प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 268, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंPlate XLI. लिपिपत्र ४१वां.
वाकाटक वंशी राजा प्रवरसेन (दूसरे) के तीन दानपत्रों से.
(ई. स. की पांचवीं शताब्दी).
दूदिया से मिले हुए राजा प्रवरसेन (दूसरे) के दानपत्र से.
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सिवनी से मिले हुए राजा प्रवरसेन (दूसरे) के दानपत्र से.
ज ज फ ब भ ल ट् म् थि बे मो क्रा ङ्गो ड्वा त्र त्रा र्ध्व श्री.
चम्मच से मिले हुए राजा प्रवरसेन (दूसरे) के दानपत्र से.
इ ई उ च ज ट ण न भ या धृ ये श्न च्छ न्ता य्य ष्ठि स्त्रो.
दृष्टं । स्वस्ति प्रवरपुरा । दग्निष्टोमाप्तोर्यामोक्थ्यषोडश्यतिरात्र -
वाजपेयबृहस्पतिसवसाद्यस्क्राचतुरश्वमेधयाजिनः विष्णुवृद्धसगोत्र -
स्य सम्राजः वाकाटकानां महाराजश्रीप्रवरसेनस्य सूनोः
सूनोः अत्यन्तस्वामिमहाभैरवभक्तस्य अंसभारसन्निवेशित - ऌ -
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