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प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

Plate XXXIV.
लिपिपत्र ३४वां.
वल्लभेन्द्र के दानपत्र और हस्तलिखित पुस्तकों से.
(ई. स. की १२वीं शताब्दी).
आसाम से मिले हुए वल्लभेन्द्र के दानपत्र से (शक सं. ११०७ = ई. स. ११८५).
अ आ इ उ ए क ख ग च ज झ ट ठ ड ण त थ द
अ आ इ उ ए क ख ग च ज झ ट ठ ड ण त थ द
ध ध न प फ भ म य र र र ल ल व/ब श ष स स
ध ध न प फ भ म य र र र ल ल व श ष स स
ह त टी कु तु मु रू लु पू लू घृ क्रे जु चे ङ्ग क्कु ज्ञे
ह त टी कु तु मु रू लु पू लू घृ क्रे जु चे ङ्ग क्कु ज्ञे
च्छ ङ्गा ण्ड त्तु द्ध द्वि द्रू ण्णी त्यं र्व्व ष्टि ष्ठ ष्णोः स्त स्थे ओं.
च्छ ङ्गा ण्ड त्तु द्ध द्वि द्रू ण्णी त्यं र्व्व ष्टि ष्ठ ष्णोः स्त स्थे ओं.
हस्तलिखित पुस्तकों से मुख्य मुख्य अक्षर (ई, स. की १२वीं शताब्दी).
अ अ आ इ इ ई ई ऊ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ॡ ॡ ए ऐ
अ अ आ इ इ ई ई ऊ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ॡ ॡ ए ऐ
ऐ ओ ओ औ ख घ च च ण त भ म र श श स स खा.
ऐ ओ ओ औ ख घ च च ण त भ म र श श स स खा.
१ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ यद्ब्रह्मसङ्कलप-
द्वैपुकल्पनिमाना वदतुिवनीव अद्यन अन्द्र मङ्ग-
लस्य । नत्त्वाद्यचः स द्वगतां यदासी यस्माचमान-
थठां ॐससिना सह यावद्विद्युः ॥ यात्रानद्यत्वन-
उनाथिवमप्रत्येकिन्त्वाद्ध्विद्ध्याः घुनाडु ङ्गवय्युष्टितनाद्युतु-

Plate XXXV.
लिपिपत्र ३५वां.
हझाकोल के लेख और पुरुषोत्तमदेव के दानपत्र से.
(ई. स. की १२वीं और १५वीं शताब्दी).
हझाकोल से मिलेहुए लेख में खुदी हुई पूरी वर्णमाला (ई. स. की १२वीं शताब्दी).
अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ अं अः क
[हझाकोल लिपि: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः, क]
ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द
[हझाकोल लिपि: ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द]
ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह क्ष ओं.
[हझाकोल लिपि: ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह, क्ष, ओं]
उड़ीसा के राजा पुरुषोत्तमदेव के दानपत्र से (ई. स. १४८३).
अ उ ए क ग च ज ट ड ण त थ द ध न प भ
[ओड़िआ लिपि: अ, उ, ए, क, ग, च, ज, ट, ड, ण, त, थ, द, ध, न, प, भ]
म य र र ल व श ष स ह ह जा रा टि ति वी दु
[ओड़िआ लिपि: म, य, र, र, ल, व, श, ष, स, ह, ह, जा, रा, टि, ति, वी, दु]
पु रुं भू सू वृ डे षो पौ क्र त्त ङ्क श्च ञ्च र्गा म्हैं.
[ओड़िआ लिपि: पु, रुं, भू, सू, वृ, डे, षो, पौ, क्र, त्त, ङ्क, श्च, ञ्च, र्गा, म्हैं]
ଶ୍ରୀ ଦୁର୍ଗା ଦୁର୍ଗ୍ଗାୟୈ ନମଃ । ବୀର ଶ୍ରୀଗଜପତି (श्री दुर्गा दुर्ग्गायै नमः। वीर श्रीगजपति)
ଗଉଡ଼େଶ୍ୱର ନବକୋଟିକର୍ଣ୍ଣାଟକଲବର୍ଗ୍ଗେଶ୍ୱର (गउडेश्वर नवकोटिकर्णाटकलबर्ग्गेश्वर)
ଶ୍ରୀପୁରୁଷୋତ୍ତମଦେବ ମହାରାଜାଙ୍କର । ପୋଟେ- (श्रीपुरुषोत्तमदेव महाराजाङ्कर । पोटे-)
ଶ୍ୱର ଭଟଙ୍କୁ ଦାନ ଶାସନ ପଟା । ୨ x (श्वर भटङ्कु दान शासन पटा । २ x)
ଅଙ୍କ ମେଷ ଦି ୧୦ ଗୁଂ ସୋମବାର ଗ୍ରହଣ- (अङ्क मेष दि १० गुं सोमबार ग्रहण-)
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitized by eGangotri

Plate XXXVI. लिपिपत्र ३६वां.
राजा नरवर्मन् और कुमारगुप्त के समय के मंदसौर के लेखों से
(ई. स. की पांचवीं शताब्दी).
राजा नरवर्मन् के समय के मंदसौर के लेख से (मालव सं. ४६१ = ई. स. ४०४).
आ ई ए क क ख ग घ च च ज ट ण त त त थ थ
य द ध न न प फ ब भ भ म य य र र ल व व
श श ष स स ह म् णा मा शा षा नि ति लि जी नी गु
तु पु रु रू सु मू क्त क्व वृ नृ घे ने मे ले तो नो ष्णो लो
पो कु वि ङ्ग ङ्ख ङ्गि द्धा ङ्क द्रा र्त्य र्थ्य र्ब्ब त्री द्ये ष्ण स्ते स्र.
गुप्तवंशी राजा कुमारगुप्त के समय के मंदसौर के लेख से (वि. सं. ५२८ = ई. स. ४७२).
इ ग ज ड ढ द ध फ ब भ ल व ष दी रू बू भू ष्ण ज्ञ.
सिद्धं मालवानां गणस्थित्या याते शतचतुष्टये एक-
षष्ट्यधिकेऽब्दानां सप्रौढे पार्थिवर्षभे श्रीनरवर्म्मणि ख्यात-
पौरुषे नृपसत्तमे तत्पितुः पृथुकल्पस्य नृपतेः पृथुविक्रमः
यः श्रुतौ शौचे विनये चात्मनि स्थितः सत्यसंधो दयालोलु-
पुत्रेण विक्रुष्टास्तु यन्मुणां...
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitized by eGangotri

?
Wait, let's look at label 13:
It is न् or म्?
Wait, what is 14?
Glyph 14: look at glyph 14: it has a स with an े... wait!
Look at glyph 14:
It is a स with a top stroke, a curve... wait, is it सेन्?
Wait, look at label 14:
The letters are: स े न्? सेन्!
Wait, why सेन्?
Because in Dharasena's plate, the name is धरसेन or ध्रुवसेन!
Wait! Look at the inscription at the bottom:
Line 1 of inscription:
Line 2 of inscription:
Line 3 of inscription:
Line 4 of inscription:
Line 5: ... धरसेनस्य!
Wait, is सेन् from सेनस्य? Or से with final न्?
Wait, look at the glyph under सेन्:
It has स + े + a final न् attached to it!
And label 14 is सेन्!
Wait, what is label 13?
Look at label 13: शत् or म् or न्?
Wait, look at the label 13:
Is it `न्

Plate XXXVIII.
लिपिपत्र ३८वां.
गारुलक सिंहादित्य और वलभी के राजा शीलादित्य (पांचवें) के दानपत्रों से.
(ई. स. की छठी और आठवीं शताब्दी).
पालिताना से मिले हुए गारुलक सिंहादित्य के दानपत्र से (गुप्त सं. २५५ = ई. स. ५७४).
आ इ उ य द ध फ ब ल व स ह न् षा हा भि री गु
[प्राचीन लिपि चिह्न]
नु ग्ये मै यो ची डु च्छे ज्ञा ण्य प्र र्ष्णा र्त्य र्म्मा औ स्थ × को ४ पु.
[प्राचीन लिपि चिह्न]
वलभी के राजा शीलादित्य (पांचवें) के दानपत्र से (गुप्त सं. ४०३ = ई. स. ७२२).
आ इ उ ए ऐ क ख ख ग च च ज ट ठ ड ड ढ ण
[प्राचीन लिपि चिह्न]
त त थ थ द ध्र ध ध न न प प फ ब व भ भ म य
[प्राचीन लिपि चिह्न]
र र ल ल ल ल ल व व श ष स ह त् त् वा रा मि
[प्राचीन लिपि चिह्न]
णी ङ्क रु भृ मै मौ च्य द्य ङ्का ङ्कि ञ्च ष्ट्रा ण्ड म्य र्त्थ न्थि ज्ञ.
[प्राचीन लिपि चिह्न]
[दानपत्र-अभिलेख का नमूना - पंक्ति १]
[दानपत्र-अभिलेख का नमूना - पंक्ति २]
[दानपत्र-अभिलेख का नमूना - पंक्ति ३]
[दानपत्र-अभिलेख का नमूना - पंक्ति ४]
[दानपत्र-अभिलेख का नमूना - पंक्ति ५]
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitized by eGangotri

Plate XXXIX.
लिपिपत्र ३६वां.
त्रैकूटक वंशी राजा दह्रसेन और गुर्जर वंशी रणग्रह तथा दद्द (दूसरे) के दानपत्रों से.
(ई. स. की पांचवीं और सातवीं शताब्दी).
पारडी से मिले हुए त्रैकूटक वंशी राजा दह्रसेन के दानपत्र से (कलचुरि सं. २०७ = ई. स. ४५६).
अ आ इ क ख ग च ज ट ण त य द ध न प भ भ म
𑀅 𑀆 𑀇 𑀓 𑀔 𑀕 𑀘 𑀚 𑀝 𑀡 𑀢 𑀬 𑀤 𑀥 𑀦 𑀧 𑀪 𑀪 𑀫
च र व श ष स ह ह्र रा लि गु वु दू भू 'ये पौ ज्ञा ण्ड.
𑀘 𑀭 𑀯 𑀰 𑀱 𑀲 𑀳 𑀳𑁆𑀭 𑀭𑀸 𑀮𑀺 𑀕𑀼 𑀯𑀼 𑀤𑀽 𑀪𑀽 '𑀬𑁂 𑀧𑁅 𑀚𑁆𑀜 𑀡𑁆𑀟𑀂
संखेडा से मिले हुए गुर्जरवंशी रणग्रह के दानपत्र से (कलचुरि सं. ३६१ = ई. स. ६१०).
अ आ इ उ ए क ख ग च ट ण त द न प ब व भ म
𑀅 𑀆 𑀇 𑀉 𑀏 𑀓 𑀔 𑀕 𑀘 𑀝 𑀡 𑀢 𑀤 𑀦 𑀧 𑀩 𑀯 𑀪 𑀫
य र ल व ष स ह जा धु दू वै यो द्य द्वै च्छि ज्ञा ज्ञ त्य श्री.
𑀬 𑀭 𑀮 𑀯 𑀱 𑀲 𑀳 𑀚𑀸 𑀥𑀼 𑀤𑀽 𑀯𑁃 𑀬𑁄 𑀤𑁆𑀬 𑀤𑁆𑀯𑁃 𑀘𑁆𑀙𑀺 𑀚𑁆𑀜𑀸 𑀚𑁆𑀜 𑀢𑁆𑀬 𑀰𑁆𑀭𑀻.
संखेडा से मिले हुए गुर्जर वंशी राजा दद्द (दूसरे) के दानपत्र से (कलचुरि सं. ३९२ = ई. स. ६४१)
अ आ इ उ ख घ च ज ट ण ण त य द ध फ व भ म र
𑀅 𑀆 𑀇 𑀉 𑀔 𑀖 𑀘 𑀚 𑀝 𑀡 𑀡 𑀢 𑀬 𑀤 𑀥 𑀨 𑀯 𑀪 𑀫 𑀭
ल ल व स क्क ङ्क च्छ ज्ञा ञ ञ ण्ड न्या द्धौ न्नि ण्णां स्य ऴ्कुं.
𑀮 𑀮 𑀯 𑀲 𑀓𑁆𑀓 𑀗𑁆𑀓 𑀘𑁆𑀙 𑀚𑁆𑀜𑀸 𑀜 𑀜 𑀡𑁆𑀟 𑀦𑁆𑀬𑀸 𑀤𑁆𑀥𑁅 𑀦𑁆𑀦𑀺 𑀡𑁆𑀡𑀸𑀁 𑀲𑁆𑀬 𑀴𑁆𑀓𑀼𑀁
[चित्रित प्राचीन अभिलेख पंक्ति १]
[चित्रित प्राचीन अभिलेख पंक्ति २]
[चित्रित प्राचीन अभिलेख पंक्ति ३]
[चित्रित प्राचीन अभिलेख पंक्ति ४]
[चित्रित प्राचीन अभिलेख पंक्ति ५]
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitized by eGangotri

Plate XL. लिपिपत्र ४०वां.
चालुक्य युवराज श्रयाश्रय (शीलादित्य) और राष्ट्रकूट कर्कराज के दानपत्रों से.
(ई. स. की सातवीं और नवीं शताब्दी.)
नवसारी से मिले हुए चालुक्य युवराज श्रयाश्रय (शीलादित्य) के दानपत्र से (कलचुरि सं. ४२१ = ई. स. ६७०).
अ आ उ ए क ख च ज ण त थ द ध न प फ व भ म य
[उपर्युक्त अक्षरों के तत्कालीन लिपि-रूप]
ल ल व श ष स ह न् री कृ त्त ङ्ख ङ्क ष्टि ण्ड नः ध्व र्त्यु क्ष.
[उपर्युक्त अक्षरों के तत्कालीन लिपि-रूप]
गुजरात के राष्ट्रकूट राजा कर्कराज (सुवर्णवर्ष) के दानपत्र से (शक सं. ७३४ = ई. स. ८१२).
अ आ इ उ ए क ख ख ग घ च च ळ ज ट ट ड ण त
[उपर्युक्त अक्षरों के तत्कालीन लिपि-रूप]
त थ थ द ध ध न प फ ब व भ भ म य र ल ल व
[उपर्युक्त अक्षरों के तत्कालीन लिपि-रूप]
श श ष स ह ह त् न् का पा मा भि की धी लु कू गू ळ
[उपर्युक्त अक्षरों के तत्कालीन लिपि-रूप]
दृ ये र यो वो न्धा ङ्गि ज्ञा द्य ण्डू र्त्य क्ष व्य औ ठ स्थि स्त्री.
[उपर्युक्त अक्षरों के तत्कालीन लिपि-रूप]
[अभिलेख-नमूना पंक्ति १:] ॐ स जयत्याविष्कृतं रूपं वारहं क्षोभितार्णवं । दक्षि-
[अभिलेख-नमूना पंक्ति २:] णोन्नतदंष्ट्राग्र विश्रान्तभुवनं वपुः ॥ श्रीमान् भुवि स-
[अभिलेख-नमूना पंक्ति ३:] र्व्वजनस्तवनार्हः क्षितिपकुलतिलकः सकलगुणगण-
[अभिलेख-नमूना पंक्ति ४:] मणिरत्ननिधानं प्रथितयशः प्रसरविजित-
[अभिलेख-नमूना पंक्ति ५:] -तिमिरनिकरः परममाहेश्वरः श्रीसुवर्णवर्षस्य
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri

Plate XLI.         लिपिपत्र ४१वां.
वाकाटक वंशी राजा प्रवरसेन (दूसरे) के तीन दानपत्रों से.
(ई. स. की पांचवीं शताब्दी).
दूदिया से मिले हुए राजा प्रवरसेन (दूसरे) के दानपत्र से.
अ आ इ उ ए क क ख ग घ च ज ज ट ड ण त थ द ध
न न प ब ब भ म य र ल व श ष स ह त् त् म् म् रा ति
भि जी पु रु भू सू क्क दृ णे पे पै भै मो हौ कृ क्य क्वा ग्नि
ङ्क ङ्का ङ्का ङ्गा ङ्गा ङ्ग ण्ड र्त्थ र्ध्व र्म्मा र्य्या श्य ष्णु ष्ठि ४ प. इ ऊ औ.
सिवनी से मिले हुए राजा प्रवरसेन (दूसरे) के दानपत्र से.
ज ज फ ब भ ल ट् म् थि बे मो क्रा ङ्गो ड्वा त्र त्रा र्ध्व श्री.
चम्मच से मिले हुए राजा प्रवरसेन (दूसरे) के दानपत्र से.
इ ई उ च ज ट ण न भ या धृ ये श्न च्छ न्ता य्य ष्ठि स्त्रो.
दृष्टं । स्वस्ति प्रवरपुरा । दग्निष्टोमाप्तोर्यामोक्थ्यषोडश्यतिरात्र -
वाजपेयबृहस्पतिसवसाद्यस्क्राचतुरश्वमेधयाजिनः विष्णुवृद्धसगोत्र -
स्य सम्राजः वाकाटकानां महाराजश्रीप्रवरसेनस्य सूनोः
सूनोः अत्यन्तस्वामिमहाभैरवभक्तस्य अंसभारसन्निवेशित - ऌ -
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri

Plate XLII.

लिपिपत्र ४२वां.

पृथिवीसेन, महासुदेव और तिवरदेव के दानपत्रों से.
(ई. स. की पांचवीं से आठवीं शताब्दी तक).
बालाघाट से मिले हुए वाकाटक वंशी राजा पृथिवीसेन (दूसरे) के दानपत्र से (ई. स. की पांचवीं शताब्दी).
च ज ट व म ल व ह ह मै म्नि ङ्गा/श ञ्झ ष्ट्रा ण्ड र्च.
[अक्षर-चिह्न]
खरिआर से मिले हुए राजा महासुदेव के दानपत्र से (ई. स. की सातवीं शताब्दी के आस पास).
अ आ उ ए क ख ग घ च ज ट ड ण त थ द ध न प फ
[अक्षर-चिह्न]
ब भ म य र ल व श ष स ह मा मा वि सी कु टु त मु
[अक्षर-चिह्न]
भू यू ह को मो लो कौ चि द्वे च्छे ज्ञा ञ्च प्र र्ण्ण द्वा × का ४ प.
[अक्षर-चिह्न]
राजीम से मिले हुए राजा तिवरदेव के दानपत्र से (ई. स. की आठवीं शताब्दी के आसपास).
अ आ इ ए ख च ज ट ड त थ फ नृ ञ्झ ज्ञा ञ्च ल श्री ष्णी.
[अक्षर-चिह्न]
[राजीम ताम्रपत्र का मूल पेटीशीर्षक (Box-headed) लिपि पाठ - पंक्ति १]
[राजीम ताम्रपत्र का मूल पेटीशीर्षक (Box-headed) लिपि पाठ - पंक्ति २]
[राजीम ताम्रपत्र का मूल पेटीशीर्षक (Box-headed) लिपि पाठ - पंक्ति ३]
[राजीम ताम्रपत्र का मूल पेटीशीर्षक (Box-headed) लिपि पाठ - पंक्ति ४]
[राजीम ताम्रपत्र का मूल पेटीशीर्षक (Box-headed) लिपि पाठ - पंक्ति ५]
[राजीम ताम्रपत्र का मूल पेटीशीर्षक (Box-headed) लिपि पाठ - पंक्ति ६]
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri

Plate XLIII.
लिपिपत्र ४३वां.
पल्लव वंशी राजा विष्णुगोपवर्मन् और सिंहवर्मन् के दानपत्रों से.
(ई. स. की पांचवीं शताब्दी).
पल्लव वंशी राजा विष्णुगोपवर्मन् के उरुवुपल्लि गांव के दानपत्र से .
अ उ ए क ग च ज ड ण त थ द ध न प व भ म य
[पल्लव लिपि वर्णमाला पंक्ति १]
र ल व श ष स ह त् जा धा नि वी गु कु सु कू पू भू वृ
[पल्लव लिपि वर्णमाला पंक्ति २]
नै र्ने गो लो पौ चा च्छा ञ्च ष्ट्रा त्र र्द्ध म्मो श्री वृ क्ष्या स्थि स्थ.
[पल्लव लिपि वर्णमाला पंक्ति ३]
पल्लव वंशी राजा सिंहवर्मन् के पिकिर गांव के दानपत्र से मुख्य मुख्य अक्षर.
च ज त थ द द ध न फ ब व श ष ष ज्ञा ष्ट्रा र्ने स्थि.
[पल्लव लिपि वर्णमाला पंक्ति ४]
पल्लव वंशी राजा सिंहवर्मन् के मंगलुर गांव के दानपत्र से मुख्य मुख्य अक्षर.
औ ख घ क्ट ट य द ध न श ह ह धा थि ळू र्ने क्क श्ये
[पल्लव लिपि वर्णमाला पंक्ति ५]
[अभिलेख/दानपत्र का पल्लव लिपि में अनुलेख - पंक्ति १]
[अभिलेख/दानपत्र का पल्लव लिपि में अनुलेख - पंक्ति २]
[अभिलेख/दानपत्र का पल्लव लिपि में अनुलेख - पंक्ति ३]
[अभिलेख/दानपत्र का पल्लव लिपि में अनुलेख - पंक्ति ४]
[अभिलेख/दानपत्र का पल्लव लिपि में अनुलेख - पंक्ति ५]
[अभिलेख/दानपत्र का पल्लव लिपि में अनुलेख - पंक्ति ६]
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitized by eGangotri

Plate XLIV. लिपिपत्र ४४वां.
कदंब वंशी राजा मृगेशवर्मन् और काकुस्थवर्मन् के दानपत्रों से.
(ई. स. की छठी शताब्दी).
देवगिरि से मिलेहुए कदंब वंशी राजा मृगेशवर्मन् के दानपत्र से.
अ आ इ उ ए क क ख ग घ च ज ट ड ण त थ द द ध
[कदम्ब-लिपि-स्वर-व्यञ्जनानि]
न न न प फ ब व ब भ भ म य र ल व व श ष स ह
[कदम्ब-लिपि-व्यञ्जनानि]
ड् न् णा मा णि लि हिः गो भु ङ्क भू भू क्त क्त दृ द्ध ते ले
[कदम्ब-लिपि-मात्रा-युक्ताक्षराणि]
वै गो नो लो लो यौ पौ क्रा द्विश्व ज्ञा न्च र्त्त र्थ्य र्ह श्री स्था स्थ.
[कदम्ब-लिपि-संयुक्ताक्षराणि]
देवगिरि से मिलेहुए कदंब वंशी राजा काकुस्थवर्मन् के दो दानपत्रों से मुख्य मुख्य अक्षर.
अ आ इ इ उ ख़ ख च ज ढ ण त त थ द ध न न ब भ
[कदम्ब-लिपि-अक्षराणि]
म य र ल ळ व श म् त् ती कू पू सू क्त क्त दृ ङ्को ष्ठम्.
[कदम्ब-लिपि-अक्षराणि]
सिद्धम् ॥ जयत्युद्भूतविस्तारः सुरेन्द्रानीक सङ्घशः । नमः [?]
शशिशेखरसंस्थानकुमुदाकरशीतगुः ॥ श्रीमान् वैरिमहावृक्षो [?] मूलोद्ध-
र्त्ता कदम्बराजोऽभूत् काकुत्स्थनृपतिः श्रुतः । यस्यास्यनलिनोत्फुल्ल-
नेत्रं मदिरासवं सुहृद्वल्लभकाव्यञ्च वन्दिभिर्बहुधोच्यते ॥
सटङ्कानां मुकुटमकुटायमानपद्मरागद्युतिविद्योतितपादयोः सुचरितैर्गुण-
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitized by eGangotri

An exact line-by-line transcription of the text on the plate:

Plate XLV.
लिपिपत्र ४५वां.
चालुक्य वंशी राजाओं के लेख और दानपत्रों से.
(ई. स. की छठी और सातवीं शताब्दी).
चालुक्य वंशी राजा मंगलीश्वर के समय के बादामी के लेख से (शक सं. ५०० = ई. स. ५७८).
अ क क ख ग च ज ट ड ण त य द ध ध न न प फ ब
ब भ म म य य र र ल व व श श ष स ह दा भि
री ली सु पृ क्क क्क मो यो पौ च ङ्ग चक्रे श्व ङ्क द्र र्त्य र्थ्य श्री द्वि.
चालुक्य वंशी राजा पुलकेशी (दूसरे) के हैदराबाद के दानपत्र से (शक सं. ५३४ = ई. स. ६१२).
अ आ इ उ क ख ग घ ट ड त य द ध न व भ र कृ ज्ञ.
पूर्वी चालुक्य राजा सर्वलोकाश्रय (मंगियुवराज) के चेंडलूर के दानपत्र से (ई. स. ६७३).
आ इ ए अं क क ख ग घ क क त द न ब र स ह
[

Plate XLVI.
लिपिपत्र ४६वां.
केंडूर से मिले हुए पश्चिमी चालुक्य वंशी राजा कीर्तिवर्मन् (दूसरे) के दानपत्र से.
(श. सं. ६७२ = ई. स. ७५०).
अ आ इ ई उ क क ख ख ग घ च च ज ज ज ट ड ढ
[वर्ण-चिह्न पंक्ति १]
ण ण त थ थ द ध ध न न प फ ब ब भ भ म म
[वर्ण-चिह्न पंक्ति २]
य य र र ल ल व व श ष स स ह ह ळ ळ ळ
[वर्ण-चिह्न पंक्ति ३]
र् का गा जा दा भि लि वि की दी नी कु भु मु झू घू भू
[वर्ण-चिह्न पंक्ति ४]
सू कृ पृ पृ णे वे शे रै यो लो पौ क्रा क्र च्च च्छ ञ्जा
[वर्ण-चिह्न पंक्ति ५]
ञ्च ञ्च ङ्क ष्ट्रा न्त त्म त्रा न्भू र्क र्त्य र्म्म र्व्या ष्प ग्य ष्ठे ४थी.
[वर्ण-चिह्न पंक्ति ६]
[दानपत्र का मूल आलेख - लिपि पंक्ति १]
[दानपत्र का मूल आलेख - लिपि पंक्ति २]
[दानपत्र का मूल आलेख - लिपि पंक्ति ३]
[दानपत्र का मूल आलेख - लिपि पंक्ति ४]
[दानपत्र का मूल आलेख - लिपि पंक्ति ५]
[दानपत्र का मूल आलेख - लिपि पंक्ति ६]
[दानपत्र का मूल आलेख - लिपि पंक्ति ७]
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Plate XLVII.
लिपिपत्र ४७वां.
कड़ब से मिले हुए राष्ट्रकूट वंशी राजा प्रभूतवर्ष (गोविंदराज तीसरे) के दानपत्र से.
(श. सं ७३५ = ई. स. ८१३).
अ आ दू ई उ ए क क ख ख ख ग घ च छ ज ज
ज ट ड ढ ढ ण त थ द द ध न प फ ब भ भ म
म म य र र ल ल व व श श ष स स ह ळ ळ र
क् त् न् का टा या ला नि त्रि ली खु कू चू कृ णे घे ये
वै गै मो लो लो वो शो सौ क्क क्त ग्धा चे श्च ण्ड ण्ड ञ्च
त्स त्न न्धे ब्ध र्ग र्थ र्नि श्री स्थि स्त्र ४५ ४५. ळ ळ. ऌ.
[अभिलेख-अंश / मूल लिपि पाठ - पंक्ति १]
[अभिलेख-अंश / मूल लिपि पाठ - पंक्ति २]
[अभिलेख-अंश / मूल लिपि पाठ - पंक्ति ३]
[अभिलेख-अंश / मूल लिपि पाठ - पंक्ति ४]
[अभिलेख-अंश / मूल लिपि पाठ - पंक्ति ५]
[अभिलेख-अंश / मूल लिपि पाठ - पंक्ति ६]
[अभिलेख-अंश / मूल लिपि पाठ - पंक्ति ७]
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Plate XLVIII. लिपिपत्र ४८वां.
पूर्वी चालुक्य वंशी राजा भीम (दूसरे) और अम्म (दूसरे) के दानपत्रों से.
(ई. स. की १०वीं शताब्दी).
पागनवरं मे मिलेहुए राजा भीम (दूसरे) के दानपत्र से (ई. स. की १०वीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध).
अ आ इ उ ए क क ख ग घ च ज ट ड ण त थ
द द ध ध न प फ व भ म य र ल ल व व श
ष स ह ळ त् म् णां णा ला या या ति लि रो कु
क्क क्त ग्ने जो कौ क्र त्त ण्ड त्सु ध्या र्के र्त्य र्म्मा ल्ल ४ प.
पूर्वी चालुक्य वंशी राजा अम्म (दूसरे) के दानपत्र से (ई. स. की १०वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध).
इ उ ए क ग ज ट त न फ म र व व श मा खि
बि कु पू भू ह्म ष्ट्र च्छ ज्ञा ट्टा न्द्र न्म न्भा न्ध र्षा ल्ल ष्णो.
स्वस्ति श्रीमत् समस्तभुवनाश्रय श्रीविजयादित्य-
महाराजाधिराज परमेश्वर परममाहेश्वर-
सर्व्वलोकाश्रय श्रीविष्णोर्व्वर्द्धन महाराजा-
धिराज परमेश्वर परमभट्टारक...
...
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Plate XLIX.
लिपिपत्र ४६वां.
कोरुमेल्लि से मिले हुए पूर्वी चालुक्यवंशी राजा राजराज के दानपत्र से.
(ई. स. की ११वीं शताब्दी).
अ अ आ आ इ ई उ ए क ख ग घ च च छ ज ट ट
[तदनुरूप लिपि-चिह्न]
ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म म य र ल
[तदनुरूप लिपि-चिह्न]
ल व श ष स ह र त् न् ना रा लां कि णि ति रि त्ति जी
[तदनुरूप लिपि-चिह्न]
भी मो नु रु चू सू दृ वृ जें ते दे ने ये तै तो
[तदनुरूप लिपि-चिह्न]
धो भो मो मो पो भौ क्र क्रो च्र च्रो ङ्के ङ्गे दृ ण्डी सा
[तदनुरूप लिपि-चिह्न]
हे द्व न्न न्नी न्मु प्र न्न र्बु र्म्मा र्ग्य ष्ट्र श्री द्या द्वा
[तदनुरूप लिपि-चिह्न]
ष्णो स्मा स्य स्व स्मो स्त्र . ञ ञा . ख र . ञ खा . ञ .
[तदनुरूप लिपि-चिह्न]
[मूल दानपत्र की लिपिबद्ध पंक्तियाँ:]
[पंक्ति १: प्राकृत/संस्कृत प्रशस्ति का प्रारम्भिक भाग]
[पंक्ति २: प्रशस्ति पाठ]
[पंक्ति ३: प्रशस्ति पाठ]
[पंक्ति ४: प्रशस्ति पाठ]
[पंक्ति ५: प्रशस्ति पाठ]
[पंक्ति ६: प्रशस्ति पाठ]
[पंक्ति ७: प्रशस्ति पाठ]
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Plate L. लिपिपत्र ५०वां.
काकतीयवंशी राजा रुद्रदेव और गणपति के समय के लेखों से.
(ई. स. की १२वीं और १३वीं शताब्दी).
काकतीयवंशी राजा रुद्रदेव के अनमकोंडा के लेख से (श. सं. १०८४ = ई. स. ११६२).
अ आ इ ई उ ए ओ घ ट ठ ड ढ थ ध भ ष स ळ.
𑠀 𑠁 𑠂 𑠃 𑠄 𑠆 𑠈 ... [काकतीय-लिपि वर्णमाला]
काकतीयवंशी राजा गणपति के समय के चेब्रोलू के लेख से (श. सं. ११३५ = ई. स. १२१३).
अ आ इ ई उ ऊ ए ओ क ख ग घ च छ ज झ ट
[काकतीय-लिपि वर्णमाला]
ठ ड ण त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व
[काकतीय-लिपि वर्णमाला]
श ष स ह ळ ऱ् त् न् का टा ला कि रि वि दी री कु
[काकतीय-लिपि वर्णमाला]
पू पृ के दे कै दै बो ह्यं गौ सौ त्ति ज्ञ् ण्ण नं स्त्री
[काकतीय-लिपि वर्णमाला]
द्रु प्रे भ्रां र्ग्यं ल्ल ष्कि श्री ष्ट्रा स्थ स्फा. ऋ. ॠ. ऌ. ऐ.
[काकतीय-लिपि वर्णमाला]
[अभिलेख पाठ पंक्ति १ - काकतीय लिपि]
[अभिलेख पाठ पंक्ति २ - काकतीय लिपि]
[अभिलेख पाठ पंक्ति ३ - काकतीय लिपि]
[अभिलेख पाठ पंक्ति ४ - काकतीय लिपि]
[अभिलेख पाठ पंक्ति ५ - काकतीय लिपि]
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Plate LI.
लिपिपत्र ५१वां.
नामय नायक, अन्नवेम और गणदेव के दानपत्रों से.
(ई. स. की १४वीं और १५वीं शताब्दी).
पीठापुरी के नामय नायक के दोनेपुंडि के दानपत्र से (श. सं १२५८ = ई. स. १३३७).
अ आ ई उ ए क ख ग च ज ट ठ ड ण त त थ
అ ఆ ఈ ఉ ఎ క ఖ గ చ జ ట ఠ డ ణ త త థ
द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष ष स
ద ధ న ప ఫ బ భ మ య ర ల వ శ ష ష స
ह ळ ऱ दा मा खि रि वि गी मु ऊ भू जूं
హ ళ ఱ దా మా ఖి రి వి గి ము ఊ భూ జూం
वै शौ शो पौ चि न्ना च्छु ज्ञा न्नों श्री श्री स्तु स्या स्सौ.
వై శౌ శో పౌ చి న్నా చ్ఛు జ్ఞా న్నో శ్రీ శ్రీ స్తు స్యా స్సౌ.
वनपल्ली से मिले हुए अन्नवेम के दानपत्र से मुख्य मुख्य अक्षर (श. सं १३०० = ई. स. १३७८).
आ ऋ च फ म ळ त टा षा पु यै हो ख्यै ह्न प्रशो.
ఆ ఋ చ ఫ మ ళ త టా షా పు యై హో ఖ్యై హ్న ప్రశో.
कोण्डवीडु के राजा गणदेव के दानपत्र से (श. सं. १३७७ = ई. स. १४५५).
अ ट च प व ह न् ढा ला ति लो ङ्क्ष टृ न्ना श्रो श्रो.
అ ట చ ప వ హ న్ ఢా లా తి లొ ఙ్క్ష తృ న్నా శ్రో శ్రో.
ఁ|ఁ శ్రీఉమామహేశ్వరాభ్యాం నమః। దాయాద్వః (श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः । पायाद्वः)
కరివదనః ప్రతనిజదానస్తుతాదివావిగనౌ। (करिवदनः प्रथितनिजदानस्तुतो दिवाविशनौ ।)
నిసదతి ముహురంపిదత్తె కర్ణౌ యః రన్త- (निसदति मुहुुरपिदत्ते कर्णौ यः रन्त-)
తాలాభ్యాం॥ త్రివిష్టరంస్తు భవదిష్టత్థలప్రదా- (तालाभ्यां ॥ त्रिविष्टरंस्तु भवदिष्टस्थलप्रदा-)
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Plate LII.
लिपिपत्र ५१वां.
पल्लववंशी राजाओं के समय के १० लेखों और कूरम के दानपत्र से.
(ई. स. की सातवीं शताब्दी).
पल्लववंशी राजा नरसिंहवर्मन् के समय के मामल्लपुरं के छोटे छोटे ६ लेखों से.
अ अ अ ए द न न प भ य य श ह जा ळि :
[पल्लव लिपि वर्णमाला रूप - मामल्लपुरं लेख]
पल्लववंशी राजा राजसिंह के समय के कांचीपुरं के कैलासनाथ नामक मंदिर के लेख से.
अ इ ए घ च ज थ ध न प ब भ ल व म् टा णा मा
[पल्लव लिपि वर्णमाला रूप - कांचीपुरं लेख, पंक्ति १]
ळां ति षि रो गु दू पूहू क्ल ह खैः क्र चु ङ्क ज्ञा ञ्च र्थ्य
[पल्लव लिपि वर्णमाला रूप - कांचीपुरं लेख, पंक्ति २]
कूरम से मिले हुए पल्लववंशी राजा परमेश्वरवर्मन् के दानपत्र से.
अ आ इ ई उ ए क ख ग घ च ज ट ड ण त थ द ध
[पल्लव लिपि वर्णमाला रूप - कूरम दानपत्र, पंक्ति १]
न न प प फ ब भ म य र ल व श ष स ह ह ळ मा
[पल्लव लिपि वर्णमाला रूप - कूरम दानपत्र, पंक्ति २]
सिं ती कु णु गृह क्त भृ तो हो पौ च्त च्छ ज्ञा ञ्च ण्ड्य भ र्म्म.
[पल्लव लिपि वर्णमाला रूप - कूरम दानपत्र, पंक्ति ३]
[कूरम दानपत्र का मूल पल्लव लिपि अभिलेख - पंक्ति १]
[कूरम दानपत्र का मूल पल्लव लिपि अभिलेख - पंक्ति २]
[कूरम दानपत्र का मूल पल्लव लिपि अभिलेख - पंक्ति ३]
[कूरम दानपत्र का मूल पल्लव लिपि अभिलेख - पंक्ति ४]
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Plate LIII. लिपिपत्र ५३वां.
पल्लव और पाण्ड्यवंशी राजाओं के समय के लेख और दानपत्रों से.
(ई. स. की ८वीं शताब्दी).
मावलीपुरं के अतिरणचंडेश्वर नामक गुफामंदिर के लेख से (ई. स. की ८वीं शताब्दी).
अ आ इ क ख ग च ण द ध व जा शु श्च ष्णा स्था स्य.
[अतिरणचंडेश्वर गुफामंदिर लेख के वर्ण/अक्षर-चिह्न]
कशाकूडि से मिले हुए पल्लव राजा नंदिवर्मा के दानपत्र से (ई. स. की ८वीं शताब्दी).
अ आ इ ई उ ए ऐ क ख ग घ च छ ज ट ड ण त
[कशाकूडि दानपत्र के वर्ण/स्वर-व्यंजन चिह्न]
थ द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह ळ
[कशाकूडि दानपत्र के व्यंजन चिह्न]
न म का या रि णी कु तु पु धू भू द्ध दृ चे के कै तो कौ
[कशाकूडि दानपत्र के मात्रा-युक्त वर्ण चिह्न]
मौ क्त च चि ङ्ग च्छ ज्ञा ञ्च ण्ठ ण्ड त्या त्य न्द्र र्द्र ब्द श्रो स्थि.
[कशाकूडि दानपत्र के संयुक्ताक्षर चिह्न]
पाण्ड्यवंशी राजा परान्तक के समय के नारसिंगं के लेख से (कलियुग सं. ३८७१ = ई. स. ७७०).
ए क च ज न ष स म् वा हा सी गृ रो ग ण्ड्य ष्णोः.
[नारसिंगं लेख के वर्ण/संयुक्ताक्षर चिह्न]
[पाण्ड्य/पल्लव कालीन अभिलेख का मूल प्रतिरूप - पंक्ति १]
[पाण्ड्य/पल्लव कालीन अभिलेख का मूल प्रतिरूप - पंक्ति २]
[पाण्ड्य/पल्लव कालीन अभिलेख का मूल प्रतिरूप - पंक्ति ३]
[पाण्ड्य/पल्लव कालीन अभिलेख का मूल प्रतिरूप - पंक्ति ४]
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