रदायों (महायान
और हीनयान) के त्रिपिटक से संबंध रखने वाले १५०० से अधिक पुस्तक, जो उसने हिन्दुस्तान और सीलोन (सिंहलद्वीप,
लंका) में संग्रह किये थे, लेकर चीन में गया. दक्षिण का श्रमण वज्रबोधि और उसका शिष्य अमोघबज्र ई. स. ७१९ में
चीन में गये. वज्रबोधी ने ई. स. ७२३ और ७३० के बीच ४ ग्रंथों का अनुवाद किया और वह ई. स. ७३२ में ७० वर्ष की
अवस्था में मरा, जिसके बाद अमोघबज्र ने ई. स. ७४१ में हिन्दुस्तान और सीलोन की यात्रा की. ई. स. ७४६ में वह फिर
चीन में पहुंचा और उक्त सन से लगा कर उसकी मृत्यु तक, जो ई.स. ७७४ में हुई, उसने ७७ ग्रंथों के चीनी अनुवाद किये.