परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 30, कुल 320 में से
संदर्भ में पढ़ें( १६ )
५६ ३ मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त स्वात्मसंविद्
भगवती का ध्यान और कादि या हादि
विद्या का दश बार आवर्त्तन ६९-७०
५७ ४ स्नान विधि और मार्त्तण्डभैरव सूर्य को
अर्घ्य का विधान ७०-७१
५८ ५ श्रीचक्र भावन, त्रिपुरसुन्दरी गायत्री से उसे भी
अर्घ्य देकर १०८ बार जप, मौन का निर्देश ७१-७२
५९ ६ यागमन्दिर प्रवेश, आसन ग्रहण ७२
६० ७ त्रितारी का उच्चारण कर पुष्पाञ्जलि ७२-७३
६१ ८ सभी मन्त्रों के आदि में त्रितारी प्रयोग का
निर्देश एवं त्रितारी का कथन ७३-७४
६२ ९ श्रीचक्र का स्वरूप, चक्र रचना के साधक द्रव्य ७४-७६
६३ १० चक्र में मन्दिराद्यर्चन क्रम ७६-७८
६४ ११ गन्धपुष्पाक्षतादि स्थान, दीपदान, मूल से
चक्र की अर्च्चा का निर्देश ७८-७९
६५ १२ बीजों के प्रयोगपूर्वक प्राणायाम से शोषण,
दहन और आप्लावन का विधान ७९
६६ १३ तीन प्राणायाम का निर्देश ७९
६७ १४ देव्यहंभावयुक्त वज्रकवचप्रयोग ८०
६८ १५ सर्वप्रथम करशुद्धिन्यास का निर्देश ८०-८१
६९ १६ आत्मरक्षा न्यास ८१
७० १७ चतुरासन न्यास की दिव्यविधि ८३
७१ १८ श्रीचक्रादि आसन के तीन मन्त्र ८२-८३
७२ १९ बालाषडङ्गन्यास, दक्षिणामूर्ति-संहितां का प्रमाण ८३-८४
७३ २० वशिन्यादियोगिनी न्यास ८४-८६
७४ २१ मूलमन्त्र न्यास ८६