प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसके चौथे अंश अर्थात् मनुष्यों की ही वाणी का निर्वचन (व्याकरण) किया क्योंकि उसको ग्रह में
से चतुर्थांश ही मिला था१.
उपर्युक्त प्रमाणों से पाया जाता है कि उपनिषद, आरण्यक, ब्राह्मण और तैत्तिरीय संहिता के
समयतक व्याकरण के होने का पता चलता है. यदि उस समय लिखने का प्रचार न होता तो व्या-
करण और उसके पारिभाषिक शब्दों की चर्चा भी न होती, क्योंकि जो जातियां लिखना नहीं जानती
वे छंदोबद्ध गीत और भजन अवश्य गाती हैं, कथाएं कहती हैं परंतु उनको स्वर, व्यंजन, घोष, संधि,
एकवचन, बहुवचन, लिंग आदि व्याकरण के पारिभाषिक शब्दों का ज्ञान सर्वथा नहीं होता. इसका
प्रत्यक्ष उदाहरण हिंदुस्तान में ही भली भांति मिल सकता है, जहां ३१३४१५३८६ मनुष्यों की आबादी
में से केवल १८४३६५७८ मनुष्य लिखना पढ़ना जानते हैं बाकी के २९४९७८८०८ अभी तक लिखना
पढ़ना नहीं जानते२. उनमें किसीको भी व्याकरण के पारिभाषिक शब्दों का कुछ भी ज्ञान नहीं है.
व्याकरण की रचना लेखनकला की उन्नत दशा में ही होती है और उसके लिये भाषा का सारा
साहित्य टटोलना पड़ता है और उसके प्रथम रचयिता को उसके पारिभाषिक शब्द गढ़ने पड़ते हैं.
भारतवर्ष की जिन असभ्य और प्राथमिक जातियों के यहां लिखित साहित्य नहीं है उनकी भाषाओं
के व्याकरण लिखना जानने वाले यूरोपियन विद्वानों ने अभी अभी बनाये हैं.
छन्द. ऋग्वेद में गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुभ्, बृहती, विराज्, त्रिष्टुभ् और जगती छंदों के नाम
मिलते हैं३. वाजसनेयि संहिता में इनके अतिरिक्त 'पंक्ति' छंद का भी नाम मिलता है और द्वि-
पदा, त्रिपदा, चतुष्पदा, षट्पदा, ककुभ् आदि छंदों के भेद भी लिखे हैं४. अथर्ववेद में भिन्न भिन्न
स्थानों में पृथक नामों के अतिरिक्त एक स्थान पर छंदों की संख्या ११ लिखी है५. शतपथ ब्राह्मण में
मुख्य छंदों की संख्या ८ दी है६; और तैत्तिरीय संहिता७, मैत्रायणी संहिता८, काठक संहिता९
तथा शतपथ ब्राह्मण१० में कई छंदों और उनके पादों के अक्षरों की संख्या तक गिनाई है.
लिखना न जाननेवाली जातियां छंदोबद्ध गीत और भजन गाती हैं, और हमारे यहां की स्त्रियां,
जिनमें केवल ६५ पीछे एक लिखना जानती है११ और जिनकी स्मरणशक्ति बहुधा पुरुषों की अपेक्षा
प्रबल होती हैं, विवाह आदि सांसारिक उत्सवों के प्रसंग प्रसंग के, एवं चौमासा, होली आदि त्यौहारों
के गीत और बहुतेरे भजन, जिनमें विशेष कर ईश्वरोपासना, देवी देवताओं की स्तुति या वेदांत के
उपदेश हैं, गाती हैं. यदि उनका संग्रह किया जावे तो संभव है कि वेदों की संहिताओं से भी
उनका प्रमाण बढ़ जावे, परंतु उनको उनके छंदों के नामों का लेश मात्र भी ज्ञान नहीं होता. छंदःशास्त्र
का प्रथम रचयिता ही छंदोबद्ध साहित्यसमुद्र को मथ कर प्रत्येक छंद के अक्षर या मात्राओं की
संख्या के अनुसार उनके वर्ग नियत कर उनके नाम अपनी तरफ से स्थिर करता है, तभी लोगों में
उनकी प्रवृत्ति होती है. लिखना न जानने वाली जातियों में छंदों का नामज्ञान नहीं होता. वैदिक
१. शतपथ ब्रा. ४. १. ३. १२, १५-१६.
२. ई. स. १९११ की हिन्दुस्तान की मर्दुमशुमारी की रिपोर्ट, जिल्द १, भाग २, पृ. ७०-७१.
३. ऋग्वे. सं. (१०.१४.१६; १०.१३२.३.४).
४. यजु. वाज. सं. (११.८; १४. १६; २३.३३, २८. १४ आदि).
५. अथ. सं. (८.६.१६).
६. विराडष्टमानि छन्दांसि (श. ब्रा. ८. ३. ३. ६).
७. सप्तच्छ्रं प्रथमं पदं अष्टाक्षराणि त्रीणि ...... षडष्टाक्षरा तेन गायत्री यदेकादशाक्षरा तेन त्रिष्टुब्यद्द्वादशाक्षरा तेन जगती
............ सप्तपदा शक्वरी (तै. सं. ६.१.१.६-७).
८. अनुष्टुभं ...... चतुर्धा व्योतस्या अष्टा अष्टा अक्षराणि बृहतीं ...... चतुर्धा व्योतस्या नव नवाक्षराणि । इत्यादि (मै. सं. १.११.१०)
९. गायत्रीं ...... चतुर्धा वि तस्याष्टाष्टौ षडक्षराणि उष्णिक ...... चतुर्धा वि तस्यास्सप्त सप्ताक्षराणि । इत्यादि (का. सं. १४.४. )
१०. द्वादशाक्षरा वै जगती । ४। ...... षट्त्रिंशदक्षरा बृहती ...... । ८। ...... दशाक्षरा विराट् । ११। (श. ब्रा. ८. ३. ३.) इत्यादि
कई जगह.
११. हिन्दुस्तान की ई. स. १९११ की मर्दुमशुमारी की रिपोर्ट, जिल्द १, भाग २, पृष्ठ ७०-७१.