परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
( १२ )
आभारी हूँ। बड़ौदा विश्वविद्यालय, बड़ौदा से प्रकाशित परशुरामकल्पसूत्र की
छायाप्रति इन्हीं की है, जिससे यह सम्पादन-कार्य मैंने किया है। श्रीविद्या के
अनुराग से आरक्त अन्तर्दृष्टि से विशिष्ट, इष्ट-कर्मनिष्ठ, कर्मण्यता के प्रतीक पुरुष
की पुष्टि पुष्कर-विष्टरा त्रिविष्टपवन्दनीया माँ महालक्ष्मी करें, यही प्रार्थना है।
इसी सन्दर्भ में श्री अनूप कुमार नागर, संचालक, श्रीजी कम्प्यूटर
प्रिन्टर्स, नाटी इमली, वाराणसी को मैं अपना विशेष हार्दक्य अर्पित कर रहा
हूँ। आपके विशिष्ट मनोयोगपूर्वक मुद्रण-प्रक्रिया के द्वारा इस महान् ग्रन्थ का
प्रकाशन एक सुखद अनुभव है। मैं इनके उत्कर्ष की कामना करता हूँ।
विदुषामनुचरः
परमहंसमिश्रः
शुद्ध-ज्येष्ठ शुक्लषष्ठी, २०५६ ए. ३६, बादशाहबाग
वाराणसी
श्रीपरशुरामकल्पसूत्रम्
विषयानुक्रमणी
पृष्ठ-संख्या
प्रस्तावना १-२
पुरोवाक् ३-८
श्रीविद्योपासनाविमर्श ९-१४
प्रथमः खण्डः दीक्षाविधिः १-४६
क्रम सं. सूत्राङ्क विषयक्रम
१ १ प्रतिज्ञा १
२ २ पञ्चमुखों से पञ्चाम्नाय प्रवर्त्तन १-३
३ ३ सिद्धान्त सूचना ३
४ ४ सिद्धान्त प्रवर्त्तक सूत्र ३-७
५ ५ शिव और जीव-परिभाषा ७-८
६ ६ पुरुषार्थ परिभाषा ८-९
७ ७ शब्द परिभाषा ९-१०
८ ८ मन्त्रशक्ति १०
९ ९ सर्वसिद्धि के साधन १०-१२
१० १० प्रामाण्य १२-१३
११ ११ अन्तरात्मवित्ति के उपाय १३-१४
१२ १२ आनन्द का स्वरूप, देह में आनन्द का
अवस्थान, पञ्चमकार, इनसे अर्चन का विधान १४-१५
१३ १३ उपासकधर्म-आज्ञासिद्धि १५-१६
( १४ )
१४ १४ दर्शननिन्दा का निषेध १६-१७
१५ १५ शास्त्रविरुद्ध गुरुवचन भी अमान्य १७
१६ १६ सत्यनिष्ठ शिष्य को रहस्यकथन का निर्देश १७-१८
१७ १७ उपास्य विद्या का नित्य अनुसन्धान आवश्यक १८-१९
१८ १८ सतत शिवता का समावेश आवश्यक १९-२०
१९ १९ क्रोध, काम आदि लोकविरुद्ध आचरण
का निषेध २०-२१
२० २० एक गुरु की उपासना का निर्देश २१-२२
२१ २१ निष्परिग्रहता धर्म २३
२२ २२ फलाकांक्षारहित कर्म करने का निर्देश २३-२४
२३ २३ नित्यकर्म लोप अनुचित २४
२४ २४ पञ्चमकार के अभाव में भी क्रम का
पालन अनिवार्य २४-२५
२५ २५ सर्वत्र निर्भयता का उपदेश २५
२६ २६ सारभूतधर्म-वेद्य ही हव्य, इन्द्रियाँ स्रुक्
शक्ति ज्वाला, स्वात्मा ही शिव, स्वयं होता २५-२६
२७ २७ निर्विषय चिद्विमर्श ही फल २६-२७
२८ २८ आत्मलाभ सर्वोत्कृष्ट फल, इससे
बढ़कर कुछ नहीं २७
२९ २९ शास्त्रशैली २७-२८
३० ३० स्वशास्त्र प्रशंसा (गुप्त विद्या) २८-२९
३१ ३१ दीक्षा अनिवार्यतः आवश्यक २९-३०
३२ ३२ तीन प्रकार की दीक्षाएँ ३०-३१
३३ ३३ दीक्षा क्रमिक रूप से सभी या एक ही
आवश्यक वैमत्य का उल्लेख ३१
३४ ३४ गुरुद्वारा दीक्षा की प्रक्रिया ३२-३४
३५ ३५ शाम्भवी दीक्षा ३४-३५
( १५ )
३६ ३६ शाक्ती दीक्षा ३५-३७
३७ ३७ मान्त्री दीक्षा ३७-३९
३८ ३८ मातृका यन्त्र ३९-४१
३९ ३९ मान्त्री दीक्षा का उपसंहार ४१-४२
४० ४० गुरुकर्तृक शेष कर्म का निर्देश ४२-४३
४१ ४१ गुरुपादुका मन्त्र ४३-४४
४२ ४२ आचारानुशासन सन्दर्भ में शिष्य के प्रति
कर्त्तव्य का निर्देश ४४
४३ ४३ शिष्य का कर्त्तव्य ४५-४६
द्वितीयः खण्डः महागणपति-क्रमः ४७-६५
४४ १ गणपति उपासना पद्धति का परामर्श ४७-४८
४५ २ श्रीगणपति उपासना प्रकार ४८-५१
४६ ३ देवतर्पण का उपदेश ५१-५३
४७ ४ पूजाविधि ५३-५५
४८ ५ अर्घ्यस्थापन विधि ५५-५७
४९ ६ करणीय कार्य ५७-५८
५० ७ पीठनियमपूर्वक यन्त्रोद्धार ५८-६०
५१ ८ प्रधान एवं सह मिथुन देवतर्पण ६०-६२
५२ ९ गणपति उपतर्पण और जप आदि ६२-६३
५३ १० गणपति के स्वात्मविलापन के सन्दर्भ में
हवन आदि का विधान ६३-६५
तृतीयः खण्डः श्रीक्रमः श्रीललिताधिकारः ६६-९७
५४ १ शक्ति चक्रैक नायिका श्रीललिता का क्रमारम्भ ६६-६८
५५ २ ब्राह्ममुहूर्त्त में जागकर परमशिवरूप
गुरुदेव का स्मरण ६८-६९
( १६ )
५६ ३ मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त स्वात्मसंविद्
भगवती का ध्यान और कादि या हादि
विद्या का दश बार आवर्त्तन ६९-७०
५७ ४ स्नान विधि और मार्त्तण्डभैरव सूर्य को
अर्घ्य का विधान ७०-७१
५८ ५ श्रीचक्र भावन, त्रिपुरसुन्दरी गायत्री से उसे भी
अर्घ्य देकर १०८ बार जप, मौन का निर्देश ७१-७२
५९ ६ यागमन्दिर प्रवेश, आसन ग्रहण ७२
६० ७ त्रितारी का उच्चारण कर पुष्पाञ्जलि ७२-७३
६१ ८ सभी मन्त्रों के आदि में त्रितारी प्रयोग का
निर्देश एवं त्रितारी का कथन ७३-७४
६२ ९ श्रीचक्र का स्वरूप, चक्र रचना के साधक द्रव्य ७४-७६
६३ १० चक्र में मन्दिराद्यर्चन क्रम ७६-७८
६४ ११ गन्धपुष्पाक्षतादि स्थान, दीपदान, मूल से
चक्र की अर्च्चा का निर्देश ७८-७९
६५ १२ बीजों के प्रयोगपूर्वक प्राणायाम से शोषण,
दहन और आप्लावन का विधान ७९
६६ १३ तीन प्राणायाम का निर्देश ७९
६७ १४ देव्यहंभावयुक्त वज्रकवचप्रयोग ८०
६८ १५ सर्वप्रथम करशुद्धिन्यास का निर्देश ८०-८१
६९ १६ आत्मरक्षा न्यास ८१
७० १७ चतुरासन न्यास की दिव्यविधि ८३
७१ १८ श्रीचक्रादि आसन के तीन मन्त्र ८२-८३
७२ १९ बालाषडङ्गन्यास, दक्षिणामूर्ति-संहितां का प्रमाण ८३-८४
७३ २० वशिन्यादियोगिनी न्यास ८४-८६
७४ २१ मूलमन्त्र न्यास ८६
( १७ )
७५ २२ पात्रस्थापन विधि ८७-८८
७६ २३ सामान्य, विशेष अर्घ्य ८८
७७ २४ द्वादशकलात्मक सूर्य और षोडशकलात्मक
चन्द्र की कलाओं को अर्घ्य प्रदान करने का
निर्देश और अर्घ्य मन्त्र ८८-८९
७८ २५ अकथ त्रिकोण में ४८ वर्णों का प्रयोग, मध्य
में वाक्, काम और शक्ति बीजों का प्रयोग ८९-९१
७९ २६ चौरानबे मन्त्रों के प्रयोग से द्रव्य संस्कार ९१-९२
८० २७ अखण्डादि पाँच मन्त्रों के वैकल्पिक
प्रयोग का निर्देश ९२-९३
८१ २८ अनुष्टुप् विद्या ९३-९५
८२ २९ अमृतेशी मन्त्र ९५
८३ ३० वाग्वादिनी विद्या सहित पाँच मन्त्रों से
अर्घ्यशोधन ९५-९६
८४ ३१ अर्घ्यपात्रस्थ बिन्दुओं से कुण्डलिनी-
ज्वाला में होम ९६-९७
८५ ३२ अर्घ्य शोधनविधि की पूर्णता का निर्देश ९७
चतुर्थः खण्डः ललिताक्रमः ९८-११२
८६ १ हृदयचक्र में उपस्थित सुषुम्णा के भेदन में
दक्ष आद्या संविद् को श्वास के माध्यम से
कुसुमाञ्जलि में आनयन की सुगम प्रक्रिया ९८-१००
८७ २ माया, लक्ष्मी और पराबीजों का उच्चारण कर
अमृतचैतन्यमूर्ति देवी का प्रकल्पना १००-१०१
८८ ३ सहस्रार में कारणानन्दविग्रहा माँ ललिता
बैन्दवचक्राधीश्वरी का समन्त्रक आवाहन १०१
८९ ४ त्रितारीपूर्व उपचार मन्त्रों से ६४ उपचारों
का प्रयोग १०१-१०२
( १८ )
९० ५ ६४ उपचारों का प्रकल्पन १०२-१०५
९१ ६ नव मुद्रायें १०५-१०६
९२ ७ मूल से त्रिधा सन्तर्पण १०६
९३ ८ देवी का षडङ्ग पूजन १०६-१०७
९४ ९ नित्यापूजन १०७-१११
९५ १० ओघत्रयपूजन १११-११२
पञ्चमः खण्डः ललितानवावरणपूजाक्रमः ११३-१३३
९६ १ प्रथमावरण व्यष्टि-पूजा ११३-११५
९७ २ समष्टिपूजा ११५-११६
९८ ३ करशुद्धि मन्त्र, त्रिपुराचक्रेश्वरी का परामर्श
संक्षोभिणी मुद्रा-प्रदर्शन ११६-११७
९९ ४ द्वितीयावरण-पूजा ११७-११८
१०० ५ तृतीयावरण-पूजा ११८-११९
१०१ ६ चतुर्थावरण-पूजा ११९-१२०
१०२ ७ पञ्चमावरण-पूजा १२०-१२१
१०३ ८ षष्ठावरण-पूजा १२१-१२२
१०४ ९ सप्तमावरण-पूजा १२२-१२३
१०५ १० आयुध-पूजा १२३
१०६ ११ अष्टमावरण-पूजा १२३-१२४
१०७ १२ कामेश्वरी आदि शक्तियों की मूलदेवी
से अभिन्नता १२४-१२५
१०८ १३ अतिरहस्य योगिनियों का चक्रावस्थान,
त्रिपुराम्बा का भावन और पराबीजमुद्राकृति १२५-१२६
१०९ १४ नवमावरण-पूजा १२६
११० १५ नवावरणपूजोपरान्त धूप-दीपादि समर्पण १२७-१२८
१११ १६ कामकलाध्यान १२८
( १९ )
११२ १७ सौभाग्यहृदय रूप पराबीज का विमर्श १२८-१२९
११३ १८ बलिप्रकार १२९
११४ १९ बलिदान मन्त्र १३०
११५ २० प्रदक्षिणादि १३०-१३१
११६ २१ शक्तिपूजा, मपञ्चक से सन्तर्पण १३१
११७ २२ चिदग्नि में हविःशेष का होम १३२
११८ २३ देवीविसर्जन, खेचरी प्रयोग और देवी का
स्वात्मसंयोजन १३२-१३३
षष्ठः खण्डः: श्यामाक्रमः १३४-१६५
११९ १ श्यामोपास्ति-विधि, परशिवेश्वरी साम्राज्ञी की
सचिवरूपा शक्ति १३४-१३५
१२० २ श्यामोपास्तिशङ्कासमाधानकारक दृष्टान्त १३५-१३६
१२१ ३ उपास्ति-विधि १३६
१२२ ४ मन्त्रभस्म-जलस्नान, वस्त्रपरिधान १३७
१२३ ५ सन्ध्या विधान १३७
१२४ ६ यागगृह प्रवेश और पूजन क्रम १३७-१३८.
१२५ ७ प्राणायाम प्रकार १३८
१२६ ८ अस्त्रमन्त्रप्रयोग और व्यापक-विधि १३७
१२७ ९ वायु, अग्नि, वरुण और धरा बीजों के प्रयोग
से देहदाहपूर्वक शिवचैतन्य का समुत्पादन १३८-१४०
१२८ १० प्राणायाम से तेजमय शरीर का प्रकल्पन् १४०
१२९ ११ षडङ्गबालासहित मातृका का मूलाधार, हृदय
और मुख में रतिप्रीतिमनोभव सहित विन्यास १४०-१४१
१३० १२ मूलविद्या का १७ भाग, उनका निर्धारित
अङ्गों में न्यास १४१-१४३
१३१ १३ पंचम न्यास १४३
( २० )
१३२ १४ मन्दिरार्चन १४३-१४६
१३३ १५ श्यामाक्रम में सभी मन्त्रों में विशेष बीजों
के प्रयोग का निर्देश १४६
१३४ १६ प्रयोगकर्त्ता के व्यक्तित्व का आकर्षक रूप १४६-१४७
१३५ १७ श्यामाचक्र-लेखन १४७
१३६ १८ सामान्यार्घ्य-विधि १४७-१४९
१३७ १९ विशेषार्घ्य-विधि १४९-१५२
१३८ २० श्रीदेवता श्रीमूर्त्ति का प्रकल्पन १५२-१५५
१३९ २१ आवरण पूजा १५५
१४० २२ पूजा में वाम और दक्ष हस्त प्रयोग में
विशेष निर्देश १५५
१४१ २३ प्रथमावरणदेवता और स्थान १५५-१५६
१४२ २४ द्वितीयावरण-पूजा १५६-१५७
१४३ २५ तृतीयावरण-पूजा १५७-१५८
१४३ २६ चतुर्थावरण-पूजा १५८
१४४ २७ पञ्चमावरण-पूजा १५९
१४५ २८ षष्ठावरण-पूजा १५९
१४६ २९ सप्तमावरण-पूजा १५९-१६०
१४७ ३० आवरण के बाहर के देव और उनके यजन १६०
१४८ ३१ सम्प्रदाय के गुरुओं की पूजा १६०-१६१
१४९ ३२ गुरुपादुका-पूजा १६१
१५० ३३ बलिप्रदान और बाला से षोडशोपचारपूजन १६१
१५१ ३४ बलि प्रकार १६२
१५२ ३५ बलिप्रदान की इतिकर्त्तव्यता १६२-१६३
१५३ ३६ सुवासिनी पूजा १६३
( २१ )
१५४ ३७ जप आदि, ब्राह्मण भोजन १६३-१६४
१५५ ३८ मन्त्रजप कर्त्ता के धर्म १६४
१५६ ३९ ललितोपासक धर्म १६४-१६५
सप्तमः खण्डः वाराही क्रमः १६६-१९७
१५७ १ श्रीललिता त्रिपुरसुन्दरी की दण्डनायिका
वाराही की उपासना-विधि का उपक्रम १६६
१५८ २ महासत्र की परिभाषा और उसमें अनाहत
ध्वनि का अवमर्श १६६-१६७
१५९ ३ गुरुनमस्कार और मूर्धा में अञ्जलि का विधान १६७-१६८
१६० ४ सभी मन्त्रों के साथ इस क्रम में 'ग्लौं'
बीजमन्त्र का प्रयोग १६८-१६९
१६१ ५-६ लिङ्ग-देह-शोधन, इसके छः मन्त्र, शाम्भव-
शरीरोत्पादन, भूतशुद्धि १६९-१७०
१६२ ७ मातृका-सम्पुटित बीजन्यास १७०-१७२
१६३ ८ अङ्गुलिन्यास १७१-१७२
१६४ ९ हृदयादिन्यास १७२-१७३
१६५ १० आत्मालङ्करण १७३
१६६ ११ अर्घ्यशोधन १७३-१७४
१६७ १२ अर्घ्यशोधनानन्तर करणीय न्यास १७४-१७७
१६८ १३ तत्त्वन्यास १७८
१६९ १४ देवीध्यान १७९
१७० १५ चक्रनिर्माण १७९-१८०
१७१ १६ चक्रकर्त्तव्य १८०-१८१
१७२ १७ चक्रमन्त्र १८१
१७३ १८ मण्डलादियजन, तत्त्वमन्त्र, गुणमन्त्र और आत्म-
मन्त्र— यहाँ तक सत्ताइस पीठ पूजन पूर्ण १८१-१८२
( २२ )
१७४ १९ चक्र के ऊपर देवी के आसन का विमर्श १८२
१७५ २० मूर्तिकरणी विद्या १८२-१८३
१७६ २१ आवाहनादि ९ मुद्राओं का प्रयोग १८३
१७७ २२ षडङ्ग-पञ्चाङ्ग न्यास १८४
१७८ २३ षोडशोपचार १८४
१७९ २४ देवी का ध्यान १८५
१८० २५ देवी का तर्पण १८५
१८१ २६ आवरण पूजा (प्रथम) १८५-१८६
१८२ २७ द्वितीय आवरण पूजा १८६
१८३ २८ तृतीय आवरण पूजा १८६-१८९
१८४ २९ तृतीयावरण पूजा पूर्ण १८९
१८५ ३० चतुर्थावरण पूजा १८९-१९०
१८६ ३१ पञ्चमावरण पूजा १९०-१९१
१८७ ३२ षष्ठावरण पूजा १९१-१९२
१८८ ३३ देवी का सन्तर्पण एवम् उपचरण १९२-१९३
१८९ ३४ बलिदान प्रकार १९३-१९४
१९० ३५ गुरु सन्तुष्टि का विधान १९४
१९१ ३६ शक्ति आदि की पूजा १९४-१९५
१९२ ३७ हवन मन्त्र साधन १९५-१९६
१९३ ३८ पूजा, शेष कृत्य १९६-१९७
अष्टमः खण्डः पराक्रमः १९८ · २१२
१९४ १ पराबीज और विद्या की एकरूपता के
अवमर्शपूर्वक पूजा का निर्देश १९८
१९५ २ उपासना हेतु १९८-१९९
१९६ ३ अनुत्तर पद्धति-कथन की प्रतिज्ञा १९९
( २३ )
१९७ ४ पराध्यान १९९-२००
१९८ ५ स्नानादि कर्म विधान २००
१९९ ६ आसन विधि २००-२०१
२०० ७ देशिक यजन २०१
२०१ ८ विघ्नोत्सारण २०१-२०२
२०२ ९ अङ्गन्यास २०२
२०३ १० चिदग्नि में सर्वतत्त्वविलापन २०२-२०३
२०४ ११ अर्घ्य के लिये मण्डलविधान २०३-२०४
२०५ १२ अर्घ्य २०४
२०६ १३ पराक्रम के मन्त्रों में योजनीय बीजमन्त्र २०४
२०७ १४ बीज-मन्त्रावयवों से न्यास २०४-२०५
२०८ १५ न्यासित देवी पूजन २०५
२०९ १६ सुधादेवी पूजन २०५
२१० १७ तत्त्वसमूह का हृदय में आनयन २०६
२११ १८ पराचक्र का उपक्रम और निर्माण २०६-२०७
२१२ १९ चक्र में देवी का आवाहन २०७
२१३ २० देवी का ध्यान २०७
२१४ २१ पूजाप्रकार २०८-२०९
२१५ २२ कृत्य शेष २०९
२१६ २३ अर्घ्य का मुख में निवेदन २०९
२१७ २४ चिदग्नि का उद्दीपन २०९
२१८ २५ ओघत्रयार्चन २१०
२१९ २६ दिव्यौघादि-कथन २१०-२११
२२० २७ बलिदान २११
२२१ २८ हवि-शेष-स्वीकरण २११-२१२
( २४ )
नवमः खण्डः होमविधिः २१३-२२८
२२२ १ स्वेष्ट मन्त्र होम विधान की प्रतिज्ञा २१३
२२३ २ स्वेष्ट मन्त्र होम विधान की विधि २१३-२१४
२२४ ३ सामान्य जल से प्रोक्षण २१४
२२५ ४ रेखाओं का निर्माण २१४
२२६ ५ उनमें देवार्चन २१४-२१५
२२७ ६ स्वदेह में षडङ्ग न्यास और उन्हीं मन्त्रों
से कुण्डपूजा २१५
२२८ ७ अग्निचक्र-निर्माण, पूजन २१५-२१६
२२९ ८ अग्निप्रतिष्ठा,- ध्यान २१६-२१७
२३० ९ संविदग्नि-पातन २१७-२१८
२३१ १० इन्धन का कवचमन्त्र और आच्छादन २१८
२३२ ११ उपस्थापन २१८
२३३ १२ मन्त्रप्रयोग २१९
२३४ १३ प्रज्वालन मन्त्र २१९
२३५ १४ अग्निसंस्कार २१९-२२०
२३६ १५ परिषेचन आदि २२०-२२१
२३७ १६ साधिताग्नि-ध्यान २२१
२३८ १७ अग्निचक्र और अष्टकोणों में देवस्थापन २२१-२२२
२३९ १८ सप्तजिह्वाहुतियाँ २२२
२४० १९ कर्मशेष २२२-२२३
२४१ २० इष्टदेवताऽऽवाहन २२३
२४२ २१ चक्रदेवियों की पूजा २२३
२४३ २२ प्रधान होम धर्म २२४
२४४ २३ काम्य होम विधि २२४
२४५ २४ साधन सहित होम २२४-२२६
( २५ )
२४५ २५ बलिदान २२६
२४६ २६ महाव्याहृति होम २२६-२२७
२४७ २७ ब्रह्मार्पणाहूति २२७
२४८ २८ विसर्जन (उद्वासन) २२७
२४९ २९ भस्मधारण आदि २२८
दशमः खण्डः सर्वसाधारणः क्रमः २२९-२७३
२५० १ सामान्य कर्माधिकार २२९-२३०
२५१ २ सन्ध्या से अर्घ्यशोधनपर्यन्त कार्यों में न्यास
को छोड़कर श्यामा की तरह कार्य विधि का
अतिदेश २३०
२५२ ३ सर्वसाधारण न्यास २३०
२५३ ४ चक्रनिर्माण २३०-२३१
२५४ ५ षडावरणी पूजा २३१
२५५ ६ सभी मन्त्रों में योजनीय बीज २३१
२५६ ७ आवाहनादि मन्त्र २३१-२३२
२५७ ८ रश्मिमाला २३२
२५८ ९ विनियोग २३२-२३३
२५९ १० रश्मिमाला के पुरुष मन्त्र २३३-२३४
२६० ११ चाक्षुषमती विद्या २३५
२६१ १२ कन्याविवाहदायिनी विद्या २३६
२६२ १३ सङ्कटहारिणी विद्या २३६
२६३ १४ जल-विपत्तिशमनी विद्या २३६-२३७
२६४ १५-१६ महाव्याधिविनाशिनी विद्या २३७
२६५ १७ प्रत्यूहशमनी महागणपतिविद्या २३७-२३८
२६६ १८ शिवतत्त्वविमर्शिनी विद्या २३८
२६७ १९ मृत्यु की भी मृत्यु (अपमृत्युनाशिनी विद्या) २३८-२३९
( २६ )
२६८ २० श्रुतधारिणी विद्या २३९
२६९ २१ सर्वज्ञताकरी विद्या २३९
२७० २२ पाँच रश्मियों का भावन २४०
२७१ २३ लोपामुद्रोपास्य शिवादि हादिविद्या स्वरूप-
प्रकाशनविद्या २४०
२७२ २४ षट्कूटा सम्पत्करी विद्या कालसङ्कर्षिणी २४०-२४१
२७३ २५ परमायुःप्रदायिनी विद्या २४१-२४२
२७४ २६ शुद्धज्ञानमयी शाम्भवी विद्या २४२-२४३
२७५ २७ पराविद्या २४३
२७६ २८ पञ्चमन्त्राधिष्ठान २४३
२७७ २९ बाला या कुमारी विद्या २४३-२४४
२७८ ३० अन्नपूर्णा विद्या २४४
२७९ ३१ अश्वारूढ़ा प्रत्यङ्गविद्या २४४
२८० ३२ श्रीपादुका विद्या २४५
२८१ ३३ मूलाधारविलोचनीया विद्या २४५-२४६
२८२ ३४ मूलविद्या २४६
२८३ ३५ लघुश्यामा २४६
२८४ ३६ वाग्वादिनी विद्या २४६-२४७
२८५ ३७ नकुली श्यामा विद्या २४७
२८६ ३८ श्यामा पादुकाविद्या २४७
२८७ ३९ हृदय में ध्यातव्य श्यामा २४८
२८८ ४० श्यामाविद्या (८९ वर्णमयी) २४८-२४९
२८९ ४१ लघुवार्त्ताली विद्या २४९
२९० ४२ स्वप्न वार्त्ताली २४९
२९१ ४३ तिरस्करिणी २४९-२५०
२९२ ४४ वार्त्ताली पादुका २५०
( २७ )
२९३ ४५ आज्ञा में भूदारमुखी २५०
२९४ ४६ वाराही विद्या २५०-२५१
२९५ ४७ श्रीपूर्त्ति विद्या (ब्रह्मरन्ध्र) २५१
२९६ ४८ महापादुका विद्या २५१-२५२
२९७ ४९ महासिद्धिप्रदायिनी (द्वादशान्त) २५२
२९८ ४९ अविद्यालयकर्त्री २५२
२९९ ५० रश्मिमालामन्त्र-प्रयोक्ता ही परमशिव २५२
३०० ५१ ललिता-जपविघ्ननिवारक मन्त्र २५३-२५४
३०१ ५२ श्यामाजपविघ्नहर मन्त्र २५४
३०२ ५३ वाराही-जपविघ्नहर मन्त्र २५४
३०३ ५४ उक्त मन्त्र जपारम्भ में ही जप्य २५४-२५५
३०४ ५५ ललिता, श्यामा, वार्त्ताली और परा विद्याओं
के जप समय २५५
३०५ ५६ मपञ्चक प्रातिनिध्य हेतु २५५-२५७
३०६ ५७ उपासक धर्म सर्वभूताविरोध २५७
३०७ ५८ परिपन्थियों का निग्रह २५७
३०८ ५९ संश्रितों पर अनुग्रह २५८
३०९ ६० गुरुपुत्र-कलत्र में गुरु भाव २५८
३१० ६१ दोषप्रद पदार्थ का त्याग २५८-२५९
३११ ६२ आदिम द्रव्य की ग्राह्यता का विमर्श २५९-२६०
३१२ ६३ पञ्चमकार-ग्राह्यता का विमर्श २६०
३१३ ६३ मकार के पाँचों द्रव्य २६१
३१४ ६४ कुलाचार धर्म-प्रवृत्ति २६१-२६२
३१५ ६५ दश कुलवृक्ष रक्षणीय २६२
३१६ ६६ विशिष्ट धर्मान्तर २६२-२६३
३१७ ६७ पञ्चपर्व की विशेष अर्चायें २६३
( २८ )
३१८ ६८ आयु स्तर के उल्लास के
विशिष्ट समयाचार २६३-२६४
३१९ ६९ अवशिष्ट उपासक धर्म २६४-२६५
३२० ७० आठ पाशों का अवसादन २६५
३२१ ७१ अन्य धर्म २६५-२६६
३२२ ७२ अभ्यर्हितों का आदर २६६
३२३ ७३ प्रकाश की विभावना २६६
३२४ ७४ स्वार्था, गुर्वर्था धारणा २६७
३२५ ७५ गुरु द्वारा उक्त ही कार्य २६७
३२६ ७६ अविचारणीय आदेश २६७
३२७ ७७ सत्य-पालन-दृढता २६८
३२८ ७८ परदार-धन में अनासक्ति २६८
३२९ ७९ आत्मश्लाघा आदि वर्जित सात व्यवहार २६८
३३० ८० सामयिक मुख्य धर्म २६८-२६९
३३१ ८१ शास्त्रान्तर में अनुशिष्ट धर्म भी ग्राह्य २६९
३३२ ८२ कुल-मार्गनिष्ठ की प्रशंसा २६९-२७०
३३३ ८३ दशखण्डी इस महोपनिषद् के अध्येता
की प्रशंसा २७०-२७१
३३४ ८४ पाँच अव्यय शब्दों से पाँच खण्ड
का आकलन २७१-२७२
३३५ ८५ ग्रन्थकार-स्तुति, वृत्तिकार-परिचय, ग्रन्थ-
रचनाकाल २७२-२७३
परशुरामकल्पसूत्रम्
दीक्षाविधिः
[ प्रथमः खण्डः ]
इह खलु श्रीभगवान् परशुरामस्तुरीयपुरुषार्थसाधनं
लघुमध्वानं दर्शयन् प्रतिजानीते—
अथातो दीक्षां व्याख्यास्यामः ।।१।।
अत्र अथशब्दः मङ्गलद्योतकः। अतःशब्दश्च आनन्तर्यद्योतकः। दीक्षा-
पदार्थं सूत्रकारोऽग्रे विवेचयिष्यति। व्याख्यापदार्थश्च निगूढाभिप्रायकशब्दस्य
विविच्य कथनम्। प्रकृते गूढार्थानां तन्त्राणामुपसंहारेण विविच्य कथनं कल्पसूत्रे
इति लक्षणसमन्वयः।।१।।
परशुरामकल्पसूत्र का यह प्रथम सूत्र है। इसमें चार शब्दों का प्रयोग किया
गया है— १. अथ, २. अतः, ३. दीक्षां और ४. व्याख्यास्यामः। अथ शब्द
मङ्गलवाचक है। प्रारम्भ में विषयप्रवर्त्तन 'अथ' शब्द से करने की भारतीय परम्परा
है। उसी का अनुसरण यहाँ किया गया है। अतः शब्द आनन्तर्य का बोधक
है। इसके पहले के कार्य की समाप्ति और उसके बाद नये कार्य के प्रारम्भ
की प्रवृत्ति का आकलन इससे होता है। दीक्षा आँख में अञ्जन की तरह
सर्वदोषनाशिका परमार्थपरिष्कारिका गुरुतः प्राप्त मन्त्रादि-वरद प्रक्रिया है। ग्रन्थ
में आगे चलकर इसका स्पष्टीकरण करेंगे। व्याख्या गूढ अभिप्राय से भरे शब्दों
का विवेकपूर्ण निर्वचन करती है। सूत्र में वर्तमान की उपेक्षा कर भविष्यत् प्रयोग
अभिप्रायगर्भ प्रयोग है।।१।।
भगवान् परमशिवभट्टारकः श्रुत्याद्यष्टादशविद्याः सर्वाणि
दर्शनानि लीलया तत्तदावस्थापन्नः प्रणीय संविन्मय्या भगवत्या
२ परशुरामकल्पसूत्रम्
भैरव्या स्वात्माभिन्नया पृष्टः पञ्चभिः मुखैः पञ्चाम्नायान् परमार्थ-
सारभूतान् प्रणिनाय ।। २ ।।
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः ।
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इति स्मृतः ।।
इत्येतादृशषड्गुणैश्वर्यसम्पन्नो भगवान् परमशिवभट्टारकः श्रुत्याद्यष्टादशविद्याः
(श्रुतयः चत्वारि, तदङ्गानि शिक्षा, व्याकरणं, कल्पः, छन्दः, ज्योतिषं,
निरुक्तं चेति षट्, मीमांसा, न्यायः, पुराणं, धर्मशास्त्रम् इति चतुर्दशविद्याः,
आयुर्वेदः, धनुर्वेदः, गान्धर्वं, नीतिशास्त्रम् इति चतस्रः, एवमष्टादशविद्याः),
सर्वाणि दर्शनानि, शाक्तदर्शनादीनि, दृश्यतेऽनेनेति दर्शनम्, ज्ञानसाधनम्,
शैवदर्शनम्, वैष्णवदर्शनम्, ब्राह्मदर्शनम्, सौरदर्शनम्, बौद्धदर्शनं चेति षट्
दर्शनानि, लीलयाऽनायासेन तत्तदावस्थापन्नः प्रणीय निर्माय, संविन्मय्या
भगवत्या भैरव्या स्वात्माभिन्नया पृष्टः पञ्चभिः मुखैः सद्योजात-वामदेव-अघोर-
तत्पुरुष-ईशान-संज्ञकैः मुखैः पञ्चाम्नायान् पूर्व-दक्षिण-पश्चिमोत्तराम्नायान्।
परमार्थः अकृत्रिमः तुरीयः पुरुषार्थः तस्मिन् सारभूतान् प्रणिनाय निर्ममे ।। २ ।।
समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य इन सर्वोत्कृष्ट गुणों
से सम्पन्न भगवान् परमशिव भट्टारक ने अनायास समस्त विद्याओं के अधिष्ठाता
होने के कारण तत्तदावस्थापन्न स्थिति में अष्टादश विद्याओं की रचना की।
साङ्ग चारों वेद, शिक्षा-व्याकरण-कल्प-छन्द-ज्योतिष-निरुक्त, पुराण-धर्मशास्त्र
और मीमांसा, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्व और नीतिशास्त्र कुल मिलाकर ये
अष्टादश विद्यायें होती हैं। ये सभी भगवद्रचित विद्यायें हैं।
इनके अतिरिक्त छः दर्शन भी भगवत्प्रवर्त्तित हैं। जिनके द्वारा वास्तविक
दर्शन होता है, उन्हें दर्शन कहते हैं। ये छः माने जाते हैं— १. शैवदर्शन,
२. वैष्णवदर्शन, ३. ब्राह्मदर्शन, ४. सौरदर्शन, ५. शाक्तदर्शन और
६. बौद्धदर्शन। पाणिनि, व्यास आदि अवस्थापन्न होकर परमशिवभट्टारक ने
ही सर्वविद्याओं, शास्त्रों और दर्शनों का इस प्रकार प्रवर्त्तन किया। इसमें
उन्हें कोई प्रयास नहीं करना पड़ा वरन् लीलापूर्वक ही यह प्रणयन
सम्पन्न हुआ।
दीक्षाविधिः ३
अभी 'प्रणीय' रूप पूर्वकालिक क्रिया पूरी हुई और अग्रिम सक्रियता होने
ही वाली थी कि, एक लोकोत्तर अनुयोगात्मक स्पन्दन घटित हो गया।
स्वात्माभिन्न भाव से ऐकात्म्य में उल्लसित भगवती संवित् शक्ति ने आगे
की सक्रियता पर प्रश्नचिह्न उपस्थित कर दिया। उस अलौकिक अव्यक्त अनुयोग
का आन्तर ऊहन भगवान् भट्टारक ने तुरत कर लिया और परिणामस्वरूप उनके
पाँचों मुखों से वाणी की तरङ्गिणी ही फूट-सी पड़ी। उन्होंने सद्योजात, वामदेव,
अघोर, तत्पुरुष और ईशान मुखों से पूर्वाम्नाय, दक्षिणाम्नाय, पश्चिमाम्नाय,
उत्तराम्नाय और ऊर्ध्वाम्नाय नामक पाँच आम्नायों का प्रवर्त्तन भी किया। ये पाँचों
आम्नाय परमार्थसारभूत माने जाते हैं॥२॥
तत्रायं सिद्धान्तः॥३॥
तत्र पञ्चाम्नायेषु, अयं वक्ष्यमाणः सिद्धान्तो विचार्य वादजनित-
निर्णयजनितविषयोऽर्थः॥३॥
उक्त पाँचों आम्नायों के व्यापक वैचारिक परिवेश की असीमता में वस्तु
तथ्य का आकलन कर भगवान् परशुराम ने यह सिद्धान्त निर्धारित किया। वाद
आदिकों के वैचारिक ऊहापोह के उपरान्त निर्णयात्मक सत्य-अर्थ ही 'सिद्धान्त'
की संज्ञा से विभूषित होता है॥३॥
सिद्धान्तप्रवर्त्तकसूत्राणि-
षट्त्रिंशत्तत्त्वानि विश्वम्॥४॥
तदित्थं केवलनिजरूपेण अवस्थितस्य 'बहु स्यां प्रजायेय' इति
इच्छाज्ञानक्रियात्मिकाः शक्तयस्ताभिर्योगे क्रमेण अर्थशब्दसृष्टी अङ्कुरच्छायावद्
युगपद् भवतः। तादृशसिसृक्षारूपोपाधिविशिष्टः परमशिव एव केवलशिव-
पदवाच्यो भवति। स एव तत्त्वानां मध्य आदिमः।
सा पूर्वोदिता सिसृक्षा द्वितीयं तत्त्वं शक्तिरिति। जगतः अहन्तया
यद्दर्शनं तदहमितिवृत्तिमान् सदाशिवपदवाच्यस्तृतीयं तत्त्वम्।
इदं जगदिति केवल-भेदविषयिणी सा वृत्तिस्तद्वान् ईश्वरपदवाच्यस्तुरीयं
तत्त्वम्। जगदहमेवेत्याकारिका या सदाशिवसम्बन्धिनी वृत्तिः सा विद्यापद-
वाच्या पञ्चमं तत्त्वम्।